
यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के फैसले को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच विवाद बढ़ता जा रहा है। सरकार की ओर से संसदीय वित्त संबंधी स्थायी समिति की सिफारिश का हवाला दिया जा रहा है, जबकि कांग्रेस सांसदों ने दावा किया है कि समिति के सामने हाल में घोषित 0.4 प्रतिशत MDR का कोई विशिष्ट प्रस्ताव रखा ही नहीं गया था।
कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई और मनीष तिवारी ने सरकार के उस दावे पर आपत्ति जताई है, जिसमें कहा गया कि समिति में मौजूद कांग्रेस सांसदों ने UPI पर शुल्क व्यवस्था का समर्थन किया था।
कांग्रेस सांसदों ने कहा- मौजूदा MDR पर नहीं हुई चर्चा
गौरव गोगोई ने कहा कि वित्त विभाग के अधिकारियों के साथ समिति की बैठक के दौरान UPI पर MDR की जरूरत को लेकर सवाल जरूर उठाए गए थे, लेकिन उस समय कोई निश्चित शुल्क प्रस्ताव समिति के सामने नहीं था। उनके मुताबिक दर, शुल्क की सीमा या किन लेनदेन को छूट दी जाएगी, इस बारे में कोई ठोस प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया गया था।
मनीष तिवारी ने भी इसी तरह कहा कि 15 अक्टूबर से लागू होने वाले मौजूदा MDR ढांचे को समिति की बैठक में मंजूरी मिलने की बात कहना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि समिति की गोपनीय कार्यवाही को राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाना उचित नहीं है।
सरकार ने समिति की रिपोर्ट का दिया हवाला
दूसरी ओर, सरकार की ओर से संसदीय वित्त संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट का हवाला दिया जा रहा है। रिपोर्ट में UPI व्यवस्था के लिए एक टिकाऊ राजस्व मॉडल और चरणबद्ध MDR ढांचे की जरूरत पर जोर दिया गया था।
समिति ने UPI के संचालन, बुनियादी ढांचे, साइबर सुरक्षा और धोखाधड़ी से बचाव जैसी व्यवस्थाओं पर होने वाली लागत का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट के मुताबिक डिजिटल भुगतान व्यवस्था के लिए सरकार की ओर से करीब 2,000 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान था, जबकि उद्योग की अनुमानित परिचालन लागत करीब 20,700 करोड़ रुपये बताई गई थी। हालांकि, समिति की इस सिफारिश और 15 अक्टूबर से लागू होने वाले मौजूदा MDR ढांचे के बीच संबंध को लेकर ही राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ है।
15 अक्टूबर से लागू होगा 0.4 प्रतिशत MDR
NPCI के नए ढांचे के तहत 15 अक्टूबर 2026 से 2,000 रुपये से अधिक के पात्र व्यक्ति-से-व्यापारी (P2M) UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू होगा। इस शुल्क की अधिकतम सीमा 300 रुपये प्रति लेनदेन रखी गई है। 2,000 रुपये तक के लेनदेन और व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) भुगतान इस MDR के दायरे से बाहर रहेंगे।
कुछ आवश्यक सेवाओं के लिए अलग फ्लैट शुल्क व्यवस्था भी रखी गई है। वहीं सरकार ने स्पष्ट किया है कि MDR का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जाना चाहिए और इसके क्रियान्वयन पर निगरानी रखी जाएगी।
आखिर विवाद किस बात पर है?
मौजूदा विवाद मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि क्या संसदीय समिति की ओर से टिकाऊ राजस्व मॉडल और चरणबद्ध MDR की सिफारिश को 15 अक्टूबर से लागू होने वाले मौजूदा 0.4 प्रतिशत शुल्क का समर्थन माना जा सकता है।
सरकार समिति की रिपोर्ट को अपने पक्ष के आधार के तौर पर पेश कर रही है, जबकि कांग्रेस सांसदों का कहना है कि समिति के सामने मौजूदा शुल्क दर और उसकी शर्तों वाला कोई विशिष्ट प्रस्ताव नहीं रखा गया था। इसी अंतर को लेकर दोनों पक्षों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है।









