
राजधानी दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भले ही अमेरिका का हिस्सा न हो, लेकिन इस बार बैठक के एजेंडे पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का असर साफ दिखाई दे सकता है। 12 और 13 सितंबर को होने वाले सम्मेलन में ब्रिक्स के सदस्य और आमंत्रित देशों के नेता वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, ऊर्जा और बदलती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करेंगे। इनमें अमेरिका की व्यापार नीति, टैरिफ और डॉलर के वैश्विक दबदबे से जुड़े सवाल भी अहम रहने की संभावना है।
ब्रिक्स के विस्तार के बाद इस समूह में शामिल देशों के हित पहले की तुलना में कहीं अधिक विविध हो गए हैं। रूस और ईरान जहां अमेरिका के प्रति ज्यादा सख्त रुख की उम्मीद कर सकते हैं, वहीं भारत, चीन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के लिए अमेरिका के साथ अपने संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में ब्रिक्स के लिए किसी एक मुद्दे पर साझा और आक्रामक रणनीति बनाना आसान नहीं होगा।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाने की
मेजबान भारत के सामने इस सम्मेलन में सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग हितों वाले देशों को एक मंच पर साथ लाने की होगी। भारत एक ओर ब्रिक्स के भीतर विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करना चाहता है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को भी प्रभावित नहीं करना चाहेगा।
अमेरिका और भारत के बीच व्यापार समझौते को लेकर चल रही बातचीत के बीच नई दिल्ली ऐसा कोई संयुक्त बयान नहीं चाहेगी, जिससे वाशिंगटन के साथ उसके संबंधों में अनावश्यक तनाव पैदा हो। इसी तरह चीन भी ब्रिक्स को सीधे तौर पर अमेरिका के खिलाफ खड़े मंच के रूप में पेश करने से बचना चाहेगा।
ट्रंप लगातार ब्रिक्स को लेकर चेतावनी देते रहे हैं
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले कुछ समय से ब्रिक्स देशों की उन कोशिशों की आलोचना करते रहे हैं, जिनका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करना है। इसे आम तौर पर ‘डी-डॉलराइजेशन’ कहा जाता है।
ट्रंप पहले चेतावनी दे चुके हैं कि यदि ब्रिक्स देश अमेरिकी डॉलर के विकल्प के रूप में किसी दूसरी मुद्रा को बढ़ावा देते हैं या वैश्विक व्यापार में डॉलर की भूमिका कम करने की कोशिश करते हैं, तो अमेरिका उन पर भारी टैरिफ लगा सकता है। ऐसे में दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स सम्मेलन आर्थिक सहयोग के साथ-साथ वैश्विक व्यापार व्यवस्था को लेकर भी महत्वपूर्ण संदेश दे सकता है।
ईरान और पश्चिम एशिया का मुद्दा भी अहम
सम्मेलन में पश्चिम एशिया की स्थिति और ईरान से जुड़ा तनाव भी प्रमुख मुद्दों में शामिल हो सकता है। रूस और ईरान जैसे देश अमेरिका के खिलाफ अपेक्षाकृत कड़ा रुख चाहते हैं, लेकिन ब्रिक्स के दूसरे सदस्य देशों के लिए परिस्थितियां अलग हैं।
संयुक्त अरब अमीरात के अमेरिका के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं और वहां अमेरिकी सैन्य मौजूदगी भी है। ऐसे में उसके लिए ऐसा कोई रुख अपनाना मुश्किल होगा, जिससे ईरान के पक्ष में सीधा संदेश जाए। यही वजह है कि ब्रिक्स के भीतर अमेरिका और पश्चिम एशिया के मुद्दे पर एकमत बनना आसान नहीं माना जा रहा।
ब्रिक्स की आर्थिक ताकत लगातार बढ़ी
इन मतभेदों के बावजूद पिछले एक दशक में ब्रिक्स का आर्थिक और रणनीतिक महत्व काफी बढ़ा है। समूह में दुनिया की बड़ी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा शामिल है। ब्रिक्स अब खुद को विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
ब्रिक्स की प्रमुख उपलब्धियों में न्यू डेवलपमेंट बैंक शामिल है, जिसने विकास और बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराया है। इसके अलावा सदस्य देशों के लिए 100 अरब डॉलर का आकस्मिक रिजर्व तंत्र भी बनाया गया है। स्थानीय मुद्राओं में आपसी भुगतान को बढ़ावा देने और वित्तीय सहयोग को मजबूत करने पर भी समूह लगातार चर्चा करता रहा है।
भारत के लिए ग्लोबल साउथ में नेतृत्व का अवसर
भारत इस सम्मेलन के जरिए ग्लोबल साउथ में अपनी भूमिका को और मजबूत करना चाहता है। विकासशील देशों को वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दे भारत की विदेश नीति की प्राथमिकताओं से भी जुड़े हैं।
हालांकि, यहां भारत के सामने चीन के बढ़ते प्रभाव की चुनौती भी है। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में चीन की आर्थिक और कूटनीतिक मौजूदगी काफी मजबूत है। ऐसे में भारत के लिए ब्रिक्स का विस्तार इन क्षेत्रों में अपनी पहुंच बढ़ाने और नए साझेदारों के साथ संबंध मजबूत करने का अवसर भी है।
संयुक्त बयान जारी करवाना भारत की बड़ी परीक्षा
सम्मेलन के दौरान भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक परीक्षा यह होगी कि क्या सभी सदस्य देशों की सहमति से एक संयुक्त बयान जारी हो पाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान से जुड़े तनाव, अमेरिका के साथ संबंध और वैश्विक व्यापार जैसे मुद्दों पर देशों के अलग-अलग रुख को देखते हुए यह आसान नहीं होगा।
हालांकि, भारत के पास जी20 की मेजबानी का अनुभव है। 2023 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भी भारत ने सदस्य देशों के बीच सहमति बनाकर संयुक्त घोषणा हासिल की थी। यही अनुभव इस बार भी भारत के काम आ सकता है।
मोदी-शी और मोदी-पुतिन मुलाकात पर भी नजर
ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत कई नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें भी महत्वपूर्ण रहेंगी। भारत और चीन के संबंधों में सुधार की कोशिशों के बीच मोदी और शी की मुलाकात पर खास नजर रहेगी।
वहीं, रूस के साथ भारत के रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को देखते हुए मोदी-पुतिन वार्ता भी अहम होगी। ऊर्जा, व्यापार और आर्थिक सहयोग के अलावा रूस-यूक्रेन संकट जैसे मुद्दे भी बातचीत का हिस्सा बन सकते हैं।
भारत के लिए दांव पर है कूटनीतिक प्रभाव
कुल मिलाकर, दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स सम्मेलन केवल सदस्य देशों की बैठक नहीं है। यह ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहे हैं। अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा, रूस और पश्चिम के बीच तनाव तथा ग्लोबल साउथ की बढ़ती भूमिका ने ब्रिक्स को पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।
भारत के लिए यह सम्मेलन अपनी कूटनीतिक क्षमता और वैश्विक नेतृत्व को प्रदर्शित करने का बड़ा अवसर है। चुनौती यह होगी कि वह रूस, चीन, ईरान और अमेरिका के साथ अलग-अलग हित रखने वाले देशों के बीच ऐसा संतुलन बनाए, जिससे ब्रिक्स की एकता भी बनी रहे और भारत के अपने रणनीतिक हित भी प्रभावित न हों। यही इस सम्मेलन की सबसे बड़ी परीक्षा और भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती होगी।













