
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार समेत कई राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए चुनाव आयोग को राहत दी है। अदालत ने साफ कहा कि मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण कराना चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार है और इसमें किसी प्रकार की कानूनी खामी नहीं पाई गई।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत मतदाता सूची को अद्यतन और शुद्ध बनाए रखने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने माना कि विशेष परिस्थितियों में आयोग सामान्य प्रक्रिया से अलग व्यवस्था अपना सकता है और इसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।
दरअसल, बिहार में वर्ष 2025 में शुरू किए गए SIR अभियान को लेकर विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि इस प्रक्रिया के जरिए नागरिकता सत्यापन की कोशिश की जा रही है और इससे बड़ी संख्या में लोगों के नाम मतदाता सूची से हट सकते हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव आयोग का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक पारदर्शी, त्रुटिरहित और विश्वसनीय बनाना है। कोर्ट ने यह भी माना कि फर्जी, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाने तथा नए पात्र मतदाताओं को जोड़ने के लिए इस तरह का विशेष पुनरीक्षण जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को बड़ी कानूनी मजबूती मिली है। बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और अन्य राज्यों में भी SIR प्रक्रिया लागू की जा चुकी है। आयोग का कहना है कि इससे चुनाव प्रक्रिया अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी बनेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत के इस फैसले से भविष्य में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर उठने वाले विवादों पर भी असर पड़ेगा। वहीं विपक्षी दलों ने कहा है कि वे इस प्रक्रिया पर नजर बनाए रखेंगे ताकि किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से बाहर न हो।













