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शनिदेव और सरसों के तेल का रहस्य, पौराणिक कथाएं और धार्मिक महत्व

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शनिदेव को हिंदू धर्म में न्याय का देवता माना जाता है, जो मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। शनिदेव की पूजा लोग प्रायः भय के कारण करते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि वे कर्मों के अनुसार न्याय करते हैं। शनिदेव की कृपा पाने और उनके प्रकोप से बचने के लिए श्रद्धालु शनिवार के दिन उनकी पूजा करते हैं और विशेष रूप से सरसों का तेल चढ़ाते हैं। लेकिन आखिर शनिदेव और सरसों के तेल का क्या संबंध है? इसके पीछे दो प्रमुख पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।

पौराणिक कथाएं

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, शनिदेव को एक समय अपनी शक्तियों पर अत्यधिक गर्व हो गया था। उन्हें यह विश्वास हो गया था कि पूरे ब्रह्मांड में उनसे अधिक शक्तिशाली कोई नहीं है। उसी समय, हनुमानजी की वीरता और भक्ति की ख्याति तेजी से फैल रही थी। जब शनिदेव ने देखा कि लोग हनुमानजी की वीरता के गुणगान कर रहे हैं, तो उन्हें क्रोध आया और उन्होंने हनुमानजी को आमने-सामने की लड़ाई के लिए चुनौती दे दी।

हनुमानजी उस समय प्रभु श्रीराम की भक्ति में लीन थे। उन्होंने शनिदेव को कई बार समझाने का प्रयास किया कि वे युद्ध न करें, लेकिन शनिदेव नहीं माने। परिणामस्वरूप, दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में शनिदेव को गंभीर चोटें आईं और उन्हें असहनीय पीड़ा हुई। हनुमानजी को शनिदेव की दशा पर दया आ गई और उन्होंने शनिदेव के घावों पर सरसों का तेल लगाया। सरसों के तेल के प्रयोग से शनिदेव को तुरंत राहत मिली और उनका दर्द समाप्त हो गया। इस घटना के बाद शनिदेव ने कहा कि जो भी भक्त सच्चे मन से उन्हें तेल अर्पित करेगा, उसके जीवन के सभी कष्ट और संकट दूर हो जाएंगे। तभी से सरसों का तेल शनिदेव को प्रिय माना जाने लगा और भक्त शनिवार को उन्हें तेल अर्पित करने लगे।

एक अन्य कथा के अनुसार, लंकापति रावण ने अपने दरबार में सभी नवग्रहों को बंदी बना लिया था। शनिदेव को उसने विशेष रूप से उल्टा लटका दिया था, जिससे वे बहुत कष्ट में थे। जब हनुमानजी माता सीता की खोज में लंका पहुंचे, तो उन्होंने अशोक वाटिका में भारी तबाही मचाई। इस घटना के बाद मेघनाद (इंद्रजीत) ने हनुमानजी को बंदी बनाकर रावण के समक्ष पेश किया। रावण ने क्रोधित होकर आदेश दिया कि हनुमानजी की पूंछ में आग लगा दी जाए। जब हनुमानजी की पूंछ में आग लगाई गई, तो उन्होंने पूरी लंका में आग फैला दी। इस आग की तपिश से नवग्रहों को लंका से भागने का अवसर मिला, लेकिन शनिदेव उल्टे लटके होने के कारण वहां से भाग नहीं सके। हनुमानजी की नजर जब शनिदेव पर पड़ी, तो उन्होंने उनकी दयनीय स्थिति देखी और उनके शरीर पर तेल लगाया। सरसों के तेल से शनिदेव को राहत मिली और उनका कष्ट समाप्त हो गया। शनिदेव ने हनुमानजी का आभार व्यक्त किया और आशीर्वाद दिया कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से उन्हें तेल चढ़ाएगा, उसकी सभी समस्याएं दूर हो जाएंगी। साथ ही, जो शनिवार के दिन हनुमानजी की पूजा करेगा, उसे शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के प्रभाव से मुक्त रखा जाएगा।

शनिदेव की पूजा और सरसों के तेल का महत्व

इन पौराणिक कथाओं के आधार पर शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाने की परंपरा आज भी चली आ रही है। भक्त शनिदेव को तेल अर्पित करके अपने कष्टों को दूर करने की प्रार्थना करते हैं। शनिदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाते हैं:

  • शनिवार के दिन शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाना – ऐसा करने से जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।
  • हनुमानजी की पूजा करना – हनुमानजी के भक्तों पर शनिदेव की कुप्रभाव नहीं पड़ता।
  • जरूरतमंदों को तेल और काले तिल दान करना – इससे शनिदेव की कृपा प्राप्त होती है।
  • शनि मंत्रों का जाप करना – ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः’ मंत्र का जाप करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं।

शनिदेव को तेल चढ़ाने की परंपरा का धार्मिक और पौराणिक आधार बहुत गहरा है। हनुमानजी और शनिदेव की कथा से यह स्पष्ट होता है कि सच्चे मन से की गई पूजा और भक्ति से सभी बाधाएं दूर हो सकती हैं। शनिदेव न्यायप्रिय देवता हैं, जो व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। उनकी पूजा न केवल भय से बल्कि श्रद्धा और सच्चे मन से करनी चाहिए।