
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पीजी मेडिकल पाठ्यक्रमों में आरक्षण से जुड़े अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पीजी मेडिकल पाठ्यक्रमों में राज्य के निवास के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। इस फैसले के बाद राज्य में स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रमों की प्रवेश प्रक्रिया में मेरिट और संवैधानिक समानता के सिद्धांत को प्राथमिकता मिलेगी।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी 2025 को दिए अपने महत्वपूर्ण फैसले में पीजी मेडिकल पाठ्यक्रमों में निवास आधारित आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि राज्य के निवास के आधार पर इस तरह का आरक्षण संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन है। देश के प्रत्येक नागरिक को किसी भी राज्य में शिक्षा प्राप्त करने और व्यवसाय करने का समान अधिकार है।
मेरिट के आधार पर होंगे पीजी मेडिकल में दाखिले
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि पीजी मेडिकल पाठ्यक्रमों की राज्य कोटे की सीटों पर दाखिले मुख्य रूप से अखिल भारतीय स्तर की प्रवेश परीक्षा में प्राप्त मेरिट के आधार पर होने चाहिए। हालांकि, अदालत ने सीमित संस्थागत वरीयता की व्यवस्था को मान्यता दी है।
अदालत के अनुसार, एमबीबीएस पाठ्यक्रमों में कुछ हद तक निवास आधारित आरक्षण दिया जा सकता है, लेकिन पीजी मेडिकल शिक्षा के स्तर पर इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता और उच्च चिकित्सा शिक्षा के महत्व को देखते हुए प्रवेश प्रक्रिया में योग्यता को प्राथमिकता देना जरूरी है।
पहले से दाखिला ले चुके छात्रों को राहत
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया था कि निर्णय से पहले निवास आधारित आरक्षण के तहत पीजी मेडिकल पाठ्यक्रमों में दाखिला ले चुके विद्यार्थियों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। जो छात्र पहले से पढ़ाई कर रहे हैं या अपना पाठ्यक्रम पूरा कर चुके हैं, उनके दाखिले सुरक्षित रहेंगे।
उत्तराखंड हाईकोर्ट के इस फैसले को राज्य में पीजी मेडिकल दाखिलों की आरक्षण व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे प्रवेश प्रक्रिया में समानता और मेरिट के सिद्धांत को प्राथमिकता देने का रास्ता साफ होगा।













