नैनीताल के ऐतिहासिक नावों से जुड़ी दिलचस्प धार्मिक कहानी

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सरोवर नगरी नैनीताल से जुडी एक रोचक और अद्भुत कहानी आज हम आपसे सांझा कर रहे है. नैनीझील में चलने वाली चप्पू वाली नाव की कील खास धार्मिक महत्व रखती है. मान्यताओं के अनुसार तांबे से बनी नाव की कील से बनी अंगूठी और ताबीज पहनने से नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित रहते हैं साथ ही साथ इसकी कील से बनी अंगूठियों के पहनने से ग्रहों के दोष से भी छुटकारा मिलता है. तांबे की इन कीलों को दिल्ली, मुंबई आदि जगहों से मंगवाया जाता है।

नाव मालिक समीति के सचिव नरेंद्र सिंह चौहान के से खास बातचीत के दौरान बताया कि चप्पू वाली नाव को तुन की लकड़ी से बनाया जाता है. तुन की लकड़ी हल्की होती है और पानी से जल्दी खराब भी नहीं होती है. नाव में अलसी के तेल की पालिश की जाती है. नाव बनाने में प्रयोग की जाने वाली तांबे की कील का धार्मिक महत्व कई ज्यादा है।

नरेंद्र बताते हैं कि नाव की कीलों को 20 से 25 सालों बाद निकाला जाता है. मान्यताओं के अनुसार झील के जल में भगवान ब्रह्मा का वास है और नाव की कील कई सालों तक जल के संपर्क में रहती है. यही वजह है कि इस कील में भगवान की विशेष कृपा रहती है. लोग इस कील की अंगूठी, ताबीज बनाकर शरीर में धारण करते हैं।

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जिससे नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव शरीर में नहीं पड़ता. साथ ही ग्रहों के दोष, नजर आदि से छुटकारा मिलता है. नरेंद्र बताते हैं कि नाव की कील के लिए लोग दूर दूर से उनके पास आते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार बदले में दक्षिणा भी देते हैं. मान्यताओं के अनुसार ही कील का आदान प्रदान होता है. लोग इस कील की दक्षिणा 51 रुपए से लेकर 5100 रुपए तक देते हैं।