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Friday, January 23, 2026
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NASA में 2145 कर्मचारियों की संभावित छंटनी, बजट कटौती और राजनीतिक हस्तक्षेप से गहराया संकट

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अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA इन दिनों एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। खबर है कि एजेंसी करीब 2145 कर्मचारियों की छंटनी की योजना पर काम कर रही है। यह फैसला अमेरिकी सरकार द्वारा बजट में की गई भारी कटौती और संसाधनों के सीमित उपयोग के चलते लिया जा रहा है। मकसद है – केवल प्राथमिक अंतरिक्ष मिशनों पर फोकस करना और खर्चों को नियंत्रित करना।

छंटनी का असर मुख्य रूप से GS-13 से GS-15 ग्रेड के कर्मचारियों पर पड़ेगा। ये वरिष्ठ वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ हैं, जो NASA के चंद्रमा और मंगल अभियानों जैसे कई अग्रणी प्रोजेक्ट्स में वर्षों से काम कर रहे हैं।

कर्मचारियों को दिए गए विकल्प

NASA ने इस बदलाव को स्वैच्छिक रूप देने के लिए तीन विकल्प सामने रखे हैं-

जल्दी सेवानिवृत्ति (Early Retirement)

मुआवज़ा लेकर इस्तीफा (Buyout Plan)

स्थगित इस्तीफा (Deferred Resignation)

इसके ज़रिए एजेंसी कर्मचारियों को बिना ज़बरदस्ती के निकाले, स्ट्रक्चर को छोटा करने की दिशा में बढ़ रही है।

बजट संकट और नीतिगत बदलाव

पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में NASA की प्राथमिकताओं और बजट में कई बड़े बदलाव हुए। ट्रंप प्रशासन ने निजी स्पेस कंपनियों जैसे SpaceX को बढ़ावा दिया, जिससे सरकारी अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर दबाव बढ़ा। NASA की प्रवक्ता बेथनी स्टीवंस ने बताया कि एजेंसी सीमित संसाधनों में अब अपने मिशनों की प्राथमिकता दोबारा तय कर रही है।

NASA के नेतृत्व को लेकर भी राजनीति ने हस्तक्षेप किया। ट्रंप प्रशासन ने SpaceX समर्थक जारेड आइजैकमैन को NASA का प्रमुख बनाने की सिफारिश की थी, लेकिन एलन मस्क और ट्रंप के बीच बढ़ती खटास के कारण यह प्रस्ताव वापस ले लिया गया। इससे एजेंसी के अंदर निर्णयों और प्राथमिकताओं में भी असमंजस पैदा हुआ है।

NASA पर इस प्रकार की छंटनी और अनिश्चितता केवल अमेरिका के अंतरिक्ष कार्यक्रमों को नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के वैज्ञानिक समुदाय को प्रभावित कर सकती है। जब दुनिया के कई देश और निजी कंपनियां नई अंतरिक्ष दौड़ में आगे बढ़ रहे हैं, तब NASA जैसी संस्था का कमजोर होना वैश्विक अंतरिक्ष अनुसंधान की दिशा के लिए खतरे की घंटी हो सकता है।

NASA की मौजूदा स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि क्या अब अंतरिक्ष अन्वेषण जैसे दीर्घकालिक वैज्ञानिक प्रयास भी राजनीतिक प्राथमिकताओं और बजटीय समीकरणों पर पूरी तरह निर्भर होते जा रहे हैं? अगर ऐसा ही चलता रहा, तो मानवता के सबसे बड़े वैज्ञानिक सपनों पर ब्रेक लग सकता है।