वट सावित्री व्रत के दिन जरूर पढ़ें सावित्री-सत्यावान की कथा।। Savitri Vrat Katha

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सावित्री -सत्यावान व्रत कथा

सावित्री भारतीय संस्कृति के इतिहास में महत्तवपूर्ण चरित्र माना गया है। सावित्री ने अपने तप की ताकत से मृत्यु के स्वामी यमराज को अपने पति सत्यवान के जीवन को वापस करने के लिए मजबूर किया था। इसलिए विवाहित महिलाएं अपने पति की सलामती और लंबी आयु के लिए यह व्रत रखती हैं। बता दें सावित्री का अर्थ वेद माता गायत्री और सरस्वती भी होता है।

सावित्री का जन्म भी विशिष्ट परिस्थितियों में हुआ था। एक कथा के अनुसार मद्र देश के राजा की कोई संतान नहीं थी। राजा अश्वपति ने संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाया और मंत्रोच्चार के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियां दी। करीब अठारह सालों बाद देवी सावित्री ने राजा को संतान प्राप्ति का वरदान दिया। देवी सावित्री की कृपा से जन्म लेने के कारण राजा अश्वपति ने अपनी पुत्री का नाम सावित्री रख दिया।

राजा की पुत्री सावित्री बेहद सुंदर थी और उसके लिए योग्य वर न मिलने की वजह से राजा अश्वपति बहुत परेशान थे। उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा। सावित्री वनों में भटकने लगी। वहां साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया। ऐसा माना जाता है साल्व देश पूर्वी राजस्थान और अलवर के इर्द-गिर्द था।

सत्यवान अल्पायु थे। वे वेदों के ज्ञाता थे। श्री नारद ने सावित्री से मिलकर सत्यवान से शादी ना करने की सलाह भी दी थी, परंतु सावित्री ने सत्यवान से ही शादी की। जब सावित्री के पति सत्यवान की मृत्यु के लिए कुछ ही दिन बचे थे तो सावित्री ने घोर तपस्या की जिसका फल उन्हें मिला।

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