
अमेरिका में एक नया व्यापारिक प्रस्ताव चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसके तहत भारत और चीन से आयात होने वाले कुछ उत्पादों पर 12.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की बात कही गई है। बताया जा रहा है कि यह प्रस्ताव वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में कथित “जबरन श्रम” (Forced Labor) से जुड़े मामलों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी नीति-निर्माता उन उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने पर विचार कर रहे हैं जिनकी उत्पादन या आपूर्ति प्रक्रिया में मानवाधिकारों के उल्लंघन अथवा जबरन श्रम के इस्तेमाल की आशंका जताई गई है। प्रस्ताव का उद्देश्य वैश्विक व्यापार में पारदर्शिता बढ़ाना और कंपनियों को जिम्मेदार आपूर्ति श्रृंखला अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना बताया जा रहा है।
हालांकि, फिलहाल यह केवल एक प्रस्ताव है और इसे लागू करने के लिए अमेरिकी संसद तथा प्रशासन की मंजूरी आवश्यक होगी। इसके अलावा अंतिम निर्णय से पहले सार्वजनिक चर्चा, विशेषज्ञों की राय और विभिन्न हितधारकों के सुझावों पर भी विचार किया जाएगा। ऐसे में अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि प्रस्तावित टैरिफ कब और किस रूप में लागू किया जाएगा।
व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रस्ताव वास्तविकता में बदलता है तो इसका प्रभाव वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है। विशेष रूप से भारत और चीन से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर अतिरिक्त लागत का दबाव बढ़ सकता है। इससे कुछ उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है।
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि ऐसे कदम वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अस्थिरता पैदा कर सकते हैं। कई अमेरिकी कंपनियां भारत और चीन से आयातित उत्पादों पर निर्भर हैं, ऐसे में अतिरिक्त शुल्क का असर अमेरिकी बाजार और उपभोक्ताओं पर भी दिखाई दे सकता है।
फिलहाल भारत और चीन की ओर से इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो दोनों देश कूटनीतिक और व्यापारिक स्तर पर अपनी चिंताओं को अमेरिका के समक्ष रख सकते हैं।
आने वाले समय में अमेरिकी प्रशासन और संसद की प्रक्रिया के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि प्रस्तावित 12.5 प्रतिशत टैरिफ लागू होता है या नहीं। लेकिन फिलहाल इस प्रस्ताव ने वैश्विक व्यापार जगत में नई चर्चा को जन्म दे दिया है।













