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Sunday, January 18, 2026
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श्री विश्वकर्मा कथा।। Shri Vishwakarma Vrat Katha

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श्री विश्वकर्मा कथा

श्री विश्वकर्मा कथा-एक समय की बात है, मुनि विश्वमित्र के बुलावे पर मुनि और सन्यासी लोग सभा करने के लिए एक स्थान पर एकत्रित हुए । सभा में मुनि विश्वमित्र ने सभी मुनिवरों को संबोधित किया। मुनि विश्वमित्र सभा को संबोधित करते हुए बोले, हे मुनियों आश्रमों में दुष्ट राक्षस यज्ञ करने वाले हमारे लोगों को अपना भोजन बना लेते है और यज्ञ को नष्ट कर रहे हैं। जिसके कारण हमारी पूजा-पाठ, ध्यान आदि में परेशानी हो रही है। इसलिए अब हमें तत्काल उनके कुकृत्यों से बचने का कोई उपाय अवश्य करना चाहिए। मुनि विश्वमित्र की बातों को सुनकर वशिष्ठ मुनि कहने लगे कि एक बार पहले भी ऋषि-मुनियों पर इस प्रकार का संकट आया था। उस समय हम सब मिलकर ब्रह्माजी के पास गये थे। ब्रह्माजी ने ऋषि मुनियों को संकट से छुटकारा पाने के लिए उपाय बताया था। ऋषि लोगों ने ध्यानपूर्वक वशिष्ठ मुनि की बातों को सुना और कहने लगे कि वशिष्ठ मुनि ने ठीक ही कहा है, हमें ब्रह्मदेव के ही शरण में जाना चाहिये।   ऐसा सुन सब ऋषि-मुनियों ने स्वर्ग को प्रस्थान किया। मुनियों के इस प्रकार कष्ट को सुनकर ब्रह्मा जी को बड़ा आश्चर्य हुआ। ब्रह्मा जी कहने लगे कि ‘हे मुनियों राक्षसों से तो स्वर्ग मे रहने वाले देवता को भी भय लगता है फिर मनुष्यों का तो कहना ही क्या जो बुढापे और मृत्यु के दुखों में लिप्त हैं’। उन राक्षसों को नष्ट करने में श्री विश्वकर्मा समर्थ है। आप लोग श्री विश्वकर्मा के शरण में जाएं। इस समय पृथ्वी पर अग्नि देवता के पुत्र मुनि अगिरा यज्ञों में श्रेष्ठ पुरोहित हैं और जो श्री विश्वकर्मा के भक्त है। वही आपके दुखों को दुर कर सकते हैं इसलिए हे मुनियों,आप उन्हीं के पास जायें।

श्री विश्वकर्मा

सूतजी बोलें, ब्रह्मा जी के कहने पर सभी मुनि अगिंरा ऋषि के पास गये। मुनियों की बातों को सुनकर अगिंरा ऋषि ने कहा, हे मुनियों आप लोग क्यों व्यर्थ् मे इधर-उधर फिर रहें हैं। सभी दुखों को हरने के लिए विश्वकर्मा भगवान के अतिरिक्त और कोई भी समर्थ नहीं है।   अमावस्या के दिन, आप लोग अपने साधारण कर्मों को रोक कर भक्ति पूर्वक “श्रीविश्वकर्मा कथा” सुनों उनकी उपासना करो। आपके सारे कष्टों को विश्वकर्मा भगवान अवश्य दुर करेंगे। महर्षि अगिंरा के बातों को सुनकर सभी लोग अपने-अपने आश्रमों को चले गये। तत्प्रश्चात् अमावस्या के दिन,मुनियों नें यज्ञ किया। यज्ञ में विश्वकर्मा भगवान का पूजन किया। “श्री विश्वकर्मा कथा” को सुना। जिसका परिणाम यह हुआ कि सारे राक्षस भस्म हो गए। यज्ञ विघ्नों से रहित हो गया, उनकें सारे कष्ट दुर हो गयें। जो मनुष्य भक्ति-भाव् से विश्वकर्मा भगवान की पूजा करता है, ह सुखों को प्राप्त करता हुआ संसार में बङे पद को प्राप्त करता है।