
संसद के उच्च सदन राज्यसभा में उपसभापति पद के लिए शुक्रवार को होने वाले चुनाव की तस्वीर लगभग साफ हो गई है। सत्तारूढ़ गठबंधन की ओर से नामित सदस्य हरिवंश का इस पद पर दोबारा आसीन होना अब महज एक औपचारिकता रह गया है। जहाँ सत्ता पक्ष ने उनके समर्थन में पांच प्रस्तावों के नोटिस दाखिल किए हैं, वहीं विपक्ष ने इस पूरी प्रक्रिया से दूरी बनाने का निर्णय लेते हुए चुनाव के बहिष्कार का एलान कर दिया है।संसद के उच्च सदन राज्यसभा में उपसभापति पद के चुनाव को लेकर तस्वीर लगभग साफ हो गई है। सत्तारूढ़ गठबंधन की ओर से हरिवंश का दोबारा चयन तय माना जा रहा है, जबकि विपक्ष ने इस प्रक्रिया का बहिष्कार करने का फैसला लिया है।
निर्विरोध जीत के आसार
राज्यसभा सचिवालय को अब तक केवल हरिवंश के पक्ष में ही नामांकन मिले हैं। विपक्ष की ओर से कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा गया, जिससे उनका निर्विरोध चुना जाना लगभग निश्चित है। अगर ऐसा होता है, तो यह उनका लगातार तीसरा कार्यकाल होगा। 9 अप्रैल को उनका पिछला कार्यकाल समाप्त हो गया था, जिसके बाद यह पद रिक्त हो गया। बाद में उन्हें फिर से राज्यसभा के लिए नामित किया गया और अब वे दोबारा उपसभापति बनने जा रहे हैं।
विपक्ष ने चुनाव से दूरी बनाते हुए सरकार पर कई सवाल उठाए हैं। जयराम रमेश ने कहा कि लोकसभा में उपाध्यक्ष पद लंबे समय से खाली है, जो संसदीय परंपराओं के खिलाफ है। इसके अलावा हरिवंश के पुनर्नियोजन की प्रक्रिया को असामान्य बताया गया और यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने विपक्ष से कोई चर्चा नहीं की। विपक्ष ने साफ किया है कि उनका विरोध किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि सरकार की कार्यशैली के खिलाफ है। साथ ही उम्मीद जताई गई है कि हरिवंश दोबारा पद संभालने पर सदन में सभी पक्षों को समान महत्व देंगे।
कुल मिलाकर, राज्यसभा में उपसभापति का चुनाव इस बार औपचारिकता बन गया है, लेकिन इसके बहाने सियासी टकराव एक बार फिर सामने आ गया है।













