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Wednesday, May 6, 2026
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लिपुलेख दर्रे पर फिर बढ़ा तनाव, नेपाल का दावा, भारत ने किया खारिज

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भारत और नेपाल के बीच एक बार फिर लिपुलेख दर्रा को लेकर कूटनीतिक तनाव बढ़ता नजर आ रहा है। नेपाल ने इस क्षेत्र पर अपना दावा दोहराते हुए भारत से औपचारिक वार्ता की मांग की है। यह विवाद ऐसे समय में फिर सामने आया है जब भारत और चीन के बीच लिपुलेख मार्ग से कैलाश मानसरोवर यात्रा शुरू करने की तैयारी चल रही है।

नेपाल सरकार ने भारत और चीन दोनों को कूटनीतिक ‘प्रोटेस्ट नोट’ भेजकर स्पष्ट किया है कि लिपुलेख क्षेत्र उसके अनुसार नेपाली भूभाग का हिस्सा है। काठमांडू ने कहा है कि उसकी सहमति के बिना वहां किसी भी प्रकार की गतिविधि स्वीकार्य नहीं होगी। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने यह भी बताया कि इस मुद्दे पर देश के भीतर व्यापक राजनीतिक सहमति है और सीमा विवाद का समाधान केवल बातचीत से ही संभव है।

नेपाल का मानना है कि कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख मार्ग का उपयोग उसकी संप्रभुता से जुड़ा संवेदनशील विषय है। उसने भारत से आग्रह किया है कि त्रि-जंक्शन क्षेत्र (भारत-नेपाल-चीन) की स्थिति स्पष्ट किए बिना किसी भी परियोजना या यात्रा संचालन को आगे न बढ़ाया जाए।

वहीं भारत ने नेपाल के दावों को खारिज करते हुए कहा है कि लिपुलेख मार्ग का उपयोग ऐतिहासिक रूप से भारत द्वारा किया जाता रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, 1954 से तीर्थयात्री इसी मार्ग से कैलाश मानसरोवर की यात्रा करते आए हैं और नेपाल के हालिया दावे ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाते।

विशेषज्ञों के मुताबिक यह विवाद केवल सीमा निर्धारण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध सामरिक, व्यापारिक और धार्मिक महत्व से भी जुड़ा है। लिपुलेख दर्रा हिमालय में एक महत्वपूर्ण त्रिकोणीय संपर्क बिंदु है, जो क्षेत्रीय रणनीति के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है।

हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच सीमा नक्शे, सड़क निर्माण और व्यापार मार्गों को लेकर मतभेद सामने आते रहे हैं। हालांकि भारत और नेपाल के संबंध पारंपरिक रूप से मजबूत और सांस्कृतिक रूप से जुड़े रहे हैं, लेकिन ऐसे संवेदनशील मुद्दे समय-समय पर तनाव पैदा करते रहे हैं।

अब यह देखना अहम होगा कि क्या दोनों देश कूटनीतिक संवाद के जरिए इस विवाद का समाधान निकाल पाते हैं या यह मुद्दा आगे भी क्षेत्रीय राजनीति में चर्चा का केंद्र बना रहेगा।