
उत्तराखंड की देवभूमि में स्थित जागेश्वर धाम न केवल एक तीर्थस्थल है, बल्कि यह आस्था, पौराणिक कथाओं और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत केंद्र भी माना जाता है। मान्यता है कि यहीं भगवान शिव महामृत्युंजय स्वरूप में पूजे जाते हैं। कहा जाता है कि सुर, नर और मुनियों की सेवा से प्रसन्न होकर भगवान शिव इस स्थान पर जागृत हुए थे, इसी कारण इस पवित्र भूमि का नाम जागेश्वर पड़ा।
घने देवदार वनों से घिरा यह धाम एक दिव्य अनुभूति प्रदान करता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां महादेव माता पार्वती सहित देवदार वृक्षों में साक्षात रूप से विराजमान हैं, जिससे यह स्थान और भी रहस्यमय व पावन बन जाता है।
124 मंदिरों का अद्भुत समूह
जागेश्वर धाम कुल 124 प्राचीन मंदिरों का विशाल समूह है। इनमें से 108 मंदिर भगवान शिव को समर्पित हैं। सबसे भव्य और विशाल मंदिर महादेव के महामृत्युंजय स्वरूप का है, जहां देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इसके अतिरिक्त यहां 16 अन्य देवी-देवताओं के मंदिर भी स्थित हैं, जिनमें जागनाथ, पुष्टि देवी, कुबेर, माता पार्वती, भैरव, केदारनाथ, हनुमान और मां दुर्गा के मंदिर प्रमुख हैं।
पुराणों में वर्णित महिमा
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार स्कंद पुराण और मार्कण्डेय पुराण में जागेश्वर धाम की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों में इस स्थान को मोक्षदायिनी भूमि बताया गया है, जहां सच्चे मन से की गई पूजा से विशेष फल की प्राप्ति होती है।
शिवलिंग स्थापना से जुड़ी रहस्यमयी कथा
एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान शिव दारुक वन में तपस्या कर रहे थे, तब सप्तऋषियों की पत्नियां उनके अर्धनग्न स्वरूप को देखकर मोहित हो गईं और मूर्छित होकर वहीं गिर पड़ीं। जब लंबे समय तक वे घर नहीं लौटीं तो सप्तऋषि उन्हें खोजते हुए वहां पहुंचे। स्थिति को गलत समझकर उन्होंने भगवान शिव को श्राप दे दिया, जिसके फलस्वरूप भगवान शिव का लिंग वहीं गिर गया। माना जाता है कि ऋषियों के इसी श्राप के कारण इस स्थान पर शिवलिंग स्वरूप की पहली स्थापना हुई और जागेश्वर धाम शिवभक्ति का प्रमुख केंद्र बन गया।
आज भी जागेश्वर धाम श्रद्धा, शांति और रहस्य का ऐसा संगम है, जहां पहुंचकर भक्त आध्यात्मिक ऊर्जा का गहरा अनुभव करते हैं।













