बांग्लादेश की शेख हसीना बोली मै बनूंगी तीसरी बार सभी की प्रधानमंत्री

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बांग्लादेश आवामी लीग की मुखिया शेख हसीना लगातार तीसरी बार बांग्लाादेश की प्रधानमंत्री बनने जा रही हैं। रविवार को हुए चुनावों में उनकी पार्टी ने बंपर जीत दर्ज की है और अब वह देश की कमान संभालने को तैयार हैं। बांग्लाउदेश के आम चुनाव विपक्ष के लिए बड़ा सदमा हैं क्यों कि विपक्ष को सिर्फ सात सीटें ही हासिल हो सकी हैं।

 

जीत के बाद शेख हसीना नेविपक्ष को सांत्वयना देने के लिए भारत के सत्तासधारी दल बीजेपी और विपक्ष कांग्रेस का उदाहरण दिया है। शेख हसीना ने कहा है कि जब दो सीटों वाली बीजेपी देश के सिंहासन पर आ सकती है तो फिर दूसरों के पास भी मौका है। जोतिया ओकिया फ्रंट जो बांग्ला देश का मुख्यर विपक्ष है और उसे सिर्फ सात सीटें ही हासिल हो सकी हैं। आवामी लीग को 300 में से 288 सीटें यानी 96 प्रतिशत सीटें हासिल हुई हैं।

प्रमुख विपक्षी पार्टियां अब इन नतीजों की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रही हैं। ‘जातीय ओइक्को फ्रंट’ के संयोजक डॉ. कमाल हुसैन जहां न्यायिक निगरानी में दोबारा चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं। वहीं बीएनपी महासचिव मिर्जा फखरूल इस्लाम आलमगीर का कहना है कि चुनाव में जीते उनके पांचों सांसद पद और गोपनीयता की शपथ नहीं लेंगे। विपक्षी पार्टियां जनादेश को खारिज करने की दोहरी गलती कर रहे हैं।

2014 के चुनाव में भी संभावित पक्षपात की आशंका जाहिर करते हुए बीएनपी और उसकी सहयोगी पार्टियां चुनाव में शामिल नहीं हुई थीं। नतीजतन अवामी लीग बगैर किसी खास चुनौती के सरकार बनाने में सफल रही। बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी को यकीन था कि चुनाव बहिष्कार का उसका फैसला सही है, जिसे अवाम भी जायज करार देगी, लेकिन इसके बरक्स बीते दस वर्षों में सांगठनिक स्तर पर पार्टी लगातार कमजोर होती चली गई।

बांग्लादेश में सियासी रूप से अहम माने जाने वाले हिस्सों मसलन-रंगपुर, चटगांव, सिलहट और खुलना डिवीजन जहां कभी बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी की मजबूत पकड़ थी, उन सभी इलाकों से पार्टी का सफाया हो गया।

गौरतलब है कि बांग्लादेश की ‘जातीय संसद’ की सदस्य संख्या 350 है, जिनमें 300 सीटों के लिए मतदान होता है, बाकी 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। इन 50 सीटों के लिए निर्वाचित 300 प्रतिनिधि एकल समानुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर वोट डालते हैं। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव में जबर्दस्त धांधली हुई है। निर्वाचन आयोग ने कहा है कि वह इसकी जांच करेगा।

बांग्लादेश की राजनीति एक लंबे अर्से से शेख हसीना और खालिदा जिया के इर्द-गिर्द ही घूम रही है। बीएनपी की अध्यक्ष बेगम खालिदा जिया भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद जेल में सजा काट रही हैं। उनके बेटे तारिक रहमान को शेख हसीना को जान से मारने के षड्यंत्र में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है और वे लंदन में आत्म निर्वासन में रह रहे हैं।

बेगम जिया के कारावास के बाद उनकी पार्टी की बागडोर तारिक रहमान संभाल रहे है। पिछले कुछ वर्षों में अवामी लीग के नेतृत्व में बांग्लादेश ने आर्थिक रूप से अपनी स्थिति में उल्लेखनीय सुधार किया है। अभी उसकी हालत पाकिस्तान से बेहतर है। यह चुनाव भी शेख हसीना ने विकास के मुद्दे पर ही लड़ा।

उन्होंने ‘डिवेलपमेंट एंड डेमोक्रेसी फर्स्ट’ के साथ स्थायी विकास का नारा दिया था। हालांकि उन पर राजनीतिक हिसाब चुकता करने के आरोप भी लगते रहे हैं। इस चुनाव की मुश्किल यह है कि इसमें विपक्ष का लगभग सफाया हो गया है,जो बांग्लादेश के लिए काफी मुश्किलें पैदा कर सकता है।

पिछले कुछ समय से वहां इस्लामिक कट्टरपंथियों का तेज उभार देखा गया है। उन्होंने आधुनिकता की वकालत और इस्लामी कट्टरपंथ की आलोचना करने वाले कई प्रोग्रेसिव ब्लॉगरों की हत्या की, जिनमें मुस्लिम और हिंदू दोनों शामिल थे। दुर्भाग्यवश, हसीना सरकार ने ऐसे तत्वों के खिलाफ कठोर कदम नहीं उठाए। 1971 के मुक्तियुद्ध के गद्दारों को उन्होंने फांसी जरूर दिलवाई पर इस्लामी कट्टरपंथियों पर हाथ डालने से बचती रहीं। संसदीय प्रतिनिधित्व के अभाव में यह कट्टरवादी तबका आगे और उत्पात मचा सकता है।

ऐन पड़ोस में ऐसे तत्वों का सक्रिय होना हमारे लिए चिंता का विषय रहेगा। शेख हसीना से भारत के रिश्ते बहुत अच्छे हैं,फिर भी बांग्लादेश गए भारतीय नेता वहां के विपक्षी लीडरों से भी मिलते रहे हैं। वहां की आंतरिक राजनीति को लेकर तटस्थता ही हमारी स्थायी नीति होनी चाहिए। हमारी भलाई इसी में है कि यह पड़ोसी मुल्क अमन-चैन के साथ विकास की राह पर आगे बढ़े।