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Kisan Andolan: गाजीपुर बॉर्डर पर आंदोलनकारियों के चलते पेट्रोल पंपों, व्यापारियों, सब्ज़ी मंडी और राहगीरों का बुरा हाल, एंबुलेंस भी फंस जाती है

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किसान आंदोलन: गाजीपुर बॉर्डर पर आंदोलनकारियों के चलते पेट्रोल पंपों, व्यापारियों, सब्ज़ी मंडी और राहगीरों का बुरा हाल, एंबुलेंस भी फंस जाती है

किसान आंदोलन में कृषि सुधार कानूनों के विरुद्ध हो रहे किसान आंदोलन को कांग्रेस, वामपंथी और आम आदमी पार्टी के साथ साथ लगभग पूरे यूपीए के घटक दलों का समर्थन है। सबको अपनी राजनीति चमकती दिखलाई पड़ रही है राजनीतिक आंदोलन की वजह से आम जनता त्रस्त है। गाजीपुर बॉर्डर पर टिकैत समर्थक बैठे हैं, सड़क का एक हिस्सा बंद है और जनता को भारी परेशानी उठानी पड़ रही है। असर ट्रैफिक जाम से भी है और आस पड़ौस के व्यापार काम धंधे भी चौपट हैं। यूपी से दिल्ली रोजाना नौकरी करने वालों की तो नींद हराम है, रोज घंटों जाम में पहुंचने पर नौकरी पर फटकार खानी पड़ती है। यही हाल सब्जीमंडी और व्यापारियों का भी है।

मोदी सरकार ने 2014 के दिसंबर में NH24 को एक्सप्रेस वे बनाने की बात कही तो दशकों से जाम में जूझते लोगों को लगा कि अब अच्छे दिन आएंगे। लेकिन जैसे ही हाईवे का काम पूरा हो, जनता को सुकून मिलना शुरु हुआ, किसान आंदोलन की छाया ने उनके इस सुनहरे सपने को ढक लिया। दिसंबर में राकेश टिकैत समेत उनके साथियों ने गाजीपुर बॉर्डर पर डेरा डाला, जो उठने का नाम ही नहीं ले रहा है।

गाजीपुर बॉर्डर पर किसान आंदोलन के चलते आम जनता को ट्रैफिक जाम में हो रही भारी दिक्कत

प्रतिदिन यूपी से दिल्ली जाने वालों की संख्या लाखों में है और जब बात आती है गाजीपुर बॉर्डर की तो पूरे एक्स्प्रेस वे पर फर्राटा भरती गाड़ियों की रफ्तार यहां आने से पहले ही पंचर सी हो जाती है। हापुड़ से आते-आते जैसे जैसे गाजीपुर बॉर्डर के करीब आते हैं, रफ्तार लगभग शून्य सी पड़ जाती है। दिल्ली से ठीक चंद मीटर की दूरी पर ही उन्हें यू टर्न लेना पड़ता है और इस यू टर्न लेने के लिए कई बार घंटों के जाम में जूझना पड़ता है।

समस्या सिर्फ यू टर्न लेने तक सीमित नहीं है, समस्या तो उसके बाद शुरु होती है, जब एक छोटी सी सड़क पर पूरे हाईवे का ट्रैफिक उतर जाता है। हालात ऐसे बनते हैं कि लोग एक दूसरे से चिढ़ते भी हैं और कई बार गुस्सा उतार भी देते हैं। ऊपर टैक्सपेयर के पैसे से बने हाईवे की मौजूदगी के बावजूद जनता नीचे ट्रैफिक में सिसकती रहती है।

गाजीपुर बॉर्डर पर एंबुलेंस भी फंस जाती हैं जाम में

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किसान आंदोलन की वजह से खासतौर पर यूपी से दिल्ली की ओर जाने वाले रास्ते पर कई बार एंबुलेंस भी फंस जाती हैं, उनके आगे मौजूद दूपहिया या कार चालक भी चाहकर भी उस एंबुलेंस को रास्ता नहीं दे पाते, क्योंकि आगे ट्रैफिक संकरे रास्ते से गुजरता है, जिसपर जाम लगना लगभग रोज की बात है। ऐसे में राकेश टिकैत और उनको समर्थक देने वाली कांग्रेस, वामपंथी सीपीआईएम या आम आदमी पार्टी ने जनता को, इमरजेंसी गाड़ियों को रास्ता देने के लिए कब किसानों से गुहार की, शायद वो ही जानते हों। भी
ड़ में फंसी जनता का गुस्सा मोदी सरकार पर भी उतरता है
और किसान आंदोलनकारियों पर भी।
लेकिन वो ठहरी आम जनता, लिहाजा मन ही मन बड़बड़ाकर निकल जाती है।

किसान आंदोलन से व्यापारियों को खासी दिक्कत, मंडी में भी काम प्रभावित

किसन आंदोलन के चलते गाजीपुर बॉर्डर पर लगने वाला जाम ना सिर्फ आने जाने की दिक्कत पैदा कर रहा है बल्कि व्यापार पर भी भारी चोट कर रहा है। व्यापार की लागत तो जाम की वजह से बढ़ ही जा रही है, आमतौर पर सामान लेने आने वाले रिटेल कस्टमर भी अब गाजीपुर मंडी जाने के नाम से ही डरने लगे हैं।
ऐसे में व्यापार पर बुरा असर पड़ रहा है। पेट्रोल पंपों का भी यही हाल है,
लोग या तो जाम की वजह से उनमें प्रवेश नहीं करते
और प्रवेश कर पेट्रोल डलवा भी लिया तो फिर जाम में फंस जाते हैं,
लिहाजा गाजीपुर यूपी बॉर्डर के दोनों तरफ मौजूद पेट्रोल पंपों की कमाई पर भी खासा असर पडा है।

किसान आंदोलन ने खोड़ा कॉलोनी और इंदिरापुरम वासियों का जीना मुहाल किया

किसान आंदोलनकारियो से गाजीपुर बॉर्डर के स्थानीय निवासी भी त्रस्त हैं।
एक तो घर आने जाने में भारी दिक्कत का सामना पड़ता है,
दूसरा घर में पहुंच भी जाएं
तो अल्टरनेट रास्ते अब उनकी इंदिरापुरम वाली सोसाइटी और खोड़ा कॉलोनी की छोटी सड़कों से गुजर रहे हैं,
सो दिन में ही नहीं रात में भी हॉर्न सुनसुनकर परेशान हैं।
कई बार रात में गलती से ट्रैफिक जाम ना हो,
तो तेज रफ्तार चलते ट्रको का शोर नींद से जगा देता है।

जाहिर है कि गाजीपुर बॉर्डर पर किसान आंदोलनकारियों का समर्थन कर रही कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, एनसीपी और अन्य पार्टियां किसानों के इस चक्का जाम मे अपनी राजनीतिक सफलता और आने वाले चुनावों के लिए बीजेपी की दिक्कत तो देख पा रही हैं।
लेकिन इस राजनीतिक समर्थन की कीमत दिल्ली और यूपी बॉर्डर पर रहने वाले लोग भुगत रहे हैं,
जिनमें से ज्यादातर गांव से ही रोजी रोटी की तलाश में दिल्ली और गाजियाबाद जैसे इलाकों में आए हैं।
सवाल उठने लाजमी हैं कि अगर किसानों के नाम पर आंदोलन हो रहा है,
तो किसान पुत्रों की नौकरी पर संकट पैदा करने का राजनीतिक खामियाजा कौन सी पार्टियां भुगतेंगी,
इस सवाल का जवाब आने वाले चुनावों में ही मिल पाएगा शायद।