Garuda Puran

0
244
garuda puran

गरुड़ पुराण

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ 

 

निखिलभुवननाचे शाश्वतं सुप्रसन्नं त्वतिविमलविशुद्धं निर्गुणं भावपुष्यैः। सुखमुदितसमस्त पूजयाम्यात्मभावं विशतु हृदयपये सर्वसाक्षी चिदात्मा

गरुड़वाहन भगवान् विष्णुसे दर्शनकी प्रार्थना अस्मादिदं जगदुर्देति चतुर्मुखाचं अस्मिन्नवस्थितमशेषमशेषमूलें। पत्रोपयाति विनयं च समस्तमन्ते इग्गोचरों भवतु मैद्य स दीनबन्धुः ।। आ ससका फरारविन्दै गुव गदा दायरको विभाति सम्प। पक्षीनपृष्ठपरिॉपितपादपों दुग्गोचरों भवतु में से दीनबन्धुः ॥ यस्याईटियातस्तु सुराः समुचि झोपमोन बनाना विलयं सनन्ति। भीताश्चत च अतर्कपमानिलाद्या दृग्गोचरों भवतु मे स दीनबन्धुः ।। जिन परमात्मासे यह अह्मा आदिप जगत् प्रकट होता है और सम्पूर्ण जगकै कारणभूत जिन परमेश्वर यह समस्त संसार स्थित है तथा अन्तकालमें यह समस्त जगत् जिनमें सीन हो जाता हैं, में दीनबन्धु भगवान् आज मेरे जैत्रों के समक्ष दर्शन दें। जिनके करकमलमें सूर्यके समान प्रकाशमान चक्र, भारी गदा और श्रेष्ठ शंख शोभित हो रहा है, जो पक्षिराज़ (गरुड़-की पीउपर अपने चरणकमल रखें हुए हैं, वे दनबन्धु भगवान् आज मैं नेत्रोंके समक्ष दर्शन दें। जिनकी नैहद्दष्टसे देखें जानेके कारण देवता लोग ऐश्वयं पाते हैं और कोपष्टिके द्वारा देखें जाने से दानव लोग नष्ट हो जाते हैं तथा सुर्य, गम और वायु आदि जिनके भयसै भौत हॉकर अपने-अपने कार्यो प्रवृत्त होते हैं, वे दीनबन्धु भगवान् आज्ञ मेरै नेत्रोंके समक्ष दर्शन दें।

 

कल्याणकारी संकल्प

अजाग्रतो मुति दैवं तद् सुप्तस्य तथैथैति।

इमं तिर्वा ओनिक जन्मे मनः शिवमल्पमस्तु

ज्ञों जागते हुए पुरुषका दूर चला जाता है और सौतें हुए पुरूषका वैसे ही निकट आ जाता है, जो परमात्माके साक्षात्कारका प्रधान साधन है, जो भूत, भविष्य, वर्तमान, सैनिकृष्ट और व्यवहित पदार्थों का एकमात्र ज्ञाता है और जो विषयका ज्ञान प्राप्त करनेवालें औत्र आदि इन्द्रियोंका एकमात्र प्रकाशक और प्रवर्तक है, मेरा वह मन कल्याणकारी भगवसम्बन्धी संकल्पसे युक्त हों।

 

चैन कमण्यमसौ मनीषियों ने कृन्त विदथेषु धींगः।

घद अक्षमतः प्रधानां तन्मे मनः शिवसायमा

कर्मनल एवं घर विद्वान् जिसके द्वारा अनिय पदाथका ज्ञान प्राप्त करके यज्ञमें कमौका विस्तार करते हैं, जो इन्द्रियका पूर्वज़ अथवा आत्मस्वरूप हैं, जो पूज्य है और समस्त प्रज्ञाके हृदयमें निवास करता है, मैरा वह मन कल्याणकारी भगवत्सम्बन्धी संकल्पसे युक्त हो।

 

पत्प्रज्ञानमुत चैतों का घोतिरारमृर्त प्रजासु।

यस्मान्न ते कि जन कर्म कियते तन्मे मनः शिवमल्पमस्तु ।।

जो विशेष प्रकारके ज्ञानका कारण है, जो सामान्य ज्ञानका कारण है, जो धैर्यरूप है, जो समस्त प्रजाके हमें बहकर उनकी समस्त इन्द्रियों को प्रकाशित करता है, जो स्थूल शरीरकी मृत्यु होनेपर भी अमर रहता हैं और जिसके बिना कोई भी कर्म नहीं किया जा सकता, मेरा वह मन कल्याणकारी भगवत्सम्बन्धी संकल्पसे मुक्त हो।

मॅनेई भूत भुवनं भविपत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्।

यैन यज्ञस्नायने समहौना तन्मे मनः शिवमल्पमस्तु ॥

जिस अमृतस्वरूप मनके द्वारा भूत, वर्तमान और भविष्यसम्बन्धी सभी वस्तुएँ ग्रहण की जाती हैं। और जिसके द्वारा सात होताओंवाला अग्रिम यज्ञ सम्पन्न होता हैं, मैं वह मन कल्याणकारी भगवत्सम्बन्धी संकल्पसे युक्त हों।

 

अस्मिञ्चः माम अनुषि यस्मिन् प्रतिता रवानाभावियाः।

यस्मित्त सर्वात प्रशान्त तन्मे मनः शिवसपमस्तु

जिस मनमें रथचक्लकी नाभिमें सगे अरोंके समान ऋग्वेद और सामवेद प्रतिष्ठित हैं तथा जिसमें यजुर्वेद प्रतिष्ठित हैं, जिसमें प्रजाका सय पदार्थों से सम्बन्ध रखनैमाना सम्पूर्ण ज्ञान ऑनत है, मैं यह मन कल्याणकारी भगवत्सम्बन्धी संकल्पसे युक्त हो।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here