
उत्तराखंड की धर्मनगरी हरिद्वार के सरकारी स्कूलों में केंद्र सरकार की मध्याह्न भोजन योजना गहरे संकट से जूझ रही है। जिले के प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में चावल का स्टॉक पूरी तरह खत्म हो जाने से हालात बिगड़ते जा रहे हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई स्कूलों में बच्चों को मिलने वाला दोपहर का भोजन बंद हो गया है, जबकि कुछ स्कूल उधार के सहारे व्यवस्था चला रहे हैं।
उधार के सहारे चल रही व्यवस्था
कक्षा 1 से 8 तक के हजारों बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी अब शिक्षकों के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। सरकारी आपूर्ति ठप होने के कारण स्कूलों को स्थानीय राशन डीलरों से उधार पर चावल लेना पड़ रहा है।
प्रधानाध्यापकों का कहना है कि उधारी लगातार बढ़ती जा रही है और पिछले बकाए का भुगतान न होने से अब कई राशन डीलर भी चावल देने से मना करने लगे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में और अधिक स्कूलों में मिड-डे मील बंद होने की आशंका बढ़ गई है।
कई स्कूलों में बंद हुआ भोजन
जिले के दूरस्थ और ग्रामीण इलाकों के कई स्कूलों में पिछले कुछ दिनों से मध्याह्न भोजन पूरी तरह बंद पड़ा है। जिन स्कूलों की उधार लेने की क्षमता खत्म हो गई है या जहां राशन डीलरों ने सप्लाई रोक दी है, वहां बच्चों को बिना भोजन के ही स्कूल से लौटना पड़ रहा है।
इसका सबसे ज्यादा असर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों पर पड़ रहा है, जिनके लिए यह भोजन पोषण का मुख्य स्रोत होता है। भोजन बंद होने से उनकी उपस्थिति और स्वास्थ्य दोनों पर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहा है।
प्रशासनिक लापरवाही बनी वजह
सूत्रों के मुताबिक, शिक्षा विभाग और रसद विभाग के बीच तालमेल की कमी और बजट आवंटन में देरी इस संकट की मुख्य वजह है। समय पर चावल की आपूर्ति न होने से पूरी योजना पटरी से उतरती नजर आ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है और तत्काल हस्तक्षेप की जरूरत है।
अभिभावकों और शिक्षकों की मांग
अभिभावकों और शिक्षक संगठनों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि जल्द से जल्द स्कूलों को चावल की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए। साथ ही राशन डीलरों के बकाए का भुगतान भी समय पर किया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने।
फिलहाल हालात यह हैं कि हरिद्वार के कई स्कूलों में दोपहर की घंटी बजने पर बच्चों के हाथों में थाली तो होती है, लेकिन उसमें खाना नहीं—और यह तस्वीर व्यवस्था की गंभीर विफलता को उजागर कर रही है।













