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Thursday, January 15, 2026
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चीन जबरन तिब्बती बच्चों को भेज रहा बोर्डिंग स्कूल, TAI रिपोर्ट में सांस्कृतिक विनाश के आरोप

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चीन की तिब्बत नीति पर तिब्बतन एक्शन इंस्टीट्यूट (TAI) की एक नई रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि चीन सरकार लगभग 10 लाख तिब्बती बच्चों को जबरन सरकारी बोर्डिंग स्कूलों में भेज रही है, जिनमें से 1 लाख से अधिक बच्चे मात्र 4 से 6 वर्ष की उम्र के हैं। इस कदम को तिब्बती पहचान और संस्कृति को मिटाने की साजिश बताया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन बोर्डिंग स्कूलों में बच्चों को उनके परिवारों से अलग कर चीनी कम्युनिस्ट विचारधारा की शिक्षा दी जाती है। पारंपरिक तिब्बती भाषा, धर्म और रीति-रिवाजों को पूरी तरह नजरअंदाज कर बच्चों को “चीनी राष्ट्रवाद” और “एकल सांस्कृतिक पहचान” की ओर मोड़ा जा रहा है।

4500 साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत पर सीधा हमला

TAI की रिपोर्ट तैयार करने में अहम भूमिका निभाने वाले डॉ. ग्याल लो ने कहा, यह राष्ट्रपति शी चिनफिंग की सांस्कृतिक आक्रामकता की रणनीति है, जो तिब्बत की 4500 साल पुरानी संस्कृति और बौद्ध धर्म को समाप्त करने का प्रयास है। उन्होंने दावा किया कि 18 साल से कम उम्र के भिक्षुओं को भी जबरन चीनी स्कूलों में भर्ती किया जा रहा है।

ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अधिक असर

रिपोर्ट में आमदो और खाम जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित 50 से अधिक स्कूलों का अध्ययन किया गया है। इन स्कूलों में तिब्बती भाषा, धार्मिक शिक्षा या सांस्कृतिक मूल्यों को कोई स्थान नहीं दिया जाता। TAI का कहना है कि यह एक व्यवस्थित अभियान है, जिसके जरिए एक पूरी पीढ़ी की सांस्कृतिक चेतना को नष्ट किया जा रहा है।

TAI की वैश्विक अपील

रिपोर्ट जारी करते हुए TAI ने संयुक्त राष्ट्र, भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करें। संस्था ने चीन से स्वतंत्र जांच कराने और तिब्बती बच्चों के सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा की मांग की है।

भारत लंबे समय से तिब्बती शरणार्थियों को संरक्षण देता आया है और यहां निर्वासित तिब्बती सरकार का मुख्यालय भी है। तिब्बत के धर्मगुरु दलाई लामा पहले भी चीन की नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। उन्होंने बार-बार चीन द्वारा तिब्बती धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के दमन की निंदा की है।

TAI की यह रिपोर्ट न केवल चीन की तिब्बत नीति की आलोचना करती है, बल्कि यह भी चेतावनी देती है कि अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया, तो तिब्बत की प्राचीन और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत इतिहास के पन्नों में खो सकती है।