
एक देश-एक चुनाव’ के मुद्दे पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की बैठक में पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने अहम राय रखी। उन्होंने साफ कहा कि किसी भी बड़े चुनावी या प्रशासनिक सुधार को लागू करते समय संविधान की मूल भावना का सम्मान अनिवार्य है और लोकतंत्र में संविधान से बढ़कर कुछ भी नहीं हो सकता।
पूर्व सीजेआई ने कहा कि चुनावी सुधारों के नाम पर संविधान के मूल ढांचे से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। भारत के संघीय ढांचे का हवाला देते हुए उन्होंने राज्यों के अधिकारों और उनकी सहमति को बेहद जरूरी बताया। साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि यदि संविधान संशोधन की जरूरत पड़े, तो प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो और न्यायिक समीक्षा के दायरे में रहे।
बैठक में एक साथ चुनाव कराने से संसाधनों और खर्च की बचत जैसे तर्कों पर भी चर्चा हुई। इस पर गवई ने कहा कि आर्थिक और प्रशासनिक लाभ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे संवैधानिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं बन सकते। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक स्थिरता और प्रशासनिक निरंतरता के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा।
संयुक्त संसदीय समिति विभिन्न कानूनविदों और हितधारकों से राय लेकर एक सर्वसम्मत रिपोर्ट तैयार करने की कोशिश में है। पूर्व सीजेआई बी.आर. गवई के विचारों को इस पूरी प्रक्रिया में बेहद अहम माना जा रहा है।













