Brahma Puran

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Brahma Puran

श्रीब्रह्मपुराण 

नमो भगवते वासुदेवाय

 संक्षिप्त ब्रह्मपुराण 

नैमिषारण्य सूतजीका आगमन, पुराणको आरम्भ तथा सृष्टिका वर्णन

यस्मात्सर्वमिदं प्रपञ्चरचितं मायाजगन्जायते सभी जुटे हुए थे। झुंड-को-झुंड गएँ उस यस्मिस्तिष्ठति यति चान्तसमये झल्यानुकल्प पुनः। वनकी शोभा बढ़ा रहीं थीं। नैमिषारण्यास यं ध्याचा मुनयः प्रपञ्चरहित विन्दन्ति मोक्ष ध्रुवं मुनियोंका द्वादशवार्षिक (बारह वर्षों तक चालू तं वन्दै पुरुषोत्तमाख्यममलं नित्यं विभु निश्चलम् ॥ रहनेवाला) यज्ञ आरम्भ था। जौ, गेहूँ, चना, यं ध्यायन्ति बुधाः समाधिसमये शुद्धं वियत्संनिभं उड़द, मूंग और तिल आदि पवित्र अन्नोंसे नित्यानन्दमयं प्रसन्नममले सर्वेश्चरं निर्गुणम्।। यज्ञमण्डप सुशोभित था। वहाँ होमकुण्डमें व्यक्ताव्यक्तपरं प्रपञ्चरहितं ध्यानैकगम्यं विभु अग्निदेव प्रज्वलित थे और आहुतियाँ डाली जा तं संसारविनाशहेतमजरं वन्दै हुरि मुक्तिदम् ॥* | रही थीं। उस महायज्ञमें सम्मिलित होने के पूर्वकालकी बात हैं, परम पुण्यमय पवित्र लिये बहुत-से मुनि और ब्राह्मण अन्य स्थानों से नैमिषारण्यक्षेत्र बड़ा मनोहर जान पड़ता था। आये । स्थानीय महर्षियोंने उन सबका यथायोग्य वहाँ बहुत-से मुनि एकत्रित हुए थे, भाँति- सत्कार किया। ऋत्विजोंसहित वे सब लोग भाँतिके पुष्प उस स्थानकी शोभा बढ़ा रहे थे। जब आरामसे बैठ गये, तब परम बुद्धिमान् पीपल, पारिजात, चन्दन, अगर, गुलाव तथा लोमहर्षण सूतजी वहाँ पधारे। उन्हें देखकर चम्पा आदि अन्य बहुत-से वृक्ष उसकी शोभा- | मुनिवरोंको बड़ी प्रसन्नता हुई, उन सबने वृद्धिमें सहायक हो रहे थे। भाँति-भौतके उनका यथावत् सत्कार किया। सूतजी भी इनके पक्षी, नाना प्रकारके मृगोंका झुंड, अनेक पवित्र | प्रति आदरका भाव प्रकट करके एक श्रेष्ठ जलाशय तथा बहुत-सों बावलियाँ उस वनको आसनपर विराजमान हुए। इस समय सब विभूषित कर रहीं थीं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, । ब्राह्मण सूतके साथ वार्तालाप करने लगे। शूद्र तथा अन्य जातिके लोग भी वहाँ उपस्थित बातचीतकै अन्तमें सबने व्यास-शिष्य लोमहर्षणजसे थे। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी-| अपना संदेह पूछा।

* प्रत्येक कल्प और अनुकल्पमें विस्तारपूर्वक रचा हुआ अहू समस्त मायामय जगत् जिनसे प्रकट होता, जिनमें स्थित रहता और अन्तकालमें जिनके भीतर पुन: लीन हो जाता है, जो इस दृश्या-प्रपञ्चसे सर्वथा पृथक् हैं, जिनका भ्यान करके मुनिजन सनातन मोक्षपद प्राप्त कर लेते हैं, उन नित्य, निर्मल, निश्चल तथा व्यापक भगवान् पुरुषोत्तम (जगन्नाचजी) को मैं प्रणाम करता हैं। जो शुद्ध, आकाशकै समान निलैंप, नित्यानन्दमय, सदा प्रसन्न, निर्मल, सबके स्वामीं, निर्गुण, व्यक्त और अध्यको परे, प्रपञ्चासे हित, एकमात्र ध्यानमें हों अनुभव करनेयोग्य तथा व्यापक हैं समाधिकालमें विद्वान् पुरुष इसी पमें जिनका ध्यान करते हैं, जो संसार उत्पति और विनाशके एकमात्र कारण हैं, जरा अवस्था जिनका स्पर्श भी नहीं कर सकतीं तथा जो मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं. इन भगवान् श्रीहरिकों में बन्दना करता हैं। के संक्षिप्त ब्रह्मपुराण में मुनि बोले-साधुशिरोमणे! आप पुराण, तन्त्र, तथा मोक्षके हेतु हैं, उन भगवान् विष्णुको हों शास्त्र, इतिहास तथा देवताओं और दैत्यक नमस्कार है। जो जगकी उत्पत्ति, पालन और जन्म-कर्म एवं चरित्र-सब जानते हैं। वेद, संहार करनेवाले हैं, जरा और मृत्यु जिनका स्पर्श शास्त्र, पुराण, महाभारत तथा मोक्षशाखमें कोई नहीं करतीं, जो सयके मूल कारण हैं, उन भी यात ऐसी नहीं हैं, जो आपको ज्ञात न हो। परमात्मा विष्णुको नमस्कार है। जो इस विश्वकै आधार हैं, अत्यन्त सूक्ष्ममें भी सक्षम हैं, सब प्राणियोंके भीतर विराजमान हैं, क्षर और अक्षर पुरुषसे उत्तम तथा अविनाशी हैं, उन भगवान् विष्णुको प्रणाम करता हैं। जो वास्तवमें अत्यन्त निर्मल ज्ञानस्वरूप हैं, किन्तु अज्ञानवश नाना पदार्थोके रूपमें प्रतीत हो रहे हैं, जो विश्वकी सृष्टि और पालनमें समर्थ एवं उसका संहार करनेवाले हैं, सर्वज्ञ हैं, जगत्के अधीश्वर हैं, जिनके जन्म

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