
एंटी-डंपिंग ड्यूटी लागू होने से भारत हर साल करीब ₹28,540 करोड़ की विदेशी मुद्रा बचा सकता है। इसके साथ ही घरेलू उद्योगों में लगभग ₹70,000 करोड़ तक नए निवेश को बढ़ावा मिल सकता है। यह दावा सेंटर फॉर डोमेस्टिक इकॉनमी पॉलिसी रिसर्च (C-DEP) और केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के सेंटर फॉर WTO स्टडीज की संयुक्त रिपोर्ट में किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, लंबे समय से सस्ते विदेशी आयात के कारण घरेलू उद्योगों और छोटे एवं मध्यम उद्योगों (MSME) पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। अध्ययन में कहा गया है कि समय पर एंटी-डंपिंग उपाय लागू करने से घरेलू उत्पादन क्षमता को मजबूती मिलेगी और स्थानीय उद्योगों को सहारा मिल सकेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी विदेशी मुद्रा बचाने और घरेलू उत्पादों को बढ़ावा देने की अपील कर रहे हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बढ़ते आयात का असर न केवल विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहा है, बल्कि भारतीय उद्योगों की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा भी प्रभावित हो सकती है।
एंटी-डंपिंग ड्यूटी उन मामलों में लगाई जाती है, जब विदेशी कंपनियां अपने उत्पादों को घरेलू बाजार की तुलना में कम कीमत पर दूसरे देशों में बेचती हैं। सरकार इस शुल्क के जरिए घरेलू उद्योगों को अनुचित प्रतिस्पर्धा से बचाने का प्रयास करती है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हाल के वर्षों में कुछ अवधियों के दौरान एंटी-डंपिंग सिफारिशों के लागू नहीं होने के कारण चीन से आयात में वृद्धि दर्ज की गई। अध्ययन के मुताबिक, घरेलू उत्पादन क्षमता मौजूद होने के बावजूद बढ़ते आयात से विदेशी मुद्रा और उद्योगों की स्थिरता पर दबाव बढ़ रहा है।
रिपोर्ट में बताया गया कि भारत एंटी-डंपिंग ड्यूटी के इस्तेमाल में कई बड़े देशों की तुलना में अपेक्षाकृत संतुलित नीति अपनाता रहा है। भारत में ऐसी ड्यूटी की औसत अवधि 6.97 वर्ष है, जबकि वैश्विक औसत 11.19 वर्ष माना गया है।













