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एक छोटे से गांव से आने वाले इस कलाकार ने कैसे तय किया फिल्मों तक का सफर

 टीवी कलाकार अकरम का कहना है कि अगर हौंसलों की उड़ान हो तो कामयाबी कदम चूमती है। अगर वह असफलताओं के आगे घुटने टेक देते तो इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाते। बार-बार प्रयासों का ही नतीजा है कि उन्हें उनकी मंजिल हासिल हो रही है।

 

जनपद इलाहाबाद के छोटे से गांव हंडिया निवासी अकरम वर्ष 2004 में रोजी-रोटी की तलाश में मायानगरी मुंबई पहुंचें। चाचा मौ. नसीम के प्रयासों से उन्हें एक सैलून पर काम मिल गया। इस संबंध में टीवी कलाकार अकरम का कहना है कि उन्हें यह काम रास नहीं आया और उन्हें लग रहा था कि केवल नौकरी तक सीमित रहना उनका मुख्य उद्देष्य नही हैं उनका इरादा तो कुछ और ही था। वे 2008 में सउदी अरब चले गए। यहां भी जब मन नहीं लगा तो 2012 में पुनः मुंबई ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया। इस बार उनके मामू फैजाद ने उन्हें नेवी के शिप आईएनएस विराट में काम दिलाया और 2016 तक काम किया। उनका मकसद कुछ और ही था कि किसी तरह सीरियल में काम करने का मौका मिले।

 

कई बार कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली इसके बाद भी हार नहीं मानी तथा प्रयास जारी रखे। हालात यह थे सुबह अपने मकसद को निकलता और शाम को घर लौटता। इसी दौरान सुजैल खान ने मेरी मुलाकात कास्टिंग डायरेक्टर मयंक उपाध्याय से कराई। उनका कहना था कि मयंक उपाध्याय ही उनकी सफलता के मुख्य किरदार रहे। अगर वो नहीं होते तो पता नहीं आज मैं कहां होता। उन्होंने बताया कि सीरियल क्राइम पैट्रोल, परम अवतार श्रीकृष्ण, मायावी मलिंग और डिटेक्टिव देव में काम किया। इतना ही नहीं आषीष चौधरी जैसे बडे स्टार के साथ काम करने का मौका मिला और हाल ही में एक मुझे फिल्म भी मिली है।

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