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Thursday, February 19, 2026
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UGC के ‘इक्विटी रेगुलेशंस-2026’ पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, कहा– समाज पर पड़ सकता है खतरनाक असर

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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा अधिसूचित किए गए ‘इक्विटी रेगुलेशंस-2026’ पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए इनके क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी है। देशभर में इन नियमों को लेकर हो रहे विरोध के बीच, शीर्ष अदालत ने कहा कि ये प्रावधान “विभाजनकारी” हो सकते हैं और समाज पर इनका “खतरनाक प्रभाव” पड़ने की आशंका है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई तक शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव से जुड़े मामलों में वर्ष 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने नए नियमों की भाषा और संभावित दुरुपयोग को लेकर गंभीर चिंता जताई।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, भगवान के लिए! आज अंतर-जातीय विवाह हो रहे हैं, हम सब हॉस्टलों में साथ रहे हैं। इन नियमों की भाषा ऐसी है कि इनका दुरुपयोग हो सकता है। क्या हम पिछले 75 वर्षों की प्रगति को पीछे ले जाना चाहते हैं?

कोर्ट ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। इस मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को होगी।

याचिकाकर्ताओं के प्रमुख तर्क

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने नियमों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि नियम 3(c) में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा केवल SC, ST और OBC तक सीमित है, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों को इससे बाहर रखा गया है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

इसके अलावा, यह भी आशंका जताई गई कि रैगिंग जैसे मामलों को जातिगत भेदभाव का रूप देकर निर्दोष छात्रों को फंसाया जा सकता है।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि अंतिम अधिसूचना में झूठी शिकायतों पर दंड का प्रावधान हटा दिया गया है, जिससे फर्जी मामलों की संभावना बढ़ सकती है।

क्या हैं UGC के विवादित इक्विटी रेगुलेशंस-2026

UGC ने 13 जनवरी 2026 को इन नियमों को अधिसूचित किया था। इसके तहत हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में 10-सदस्यीय ‘इक्विटी कमेटी’ बनाना अनिवार्य किया गया था। कमेटी में SC, ST, OBC, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व तय किया गया था, जबकि सामान्य वर्ग के लिए कोई अनिवार्य प्रतिनिधित्व नहीं रखा गया। नियमों का पालन न करने पर संस्थानों के अनुदान रोकने और मान्यता रद्द करने तक की चेतावनी दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद अब देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में नई इक्विटी कमेटियों के गठन की प्रक्रिया फिलहाल रोक दी गई है। अब केंद्र सरकार को मार्च में होने वाली अगली सुनवाई तक यह स्पष्ट करना होगा कि ये नियम भेदभावपूर्ण नहीं हैं और इनका उद्देश्य केवल समानता और समावेशन सुनिश्चित करना है।