
मध्य पूर्व संकट को लेकर ब्रिक्स देशों के बीच साझा रुख बनाने की कोशिशें इस बार गहरे मतभेदों के चलते सफल नहीं हो सकीं। सदस्य देशों के अलग-अलग राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टिकोण के कारण संयुक्त सहमति बनाना मुश्किल साबित हुआ।
सूत्रों के मुताबिक हालिया बैठकों में गाजा और व्यापक मध्य पूर्व की स्थिति चर्चा के केंद्र में रही। हालांकि, युद्धविराम, संघर्ष समाधान और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर सदस्य देशों की प्राथमिकताएं अलग-अलग रहीं। कुछ देशों ने इजराइल की सुरक्षा चिंताओं पर जोर दिया, जबकि अन्य ने फिलिस्तीन के नागरिकों की मानवीय स्थिति और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन की आवश्यकता को प्रमुख बताया।
भारत ने इस मुद्दे पर अपना पारंपरिक और संतुलित रुख दोहराया। सरकार ने स्पष्ट किया कि पश्चिम एशिया में स्थायी शांति केवल संवाद और कूटनीतिक प्रयासों से ही संभव है। भारत ने आतंकवाद और हिंसा का विरोध करते हुए फिलिस्तीनी जनता के वैध अधिकारों का समर्थन किया और दो-राष्ट्र समाधान की वकालत की—जिसमें एक स्वतंत्र और संप्रभु फिलिस्तीन राज्य, सुरक्षित और मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर इजराइल के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में रहे।
राजनयिक सूत्रों का कहना है कि ब्रिक्स जैसे मंच, जहां विविध राजनीतिक व्यवस्थाओं और वैश्विक हितों वाले देश शामिल हैं, वहां अंतरराष्ट्रीय संकटों पर एकमत रुख बनाना स्वाभाविक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है। मध्य पूर्व का मुद्दा विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि इसमें ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय गठजोड़ और वैश्विक शक्ति संतुलन जैसे कई कारक जुड़े हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रिक्स वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है, लेकिन जटिल भू-राजनीतिक मुद्दों पर सदस्य देशों की राष्ट्रीय प्राथमिकताएं अक्सर सामूहिक सहमति को प्रभावित करती हैं। यही वजह रही कि इस बार कोई व्यापक संयुक्त बयान जारी करना आसान नहीं हो सका।













