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श्रीमद्भगवद्गीता: का सार एक जीवन जीने की शैली। जीवन की सफलता का मन्त्र।

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गीता कोई धार्मिक वस्तु नहीं है अपितु जीवन जीने का सही तरीका बताने वाली एक महान पुस्तक है! मनुष्य को सही मार्ग सूझती है। ये हर धर्म के लोगो के लिए है। भारत की इस महान पुस्तक को विदेश में भी खूब प्यार मिल रहा है। और ये इसलिए संभव हो पाया है। क्योकि लोगो ने इसके महत्त्व को पहचाना है। आज हम वही गीता का सार आपको बताने वाले हैं।

गीता का सार – एक जीवन जीने की शैली

भारतीय संस्कृति अति प्राचीन संस्कृति है। यहां मनुष्य, प्राणी मात्र की ही पूजा नहीं होती, अपितु यहां एक पाषाण की भी पूजा की जाती है इतनी महान संस्कृति है। यहां के वेद, उपनिषद, पुराण, ब्राह्मण पुराण आदि इतने प्राचीन हैं कि इसके समकालीन कोई और संस्कृति नहीं है। महाभारत का युद्ध दो भाइयों का युद्ध नहीं था अपितु–सत्य–असत्य और धर्म का युद्ध था। श्री कृष्ण के मुख से युद्ध भूमि में अपने शिष्य अर्जुन को दिए गए उपदेश को गीता का सार कहा जाता है।
गीता का सार एक जीवन जीने की शैली है, जो मानव के उत्पन्न होने से मृत्यु तक के रहस्य और उसके लक्ष्य को निर्धारित करता है। गीता मैं निहित विचारों को जिस मानव ने अक्षरसह पालन कर लिया, वह इस पृथ्वी पर दुख वैमनस्य आदि से छुटकारा पा गया। माना जाता है कि दुनिया के जितने भी सवाल हैं उसका जवाब गीता में ही छिपा हुआ है। जब भी कोई व्यक्ति अपने पथ से विचलित होता है। उसे स्पष्ट लक्ष्य और रास्ता नजर नहीं आता तो उसे गीता का पाठ अवश्य करना चाहिए। व्यापार, परिवार, समाज धन-संपत्ति आदि जितने भी पृथ्वी पर विषय हैं उन सभी के सार गीता में निहित है।

श्रीमद्भगवद्गीता गीता दुनिया के वैसे श्रेष्ठ ग्रंथों में है जो ना केवल सबसे ज्यादा पढ़ा जाता है, बल्कि इसका वाचन और श्रवण भी सबसे अधिक होता है। कहते हैं जीवन कि हर पहलू को भागवत गीता से जोड़कर व्याख्या की जा सकती है। जबकि अन्य कोई ऐसा ग्रंथ नहीं है जिससे जीवन का सार लिया जा सकता है।

भारत के लिए दुर्भाग्य का विषय है कि जिस भूमि पर इस गीता का प्रादुर्भाव हुआ है, वहां के लोग इसका अनुकरण करने में पीछे है। जबकि दुनिया के अन्य क्षेत्र गीता का अनुकरण करके उन्नति कर रही है। यह भी दुर्भाग्य की बात है आज युवाओं को इसका महत्व पता नहीं है, शायद पूर्वजों के द्वारा युवाओं को गीता का महत्व नहीं बताया जा रहा है। गीता के रहस्य को जिस व्यक्ति ने ग्रहण किया वह सांसारिक चिंता से मुक्ति को प्राप्त हुआ।

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गीता का सार

  1. क्यों व्यर्थ चिंता करते हो ? कौन तुम्हें मार सकता है? आत्मा न पैदा होता है ना मरता है।
  2. जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है। जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप ना करो। भविष्य की चिंता ना करो। वर्तमान चल रहा है।
  3. तुम्हारा क्या गया, जो रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? ना तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया, जो दिया यहीं पर दिया। जो लिया इसी( भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया। खाली हाथ आए, खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का है, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझकर मग्न हो रहे हो। बस, यही प्रसन्नता तुम्हारे दुखों का कारण है।
  4. परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो, मेरा, तेरा, छोटा–बड़ा, अपना- पराया, मन से मिटा दो, विचार से हटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।
  5. ना यह शरीर तुम्हारा है, ना तुम इस तरह के हो। यह अग्न, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जाएगा। परंतु आत्मा स्थिर है, फिर तुम क्या हो ?
  6. तुम अपने आप को भगवान को अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इस सहारे को जानता है, वह भय, चिंता, शौक से सर्वदा मुक्त है।
  7. जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान को अर्पण करता चल। ऐसा करने से तू सदा जीवन–मुक्त का आनंद अनुभव करेगा।