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Saturday, January 17, 2026
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मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर डिजिटल अन्याय, 6.2 लाख से अधिक वाहनों का ₹12.4 करोड़ का फर्जी चालान

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क्या किसी सभ्य समाज में तकनीक कानून से ऊपर हो सकती है? मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर जो हुआ, उसने न केवल कानून-पालक नागरिकों का भरोसा तोड़ा, बल्कि तकनीक-आधारित ट्रैफिक निगरानी प्रणाली की साख को भी गहरा झटका दिया है।

जनवरी 2023 से मार्च 2024 के बीच, 6.2 लाख से अधिक वाहन चालकों पर गलत साइड ड्राइविंग का फर्जी आरोप लगाते हुए करीब ₹12.4 करोड़ का जुर्माना ठोक दिया गया वो भी तब, जब उन्होंने कोई उल्लंघन किया ही नहीं था।

आरटीआई से सामने आई चौंकाने वाली जानकारी के अनुसार, यह भारी गड़बड़ी महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम (MSRDC) की कैमरा आधारित निगरानी प्रणाली से उत्पन्न हुई। कैमरे की गलत स्थिति या सॉफ़्टवेयर की दोषपूर्ण कॉन्फ़िगरेशन के कारण, सही दिशा में चलने वाली गाड़ियों को भी गलत दिशा में जा रही गाड़ियां समझा गया और बिना मानवीय जांच के ऑटोमैटिक चालान भेज दिए गए।

इस सिस्टम की सबसे बड़ी विडंबना यही है जिसे सड़क सुरक्षा के प्रहरी के तौर पर तैनात किया गया, वही निर्दोषों को अपराधी घोषित कर बैठा। वाहन मालिकों को चालान तब मिला जब कथित ‘उल्लंघन’ को हुए कई हफ्ते बीत चुके थे, और चालान में यह तक स्पष्ट नहीं था कि ग़लती कहाँ और कैसे हुई। बहुतों ने परेशानी से बचने के लिए चालान भरना बेहतर समझा, जिससे एक दोषपूर्ण प्रणाली को अप्रत्यक्ष समर्थन मिलता गया।

इतनी बड़ी चूक, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं?

15 महीनों में 6 लाख से अधिक फर्जी चालान यानी हर दिन 1,300 से ज्यादा गलत जुर्माने। फिर सवाल उठता है- क्या कोई निगरानी नहीं थी? क्या कोई चेतावनी नहीं मिली?, और सबसे अहम जवाबदेही किसकी है? यह चूक सिर्फ तकनीकी नहीं, प्रशासनिक विफलता भी है।

रिफंड की उम्मीद, लेकिन कब?

अब जब RTI और जनआक्रोश के चलते मामला सामने आया है, तो MSRDC ने कहा है कि वे कैमरे और सॉफ़्टवेयर की समीक्षा कर रहे हैं और गलत चालान का भुगतान कर चुके लोगों को रिफंड देने पर विचार कर रहे हैं। लेकिन अब तक कोई निश्चित समयसीमा, कोई ठोस प्रक्रिया सामने नहीं आई है।
ऑनलाइन मंचों पर गाड़ियों के मालिक अपने अनुभव साझा कर रहे हैं — “हमने कुछ किया नहीं, फिर भी सज़ा मिली”, “सिस्टम को चुनौती देने का कोई रास्ता नहीं”, “डिजिटल चालान अब डर का प्रतीक बन गया है”।

जब तकनीक ही जज, जूरी और जल्लाद बन जाए, तो न्याय कहाँ से मिलेगा? यह सवाल सिर्फ एक्सप्रेसवे पर नहीं, पूरे देश के लिए चेतावनी है, जहां AI और ऑटोमेशन के नाम पर इंसानी गलती को सिस्टम की मजबूरी कहा जा रहा है।

अब ज़रूरत है जवाबदेही की

हर गलत चालान का ऑडिट हो।

सभी भुगतानों की वापसी सुनिश्चित हो।

ट्रैफिक सिस्टम में मैन्युअल समीक्षा की अनिवार्यता तय हो।

और सबसे बढ़कर नागरिकों को न्याय मिले।

यह घटना साफ संदेश देती है बिना पारदर्शिता और जवाबदेही के तकनीक भी अन्याय का हथियार बन सकती है।