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Thursday, February 19, 2026
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उत्तराखंड हाई कोर्ट का बड़ा अंतरिम आदेश, वर्कचार्ज कर्मचारियों की पेंशन बंद करने पर रोक

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उत्तराखंड हाई कोर्ट ने राज्य के हजारों वर्कचार्ज (कार्यप्रभारित) कर्मचारियों को बड़ी राहत देते हुए सरकार के उस आदेश पर तत्काल रोक लगा दी है, जिसमें उनकी पेंशन बंद करने या घटाने का प्रावधान किया गया था। मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है और चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

कोर्ट के इस अंतरिम आदेश से उन सेवानिवृत्त कर्मचारियों को राहत मिली है, जिनकी आजीविका का एकमात्र सहारा उनकी मासिक पेंशन थी।

क्या है पूरा मामला

राज्य सरकार ने हाल ही में एक आदेश जारी कर कहा था कि नियमित नियुक्ति से पहले वर्कचार्ज के रूप में दी गई सेवाओं को पेंशन के लिए अर्हकारी सेवा में शामिल नहीं किया जाएगा। सरकार का तर्क था कि वर्कचार्ज अवधि की सेवा पेंशन गणना के दायरे में नहीं आती।

इस आदेश के लागू होने से कई कर्मचारियों की पेंशन या तो बहुत कम हो गई थी या पूरी तरह बंद होने की स्थिति में पहुंच गई थी।

कर्मचारियों की दलील

सरकार के फैसले के खिलाफ कर्मचारी संगठनों और सेवानिवृत्त कर्मियों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया कि वर्कचार्ज सेवा को पेंशन के लिए गिना जाना अनिवार्य है। याचिकाकर्ताओं ने इसे मौलिक अधिकारों का हनन बताया।

अदालत का सख्त रुख

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने प्रथम दृष्टया कर्मचारियों की दलीलों को मजबूत पाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई तक किसी भी कर्मचारी की पेंशन रोकी नहीं जाएगी और न ही पहले से मिल रही पेंशन में कोई कटौती की जाएगी।

इसके साथ ही कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि पूर्व के न्यायिक फैसलों के विपरीत यह आदेश किस नियम और परिस्थिति में जारी किया गया।

हजारों परिवारों को राहत

लोक निर्माण विभाग, सिंचाई विभाग और जल संस्थान सहित कई विभागों में बड़ी संख्या में कर्मचारी वर्कचार्ज के रूप में नियुक्त हुए थे। इस आदेश से करीब 15 हजार से अधिक कर्मचारियों और उनके परिवारों की आर्थिक सुरक्षा पर असर पड़ रहा था। हाई कोर्ट के स्टे के बाद कर्मचारी संगठनों में खुशी की लहर है और इसे न्याय की बड़ी जीत बताया जा रहा है।

अब सरकार को चार सप्ताह में कोर्ट के समक्ष अपना पक्ष रखना होगा। यदि सरकार संतोषजनक जवाब नहीं दे पाती है, तो हाई कोर्ट इस आदेश को पूरी तरह निरस्त कर सकता है।