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Tuesday, April 14, 2026
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तेल संकट के बीच भारत का बड़ा दांव, रूसी कच्चे तेल की खरीद फिर तेज

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वैश्विक ऊर्जा संकट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने अपनी रणनीति पूरी तरह साफ कर दी है। दुनिया जहां कच्चे तेल की कमी और सप्लाई चेन के दबाव से जूझ रही है, वहीं भारत ने बिना देरी किए रूस से कच्चे तेल की खरीद एक बार फिर तेज कर दी है। साफ संकेत है कि अब भारत के लिए सबसे अहम मुद्दा सस्ता तेल नहीं बल्कि लगातार और सुरक्षित सप्लाई है।

भारत अपनी करीब 90 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में मिडिल ईस्ट में जरा सी भी अस्थिरता देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डालती है। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से बड़ी मात्रा में तेल की सप्लाई होती है, वहां बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने चिंता और बढ़ा दी है। इसी अनिश्चितता के बीच भारत ने अपनी खरीद रणनीति को तेजी से बदला है।

ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2026 में भारत ने रूस से करीब 1.98 मिलियन बैरल प्रति दिन कच्चा तेल खरीदा, जो जून 2023 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। अप्रैल में यह आंकड़ा घटकर 1.57 मिलियन बैरल प्रति दिन पर आ गया, लेकिन इसकी वजह मांग में कमी नहीं बल्कि तकनीकी कारण बताए जा रहे हैं। नायरा एनर्जी की रिफाइनरी में मेंटेनेंस शटडाउन के चलते सप्लाई में अस्थायी गिरावट आई है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे ही यह मेंटेनेंस पूरा होगा, खरीद फिर से तेजी पकड़ सकती है।

ऊर्जा बाजार की विशेषज्ञ वंदना हरि का कहना है कि मौजूदा हालात में भारत जितना संभव हो उतना रूसी तेल खरीद रहा है। उनके अनुसार, जब तक पर्शियन गल्फ से सप्लाई में अनिश्चितता बनी रहेगी, तब तक भारत रूसी तेल पर निर्भरता बनाए रखेगा। यह एक रणनीतिक कदम है ताकि भविष्य में किसी बड़े संकट से बचा जा सके। वहीं, पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने भी साफ किया है कि सरकार का मुख्य फोकस देश की ऊर्जा जरूरतों को हर हाल में पूरा करना है। उन्होंने कहा कि सभी फैसले तकनीकी और व्यावसायिक व्यवहार्यता के आधार पर लिए जाते हैं, ताकि सप्लाई में कोई रुकावट न आए।

दरअसल, यह पहली बार नहीं है जब भारत ने रूस की ओर रुख किया हो। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए थे, तब भारत ने डिस्काउंट का फायदा उठाते हुए बड़ी मात्रा में रूसी तेल खरीदा था और रूस का प्रमुख खरीदार बन गया था। हालांकि 2025 में अमेरिकी दबाव और कुछ प्रतिबंधों के चलते इसमें थोड़ी कमी आई, लेकिन मौजूदा वैश्विक संकट ने भारत को फिर उसी रणनीति की ओर लौटने पर मजबूर कर दिया है।

इस बीच ग्लोबल ऑयल मार्केट से एक और चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। समुद्र में जमा रूसी तेल का स्टॉक तेजी से घट रहा है। पिछले साल के अंत में यह करीब 155 मिलियन बैरल था, जो अब घटकर लगभग 100 मिलियन बैरल रह गया है। इसका सीधा मतलब है कि वैश्विक स्तर पर मांग बढ़ रही है और सप्लाई पर दबाव लगातार बना हुआ है।

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, सप्लाई चेन में अनिश्चितता और घटते ग्लोबल स्टॉक के बीच भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी कीमत पर ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। आने वाले दिनों में अगर हालात ऐसे ही बने रहते हैं, तो भारत रूस से तेल खरीद और बढ़ा सकता है। कुल मिलाकर, मौजूदा हालात में भारत का यह कदम एक रणनीतिक और दूरदर्शी फैसला माना जा रहा है, जो देश को संभावित ऊर्जा संकट से बचाने में अहम भूमिका निभा सकता है।