Garuda Puran

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garuda puran

गरुड़ पुराण

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ 

 

निखिलभुवननाचे शाश्वतं सुप्रसन्नं त्वतिविमलविशुद्धं निर्गुणं भावपुष्यैः। सुखमुदितसमस्त पूजयाम्यात्मभावं विशतु हृदयपये सर्वसाक्षी चिदात्मा

गरुड़वाहन भगवान् विष्णुसे दर्शनकी प्रार्थना अस्मादिदं जगदुर्देति चतुर्मुखाचं अस्मिन्नवस्थितमशेषमशेषमूलें। पत्रोपयाति विनयं च समस्तमन्ते इग्गोचरों भवतु मैद्य स दीनबन्धुः ।। आ ससका फरारविन्दै गुव गदा दायरको विभाति सम्प। पक्षीनपृष्ठपरिॉपितपादपों दुग्गोचरों भवतु में से दीनबन्धुः ॥ यस्याईटियातस्तु सुराः समुचि झोपमोन बनाना विलयं सनन्ति। भीताश्चत च अतर्कपमानिलाद्या दृग्गोचरों भवतु मे स दीनबन्धुः ।। जिन परमात्मासे यह अह्मा आदिप जगत् प्रकट होता है और सम्पूर्ण जगकै कारणभूत जिन परमेश्वर यह समस्त संसार स्थित है तथा अन्तकालमें यह समस्त जगत् जिनमें सीन हो जाता हैं, में दीनबन्धु भगवान् आज मेरे जैत्रों के समक्ष दर्शन दें। जिनके करकमलमें सूर्यके समान प्रकाशमान चक्र, भारी गदा और श्रेष्ठ शंख शोभित हो रहा है, जो पक्षिराज़ (गरुड़-की पीउपर अपने चरणकमल रखें हुए हैं, वे दनबन्धु भगवान् आज मैं नेत्रोंके समक्ष दर्शन दें। जिनकी नैहद्दष्टसे देखें जानेके कारण देवता लोग ऐश्वयं पाते हैं और कोपष्टिके द्वारा देखें जाने से दानव लोग नष्ट हो जाते हैं तथा सुर्य, गम और वायु आदि जिनके भयसै भौत हॉकर अपने-अपने कार्यो प्रवृत्त होते हैं, वे दीनबन्धु भगवान् आज्ञ मेरै नेत्रोंके समक्ष दर्शन दें।

 

कल्याणकारी संकल्प

अजाग्रतो मुति दैवं तद् सुप्तस्य तथैथैति।

इमं तिर्वा ओनिक जन्मे मनः शिवमल्पमस्तु

ज्ञों जागते हुए पुरुषका दूर चला जाता है और सौतें हुए पुरूषका वैसे ही निकट आ जाता है, जो परमात्माके साक्षात्कारका प्रधान साधन है, जो भूत, भविष्य, वर्तमान, सैनिकृष्ट और व्यवहित पदार्थों का एकमात्र ज्ञाता है और जो विषयका ज्ञान प्राप्त करनेवालें औत्र आदि इन्द्रियोंका एकमात्र प्रकाशक और प्रवर्तक है, मेरा वह मन कल्याणकारी भगवसम्बन्धी संकल्पसे युक्त हों।

 

चैन कमण्यमसौ मनीषियों ने कृन्त विदथेषु धींगः।

घद अक्षमतः प्रधानां तन्मे मनः शिवसायमा

कर्मनल एवं घर विद्वान् जिसके द्वारा अनिय पदाथका ज्ञान प्राप्त करके यज्ञमें कमौका विस्तार करते हैं, जो इन्द्रियका पूर्वज़ अथवा आत्मस्वरूप हैं, जो पूज्य है और समस्त प्रज्ञाके हृदयमें निवास करता है, मैरा वह मन कल्याणकारी भगवत्सम्बन्धी संकल्पसे युक्त हो।

 

पत्प्रज्ञानमुत चैतों का घोतिरारमृर्त प्रजासु।

यस्मान्न ते कि जन कर्म कियते तन्मे मनः शिवमल्पमस्तु ।।

जो विशेष प्रकारके ज्ञानका कारण है, जो सामान्य ज्ञानका कारण है, जो धैर्यरूप है, जो समस्त प्रजाके हमें बहकर उनकी समस्त इन्द्रियों को प्रकाशित करता है, जो स्थूल शरीरकी मृत्यु होनेपर भी अमर रहता हैं और जिसके बिना कोई भी कर्म नहीं किया जा सकता, मेरा वह मन कल्याणकारी भगवत्सम्बन्धी संकल्पसे मुक्त हो।

मॅनेई भूत भुवनं भविपत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्।

यैन यज्ञस्नायने समहौना तन्मे मनः शिवमल्पमस्तु ॥

जिस अमृतस्वरूप मनके द्वारा भूत, वर्तमान और भविष्यसम्बन्धी सभी वस्तुएँ ग्रहण की जाती हैं। और जिसके द्वारा सात होताओंवाला अग्रिम यज्ञ सम्पन्न होता हैं, मैं वह मन कल्याणकारी भगवत्सम्बन्धी संकल्पसे युक्त हों।

 

अस्मिञ्चः माम अनुषि यस्मिन् प्रतिता रवानाभावियाः।

यस्मित्त सर्वात प्रशान्त तन्मे मनः शिवसपमस्तु

जिस मनमें रथचक्लकी नाभिमें सगे अरोंके समान ऋग्वेद और सामवेद प्रतिष्ठित हैं तथा जिसमें यजुर्वेद प्रतिष्ठित हैं, जिसमें प्रजाका सय पदार्थों से सम्बन्ध रखनैमाना सम्पूर्ण ज्ञान ऑनत है, मैं यह मन कल्याणकारी भगवत्सम्बन्धी संकल्पसे युक्त हो।

सुषाश्चरानिव यन्मनुष्याचेनीयने भीशभिजन इव।

हृत्स्नतिनं अदजिरे जवि में मनः शिवमल्पमस्तु

श्रेष्ठ सारधि जैसे घौका संचालन और उसके द्वारा घौडौंका नियन्त्रण करता है, वैसे ही ज्ञ प्राणियोंका संचालन तथा नियन्यण करनेवाला है, जो हमें रहता है, जो कभी बड़ा न होना और जो अत्यन्त बैंगवान् है, मैं यह मन कल्याणकारीं भगवत्सम्बन्धी संकल्पसे युक्त हो।

 

 

असतो मा सद् गमय

गराइपुरागका माहात्म्य

विद्याकीनभालक्ष्मीनारोग्यादिकारम् यः पठेयाः सववत् चिर्न मोंत्॥ [भगवान् इरिने कहा-]ॐ कट्! यह महामुराग विद्या, अश, सौन्ट्र्य, लक्ष्मी, विजय और आग्मादिको कारक ॥ है। जो मनुष्य इसका पट करता है या सुनता है, वह सब का गान गाता है और भन्ने कुनै स्वर्गकी प्राप्ति होती है।

 

: पोंछायाहामि मावा समाहितः ।।

सलिल्लेखयेदापि भारयेत् पुस्तक ननु धर्मा प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात्

जो मनुष्य एकाग्रत होकर इस महापराका पाद्ध करता है, मुनता है अधया सुनाता है, जो इसको सिखाता है। लिखता हैं या पुस्तके ही रूममें इसे अपने पास रखता है, वह पद धर्मा है तो इसे धर्मकी प्राप्ति होती है, बदि | यह आईका अभिलाषी है जो अर्थ प्राप्त करता है।

गास यस्य कुनै तु तस्य कुतगती मयः । अः पातन मुनि समाप्नुयात् ॥ | जिस मनुष्यके हाथ महः गरुमहापुराण विमान है, उसके हाथमें ही नीतिका कौश है। जो प्राण इस पुराणका माछ करता है या इसको सुनता है, यह भोग और मोक्ष दनको प्राप्त कर सँता है।

धर्मार्थकाममोक्षांश्च मानाच्यागादितः पुत्रार्थी लभते सुभान कामा ममाप्द्

इस महापुराणको पाने व सुनने में मायके धर्म, अर्थकाम और मोक्ष-इन चारों मुरुषायक मिस हो जाती हैं। म मराजका माछ करके या इसको सुन करके मुन्न चाहनेवाला पुत्र प्राप्त होता हैं तथा कामनाका इछुक अपनी कामना प्राममें सफलता प्राप्त कर लेता है।

विद्यार्थी लभते सिं ज्ञयार्थी लभते ज्ञयम्। ब्रह्महत्यादिना पापी पापानमधाम्नुपान्॥

विद्यापीको विद्या, विजिगको विनय, झह्महत्यादि अE पापों पापाले चिनिकों प्राप्त होता है।

वम्याप भते पुत्र कन्या विन्दतिं त्पत्तिम् कोमा में ये भीगा भीगानुपान्॥ वन्या स्त्री पुत्र, कन्या सन पति, क्षेमाची अंम् धा भोग चाहनेवाला भोग प्राप्त करता है।

मङ्गलार्थी मङ्गलानि गुणाध गुणमाप्नुयात् काथ्यार्थी चे कवित्वं सारार्थी सारमाप्नुयात्।।

मालकी कामनायाला व्यक्ति अपना मस, गणका क व्यक्ति गुण, काय करनेका अभिलाषी मनुष्य कवियशक्ति और जीवनका साराच चाहनेवाला व्यक्ति सारच नाश करता है।

ज्ञानार्थी भर्ने ज्ञानं सर्वसंसारमर्दनम्। इदं यत्पयनं अन्य गाई गरिनम्

ज्ञानाची सम्पूर्ण संसारको मर्दन करनेवाला ज्ञान प्राप्त करता है। [हें कह !] पक्ष के द्वारा कहा गया यह गारु [महापुराण धन्य है। यह तो सबका कल्याण करनेवाला है।

. भाकाले तम्य लोकमेकं यः पर्चेत् इनकामनायो मम्॥

जो मनुष्य इस महापुरागकै एक भी श्लोकका पाठ करता है. इसकी अकाल-मृत्यु न होती। इसके मात्र आधे अनौकका पाठ करनेमें निधन हौं दुष्ट झाका अम हो जाता है।

अतो हि गाई मुख्य पुराण शास्त्रसम्मतम् । गारुन सर्म नामित विष्णुधर्मप्रदर्शन। इसलिये बहू गरुडपुराण मुख्य और शास्त्रसम्मत पुराण हैं। विष्णुधर्मके प्रदर्शन गरुडपुराणके समान दूसरा कोई भी प्राप्त नहीं है। यथा

सुरागां प्रवरों जनार्दनों यथायुधानां प्रवरः सुदर्शनम् तथा पुराणेषु गारुई मुख्यं तदारितत्वदर्शने

जैसे देयम् जनार्दन श्रेष्ठ हैं और आपमें सुदर्शन में है, वैसे ही पुराणों में वह गशपुराण हरिके तत्वनिरूपणमें मुम कहा गया है।

गाठायपुराणे 1 प्रतिमाओं का स्मृतः अतों नमस्काघ गम्यो बग्यो सतः वाम गारुडपुराणमें हुई हौं प्रतिपाद्म हैं, इसलिये हरि हौं नमस्कार करने योग्य है, हर ही प्य है और वे हरि | ह सब प्रकार से मैवा करने योग्य हैं।

परा गाई पपयं पवित्रं पापनाशनम् । शृण्म्यतां कामनापूर तथ्यं सर्वव हि ॥ यचे अयान्मत्य माझ्चापि पाँकीतयेत् । विप सानो घरी नपाको दिर्न मजेत् ॥

हाय हा ही पवित्र और यदायक है। मह सभी पार्षीका विनाशक एवं सुननेबाकी समस कामनाका पुरक है। इसका सदैव ऋण करना चाहियें। जो मनुष्य इस मामुको सुनता पा सका भाव का है, यह निष्पाप होकर यमराजको भयंका यातनाको तौइकर स्वर्गको प्राप्त करता है।

* पुराणं गारुडं वक्ष्ये सारे विष्णुकथाअयम्

 

गरुडपुराण सिंहावलोकन

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। और श्रीरूपमें विख्यात हैं, उसी प्रकार हैं गरुड! सभी देवी सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥ पुराणोंमें यह गरुडमहापुराण भी याति आँनत करेगा। जैसे

नरनेछ भगवान् श्रीनर नारायण और भगवती सरस्वती विमें मेरा कीर्तन होता है, वैसे ही गरुड नामसे आपका तथा व्यासदेवको नमन करके पुराणकी चर्चा करनी भी संकीर्तन होगा। हे पक्षिश्रेष्ठ ! आप मैग्र ध्यान करके उस चाहिये ।।

मुगुणका प्रायन करें । पुराण वाङ्मयमें गरुडपुराणका महत्त्वपूर्ण स्थान है, अधाई देवदेवान श्रीः ख्यात विनतासुत

क्योंकि सर्वप्रथम परब्रह्म परमात्मप्रभु साक्षात् भगवान् तथा यानि पुराणेषु गारुई गरुष्यति ।। विवाने ब्रह्मादि दैवतासहित देवदेवेश्वर भगवान् रुद्रदेवको बधाई, कीर्तनीय तथा त्वं गकामना।

सभी शास्त्रों सारभूत तथा महान् अर्थ बतानेवाले इस म स्यात्वा पक्षिवेद पुरा गर्दै गासम्॥ ‘गरुमहापुराण’को सुनाया था।

। । ३५६-५७) एक बार तीर्थयाआके प्रसंगमें सर्वशास्त्रपारंगत शान्तचित्त भगवान्के द्वारा यह वरदान दिये जानेके बाद, इसी महात्मा सूतजी नैमिषारण्यमें पधारे, व शौनकादि ऋषि- सम्बन्धमें कश्यप ऋषिके द्वारा पूछे जानेपर गरुड़ने इसी मुनियनें उनकी पूजा की और जिज्ञासारूपमें कुछ प्रश्न भी पुराणको उन्हें सुनाया। कश्यपने इस गरुद्धमहापुराणका कियें। प्रश्नोंके समाधान सूतीने गरुङमहापुराणक कथा श्रवण करके ‘गारुडी विद्या’ के बलसे एक जले हुए उन ऋषि-महर्षियोंको सुनायीं। सूतजौने यह कथा भगवान् वृक्षको भी जीवित कर दिया था। गरुड़ने स्वयं भी इसीं । व्यासजसे सुनीं श्री, व्यासजीकों यह कथा पितामह ब्रह्मासे विद्याकै द्वारा अनेक प्राणियोंको जीवित किया था। प्राप्त हुई । वास्तव मूलरूपसे इस महापुराणको गरुजींने इस गरुद्धमहापुराणके प्रारम्भमैं सर्ग-वर्णन किया गया। कश्यप ऋषिकों सुनाया था।

है। तदनन्तर देवार्चनकी धियाँ प्रस्तुत की गयी हैं, । प्राचीनकालमें पृथ्वोपर पक्षिराव गरुड्ने तपस्या द्वारा ‘विष्णुपञ्चरस्तोत्र’ कहा गया है, जो जौवोंके लिये अत्यन्त भगवान् विष्णुको आराधना कीं, जिससे संतुष्ट होकर प्रभुने कल्याणकारी है। इसके बाद भोग और मोक्षको प्रदान अभीष्ट वर माँगनेके लिये कहा। गरुड़ने भगवानुसे निवेदन करनेवाले पानयोगका वर्णन हुआ है किया कि नागने में माता विनताको दास बना लिया है। मैं शगनुका साक्षी, अगत्का नियन्ता और परमानन्दस्वरूप है देब! आप प्रसन्न होकर मुझे यह वरदान प्रदान करें कि हैं। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति- इन सभी अवस्थाओं मैं उनको जीतकर अमृत प्राप्त करने में समर्थ हो सकें और जगत्का साक्षी होते हुए भी मैं इन अवस्थाओंसे रहित माँको नागौंकों माता कदुक दासतासे मुक्त करा सकें। मैं हैं. मैं ही तुरीयं ब्रह्म और विधाता हैं। मैं दृग्रूप अर्थात् आपका वाहन बनें और नागको विद्द करनेमें समर्थ हो समस्त प्रपाका इष्टा, दृश्य एवं दृष्टि हैं। मैं ही निर्गुण, मुक्त, सकें तथा जिस प्रकार पुराणमंहिताका रचनाकार हो सके. बुरू, शुद्ध-प्रयु, अजर, सर्वव्यापी, सत्यस्वरूप पूर्व वैसा हीं करनेकी कृपा करें।

शिवस्वरूप परमात्मा हैं। इस प्रकार ज्ञों विद्वान् इन । भगवान् हरिनं पक्षिराज गरुड़कों ये अभीष्ट वरदान परमपद परमेश्वरका ध्यान करते हैं, वे निश्चय ही ईभएका प्रदान किये तथा कहा कि आप अत्यन्त शक्तिसम्पन्न होकर सारूप्य प्राप्त कर लेते हैं। यह स्वयं श्रीहरि भूतभावन मेरे वाहन बनेंगे। वियोंके विनाशकी शक्ल भी आपको प्राप्त भगवान् शङ्करसे कहते हैं कि हैं सुखत शङ्कर ! आपसें हौं होगी, मेरी कृपासे आप मेरे ही माहात्म्यको कहनेवाली इस ध्यानयोगकी चर्चा मैंने कौं है। जो व्यक्ति सदैब इस पुराणहिताका प्रणयन करेंगे। मेरा जैसा स्वरूप कहा गया ध्यानयोगका पाड़ (मनन-चिन्तन) करता है, वह विष्णुलोकको हैं, वैसा ही आपमें भौं प्रकट होगा। आपके द्वारा प्रणीत ग्रह प्राप्त करता है। पुराणसहिता, आपके ‘गरुड’ नामसे लॉक में प्रसिद्ध होगी। भगवान् रुद्र पूछते हैं- हे प्रभो ! मनुष्य किस हैं विनतासुत ! सि प्रकार, देवदेवोंके मध्य में ऐश्वर्य मन्त्रका जप करके इस अथाह संसार-सागर पार हो सकता के गपुराग-विलोकन है? इसपर श्रीहरिने उत्तर दिया कि परब्रह्म परमात्मा, शुद्ध, ऐश्वर्यसम्पन्न, सत्प, परमानन्दस्वरुप, आत्मस्वरूप, नित्य परमेश्वर भगवान् विष्णुकौं सहस्त्रनाम स्तुति करनेपर परब्रह्म तथा परमभ्योति स्वरूप हैं, ऐसे में परमार मनुष्य भवसागरको पार कर सकता है। इस क्रममें समस्त ध्यानके योग्य हैं तथा पूजनीय हैं। मैं भी वही है-ऐसा | पापक विनष्ट करनेवाले विष्णुसहस्रनामस्तोत्र को भगवान्नै समझना चाहियें।

उन्हें सुनाया। यह बिष्णुसहस्रनाम इस पुराणमें प्रस्तुत हैं, इस प्रकार आत्मस्वरूप नारायणका यम-नियम इत्यादि नौ अन्य विष्णुसहस्रनामसे भिन्न हैं।

बगक साधनसे एकाग्रचित्त होकर जो पान करता है, वह भगवान् विष्की आराधनाके बाद भगवान् सूर्यकी मनोऽभिलषित इलाकों प्राप्तकर देवस्वरूप हो जाता है। पुमाका भी वर्णन मिलता है। तदनन्तर जीवोंका उद्धार यदि निष्काम हॉकर उन हरिकी मूर्तिका ध्यान और स्तवन कानैयास पुण्यप्रदायिनी सर्वदेवमय मृत्युञ्जयपूजाका निरूपण करें तो मुक्ति प्राप्त हो जाती है। हुआ है तथा मृत्युञ्जयज्ञपकौं महिमा भी प्रस्तुत की गयौं इसके बाद विविध शालग्राम शिलाओंके लक्षण, हैं। यह मन्त्र मृत्यु और दरिद्रताका मर्दन करनेवाला हैं तथा वास्तुमङ्गल-पूजा विधि तथा प्रासाद-सक्षम (वास्तुको शिव, विष्णु, सूर्य आदि सभी देबका कारणभूत हैं ‘ दृष्टिसे) प्रस्तुत किये गये हैं। देवताको भी सामान्य | जूं सः’- यह महामन्त्र ‘अमृतैज्ञा’ के नामसे कहा जाता है। विधि बता गयी है। वर्ण एवं आश्रम-धमका निरूपण इस मन्त्रका जप करनेसे प्राणों सम्पूर्ण पापसे छूट जाता किया गया है। इसके साथ ही सदाचार एवं शौचाचारकी और मृत्युरहित हो जाता है। अर्थात् मृत्युके समान होनेवाले महत्ता बतायी गयी है। वर्णाश्रम-धर्मका निरूपण करते हुए उसकै कष्ट दूर हो जाते हैं।

ब्रह्माज्ञोंने आसमें कहा कि परमात्मप्रभु परमेश्वरको पूजा भगवान् मृत्युञ्जय चैतकमलके ऊपर बैठें हुए वरदहस्त ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्द-इन चारों वर्गोको अपने तथा अभयमुद्रा धारण कियें रहते हैं। तात्पर्य यह है कि अपने धर्मकै अनुसार करना चाहियें। उनके द्वारा पृथक् उनके एक हाथमें अभयमुद्रा हैं और एक हाथ वरदमुद्दा। पृथक् रूपसे ही उनके धमका वर्णन किया गया है। दों हाथमें अमृतकलश हैं। इस रूपमें अमृतेश्वरका ध्यान यज्ञन, याजन, दान, प्रतिग्रह, अध्ययन और अध्यापन करनेके साथ ही भगवानकै बामाङ्गमें स्थित अमृतभाषिजी ये छ: कर्म ब्राह्मणके धर्म बताये गये। दान, अध्ययन तथा अमृतादेवीका भी ध्यान करना चाहिये। देयके दायें हाथमें यज्ञ-ये क्षत्रिय तथा वैश्य साधारण धर्म हैं। शस्त्रपौवीं कलश और बायें हाथमें कमल सुशोभित रहता है। हॉना तथा प्रागिकी रक्षा करना क्षत्रियोंका विशेष धर्म | इस महापुराणमें प्राणेश्वरी जिल्लाका निरूपण हुआ है। है । पशुपालन, कृषिकर्म तथा व्यापार–में वैश्यवर्गकी वृत्ति सपके विय हरनेके उपाय तथा दुष्ट उपद्रवोंकों दूर करनेके कही गयी है। द्विजातिको संवा शूहका कर्तव्य माना गया मन्त्र दिये गयें हैं। पञ्चवक्त्रपूजन, शिवार्चन-विधि, भगवतीं है। शिल्पकारी उनकी आजीविका की गयी हैं। त्रिपुरा तथा गणेशा आदि देवकी पूजाविधि प्रस्तुत की गयी इसी प्रकार आश्रम-धर्मका भी वर्णन हुआ है। है। भौग और मोक्ष प्रदान करनेवासी गोपालकी तथा भगवान् भिक्षाचरण, गुरुश्रुषा, स्वाध्याय तथा आँगनकार्य में | श्रीधरविष्णुकी पूजाका वर्शन भी किया गया है। इसके साथ ब्राह्मचारियों के धर्म बताये गये हैं।

हो श्रीधरविणका ध्यान तथा उनकी स्तुति प्रस्तुत की गयीं नहोत्र-धर्मका पालन तथा कहे गये अपने विहित हैं। पञ्चतत्वार्चन-विधि, सुदर्शनचक्र-पूजाविधि, भगवान् कर्मांक अनुसार जीविकोपार्जन, पर्वरात्रिको छोड़कर अन्य हयग्रीवके पुजनकी विधि, इँयौं दुर्गाका स्वरूप, सूर्यध्यान यात्रियोंमें धर्मपत्रीका सहवास, देवता, पितर तथा अतिथिगणकी तथा माहेश्वरींपुजन-विध प्रस्तुत की गयी हैं। विधिवत् पूजामें संतान रहना और श्रुतियों एवं स्मृतियों में । तदनन्तर ब्रह्ममूर्तिकं ध्यानका निरूपण किया गया है। कहे गये धर्मांक अनुसार अर्थोपार्जन करना – गृहपॉके ‘हृदयकमलको कर्णिकाके मध्य विराजमान रहनेवाले, धर्म कहे गये हैं। इसके साथ ही संस्कारोंका भी वर्णन शंख, चक्र, गदा और कमलसे सुशोभित तथा श्रीवत्स, किया गया है, जिसके अनुसार गर्भाधानसे लेकर मृत्युपर्यनके कौस्तुभमणि, वनमाला एवं लक्ष्मीसे विभूषित नित्य- संस्कार बताये गये है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य बालकॉक

 

* पुराणं गारुई बमें मा विष्णुकथाभयम् *  

लिये पनयन-संस्कारको अनिवार्यताका दिग्दर्शन काया और स्मृतं ये नेमस्यरूप हैं। यदि इन दोनों दिशा-निर्देश गया है। नहीं मिल पाता है तो सदाचार शिष्टाचार-धर्मका पालन | गृहस्थाश्रमके धर्ममें स्त्रियोंके कर्तव्यका भी विवेचन करना चाहिये। इस प्रकार श्रुति, स्मृति और शिष्टाचारसे हुआ है। स्त्रियोंको अपने पतिकी आज्ञाका पालन करना प्राप्त धर्म – मैं तन प्रकारके सनातन धर्म हैं।

चाहिये, यही इनका परम धर्म है। जिस घरमें पति-पके सुत्प, दान, इमा, निर्लोभता, विद्या, यज्ञ, पूज्ञा और मध्य किसी प्रकारका विरोध नहीं होता, इस में धर्म, इन्द्धय-इमन = आठ शिष्टाचारकै पनि लक्षण कहे गये अर्थ और काम – इसे अबकीं अभिसहि कती है। जी हैं। यह प्रात:काल जानै नैव स्त्री पतिको मृत्युके पश्चात् अथवा उसके जवित रहते हुए करने योग्य गृहस्थ धर्मका वर्णन भी हुआ है। गृहस्थकों अन्य पुरुषको आय नहीं लेतीं, वह इस नौकमें यज्ञ मान सामानमें निहाका परित्याग करके धर्म और अर्थका करती हैं और अपने पातिव्रत्यकें प्रभाव परलोकमें जाकर भलीभाँति चिन्तन करना चाहिये। शौचादि क्रियाओंसें पार्वतीक साहचर्यमें आनन्द प्राप्त करता है। निवृत्त होकर दन्तधावन, स्नान करके समाहितचित्त होकर | अग्निहोत्रका पालन, पृथ्वौष शयन, मृगचर्मका धारण, संध्योपासन, तर्पण, देवार्चन आदि नित्यक्रिया सम्पन्न वनमें निवास, दुध, मूल, फल तथा निवारका भक्षण, निषिद्ध करनी चाहिये। शौचादि क्रियाओंकी शुद्धिका विस्तृत वर्णन कर्मका परित्याग, त्रिकाल-संध्या, ब्रह्मचर्यका पालन और यहाँ हुआ है। देवता तथा अनिधिको पूजा–यह वानप्रस्थाका धर्म हैं। शुद्धि दो प्रकारको हैं – पहली आह्म तथा दूसरी | सभी प्रकारके आरम्भका परित्याग, भिक्षासे प्राप्त अन्नको अभ्यन्तरिक। मिट्टौं तथा जलसे की जानेयासी का शुद्धि भोजन, वृक्षकों छापामें निवास, अपरिग्रह, अहह, सभी और भावकी शुद्धि हाँ आभ्यन्तरंक शुद्ध मानी गयी है। प्राणियोंमें समानभाय, प्रिय तथा अप्रिंयकी प्राप्ति एवं सुख आचमनको शुका प्रमुख अङ्ग माना गया है।

और इसमें समान स्थिति, शरीरको बाह्म और आन्तरिक दृष्ट और अदृष्ट दोनों प्रकारका हित सम्पादन होनेके नी, घाणीमें संयम, परमात्माका ध्यान्व, सभी इझर्योका कारण प्रात:कालकें स्नानक अत्यधिक प्रशंसा की गयी हैं। निग्रह, धारणा तथा ध्यानमैं तत्परता और भाव-शुद्धि– ये सभी शरीर अत्यन्त मलिन है। इसमें स्थित नत्र छिड़ोंसे सदैव परम्राजक या संन्यासौके धर्म कहे गये हैं।

मल निकलता ही रहता है। अत: प्रात:कालका स्नान ‘इसके साथ हीं अहिंसा, प्रिय और सत्य वचन, शरीरको शुद्धिका हेतु, मनको प्रसन्न रखनेवाला तथा रूप पवित्रता, क्षमा तथा दया— सभी आश्रमों और वर्गोका और सौभाग्य वृद्धि करनेवाला है। यह शोक और सामान्य अर्म कहा गया है

दुःखका विनाशक हैं। गङ्गास्नानकी विशेष महिमा है। अहिंसा सुनना वाण सत्यशौचे क्षमा दया। गङ्गास्नानमें सर्यविध पापका नाश होता हैं। वगनां निगिनां चैव सामान्य अर्म उच्यते । शास्त्रोंमें तीन करोड़ मेह नामक राक्षस माने गये हैं।

। १ । ३१३ । २२) ये दुरात्मा राक्षस सदैव प्रातःकाल उदित हो रहे सूर्यदेवको | सदाचार और शौचाचारका निरूपण करते हुए सुतज्ञ या ज्ञानेकौं पाचग करते हैं। अतः सूर्योदय पर्व स्नान शौनकादि ऋषियोंसे कहते हैं कि श्रुति (वेद) और स्मृत करके संध्यौपासनकर्म नहीं करना सूर्यदेवका हौं घातक ( धर्मशास्त्र -का भनौं अकारने अध्ययन करके ऑन- है। जो लोग यथासिधि स्नानकर यथाधिकार संध्योपासन प्रतिपादित धर्मका पालन करना चाहिये, क्योंकि श्रुति हीं करते हैं, में मन्त्रमें पवित्र किये गये अननरूप अर्घ्य सय कमौका मूल है। श्रुतिमें कहा गया धर्म परम धर्म है। (जत)-से उप मह मामक राक्षसोंको जला देते हैं। दिन स्मृति और शास्त्रमें प्रतिपादित धर्म अपर धर्म हैं। यदि और तक जो संधिकाल है, वहीं संध्याकाल ( ४४ मिनट) उपलब्ध श्रुतियों में कोई कर्म ज्ञात नहीं हो रहा है तो उसको होता है। यह संध्याकाल सूर्योदयसे पूर्व दो बड़ीपर्यन्त रहता स्मृतिशास्त्र अनुसार ज्ञानकर करना चाहिये। क्योंकि है, जो उपासक प्रात:काल नित्य ‘गायत्री मन्त्र का जप्त स्मृतिशास्त्र भो तिमूलक होनेके कारण ही मर्मक बोधमें करता है, वह कमलपत्रक भौति पापसे सांलिप्त नहीं होता। प्रमाण माने जाते हैं। कर्ममार्गका दर्शन करानेके लिये श्रुति इस संसारमें आठ मङ्गल हैं-ब्राह्मण, गौ, ग्न,

 

* गरुडपुराणसिंहावलोकन हिरण्य (सोना), नृत, सूर्य, जल और राजा। सदैव इनका इन स्नानको तोर्षका अभाव होनेपर जण जल अथवा किसी

दर्शन और पूजन करना चाहिये तथा प्रधानाध्य अपने कार प्राप्त कृत्रिम जलसे सम्पन्न कर लेना चाहिये। दाहिने करके ही चलना चाहिये।

भूमिसे निकला जल पवित्र होता है, इस जनकी अपेक्षा ‘माता, पिता, गुरु, भ्राता, प्रशा, दीन, दु:खी, आश्रितजन, पर्वतसे निकलनेवाले झरनैका जल पवित्र होता है। इससे भी | अभ्यागत, अतिथि और अग्नि- ये पॉयवर्ग कहे गये हैं। बढ़कर पवित्र जल सरोवरका है। उसकी अपेक्षा नदीका जाल पोष्यवर्गका भरण-पोषण करना स्वर्गका प्रशस्त साधन है। पवित्र है, नदौके जलसे तौर्वजाल श्रेष्ठ है। इन सभी जलों की

अतः मनुष्यको पोष्यवर्गका पालन-पोषण प्रयत्नपूर्वक अपेक्षा गङ्गाका जल परम पवित्र है। गङ्गाके श्रेष्ठतम जलसे | करना चाहिये। इस संसारमैं इस व्यक्तिका ज्ञवन श्रेष्ठ हैं, जौवनपर्यन्त किये गये पापका विनाश शी हो जाता है

जो बहुतोंके जीवनका साधक बनता है अर्थात् हुनौका तीर्घतोयं ततः पुण्यं गाई पुण्यं तु सर्वतः ॥ पालन-पोषण करता है। जो मात्र अपने भरण-पोषणमें लगे गा यः पुनात्यानु पापमामरणान्तिकम्।। रहते हैं, वें बिता रहते हुए भी मरे हुए समान हैं;

(१ । ३१३ । १३-१४] क्योंकि अपना पेट कुत्ता भी पालता हैं मनुष्य आधार (सदाचार-शौचाचार-मैं हीं अब कुछ माता पिता गुरुभता प्रज्ञा दींनाः समाश्रिताः ॥ प्राप्त कर लेता है। संध्या, सान, जप, होम, देय और भ्यागोनिधाग्निः पॉपवर्गा दाता: ॥ अतिधिपूजन – इन घट्कमौकों प्रतिदिन करना कर्तव्य है। भरण पोष्यवर्गम्य मशस्तं स्वर्गसाधनम् ॥ पञ्चमहायज्ञोंमें – अध्ययन और अध्यापन आहायज्ञ, तर्पण भरण पोष्यवर्गस्य तस्माद् यत्नन कारपेंन्। पित्यज्ञ, होम देवया, बलिभदेव भूतयज्ञ तथा अतिथिका म जीत सकौं अभियपजीव्यति ॥ यूजन मनुष्ययज्ञ हैं। गृहस्थकों दिनका यथायोग्य पाँच झवनों मृतकास्वन्ये पुरुषाः स्योदरम्भः । विभाग करके पितृगण, देवगणक अर्ची और मानयोचित स्वकीयोदरपूर्नवा कुक्काम्याप विते । कार्य करना चाहिये। जो मनुष्य अन्नदान करके सर्वप्रथम ६ । ३१३।७-१) माणको भोजन कराकर अपने मित्रगण साध स्वयं न्यवहारमें अर्थका अत्यधिक महत्व है। अर्थ इन्हें ही भोजन करता हैं, वह मुँहत्यागके बाद स्वर्गलोकके मुखको कहते हैं जो हमारे सभी कार्यो की सम्पनजामें अनिवार्य अधिकारी बन जाता हैं। रूपसे उपयोगी हैं। इसी दृष्टिसे सभी रनोंकी निश्चि पृथ्वी, अभक्ष्यभक्षण (शास्त्रनिषिद्ध भोजन), चोरों और धान्य, पशु, स्त्रियाँ आदि अर्थं माने जाने हैं। इस तरह अगम्यागमन करनेसे व्यक्तिका पतन हो जाता है। सदाचार अर्धका महत्त्व होनेपर भी इसके उपार्जनमें संयम आवश्यक एवं धर्मका पालन करनेवाला अधिकारी मनुष्य साक्षात् । है। शास्त्रसम्मत विधिसे नित धनकै लाभांशमें सभी कैाव (विष्णु) ही माना गया है। लोगोंको पितृगण, देवगण तथा ब्राह्मणको पुजा करनौं कलियुगमै दानधर्मको विशेष महत्व है। सत्पात्रमें चाहिये। ये संतुष्ट होका अनोपार्जनमें अज्ञानवश हुए दोषको श्रद्धापूर्वक किये गयें अर्थ (भोग्य वस्तु) का प्रतिपादन नि:संदेह शान्त कर देते हैं।

(विनियोग) दान कहलाता है। इस लोक यह दान भौग विद्या, शिल्प, वेतन, सँवा, गोरक्षा, व्यापार, कृषि, वृत्ति, नाथा परलोकमें मोक्ष प्रदान करनेवाला है। मनुष्यको चाहिये भिक्षा और व्याज -ये इस जीवनयापनके साधन हैं। कि वह न्यायपूर्वक अर्थका उपार्जन करें, क्योंकि न्यायपूर्वक नित्य, नैमित्तिक, काम्य, क्रियाङ्ग, मनापकर्षण, मार्जन, उपार्जित अर्थका हौं दान-भौग सफल होता है। आचमन और अवगाहन -ये आढ़ प्रकारके स्नान बताये गये जलदानले तृप्ति, अन्नदानसे अक्षय सुख, निलदान हैं। प्रात:काल पूजा-पाठ आदि धार्मिक कृत्यके लिये जो अभीष्ट संतान, दीपदानसे उत्तमनेत्र, भूमिदान समस्त स्नान किया जाता है इसीको निन् स्नान कहा गया है। अमित पदार्थ, मानणदानी दोघं आ

न उस्ला आदिको पके बाद जो भवन तथा जतदानसे जुत्तम कामको प्राप्ति होती है। वह ज्ञाता है, वह नैमित्तिक कहलाता है। पाय आदि प्रदान करने चलक तथा अञ्चदान करनेमें अभिनॉममारके नक्षत्रोंमें जो स्नान किया जाता है, उसे काम्य स्नान करते हैं। स्नोककी प्राप्ति होती हैं । वृषभका दान देनेसे चिपुत सम्पत्ति

पुराणं गाई वये सारं विष्णुकथाश्चयम् और गोदानसे सूर्यलोककौं प्राप्ति होती हैं।

किया गया है। उनके प्रादुर्भावका आयान्, वल्ल (हॉरं) यान और शरयाका दान करने पर भार्या, भयभौतको को परीक्षा, पद्मराग, मरकतर्माण, इनौलमणि, वैद्यँर्माण, अभय प्रदान करनेसे ऐश्वर्यको प्राप्ति होती हैं। धान्यदानसे पुष्परागमणि, सिद्ममणि, स्फटिक, रुधिराक्षरत्न, पुलक, शाश्वत विनाशों सुख तथा बैंदाध्यापन (वैदके दान-से कनर्माण, भीष्मकमणि तथा मका आदि इलोकं विधि ब्रह्मका सांनिध्य-लाभ होता हैं। गायकों घास देनसे पापोंसे भेद, लक्षण और परीक्षण-विधि बतायी गयी है। मुक्ति हो जाती है। इनके लिये का आदिका दान करनेमें गङ्गा आदि विविध ती–प्रयाग, वाराणसी, कुरुक्षेत्र, व्यक्ति अदप्त अग्निके समान तेजस्वी हो जाता है। द्वारका, केदार, अदरिकाश्रम, श्वेतद्वीप, मायापुरी (हरिद्वार), | रोगियोंके रोग-शान्तिके लिये औषधि, तेल आदि पदार्थ नैमिषारण्य, पुष्कर, अयोध्या, चित्रकुट, काशीपुरी, तुंगभद्रा, एवं भोजन देनेवाला मनस्य रोग, सवीं और दाँपयशैल, सेंबन्ध-में भर अमरकण्टक, ३ मथुरापुरी हो जाता है। जो मनुष्य परलोकमें अक्षय सुखकों आदि स्थानोंको महातीर्थ कहा गया है। इन पवित्र अभिलाषा उखाता है, उसे अपने लिये संसार मा घरमें जो तीर्थस्थानों में किया गया इनान, दान, प, पूजा, झाल जपा बस्तु सर्वाधिक प्रिय है, इस वस्तुका दान गुमायान् पिण्डदान भादि अक्षम होता है। आह्मणको करना चाहिये।

गातीर्थका माहात्म्य तथा गाक्षेत्रमें त्रादि करनेका दानधर्मसे बढ़कर मेड धर्म इस संसार प्राणियोंके लिये फल सविस्तार समारोहपूर्वक यहाँ प्रस्तुत हुआ है। गय कोई दूसरा नहीं हैं। गौ, ब्राह्मण, अग्नि तथा देवकों दिये नामक असरको उत्कट तपस्याने संतप्त देवगणकों ज्ञानेवाले दानमें ज्ञों मनुष्य मौहब दूसरोंकों शैकता है, वह प्रार्थनापार भगवान् विष्णुकौं गदामें वह असुर मारा गया। पाषौ तिर्यक् (पक्षी)-को योनिको प्राप्त करता है। उस गयासुर नामपर हों गयातर्थं प्रसिद्ध हुआ। यहाँ दानधर्मके बाद प्रायश्चित्तका निरूपण किया गया है। गदाधर भगवान् विष्णु मुख्यदैवके रूपमें अस्थत हैं। ब्रह्महत्या, मदिरापान, स्वर्णको चोरी, और गुरूपत्नींगमन -यें गयामें श्राद्ध करनेसे पञ्चमहापापको निवृत्ति तो होती। चार महापाप कहे गये हैं। इन सभीका साथ करनेवाला ही हैं, इसके साथ ही अन्य सम्पूर्ण पापका भी विनाश होता पाँच महापातकों होता है। गोहत्या आदि जो अन्य पाप है। जिनको संस्काररहित दशामें मृत्यु हो जाती है अथवा हैं, वें उपपातकमें माने गये है। इन सभी पापोंका प्रायश्चित्त- जो मनुष्य पशु या चोरद्वारा मारे जाते हैं। जिनकी मृत्यु विधान यहाँ प्रस्तुत किया गया हैं।

सर्पकै काटनेसे होती हैं, वे सभी गयालाद्धके पुण्यसे इसके अनन्तार भारतवर्षका वर्णन, तथका वर्णन और उन्मुक्त होकर स्यागं चले जाते हैं। गया पिण्डदान इनकी महिमा प्रस्तुत की गयी हैं। क्योतिश्चक्रमें बात करनैमात्र भित्रको परम गति प्राप्त होती हैं। नक्षत्र, उनके देवता एवं कतिपय शुभ-अशुभ योगों तथा गातीथमें पितरोंके लिये पिण्डदान करनेसे मनुष्यको मुहूतका वर्णन, ग्रहदशा, यात्रा, शकुन, छींकका फल, बों फल प्राप्त होता है, सौ करोड़ वर्षों में भी उसका बर्णन ग्रहोंके शुभ एवं अशुभ स्थान तथा उनके अनुसार शुभाशुभ नहीं किया जा सकता है। यहाँतक कहा गया हैं कि फलका विवंचन यहाँ प्रस्तुत हैं। इसी प्रकार लाग्न-फल, गयागमनमात्र हौं व्यक्ति पितृऋणसे मुक्त हो जाता हैं। राशियाकै चर-स्थिर आदि भेद, ग्रहों का स्वभाव तथा सात गमागमनमात्रेण पितृणामनुणं भवेत्।’ कहते हैं गया¥त्रमें वारोंमें किये जाने योग्य प्रशस्त कार्यका भी निरूपण किया भगवान् विष्णु पितृदेवताके रूपमें विराजमान रहते हैं। गया हैं। सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार स्त्री-पुरुपके शुभाशुभ पुण्डरांकाक्ष उन भगवान् जनार्दनका दर्शन करने पर मनुष्य लक्षप, मस्तक एवं हस्तरेखासे आसुको परिज्ञान भी यहाँ अपने तीनों गोसे मुक्त हो जाता है। कराया गया है। स्वरोदय विज्ञानका निरूपण भी हुआ है। गयाजमें कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहाँपर तीर्थ नहीं निधि, नक्षत्र आदि इतका निरूण, चातुर्मास्यन्नातक है। च कोशके क्षेत्रफलमें स्थित याक्षेत्र जहाँ-जहाँ भी नियण, शिवरात्रित-कथा तथा झन-विधान, एकादशौ- पिण्डदान करनेवाला मनुष्य अक्षयनको प्राप्तकर अपने माहात्म्य आदि मस्त किया गया है। इसके आंतरिक्त पितृगणको महालक प्रदान करता है। सूर्यवंश-चन्द्रवंशका वर्णन, भविष्यके राजवंशका बर्णन प्राचीनकालमें रुचि नामक प्रज्ञापत संसारकै माया

* गरुडपुराणसिंहावलोकन

महको छोड़कर गृहस्थादिक आश्रमके नियमोंसे रिहत हो ‘नरकमें निवास करना अच्छा है, किंतु दुरंत्रके अरमें इधर-उधर निरहंकार भावसे अकेले ही विचरण करने वास करना उचित नहीं है। नरकवासके कारण पाप विनष्ट लगे। यह देखकर उनके पित्तजननें उन्हें गुस्थान्नमक हो जाते है, किंतु दुश्चरित्रके में निवास करनेमें आप महिमा बताते हुए पापग्रहप-संस्कारको स्वर्ग एवं मोक्षप्राप्तिका विनष्ट नहीं होतें’ हेतु बताया। क गृहस्थ समस्त देवताओं, पितरों, सारे हि नारकै वासों न तु इतेिं गृहे। ऋषियों और याचकोंकी पूजा करके उत्तम लोकको प्राप्त नरकात् पते पाप कुणूझान निवर्तते ।। करता है। चिनें भी तिमें अपनी शंकाएँ प्रस्तुत की।

| १ ॥ : : । ३ इसका पितरौंने समुचित उत्तर देते हुए गृहस्थाश्रमके हो बाल्यावस्थामें विद्याध्ययन नहीं करते हैं, फिर धर्ममान लिये से आग्रह किया। कुछ भी हानी झवावस्या कामात झोंक यौवन तथा आ गये और उन्होंने तपस्याद्वारा ब्रह्माको प्रसन्न किया। देते हैं, में वृद्धावस्थामै चिन्तासे जलते हुए शिशिरकारनमें ब्रह्माकै निर्देशसे आय कृचिने नदॉक एकान्त तटपर कुहासेसे झुलसनेवाले कमलके समान संतप्त जीवन व्यतीत पितका तर्पपाकर उन्हें संत किया और पितरोंकों करते हैं।

स्तुतियोंसे आराधना की। पित्तजनोंने संतुष्ट हो प्रकट होकर इसके बाद राजनीतिका वर्णन किया गया है। राजाको रुचिको मनोरमा पनौं तथा पुत्रादिकी प्राप्ति कानेका वरदान सत्यपरायण तथा धर्मपरायण होना चाहिये। जो धार्मिक दिया और यह भी कहा कि जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस राजा गाँ-ब्राह्मणके हितमें रत रहता है, वहीं जितेन्द्रिय राजा स्तुतिमें हम पितरोंको संतुष्ट करेगा, उससे प्रसन्न होकर हम अज्ञाकै पालनमैं समर्थ हो सकता है।’ज्ञों का शास्त्रसम्मत लोग उसे उत्तम भोंग, आत्मविषयक इत्तम ज्ञान, आयु, तथा युक्तियुक्त सिद्धान्तका उल्लंघन करता है, यह निश्चित आरोग्य तथा पुत्र-पौत्रादि प्रदान करेंगे। अतः कामनाओंकी ही इस लोक तथा परलोक दोनों में नष्ट हो जाता है पूर्न चाहनेवाले श्रद्धालुओंको निरन्तर इस स्तोत्रमें पितरोंको संघच्छास्त्रयुक्तानि हैनुयुक्तानि यानि स्तुति करनी चाहिये।

स हि अर्थात वै राजा इड़ लोंके पत्र च ॥ । तदनन्तर इव्यशुद्धि एवं कर्मविपाक, प्रायश्चित्त-विधान

। । । । ११.१ । ३।। सतपन, ए, पाक तथा चान्द्रादि इतके विविध सपके पालनसे धर्मको उक्षा होती है, सदा अभ्यास स्वरूपको दर्शाया गया है।

| करनेसे मियाको रक्षा होती हैं, मार्जनके द्वारा पाकी दृक्षा | इसके सथ ही ऋषि-महर्षि तथा देवताद्वारा प्रतिपादित होती है और हलके द्वारा कुलकी रक्षा होती है नतिशास्त्रका विवेचन किया गया है, जो सभके लिये हितक्म सत्येंन रक्ष्यते धर्मों विद्या योगेन रक्ष्यते।। तथा पुण्य, आयु एवं स्वादिको प्रदान करनेवाला है।

मुमया रक्षपते पात्र फुलं शीलेन भ्यने ।। जो मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इस पुरुषार्थ चतुष्टयकी सिद्धि चाहता हैं, उसे सदैव सम्जनकों ही ‘सत्यपालनरूपी शुचिता, मन:शुद्धि, इन्द्रियनिग्रह, सभी संगति करनी चाहिये । दुर्जनके साथ रहनेसे इस लोक तथा प्राणियों में दया और जलसे प्रक्षालन -मैं पाँच प्रकारके परलोकमें हित सम्भव नहीं है।

शौच माने गये हैं। जिसमें सत्यपालनको शुचिता है, उसके |-दूसरेको निन्दा, दूसरेका धनप्रहण, पयों स्त्रीके साथ लिये स्वर्गकी प्राप्ति दुर्लभ नहीं है। जो मनुष्य सत्य परिहास तथा पर्यै घरमें निवास कभी नहीं करना चाहिये। सम्भाषण ही करता है, वह अश्वमेधयज्ञ कानेवाले व्यक्ति में ‘मनुपकों नॉक संगका परित्यागकर साधुजनोंको बकर है संगति करनी चाहिये और दिन-रात पुण्यका संचय करते सन्मगौवं मनःशीचं शौच्चमिन्द्रियनिग्नः। हुए निम अपनी अनिताको स्मरण गुञ्जना चाहिये। सर्वभूतें दयाशौचं जलशौच च पश्चमम्॥

यज्ञ दुर्जनमंमग । भन्न साभमभागमम्। . अस्य सत्यं च च च तस्य वर्गों न सुलभ: ॥

पुपमा नर नियमनियताम् ।।

सत्यं हि वचनं अस्य सोमेधादिप्तिश्पते

[ १३ .) यह स्तों इसी में पा सं १३८ में दिया गया है।

* पुरा गारुई वक्ष्ये सारे विष्णुकधाश्रयम्

जिस व्यक्तिने एक आर भी ‘हरि’ इन दो अक्षराँसे युक्त लिये अनेक औषभिक योगोंकों भी बताया गया है। शब्दको उच्चारण कर लिया है, वह अपने कटिप्रदेशमें आयुर्वेदकी औषधियों और वनस्पतियाँका वर्णन जों परकर (ऊँझ बाँधकर मुक्ति प्राप्त करनेके लिये तैयार भगवान् औहरिने शिवजोंसे किया था, उसे सुनानेके बाद रहता है। ऐसा मनुष्य मोक्षका अधिकारी होता है। सूतजीने शौनकादि ऋषिर्योक कुमार अर्थात् भगवान् | इस प्रकार मनुष्यको उन्नतिके पथपर ले जानेवाले स्कन्दके द्वारा कात्यायनसे कहे गये व्याकरण शास्त्र को नीतिसे युक्त कल्याणकारी वचनोंका संग्रह इस महापुराणमें सुनाया। यह व्याकरण सिद्ध शब्दोंके ज्ञान एवं बालकोंकी प्राप्त होता है, जिसे ग्रहणकर मानव शाश्वत सुखानुभूतिसे व्युत्पत्ति प्रक्रियाको बढ़ानेमें सहायक है। इसके अनन्तर लाभान्वित हो सकता है।

सूतीने अस्प बुद्धिवालों के लिये विशिष्ट बुद्धिकी प्राप्ति । तदनन्तर भगवान्के विभिन्न अवतारोंकीं कक्षा तथा हेतु माना और वर्णके भेदके अनुसार छन्द-विधानकों पतिद्माता-माहात्म्य ब्राह्मणपत्नी, अनसूया एवं भगवती प्रस्तुत किया है। सौताके पातिव्रतका आख्यान मिलता है। रामचरितवर्णन कमविपाकका वर्णन (रामायणकथा), हरिवंशवर्णन ( श्रीकृष्णकथा) तथा महाभारतको जगत्सृष्टि और प्रलय आदिक चक्रगतिको जाननेवाले कथा और बुद्ध आदि अवतारोंकी कथाका वर्णन भी यहाँ विद्वान् यदि आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक प्राप्त होता है।

इन तीन सांसारिक तापको ज्ञानकर ज्ञान और वैराग्यका इसके बाद आयुर्वेदका प्रकरण प्रारम्भ होता है। मार्ग स्वीकार कर लेते हैं तो आत्यन्तिक लय (मोक्ष) भगवान् धन्वन्तरिक्त सम्पूर्ण आयुर्वेदको अष्टाङ्ग आयुध को प्राप्त करते हैं। कहा गया है। यह अथर्ववेदका उपवेद है। शारीरिक, सूतज्ञों कर्मीविपाकका वर्णन करते हुए कहते हैं मानसिक तथा आगन्तुक -इस प्रकारसे व्याधि तीन पापकर्म करनेके कारण नरक-लोकमें जाता है और प्रकारको कहीं गयीं हैं।

पुण्यकर्मकै कारण स्वर्ग। अपने इन पाप-पुण्याकै प्रभाव प्रस्तुत गरुडपुराणमें मुख्यरूपसे निदान-स्थान, चिकित्सा- नरक तथा स्वर्गम गया प्राणी पुनः नरक और स्वर्गको स्थान, कल्प-स्थान [विपौषधिज्ञान तथा चिकित्सा] और लौटकर स्त्रियोंके गर्भमैं जाता है। गर्भमें विकसित होता उत्तरतन्त्रमें कौमार्यतन्त्र एवं भूतविद्या आदि विषयोंका ही हुआ अ जीव नौ मासतक अधोमुख स्थित रहकर इसमें निरूपण हुआ है। साथ ही गयायुर्वेद, अश्व-चिकित्सा, मासमें जन्म लेता है। यह जौव बाल्यावस्था, कौमाद्यवस्था, गज़-चिकित्सा आदिका भी संक्षेपमें निर्देश हुआ है। युवावस्था तथा वृद्धावस्थाको प्राप्त करता है। इसके बाद | गरुडपुराणके आयुर्वेद-प्रकरणके प्रथम बस अध्यायोंमें पुन: यह मृत्युको प्राप्त हो जाता हैं। इस प्रकार यह ऑब निदान-स्थानकै विषय वर्णित है। किस कारणले रोग उत्पन्न इस संसारचक्रमें घटींयन्त्रके समान घूमता रहता है। जींव हुआ है, रोगके लक्षण क्या है जिसमें आँगका निर्णय हो सके नरक-भौंग करनेके पश्चात् घाययोंनियों में जन्म लेता है। यह इत्यादि विषय निदान शब्दसे अभिप्रेत हैं। इसमें प्रारम्भमें पापयनियोंका वर्णन सविस्तार किया गया है-मित्रका र, रक्त, पित्त, वास, राजयक्ष्मा, मदात्यय, अर्श, अतिसार, अपमान करनेवाला गधेकी सोनिमें अन्म होता है। माता मूत्राघात, प्रमेह, गुल्म, पापड, कुवा, वातदोष आदि रोगोंके पिताको कष्ट पहुँचानेवाले प्राणों कइवेंकी योनिमें ज्ञाना उत्पत्तिजनक कारणों तथा उनके लक्षणों का वर्णन हुआ है। पड़ता है। जो मनुष्य अपने स्वामीका विश्वसनीय बनकर गरुडपुराणका यह वर्णन आचार्य वाग्भट्टकै अष्टाङ्गादयसे उसको छलकर जीवन-यापन करता है वह च्यामोहमें कैसे बहुत अंश साम्य बाता है। इसके बाद लगभग चालीस बंदकी योनिमें आता है। धरोहर रूपमें अपने पास रखे हुए अध्यायोंमें विभिन्न रोगको चिकित्साहेगु औषधियोंका पराये धनका अपहरण करनेवाला व्यक्ति नरकगामी होता निरूपण हुआ है। अमुक रोग होनेपर, अमुक-अमुक है, नरकसे निकलनेके बाद यह कृमियोनिमें जन्म लेता है।

औषधिको प्रयोग करना चाहिये। इनके निमोणक तथा मनष्य विश्वास होता है। अनुपान आदिको बिधि बनायी गयी है। एक ही रोग होता है। ज्ञ, दान त थिए मनुष्यकों कृमियोनि प्राप्त होती है।

 

* कपुराणसिंहावलोकन

प्राप्त करके अज्ञानसे मुक्त हो जाते हैं। उसके बाद वह देवता, पितर और ब्राह्मणोंको बिना भोजन आदि दिये जीवमुक्त योगी ने कभी मरता है, न इत्री होता है, न जो मनुष्य अन्न ग्रहण कर लेता है, वह नरकको ज्ञाता हैं। रोगी होता हैं और न संसारके किसी अन्धनसे आबद्ध होता | वहाँसे मुक्त होकर वह काकोनिको प्राप्त करता है। है। न वह पापों से युक्त होता है, न तो उसे नरकयातनाका   कृतघ्न व्यक्ति कृमि, कौंट, पतंग तथा बिचको योनिमें हौ दुःख भोगना पड़ता है और न उसे गर्भवासमें जाना भ्रमण करता है।

पड़ता है। वह स्वयं अव्यय नारायणस्वरूप हो जाता है। | इसको निन्दा करना, कृतघ्नता, दुसकी मर्यादाको नष्ट इस प्रकार की अनन्य भक्तिसे वह योगी भीग और मोक्ष करना, निधरता, अत्यन्त अमित व्यवहार अभिच, परस्त्र प्रदान करनेवाले भगवान् नारायणको प्राप्त कर लेता हैं। साथ सहवास करना, परायें घनका अपहरण करना, अपवित्र ध्यान, पूजा, जप, स्तोत्र, अत्त, मन और दानके हुना, इँको निन्दा, मर्यादाके बन्धनको तोड़कर अशिष्ट नियमका पालन करने से मनुष्यकै चित्तक शुद्ध होती हैं। व्यवहार करना, कृपणता तथा मनुष्योंका हनन-यह सब चित्तशुद्धिसे ज्ञान प्राप्त होता है तथा इससे जन्म-मरणके नरक भौगकर जन्म लिये हुए मनुष्यको लक्षण कहा गया है। अन्धनसे मुक्ति मिलती है। | प्राणियों के प्रति दया, सनावपूर्ग वार्तालाप, परलोक भगवत्तिका निरुपण लिये सात्त्विक अनुष्ठान, सत्कार्यों का निष्पादन, सत्यधर्मका सूतजी भगवद्भक्तिका निरूपण करते हुए कहते हैं कि पालन, दुसरेका हितचिन्तन, मुक्तिकी साधना, वेदोंमें प्रभु भकिसे जितना संतुष्ट होते हैं, उतना किसी अन्य प्रामाण्य-बुद्धि, गुरु-देव और सिद्धर्षक सेवा, साधनसे नहीं। भगवान् हरिका निरन्तर स्मरण करना साधुजनोहारा बनाये गये नियमों का पान, सपिाका मनुष्यों के लिये महान् अँयका मूल हैं। यह पुण्यकी अनुष्ठान तथा प्राणियोंके साथ मैत्रीभाङ्ग–यै स्वर्गसे आयें उत्पत्तिका साधन है और जौवनका मधुर फल हैं। इसलिये | मनुष्योंके लक्षण हैं।

विद्वानोंने प्रभुको सँवाको भक्तिका बहुत बड़ा साधन कहा जो मनुष्य योगशास्त्रद्वारा अताये गये यम-नियम आदि है। भगवान् त्रिलोकनाथ विष्णुकै नाम तथा गुणके आशङ्गयोंगके साधनमें सत् ज्ञानको प्राप्त करता है, वह कीर्तनमें तन्मय होकर को प्रसन्नताके आँसू बहाते हैं, आत्यन्तक फल-मोक्षका अधिकारी बन जाता है। रोमाञ्चित हॉकर गद्गद हो उड़ते हैं, वे ही उनके भक्त है।

 

इस संसारमें वहीं श्रेष्ठ हैं, वहीं ऐश्वर्यसे सभ्यन है और यहीं सूतजींने यहाँ समस्त अङ्गसहित महायोगका वर्णन मोक्षकों प्राप्त करता है, जो भगवान् हरिकी भक्तिमें तन्मय किया है। यह महायोग मनष्यको भौग और मोक्ष प्रदान रहता है। यदि कोई भगवद्भक्त चाण्डाल जातिका है तो वह करनेका श्रेष्ठतम साधन है।

भी अपनी पवित्रा भक्ति की महिमासे सबको पवित्र कर देता मझामन भगवान माने जा अनमें कहा था है राजन्! ममता ही :खका मूल है और ममताका परित्याग ‘हे नाथ! आप मुझपर दया करों, मैं आपको शरणमें हो दु:खसे निवृत्तिका उपाय है। अहंकार अज्ञानरूपीं है-ऐसा जो माणों कहता है, उसको भगवान् हरि अभय | महातरुका अंकुर है। पापमुलक आपातरमणीय सुख- कर देते हैं। किसीसे भी उसको भय नहीं होता, यह शान्तिके लिये यह अज्ञानरूपी महातरु पैदा हुआ है। ॐ भगवान्की प्रतिज्ञा है । लोग ज्ञानरूपी कुल्हाड़ीसे अज्ञानरूप महावृक्षकों काट दयां कुरु अपनाय तवाम्मति च यो बर्देत् । गिराते हैं, वें परह्ममें लीन हो जाते हैं। तदनन्तर अह्मरसको अभयं सर्वभूतेभ्यों दद्यादेतद् व्रत हरेः ।। प्राप्त कर उसका भलीभाँति पान करके प्राज्ञपुरुष नित्य ।

[१ । ३३५॥ १।। सुख एवं परम् शान्तिको प्राप्त करते हैं। जो लोग जिन मनुष्योंका मन हरिभक्तमैं रमा हुआ है, उनके मायामाज्ञसे आम हैं, वे सभी नित्य-नैमित्तिक । कार्य सभी प्रकारके पापोंका विनाश निश्चित है।

में अन्तत्तक ना बने हैं। इस कारण हाथमें पाना इ ई ए अपने को देखक उन्हें परमात्माका ऐक्य प्राप्त नहीं होता। जो पुनः इस यमराज़ उसके कानमें कहते हैं कि हे दूत! तुम उन संसारमैं जन्म लेते हैं, जो अज्ञानसे मोहित हैं, ये ज्ञानयोग सोंगको छोड़ देना, ओं मधुसूदन विष्णुके भक्त हैं।

 

* पुराणं गाझडं वक्ष्ये मार विष्णुकाश्नम् +

अन्य दुराचारों पापियका स्वामी हैं, भक्तोंके स्वामी स्वयं इसके अनन्तर औसूतज्ञ भगवान् शिवद्वारा कही गयीं हर हैं। मौविष्णुने सर्वदा कहा है- यदि दुराचारी मनुष्य नारसिंहस्नुनि (नृसिंहस्तोत्र)का वर्णन करते हैं। इसके | भी मुझमें अनन्य भक्ति रखता है तो वह साधु हीं हैं, साथ ही ‘कुनामृतस्तोत्र’ का वर्णन किया गया है, जो वर्ष क्योंकि उसने यह निश्चय कर लिया है कि भगवान्की नारदके पूछनेपर शिवजींने कहा था। तदनन्तर मार्कण्डेय | भोकै समान अन्य कुछ भी नहीं है। भगवान् कुरिमें जिस मुनिके द्वारा कहे गये मृत्युको निमाण करनेवाले मनुष्यकी भक्ति रहती है, उसके लिये धर्म, अधं और “मृत्यष्टकस्तोत्र” को कहा गया है। इसके बाद प्राणियोंकों काम-इस त्रिवर्गका कोई महत्व नहीं है, क्योंकि परम सब कुछ प्रदान करनेवाले ‘अच्युतस्तोत्र’ का वर्णन किया | सुखरूप मुक्ति उसके हाथमैं ही सदा रहती है। गया है। यह स्तोत्र देवर्षि नारदके पूछनेपर ब्रह्माजींने कहा था।

इस संसाररूप विषवृक्षकै अमृत समान दो फल है। संताजींने इस स्तोत्रकी अत्यधिक महिमाका वर्णन किया है। एक फल है भगवान् केशवकी भक्ति और दूसरा फल है आधारकाण्डके अन्तमें ब्रह्मज्ञान और प्रयोग, आत्मज्ञान | इनके भक्तों का सत्सङ्ग’ तथा गीतासारका निरूपण किया है। संसारविषवृक्षस्य हैं फलं अमृतोपमें। जीवका अन्तिम लक्ष्या मुक्त है। यह मुक्ति ज्ञवको तभी कदाचिन् केशवं भक्तिस्तव समागमः ॥ प्राप्त होती हैं, जब वह पुर्यष्टक तथा त्रिगुणात्मिका प्रकृतिका १ । २२ । ३२ परित्याग कर देता है। जीवको मुक्ति प्राप्त करनेके लिये नाम-संकीर्तनकी महिमाका वर्णन करते हुए सुनौं प्रकृतिसे स्वयंको अलग करना अनिवार्य है। इसके लियें कहते हैं कि मुक्तके कारणभूत अनादि, अनन्त, अज्ञ, नित्य, शब्द आदि विषयक प्रत अनासक्त होना आवश्यक है। अव्यय और अक्षय भगवान् विष्णुको जो व्यक्ति नमन करता प्राणायाम, जप, प्रत्याहार, धारणा, समाधि और ध्यान है, वह समस्त संसारके लिये नमस्कार योग्य हो जाता है। ये छ: पोंगके साधन हैं। | स्वप्न भ भगवान् नारायणका नाम लेनेवाला मनुष्य इन्द्रियसंयमसे मापक्षय और पापक्षयसे देवप्नतिं सुलभ | अपनौं अक्षय पापराशिको विनष्ट कर देता है। यदि कोई होती है। देवप्नति भुक्ति एवं मुक्ति-साधक और उन्मुख मनुष्य ज्ञापत् अवस्था परात्पर प्रभुका नाम लेता है तो होनेके लिये प्रथम एवं अनिवार्य साधन है। फिर इसके विषयमें कहना ही क्या? ‘हे कृष्ण ! ॐ अच्युत !

आत्मान | हे अनन्त ! हैं वासुदेव! आपको नमस्कार है। ऎसा कहकर भगवान् नारदजीसे कहते हैं-कर्मोंसे भवबन्धन और जो भक्तिभावसे विष्णुको प्रणाम करते हैं, वे यमपुरी न ज्ञान होनेसे जीवको संसारसे मुक्ति हो जाती है। इसलिये | जाते। सूर्यके जाँदत हो जानेपर जैसे अन्धकार विनष्ट हो आत्मज्ञानका आशष करना चाहिये। ज्ञों आत्मज्ञानसे भिन् | जाता है, वैसे हाँ हुरिका नाम-संकीर्तन करनेसे प्राणियोंके ज्ञान हैं, उसे अज्ञान कहा जाता हैं। ‘जब हृदयमें स्थित सभी

मापसमका विनाश हो जाता है।

कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब जब निस्संदेह जौवनकालमें | सूजी कहतें हैं कि सभी शास्त्रका अवलोकन करके ही अमृत प्राप्त कर लेता है’- – . तथा पुन:पुन: मिंधार करनेपर एक ही निष्कर्ष निकालता है अदा सर्वे विमुयन्तै कामा बैंस्य दि स्थिताः ।। कि मनुष्यको सदैव नारायणका ध्यान करना चाहिये इस लोक तदाऽमृतत्वमाप्नोति जीवनेव संशयः ।। और परलोक प्राणीके लिये जो कुछ दुर्ल हैं, जो अपने

– । । । ३३६ ॥ १३)। मनसे भी सोचा नहीं जा सकता, वह बिना माँग ही ध्यानमात्र वस्तुमानका सार ब्रह्म ही हैं। तेजोरूप ब्रह्मको एक करनेमें भगवान् मधुसूदन प्रदान कर देते हैं। पापकर्म अल्लाहु म पुण्यरूप समझना चाहिये। जैसे अपनी

करनेयानको शुद्धिका ध्यानक सामान अन्य कोई साधन नही आत्मा सबको प्रिय है, वैसे ही ब्रह्म सबको प्रिय है; | हैं। यह ध्यान पुनर्जन्म इँनेवालें कारणको भस्म करनेवालों क्योंकि आत्मा हीं अहा है। सभी तत्त्वज्ञ ज्ञानको सर्वोच्च

योगाग्नि है। भगवानुका भक्त अनासक्त भाव र्याद अपने सभी मानते हैं। इसलिये चित्तका आलम्बन मोस्वरूप आत्मा कमको विष्णुके चरणों में समर्पित करता है तो उसके कर्म ही हैं। यह आत्मविज्ञान है। यह पुर्ण है। शाश्वत है। ज्ञागते साधु हों या असाधु बन्धनकारक नहीं होते। सोते तथा सुप्तावस्थामै प्राप्त होनेवाला मुख, पूर्ण सुस्वरूप कहा जाता है।

 

# गशपुराणसिंहावलोकन

योंगरम्भके समय मूर्तिमान् और अमूर्तरूपमैं हैं नारद! मैं अनन्त हैं, हमारा ज्ञान भी अनन्त है। मैं हरिका ध्यान करना चाहिये। जैज्ञमण्डलके मध्यमें शव अपने में पूर्ण हैं। आत्माके द्वारा अनुभूत अन्त:मुख मैं हीं चक्र, गदा तथा पद्मधारी चतुर्भुज, कौस्तुभचिसे विभूति, हैं। सात्त्विक, राजस और तामस गुणसे सम्बन्धित भाषसे वनमाल, वायुस्थरूप में अच्च अधिष्ठित हैं, ‘मैं वही हैं। इस | मैं निस्प परे रहता है। मैं शुद्ध हैं। अमृतस्यरूप हैं। मैं ही प्रकार मनका लय करके परमात्मप्रभुकों धारण करना ही ब्रह्म हैं। मैं प्राणियोंके हृदयमें प्रवाहित वह ज्योति हैं, जो धारणा हैं। मैं ही ब्रह्म हैं और ब्रह्म ही मैं हैं-इस प्रकार दीपकके समान उनके अज्ञानरूप अन्धकारको बिना अई और अह्म पदार्थका तादात्म्य रूप हौ समाधि है। करती रहती है। यही आत्मज्ञानकी स्थिति है। | ब्रह्मगताका सारतत्त्व वर्णन करते हुए भगवान् कहते है- यह सिद्ध है कि परमात्मा है। इस परमादमासे गीतासारका वन करते हुए भगवान् नारदजौमें कहते आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल तथा हैं—है नारद! आत्मकल्याण हौं परम कल्यान है। इस जलसे पृथ्वींकी उत्पत्ति हुई है। जो इस जगत्प्रपञ्चकी भी आत्मज्ञानसे इत्कृष्ट और कुछ भी नहीं हैं। आत्मा रहित, जन्मदात्र है। रूप आदिसे हीन, इन्द्रियोंसे भतींत है। मैं आत्मा है। संसार जाग्नच, स्वप्न तथा सुषुप्तिकी अवस्थाओंसे घरै वह आदि सम्बन्धके कारण मुझे किसी प्रकारका छ नी है। स्वाहा अपने निर्गुण स्वभाव ही ता है। उस क्रियाशील जैसे आकाशमैं विधत् अग्निका प्रकाश होता है, वैसे ही शरीर के साथ रहने तथा न उड़नेकौं स्थितमें भी यह नित्य इसमें आत्मा आत्मज्ञान]-के द्वाग्र आत्मा प्रकाशित होता है। शुद्ध स्वभावयता ही है। इसमें कोई विकृति नहीं आतौ यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारा है। मुमधुके अन्त:करणमैं कैयन्य अर्थात् उस परमात्माके और समाधि- यह अष्टाङ्गयोग मुक्ति के लियें कहा गया है। साक्षात्कारको अवस्था आ जाती है। अत: मोक्षार्थीको उस शौर, मन और यामीको सदा सभी प्राणियोंकी हिंसाको स्थितिमें जौवात्माकै विषयमैं विचारकर उसको शरीरसे निवृत्त रखना चाहिये; क्योंकि ‘अहिंसा हाँ परम धर्म है और पृथक् समझना चाहिये, क्योंकि आत्मतत्त्वको शरमें अतिरिक्त उसमें परम सुख मिलता है ।

 

माननेपर ब्रह्मतत्त्वको साक्षात्कार करनेमें अनेक बाधाएँ होतसाविशयको अर्मी हसा मर्म मुम्है। अत: मामाको दूर करना अपेक्षित है। ।। ३३८॥

को नित्य शुद्ध बुद्ध सस्य तथा अद्वैत कहा जाता सत्य और मिथ ज्ञचन बोलना चाहियें। कभी भी हैं। यह आत्मतत्व परम याविरूप है। यह चिदानन्द मंय सत्य नहीं बोलना चाहिये। प्रिय मिंध्या बचन भी हैं। यह सत्य, ज्ञान और अनन्त है। बड़ी तत्वमसि है नहीं बोलना चाहिये। चोरीसें या बलपूर्वक इसके इस्यका ऐसा वैदका भौं कथन है।’मैं भ्रम है सांसारिक विषयोंसें अपहरण करना सच है। सोचे कार्य (चौ] कभी भी नहीं जो परे रहता है, मैं वहाँ निलप्त दैव हैं। मैं तो वहीं अनादि करना चाहिये, क्योंकि अस्तेय (चौरी न करना ही धर्मका देवदेवेश्वर परब्रह्म ही हैं, जिसके आदि और अन्तका ज्ञान साधन हैं। आपत्तिकालमें भी इच्छापूर्वक व्यका ग़म न किसको भी नहीं है, यहीं गाँताका सार है। इसको सुनकर करना हौं अपरिग्रह है। अच्छालाभ तथा अनायास प्राप्तिको मनुष्य ब्रह्ममें लीन हो सकता है। अर्थात् उसे जीवन्मुक्ति संतुष्ट होना ही संतोष हैं। यह संतोष ही सभी प्रकार प्राप्त हो सकती है। सुखका साधन हैं। मन और इन्द्रियोंको जो एकाग्रता है, गरुडपुराणका माहात्म्य यही परम तप हैं।

आचारकाप्के अन्तिम अध्याय गरुडपुराणका माहात्म्य कर्म, मन और बाणसे हाँको स्तुति, नाम स्मरण, वर्णित है। भगवान् हरि भूतभावन रुदसे कहते हैं कि मैंने पूगा आदि कार्य और हरिके प्रत निश्चला भक्तको हीं गरुडपुराणका यह सारभाग आपको सुना दिया, जो भौग ईश्वरका चिन्तन कहा जाता हैं। अपने शरीरगत बायका नाम एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है। यह विद्या, यश, सौन्दर्य, प्राप्त है। इस वायुके निरोधकों प्राणायाम कहा जाता हैं। लक्ष्मी और आरोग्य आदिका कारक है। जो मनुष्य इसका इन्द्रिय असन् विषयोंमें विचारण करती हैं। उनको विषयको पाठ करता है या सुनता है, वह सब कुछ जान लेता है। निवृत्त करना चाहिये। मूर्त और अमूर्त ब्रह्मचरनको ध्यान और अन्तमें उसका परम कल्याण हो जाता है।

 

* पुराणं गारु बसें सारे चिमुकथामम्

जिस व्यक्तिको घरमैं यह महापराण सना है, उसमें जाती है। जो मनुष्य इस पुराणमें एक भी नोंका पाठ इस जन्ममें सब कुछ प्राप्त हो जाता हैं।

करता है, इसकी अकालमृन्य नहीं होती है। पक्षिश्रेष्ठ | इस महापुरामको पढ़ने एवं सुनने से मनुष्यकों धर्म, गरुजीके द्वारा कहा गया यह महापुराण धन्य है। यह अर्थ, काम और मौ–इन चारों पुरुषार्थीको सिद्ध हो सबका कल्याण करनेवाला है। धर्मकाण्ड-प्रेतकल्प धर्मकाण्ड़ (प्रेतकल्य)-मैं सर्वप्रथम भगवान् श्रीनारायणको गापन्ति देवाः किस गीतकानि धन्यास्तु में भारतभूमिभागे। नमस्कार किया गया है। तदनन्तर देवत्र नैमिषारण्य स्वर्गापवर्गस्य फलानाब भवन्ति भूपः पुरुषाः मुरल्यान्॥ शौनकादि अच्च मुनि सुती महाराज्ञासै प्रश्न करते हैं कि १३ ॥ १ ॥ ) कुछ लोगका कहना है कि शरीरधारी जीव एक शरीरके गरुद्ध पूछते हैं–हे प्रभो! आप यह बतानेकी कृपा बाद दूसरे शरीरका आश्रय ग्रहण करता है, जबकि इसे करें कि मरणासन्न व्यक्तिको किस कारण पृथ्यौपर मुलाया विज्ञानका कहना है कि प्राणीको मृत्युके पश्चात् अमराफी ज्ञाता है? उसके मुख पर क्यों डाला जाता है? उसके यातनाओंका भोग करनेके बाद दूसरे शौंरकी प्राप्ति होती नीचे कुश और तिल क्यों बिछायें जाते हैं? हैं कैशव! हैं-इन दोनोंमें क्या सत्य है, यह बतानेकौं कृपा करें। मृत्युकै समय विविध वस्तुक दान एवं गोदान, अष्ट सूतजी महाराज प्रश्नको सुनकर प्रसन्न होते हैं और इस महादान किसलिये दिया जाता है। प्राणी कैसे मरता है और प्रकारकथाका वर्णन करते हैं मानके बाद कहाँ जाता है। उस समय भी आतिपाहिक एक बार विनतापुत्र गरुडके हृदयमें इस आह्माण्डके शरीर कैसे प्राप्त करता है? अग्नि देनेवाले पुत्र-पौत्र उसे सभी लोकको देखनैकी इच्छा हुई। अतः हरिनामका कन्धेपर क्यों ले जाते हैं। ज्ञवमें घृतका लैंप क्यों किया उच्चारण करते हुए उन्होंने पासास, पृथ्वी तथा स्वर्ग आदि जाता है? शबके उत्तर दिशामें ‘अमसूक्त’ का पाठ क्यों होता सभी लोकका भ्रमण किया।

है। मेरे हुए व्यक्तिको यौनके लिये जल एक ही वस्त्र | पृष्यलोकके इससे अत्यन्त दु:खित एवं अशात्तचित्त धारण करके क्यों दिया जाता है? शवका दाह संस्कार होकर वे पुन: वैकुण्ठलॉक वापस आ गये। वैकण्ठलॉक करने के पश्चात् उस व्यक्तिको अपने परिजनों के साथ मृत्युलोकके समान रजोगुण तथा तमोगुण आदिको प्रवृत्ति बैठकर भोजन आदि क्यों नहीं करना चाहिये? मृत नहीं है। केवल शुद्ध सत्त्वगुणी ही प्रवृत्ति है। वहीं राग- व्यक्तिक पुत्र दसवें दिनके पहले किसलिये नौ पिण्डौंका द्वेषादि पविकार भी नहीं हैं। किसीका वह विनाश नहीं दान देते हैं। सबका दाह-संस्कार तथा उसके अनन्तर होता। यह भगवान्के मनोहारी सुन्दर पार्षद उपस्थित हैं। जलतर्पणकी क्रिया क्यों की आती है किस विधानसे गरुडझौने देखा कि हरि झुलेपर विराजमान हैं। भगवान् पितरौंको पिण्डदान देना चाहिये? इस पिण्डको स्वीकार इरिका दर्शन करनेसे विनतासुत गरुड़का इदय आनन्दविभोर करने के लिये उनका आवाहन कैसे किया जाता है? दाह हो उठा। आनन्दमग्न होकर उन्होंने प्रभुको प्रणाम करते संस्कारके बाद स्व-संचयन और घट फॉइनका विधान हुए कहा- भगवन् ! आपकी कृपासै त्रिलोकका परिभ्रमण क्यों है? इसवें दिन सभी परिजनोंके साथ शुद्धिके लियें मैंने कर लिया है। यमलोकको छोड़कर पृथ्वलोकसें सत्य- स्नान तथा पिण्डदान क्यों करना चाहिये? एकादशाहको लोकतक सब कुछ मेरे द्वारा देखा जा चुका है। सभी नृपोत्सर्ग आदि सहित पिण्डदान करनेका क्या प्रयोजन है? लोकॉकी अपेक्षा पृथ्वीलोक प्राणियोंसे अधिक परिपूर्ण है। तैरहवें दिन पडदान आदि क्यों किया जाता है। वर्षपर्यन सभी योनियोंमें मानवयोनि ही भोग और मोक्षका शुभ आश्रय सौलह श्राद्ध क्यों किये जाते हैं? है। अत: सुकृतियाँके लिये ऎसा लोक न तो अभौतिक बना हैं प्रभो ! मनुष्यका यह शरीर अनित्य हैं और समय है और न भविष्यमें बनेगा। देवता लोग भी इस लोककी आनेपर ही वह मरता है, किंतु मैं उस छिड़कों नहीं देख प्रशंसा गौत गाते हुए कहते हैं कि जो लोग पवित्र पाता हैं, जिससे जीय निकल जाता हैं। भारतभूमिमें जन्म लेकर निवास करते हैं, वें धन्य हैं। सुरगण प्राणी अपने जीवनकालमें पुण्य और पाम को भी भी स्वर्ग एवं अप्रवर्गरूप फलक प्राप्तिके लिये पुनः करता है, नाना प्रकार दान देता हैं, मैं सब शरीर नष्ट भारतभूमिमें मनुष्यरूपमें जन्म लेनेकी इच्छा करते हैं।’ हो जानेपर उसके साथ कैसे चले जाते हैं? मरे हुए प्राणीके

 

# गरुडपुराणसिंहावलोकन

लिये सपिण्डीकरण क्यों होता है? इस कृत्यमें प्रेतपिपटुका है चितामें शयको जलानेकी क्या विधि है? तत्काल मिलन किसके साथ किस विधिसे होना चाहिये? इसे आप अधवा विलम्ब उस ज्ञबको कैसे दूसरी देह प्राप्त होती बतानेकी कृपा करें।

यमलोक (संयमनी नागरी) – जानेवाले के लिये | मनुष्य माप, दुराचा अथवा हुनबुझि है, मरने के बर्षपर्यन्त कौन-सौं क्रियाएँ करनी चाहिये? इहि अर्थात् बाद वे किस स्थितिको प्राप्त करते हैं? जो पुरुष दुराचारी व्यक्तिको मृत्यु होनेपर उसका प्रायश्चित्त क्या है?

आत्मघातीं, अह्महत्यारा, स्वर्ण आदिकी चोरी करनेवाला, पञ्चकादिमें मृत्यु होनेपर पञ्चकशान्तिके लिये क्या करना मित्रादिके साथ विश्वासघात करनेवाला है, उस महापातकका चाहिये? हे देय! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों। आप मेरे इस

क्या होता है।

सम्पूर्ण भ्रमको विनष्ट करनेमें समर्थ है। मैंने आपसे यह सब | है माधव ! यदि शूद्र प्रणव महामन्त्रको जप करता है लोकमङ्गलकी कामनासे पूछा है, मुझे बतानेकौं कृपा करें। तथा ब्रह्मसूत्र अर्थात् यज्ञोपवीतको धारण करता है तो मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये मृत्युके बाद उसकी क्या गति होती है। जानेवाले कर्म । | गरुडौं कहते हैं कि हैं विश्वात्मन्! मैंने कहलवश श्रीकृष्णजी गरुइसे कहते हैं—आपने मनुष्योंके हितमें । सम्पूर्ण गनुका भ्रमण किया है, उसमें रहनेवालें नौगोंको बहुत ही महत्वपूर्ण बात मानी है। जिसको दैवताग, योगीजन मैंने देखा है कि वे सभी दु:खमैं हीं इयें रहते हैं। उनके नहीं देख सकें, जो मानिस है, उसे मैं बता रहा हैं। अत्यन्त कष्टको देखकर मेरा अन्त:करण पीड़ासे भर गया, पुत्रकी महिमा बताते हुए भगवान् कहते हैं यदि स्वर्गमें दैत्योंकी शत्रुतासे भय है, पृथ्वीलोकमै मृत्यु और मनुष्यकों मोक्ष नहीं मिलता है तो पुत्र नरकसे उसम उद्धार राँगादिसे तथा अभीष्ट वस्तुके वियोंगसे लोग दुखी हैं। कर देता है। पुत्र और पौत्रकों मरे हुए प्राणको कन्धा देना पाताललोकमें रहनेवाले प्राणियों (नाग आदि)-कों में चाहिये तथा उसका यथाविधान अग्निदाह करना चाहिये। भयसें दु:बना रहता है। है भो ! आपके इस सबसे पहले गोबरसे भूमिकों लींपना चाहिये। तदनन्तर वैकुण्ठधामके अतिरिक्त अन्यत्र किसी भी सौक ऐसी जलकी खामें मण्डल बनाना चाहिये। इसके बाद उस | निर्भयता नहीं दिखायी देतीं । कालके वशीभूत इस जगत्को स्थानपर तिल और कुश बिछाकर मरणासन व्यक्तिको स्थित स्वप्नको मामाके समान असत्य है। उसमें भी इस कुशासनपर सुला देना चाहिये तथा उसके मुख स्वर्ग भारतवर्षमें रहनेवाले लोग बहुत-से चोंको भोग रहे हैं। आदि पञ्चरत्न डालना चाहिये। यह सब कार्य करनेसे वह मैंने देखा है कि उस देश मनुष्य राग-द्वेष तथा मह प्राणीं अपने समस्त पापको जलाकर पापमुक्त हो जाता है।

आदि आकण्ठ इंचे हुए हैं। उस देशमें कुछ लोग अन्धे भूमिपर मण्डल बनानेका अत्यधिक महत्व बताया गया है। | हैं, कुछ दीं दृष्टिवाले हैं, कुछ दुष्ट वाणवाले हैं, कुछ लले भूमिपर बनाये गयें ऎसे मण्ड़लमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, लक्ष्मी | हैं, कुछ सँगड़े हैं, कुछ फ्राने हैं, कुछ बहरे हैं, कुछ गैंग तथा अन् आदि देवता विराजमान हो जाते हैं, अत: | है. कुछ कही हैं, कुछ अधिक होमवाले हैं, कुछ नाना मण्डूलका निर्माण अवश्य करना चाहिये। मण्डलविहीन रोगसे घिरे हैं और कुछ आकाश-कुसुमक तह नितान्त भूमिपर प्रणम्याग करनेपर, उसे अन्य योनि नहीं प्राप्त होती, मिथ्याभिमानमें चूर हैं। उनके विचित्र दोषको तथा उनको इसकी ज्ञवात्मा वायके साथ भट्टकती रहती हैं। तिल और मृत्युको देखकर मैं मनमैं जिज्ञासा उत्पन्न हो गया है कि कुशकी महत्ता बताते हुए भगवान् कहते हैं कि हैं गरुड! यह मृत्यु क्या हैं? इस भारतवर्षमें यह कैसी विचित्रता है? तिल में पसीनेमें उत्पन्न हुए हैं, अत: तिल बहुत ही पवित्र ऋषियोंमें मैंने पहले ही इस विषयमैं सामान्यतः यह सुन हैं। तिलका प्रयोग करनैर असुर, दानव और दैत्य भाग रखा है कि जिसकी विधिपूर्वक वार्षिक क्रियाएँ नहीं होतीं जाते हैं। एक ही तिलका दान स्वर्ग बत्तीस सेर तिलके हैं, उसकी इन हसीं हैं। फिल भी प्रभो ! इसकी विशेष बराबर हैं। तर्पण, दान एवं होममें दिया गया तिनका दान जानकारीक लिये मैं आपसे पूछ रहा है।

अक्षय होता है। कुशे मेरे शरीरके रॉम इपन्न हुए हैं। | हैं उपेन्द्र! मनुष्क मृत्युकै समय उसके कल्याणकै कुनके मूलमैं ब्रह्मा, मध्यमैं दिशतु तथा अग्रभागामें शिवकों निये क्या करना चाहियें ? कैसा दान देंना चाहिये? मृत्यु जानना चाहिये। ये तीनों देव शमें प्रशिक्षित माने गये और मशानभूमतक पहुँचनेकी कौन-सी विधि अपेक्षित हैं। इर्मालायें देवताओंकौं तृप्तिके लिये मुख्यरूपसे ।

 

* पुराणं गाकडं वक्ष्ये सारं विष्णुकथाभयम् का काम क्या का सामना । कुशको और पितरोंकी तृप्तिके लिये तिलको आवश्यकता लकड़ौका प्रयोग करना चाहिये। होती हैं। इँयताओं और पितरोंकी तृप्ति ही विश्वको इप्तिमें अब मरणासन्न व्यक्तिकी इन्द्रियों का समूह व्याकुल हो हेतु है। अत: श्राद्धको जो विधियाँ बताया गया है, उन्हौंक उठता है, चैतन ज्ञार जीभूत हो जाता है, उस समय प्राण अनुसार मनुष्यको ब्रह्मा, देवदेवेश्चर तथा पितृञ्जनको संतृप्त शरीरको छोड़कर अमके दूतों के साथ चल देते हैं। करना चाहिये। ब्राह्मण, मन्त्र, कुश, अग्नि और तुलसी- उस समय जो प्राणों दुरात्मा होते हैं, उन्हें यमदूत अपने में बार-बार प्रयुक्त होनेपर भी चासो नहीं होते। पाशबन्धनौंको ज्ञकड़कर माते हैं। जो सुकृती हैं, उनको ‘हैं पक्षिश्रेष्ठ ! विष्णु, एकादशीव्रत, गीता, तुलसौं, स्वर्गके पार्षद सुखपूर्वक अपने लोककों लें जाते हैं। ब्राह्मण और गौ-ये छः दुर्गम असार संसार में लोगोंको यमलोककै दुर्गम मार्गमें पापियाँको दुःया झेलते हुए जाना मुक्ति प्रदान करने के साधन हैं ।

पड़ता है। विष्णुकादशी गौंता तुलसी विप्रभेनवः ॥ यमराज्ञ अपने लोक शा. चक्र तथा गदा आदिको असारे दुर्गसंसारे पट्पदी मुक्तिदायिनी। विभूषित चतुर्भुज रूप धारणकर पुण्यकर्म करनेवाले साधु । ३।३। ३४-३, पुरुषों के साथ मित्रवत् आचरण करते हैं और पापियोंकों मृत्युकालमें मरणासन्नकै दोनों हाथोंमें कुश रखना नकर बुलाकर उन्हें अपने पडसे तर्जना देते हैं। वे चाहिये। इससे प्राणी विष्णुलोकको प्राप्त करता है। प्रलयकालीन मेमके समान गर्जना करनेवाले हैं। अञ्जनगरिकै

लवारस पितरोंको प्रिय होता है और स्वर्गको प्रदान काश उनका कृष्णवर्ग है। तथा एक बहुत बड़े भैसेपर करता है। यह लवपारस भगवान् विष्णुके शरीर से उत्पन्न सवार होते हैं। वे महाक्रोध एवं अत्यन्त भयंकर हैं। हुआ है। इसलियें अनादिके साथ लवणका दान करना भीमकाय इराकृति यमराज अपने हाधोंमें लोहेका इण्डू चाहियें। इस पृष्ट्यापर यदि किसी आतुर व्यक्तिके प्राण न और पाशा भरण करते हैं। उनके मुख तथा नेत्रको नमें स्वर्गका हा नॉनने के लिये देनेसे हीं पापियो मनमें भच्च उत्पन्न हो इन्नता है। लमणका दान करना चाहिये।

इस प्रकारका महाभयानक यमराज्ञ जब पापकों इसके समीप तुलसीका वृक्ष एवं शालग्रामको शिलाको दिखायी अङ्कलें हैं, इस समय् ाकार करता हुआ भों लाकर रखें। तत्पश्चात् यथाविधान विभिन सूक्तोंका पाल अङ्गडमात्रका मृत पुरुष अपने घर की ओर देखता हुआ करना चाहिये, क्योंकि ऐसा करनेसे मनुष्यकी मृत्यु यमदूतोंके द्वारा ले जाया जाता है। मुक्तिदायक होती है। उसके बाद मरे हुए गौके शरॊरगत जोंसे मुक्त-शरीर-चेष्टाहाँन हो जाता है। उसको विभिन्न स्थानों में सोनेक शलाकाऑको खनेका विधान हैं, देखनेसे मनमें घुगा इत्पन्न होने लगती है। वह तुरंत जिसके अनुसार क्रमशः एक शक्षाका मुख, एक-एक अस्पृश्य तथा दुर्गन्धयुक्त और सभ प्रकार निन्दित हो शलाका नाकके दोनों छिद्र, दो-दो शलाकाएँ नेत्र और जाता है। यह शरीर अन्तमें कीट, चिल्ला या ग़खमें परिवर्तित कान, एक शलाका लिङ्ग तथा एक शक्षाको उसके हो जाता है। है शाय! क्षणभरमें विध्वंस होनेवाले इस ब्रह्माग्में रखनी चाहिये। उसके दोनों हाथ एवं कण्ठभागमें शौंरपर कौन ऐसा होगा बों गर्व करेगा। इस असत् तुलसीं रखें। इसके शासकों द वस्त्रोंसे आच्छादित करके शरीर में होनेवाले वित्तका दान, आदरपूर्वक मानौं, कीर्ति, कुंकुम और अक्षतसे पुजन करना चाहिये। तदनन्तर धर्म, आयु और परोपकार हो सारभूत है। यमलोक ले जाते पुष्पकी मालासे विभूपित करके उसे बन्धु-बान्धवों तथा हुए यमदूत प्राणौको बार-बार नरकका तीव्र भय दिखाते हुए, पुत्र एवं पुरवासियोंके साथ अन्य द्वारसे ले जाय । इस समय आँटकर यह कहते हैं कि हे दुष्टात्मन्! तु शीघ्र चल। कुओं अपने बान्धके साथ पुशकों मरे हुए पिताके शवको यमराजकै घर जाना है। शीघ्र ही हम सब तुझे ‘कुम्भपाक’ कन्धेपर रखकर स्वयं ले जाना चाहिये।

नामक नरकमें ले चलेंगे। उस समय इस प्रकारको वानी और श्मशान देशमें पहुँचकर पुत्र पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख बन्धुबान्धका कृदन सुनकर ऊँचे स्वर हा-हा करके वहाँको उस भूमिपुर चिताका निर्माण करवायें, जो पहलेसे विलाप करता हुआ वह मृतक यमदूतोके द्वारा यमलोक ज़लों न हों। उस चितामें चन्दन, तुलसी और पलाशादिको पहुँचाया जाता हैं। [शैष मृत्य-संख्या ५६५ से]

 

परमामने नमः

श्रीगणेशाय नमः

नमो भगवते वासुदेवाय संक्षिप्त गरुडपुराण

 

आचारकाण्ड भगवान् विष्णुकी महिमा तथा उनके अवतारोंका वर्णन नारायणं नमस्कृत्य ां चैव नरोत्तमम्। वे देव संतुष्ट होते हैं? किस योग द्वारा उनको प्राप्त किया दैर्वी मरम्मत में ततो जयमुदीरयॆत् ॥ जा सकता है। उनके कितने अवतार हैं उनकी संश ‘नरष्ठ भगवान् बौनरनारायण और भगवती सरस्वती तथा परम्परा कैसी है? वर्णाश्रमादि धर्मोकं वर्तक एवं रक्षक व्यासदेव नमन करके पुग्नसक्ने प्रवचन करना चाहिये। कौन हैं हैं महामते श्रीसूतजीं! इन सबको और अन्य जो जन्म और रासे रहित कस्मणाम्यरूप-अजन्मा विषयकों में बायें था भगवान् नारायणक सभी उम तथा अजर हैं, अनन्त एवं ज्ञानस्वरूप हैं, महान् है, विशुद्ध कथाओंका वर्णन करें। (मसहित), अनादि एवं पाञ्चभौतिक शरीरसे हॉन हैं, समस्त इन्द्रियोंसे रहित और सभी प्राणियोंमें स्थित हैं, मायासे परें हैं, उन सर्वव्यापक, परम पवित्र, मङ्गलमय, अद्वय भगवान् श्रीकृरिकी मैं वन्दना करता हूँ। मैं मन-वाणी और कर्ममें विष्णु, शिव, ब्रह्मा, गणेश तथा देवी सरस्वतीको सर्वदा नमस्कार करता है।

एक बार सर्वशास्त्रपारङ्गत, पुराणविद्याकुशल, शान्तथि। महात्मा सुतौं तीर्थयात्राकै प्रसङ्गमैं नैमिषारण्य आये | और एक पवित्र आसनपर स्थित होकर भगवान् विका यान करने लगे। ऐसे उन क्रान्तदर्शी तपस्वींका दर्शन | करके नैमिषाबवासी शौनकादि मुनयनें उनकीं ना की । और स्तुति करते हुए उनसे यह निवेदन किया ऋषियोंने कहाहे सूतों! आप तो सब कुछ सूतजीं बोलें- हे ऋषियों! मैं उस गरुङमहापुराणका | जानते हैं, इसलिये हम सब आपसे पूछते हैं कि देवताओंमें वर्णन करता है, जो सारभूत हैं और भगवान् विष्णुकी सर्वश्रेष्ठ देव कौन हैं, ईश्वर कौन हैं और कौन पून्य हैं। कथाओंमें परिपूर्ण है। प्राचीन कालमें इस पुराणको ध्यान करनेके योग्य कौन है? इस जगत्को सट्टा, श्रीगजीने कश्यप पिको सुनाया था और मैंने इसे पालनकर्ता और संहर्ता कौन हैं? किनके द्वारा यह व्यासजसे सुना था। हैं ऋषियों! भगवान् नारायण ही सब (सनातन धर्म प्रतीत हो रहा है और इष्टॉर्क विनाशक देवोंमें मंह कुँव हैं। मैं हौं परमात्मा एवं परह्म हैं। उन्होंने कौन है? उन देबका कैसा स्वरूप हैं? किस प्रकार इस इस ज्ञातुकी उत्पत्ति, स्थिति और संहारक क्रियाएँ होती सम्मृर्ग ज्ञगकी मुष्टि हुई है। किन मृतका मानन कानैमें है। मैं जरा-मममें रहता है। मैं भगवान् वामदैव आलमा हैं. आजमपम ज्ञानपं मनं शिवमनलमनाई भूतादिनन् ।

 

काफसाफमॉर्न सर्वभूतस्थित में मिमममायं घान्द प्रकम् नमामि अहं ब्रह्मानं साधम्। देव मम्वतों चैव मनोशाक: मदा १३

 

* पुणं गारुओं वक्ष्ये सारं विष्णुकथाश्नमाम्

जगतकी रक्षाकें लिये सनत्कुमार आदि अनेक धारण किया। उन्होंने बारहवें अवतार में ‘धन्वन्तरि’ तथा | रूपोंमें अवतार ग्रहण करते हैं।

तेंवें अवतारमें ‘मोहिनी का रूप ग्रहण किया और इसी | हैं ब्रह्मन् ! उन भगवान् श्रीहरिने सर्वप्रथम कौमार-सर्गमें स्त्रीरूपमें उन्होंने अपने सौन्दर्यसे) दैत्यको मुग्ध करते | (सनत्कुमारादिके रूपमें) अवतार धारण करके कठोर तथा हुए देवताओंको अमृतपान कराया। चौदहवें अवतारमें अखण्ड़ अह्मचर्यन्नतका पालन किया। इस्र अवतारमें उन्हीं भगवान् विष्णुने “नृसिंह’ का रूप धारणकर, अपने तेज यज्ञे श्वार और जगनाक स्थितिके लिये ( हिरण्याक्षके नल्लासे पराक्रम दैत्यराज हिरण्यकशिपुके हृदयको सौ द्वारा) रसातलमें ले जायीं गयीं धिवांका उद्धार करते हुए प्रकार, विदीर्ण किया, जिस प्रकार चटाई बनानेवाला व्यक्ति । “बराहू’ शरीरकों धारण किया। तीसरे ऋषि-सर्गमें देवयं तिनकको चौंर डालता हैं। पंद्रहवें अवतार ‘वामन’ रूप । (नारद ) के रूप में अवतरित होकर उन्होंने ‘सात्वत तन्त्र धारण कर वें राजा बलिके यज्ञमें गयें और देंचोंको तौनों (नारदपाशरात्र)-का विस्तार किया, जिससे निष्काम कर्मका नोंक प्रदान करने की इसे उनमें तीन पग भूमिक प्रवर्तन हुआ। चौथे ‘नरनारायण’-अवतार भगवान् श्रीहरिने बिना की । सोलहवें (परशुराम नामक) अवतारमैं ब्राह्मणद्रोही धर्मको रक्षाकें लिये कठोर तपस्या की और वे देवताओं क्षत्रियोंके अत्याचारों को देखकर उनको क्रोध आ गया और तथा असुरों द्वारा पूजित हुए। आँचवें अवतारमें भगवान्, उस भावार्थेशमें उन्होंने इक्कीस बार पृथिवीको क्षत्रियों से हाँ ‘कपल’-नामसे अवतरित हुए, जो सिॉमें सर्वश्रेष्ठ रहित कर दिया। तदनन्तर सत्रहवें अवतारमें यें पराशरद्वारा हैं और जिन्होंने कालके प्रभावसे लुप्त हो चुके सांयशास्वकी सत्यवतोसे (व्यास-नाम) अवॉरंत हुए और मनुष्यों को शिक्षा दी। छठे अवतार में भगवान् नारायणने महर्षि अत्रिकी अल्पताको जानकर इहोंने वेदरूपी वृक्षकों अनेक | पी अनसूया कि ‘ज्ञानेय’ के रूपमें अवतीर्ण होकर आाखाओंमें विभक्त किया। श्रीहरिने कि काया को राजा अलर्क और प्रहाद आदिको आन्वीक्षिको (ब्रह्म) करनेकी इच्छासे राजाके रूपमें ‘ श्रीराम-नामसे अट्ठारहवाँ विद्याका उपदेश दिया। सातवें अवतार में श्रनारायणने अवतार लेकर समुद्रबन्धन आदि अनेक पराक्रमपूर्ण कार्य द्रादि देवगणोंके साथ यज्ञका अनुष्ठान किया और इसी किया। उन्नीसवें तथा बसवें अवतारमें श्रीहरिनें वृष्णिवंशमें स्वायम्भुव मन्वन्तरमें वे आकृत्तिकै गर्भसे रुचि ज्ञापतके ‘कृष्ण’ एवं ‘बलराम’ का रूप धारण करके पृथ्वौके गुञरूपमें ‘यज्ञईय’ नामसँ अवतर्ण हुए। आवें अवतारमें भारका हरण किया। इक्कीसवें अवतारमें भगवान् कलयुगको में ही भगवान् विष्णु नाभि एवं मेरदेवीके पुत्ररूपमें सन्धिके अन्नामें देवरियौंकों मोहित करनेके लिये काफट ‘ऋषभदेव’ नामसे प्रादुर्भूत हुए। इस अवतारमें इन्होंने देशमैं जिनपुत्र ‘बुद्ध’ के नामसे अयणं होंगे और इसके नारियोंके उस आदर्श मार्ग (गृहस्थाश्रम)-का निदर्शन पश्चात् कलियुगक आठ सन्ध्या अधिकांश राजवर्गके किया, जो सभी आश्चमद्वारा नमस्कृत हैं। ऋषियको समाप्त होने पर वे ही श्रीहरि विष्णुयशा नामक ब्राह्मण प्रार्थनासे भगवान् जौहरने नथे अवतार में पार्थिव शरीर, अर्थात् घरमें “ककि ‘ नामसे अवतार ग्रहण करेंगे। ‘पृथु का रूप धारण किया और गोल्पा पृथिवीसे) हे द्विजों! { मैंने यहाँ पर भगवान् नारायणके कुछ ही दुग्धरूपमें ! अन्नादक) महौषधियोंका दोहन किया, जिससे अवतारोको कथाका वर्णन किया है। सत्य तो यह है कि ग्रजाओ ज्ञवनको रक्षा हुई। दसवें अवतारमें ‘मत्स्यावतार’ सत्त्वगुणके अधिष्ठान भगवान् विष्णुके असंख्य अवतार हैं। ग्रहकर इन्होंने चाय मन्वन्तरके बाद आनेवाले प्रतकालमें मनु, वेदवेत्ता तथा सृष्टिप्रवर्तक सभी ऋषि इन्हीं विष्णुको निराश्रित वैवस्वत मनुको पीपी नौकाको बैठाकर विभूतियों की गयी हैं। इन्हीं मानु आदि मे वापिसे इस साक्षा प्रदान की। ग्यारहवं अवतारमें इंवों और दानयनें ज्ञातुकौं सृष्टि आदि होती है, इसीनियें व्रत आदिके द्वारा समुद्र मन्थन किया तो उस समर भगवान् नारायणने इनकी पूजा करनी चाहिये। गायीन कालमें भावानु स्वास ‘कु’ रूप ग्रहण करके इन्दराचल पर्वतको अपनी पाळपर इस ” रमपुराण’ को मुझे सुनाया था।

(अध्याय

आचारकाण्ड ]

 

+ गपुराणको वक्तत्परम्परा, भगवान् विष्णुमाग अपने स्वरूका वर्णन

गरुडपुराणकी वक्तृ-ओतृ-परम्परा, भगवान् विष्णुद्वारा अपने स्वरूपको वर्णन तथा गरुइजीको पुरागसंहिताके प्रणयनका वरदान ऋषियने पुन: कहा-(हे सूतजी महाराज !} आपको परम तत्वके ध्यानमें निमग्न हैं। मैंने प्रणाम करके उनसे महात्मा व्यासजीने विष्णकथामें आश्रित इस ऑछ पुछा-है सदाशिव ! आप किस देवका ध्यान कर रहे हैं। गरुडमहामुरागको किस प्रकार सुनाया था? वह सब आप मैं तो आपसे अतिरिक्त अन्य किसी देवताको नहीं जानता | हमें विधिबनु सुनानेकी कृपा करें।

है। इन सभी देवताओं के साथ अम परम सारतापकों सूतजी बोले-एक बार मुनि के साथ मैं अदरिकाश्नम जाननेकौ मैरी इच्छा है। अतः आप उसका वर्णन करें। गया था। वहाँपर परमेश्वरकै ध्यानमैं निमग्न भगवान् व्यासका रुजींने ब्रह्माजीसे कहा- मैं तो सफलदायक, मुझे दर्शन हुआ। उन्हें प्रणाम करके मैं वहीं पर बैठ गया सर्वव्याप, सर्यरूप, सभी प्राणियोंके हृदयमें अवस्थित और उन मुनीश्वरसे मैंने पूछा-हे व्यासजी! आप परमैश्वर परमात्मा तथा सर्वेश्वर उन भगवान् विष्णुका ध्यान करता भगवान् हरिके स्वरूप और जगकी सृष्टि आदिको मुझे हैं। हे पितामह ! इन्हीं विष्णुको आग्रधना करनेके लिये में मनायें, क्योंकि मैं जानता है कि आप इन्हीं परम पुरुषको शरीरमें भस्म तथा सिरपर जाजूट धारण करके सत्ताचरण में ध्यान कर रहे हैं और उन सर्वज्ञके स्वरूपका परिज्ञान भी निरत रहता है। जो सर्वव्यापक, सशस्त, अद्वैत, निराकार, | आपकों हैं। ॐ विघन्। ने यासबके सामने जय होसी एवं पद्मनाभ हैं। यों निर्मन (श जया पवित्र सस्वरूप | जिज्ञासा की तो उन्होंने मुझसे ज्ञों कहा था, यह सच है, मैं इक रमपद में भर भगवान का ध्यान करता मैं आप सभीसे कह रहा है, सुनें।

इस सारतच (विष्णु)-के विषयमें अहाँके पास | व्यासजींने कहा-हे सूतज्ञ ! ब्रह्माजीने जिस प्रकार चलकर हम सभीको पुछना चाहिये।

नारद एवं प्रजापति दक्ष आदिसे तथा मुझसे इस पुराणको जिनमें सम्पूर्ण जगत्का वास है। प्रलयकालमैं जिनमें कथा कहीं घों, उसी प्रकार मैं गरुड़महापुराणको सुनाता हैं। सम्पूर्ण जगत् प्रविष्ट हो जाता है, सच प्रकारको अपनेकों आप सब (इसे) सुने।

उहाँको शरणमें करके मैं उन्हींका चिन्तन करता हैं। जिन सूतजीने पूछा-(हे भगवन्!) ब्रह्माजौने देवर्षि नारद सर्वभूतेश्वरमें सत्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण एक सूत्रमैं और प्रजापति दक्षसहित आपसे किस प्रकारके पवित्र एवं अवगुम्फित मणियोंके समान विद्यमान रहते हैं, जो हजार सारतत्व बतानेवाले पुराणको कहा था?

नेत्र, हुशार चरण, इजार जंपा तथा श्रेष्ठ मुख़से युक्त हैं, ओं | व्यासज़ने कहा-एक बार नारद, इक्ष तथा भूगु सुक्ष्म भी सूक्ष्म, स्थूलसे भी स्थल, गुस्से गुरम और

आदि ऋषियोंके साध मैं अह्मलोकमें विद्यमान ब्रह्माज्ञीके यूयमें पूनम तथा में भी श्रेष्ठतम हैं, जो सत्योंक परम् पास गया और उन्हें प्रणामकर मैंने प्रार्थना की कि हे प्रभो! सत्य और सत्यकर्मा कहे गये हैं, जो (पुराणमें) पुराणपुरुष आप हमें सारतत्त्व बतानेकी कृपा करें।

और द्विजातियोंमें ब्राह्मण हैं, जो प्रलयकालमें सर्षण ब्रह्माजी बोले—यह गड़महापुराण अन्य सभी शास्र्लोका कहलाते हैं। मैं उन्हीं परम उपास्यको उपासना करता है। सारभूत है। प्राचीन कालमें भगवान् विष्णुने अन्य देवताओंसहित जिन सत्-असत्से परे, ऋत ( सत्यस्वरूप), एकाक्षर स्ददेव (शिव) और मुझसे जिस प्रकार से कहा था, उस (प्रावस्वरूप) परब्रह्मको देव, यक्ष, राक्षस और नागगण प्रकार मैं भी इसका वर्णन आपसे कर रहा हूँ। अर्चना करते हैं, जिनमें सभी सोक उसी प्रकार स्फुरित व्यासजींने कहा-भगवान् श्रीहरिने अन्य देवोंके साथ होते हैं, जिस प्रकार जलमें छोटी-छोटीं माँलय स्फुरंत रुद्रदेवको किस प्रकारको सारभूत और महान् अर्थ बतलानेवाले हॉतीं हैं, जिनका मुख अग्नि, मस्तक झुलॉक, नाभि इस गरुडमहापुराणों सुनाया था? हे ब्रह्मन्! उसे आप सुनायें। आकाश, चरणयुग्म पृथ्वों और नेत्र सूर्य तथा चन्द्र हैं; ऐसे ब्रह्माजी बोले- एक बार इन्द्रादि देवताओंके साथ मैं उन (विष्णु) देषका मैं ध्यान करता हूँ। कैलासपर्वतपर पहुँच गया। वहाँ मैंने देंखा कि हदेव शङ्कर जिनके दरमें स्वर्ग, मयं एवं माताल- ये तीनों लोक

 

# पुराणं गाई बों सारं कियाअम् +

विद्यमान हैं। समस्त दिशाएँ जिनकों भुजाएँ हैं, घवन अन्य देवांके साथ आप इसका श्रवण करें । जिनका उच्चश्वास है, मेघमालाका समूह जिनका केश- मैं ही सभी देवोंका देव हैं। मैं हो सभी लोकका पुञ्ज हैं, नदियाँ हों जिनके सभी अङ्गको सन्धियाँ हैं और स्वामी हैं। इँका मैं हौं ध्येय, पुम्य और स्तुतियोंमें स्तुति चारों समुह जिनकी कुक्षि हैं, जो कालातीत हैं, यज्ञ एवं करने योग्य हैं। है हद् ! मैं ही मनुष्योंसे पूजित होकर इन्हें सत्-असत्से परे हैं, जो जगाके आदि कारण तथा स्वयं परम गति प्रदान करता हूँ तथा नृत, नियम और सदाचरणसे अनादि हैं, ऐसे बन नारायणका मैं चिन्तन करता है। संतुष्ट होकर हे शिव! मैं ही इस संसारकी स्थितिका मूल जिनके मनसें चन्द्रमा, नेत्रोंसे सूर्य और मुखसे अग्नि कारण हैं। मैं हो जगत्की रचना करनेवाला हैं। हे शङ्कर! उत्पन्न हैं, जिनके चरणोंमें वृधिवक, कानों दिशाक मैं हाँ दाटका निग्रह और धर्म रक्षा करता हैं। मैं है और मस्तक स्वर्गकी मष्ट हुई हैं, जिन परमेश्वरले सर्ग, मत्स्य आदिक उपमें अचनों हॉकर अखिल भुमहलक प्रतिसर्ग, वश, मन्यन्तन तथा बंशानुचरित प्रवर्तित हुआ है। पालन करता है। मैं ही मन्त्र हैं। मैं हाँ मन्त्रको अर्थ हैं और । उन देवकों में आराधना करता है। परम मातयका ज्ञान प्राप्त मैं ही पण या मानक हैं। प्राप्त नमाना म त करनेके लिये हम सभीको उहाँकी शरणमें जाना चाहिये। हैं। मैंने हाँ स्वर्ग आदिकी सृष्टि की है और मैं ही स्वर्गादि ब्रह्माजीने कहा-हे व्यासजौ ! प्राचीन कालमें रुकें भी हैं। मैं हीं योगी, आद्म योग और पुराण है। ज्ञाता, होता। द्वारा ऐसा कहे ज्ञानेपर श्वेताद्वीपमें निवास करनेवाले भगवान् तथा मननकर्ता मैं हीं हैं। वक्ता और सम्भाषणका विषय । विष्णुको प्रणाम करके उनकी स्तुतिकर उस परम तत्व भी मैं हीं हैं। इस जगतुके समस्त पदार्थ मै हौं स्वरूप । सारको सुननेको इन्चासे देवगणोंके साथ मैं भौं यहाँपर हैं और मैं ही सब कुछ हैं। मैं हीं भौग और मोक्षका स्थित हो गया। तदनन्तर हमारे मध्य अवस्थित रुद्ने जुन प्रदायक परम देव हैं। हैं ! ध्यान, पुजाके उपचार और प्रम सारतत्त्वस्वरूप विषाको प्रणाम करके (यह जिज्ञासा (सर्वतोभद्र) मण्डल आदि सब कुछ मैं ही हैं। हे शिव! करते हुए कहा- हैं देवेश्वर ! हे रे ! आप हम सबको यह मैं ही सम्पुर्ण चंद हैं। मैं ही इतिहासस्वरुप है। मैं हीं अता कि कौन देवाधिदेव हैं और कौन ईश्वर हैं। कौन सर्वज्ञानमय है। मैं हीं अह्म और सर्वात्मा हैं, मैं हौं सह्मा ध्येय तथा कौन पुग्म हैं? किन ब्रतोंसे वे परम शत्त्व संतुष्ट हैं, मैं ही सर्वलोकमय हैं तथा मैं हीं सभी का आत्मस्वरूप होते हैं? किन धमके द्वारा, किन नियमोंसे अधया किस हैं। मैं ही साक्षात् सदाचार हैं। मैं ही धर्म हैं। मैं ही वैष्णव हैं। धार्मिक मृज्ञासे और किस आचरणसे वे प्रसन्न होते हैं। मैं ही वर्णाश्रम है। मैं ही सभी सण और आश्रमका सनातन इन ईभरका वह स्वरूप कैसा है ? किन देवके द्वारा इस धर्म हैं। है कुल्ल ! मैं हीं यम-नियम और विविध प्रकारका व्रत जगतुकी सृष्टि हुई हैं और कौन इस जगत्का पालन करते हैं। मैं ही सूर्य, चन्द्र एवं मंगल आदि ग्रह है। हैं। ये किन-किन अवतारोंको धारण करते हैं? प्रलयकालमें प्राचीन काल मृथिवीपर पक्षिराज गरुड़ने तपस्याके यह विश्व किन देंवमें लीन होता हैं ? सर्ग, प्रतिसर्ग, बंश द्वारा मेरी ही आराधना की थी। इनकी तपस्यासे संतुष्ट होकर तथा मन्वन्तर किन देंयसें प्रवर्तित होते हैं और यह सब मैंने उनसे कहा था कि आप मुझमें अभीष्ट वर माँग लें।

दृश्यम्मान जगत्] किन देवमें प्रतिष्ठित हैं हैं हरे ! इन् । उस समय गझने कहा- हे हरि! भागने में माता। सभी विषयों के साथ अन्य जो भी सारतत्त्व हैं, उन्हें बतायें बिनताको दासी बना लिया है। हे देव ! आप प्रसन्न होकर और इसके साथ ही परमेश्वरको माहात्म्य तथा ध्यानयोग मुझे यह बर प्रदान करें कि मैं उनको जीतकर अमृत प्राप्त विषयमें भी बतानेकौं कृपा करें।

करनेमें समर्थ हो सकें और माँको (नागोंकी माता) कडूक । तदनन्तर भगवान् विष्णूने रुद्रको उस परमेश्वर दासतासे मुक्त करा सकें, मैं आपका वाहन बन सकें, महान्

माहात्म्य एवं उसकी प्राप्तिके साधनभूत) ध्यान और अली, महान् शमशाली, सर्वज्ञ और नागको विर्ण । योगादिक नियमों तथा अष्टदश विद्याओंका ज्ञान (इम करनेमें समर्थ हो सकें तथा जिस प्रकार पुराण-संहिताका प्रकारले दिमा—

. उचनाकार हो सकें वैसा ही करने की कृपा करें। श्रीहरिने कहा- हे रुड़ ! मैं बताता हैंब्रहा और विष्णु बोले- हे पक्षराज गरुड़ ! आपने जैसा घर आ चारा ]

 

* गरुडपुराणके प्रतिपाद्य विषयोंका निरूपण +

माँगा हैं, वैसा ही सब कुछ होगा। आप नागको दासतासे मेरे ही माहाको कहनेवाली पुराण-सरिताका प्रणयन करेंगे। मेरा जैसा स्वरूप कहा गया है, वैसा ही आपमें भी प्रकट होगा। आपके द्वारा प्रणीत अह पुराणहिता आपके ‘गरुड़ नाम नौकमैं प्रसिद्ध होगी।

हे विनतासुन ! जिस प्रकार देव-देवोंके मध्य मैं ऐश्वर्य और श्रीरूपमें विख्यात हैं, उसी प्रकार है गरुड! सभी पुराणों में यह गरुद्धमहापुराण भी रयाति अर्जित करेगा। जैसे विश्व में कीर्तन होता है, वैसे ही गरुडुकै नाममैं आपका भी मकान होगा। हैं पक्षिप्त ! अब आप मेरा ध्यान करके उस पुराणाका प्रणयन हो । | हैं ह! मैरे द्वारा यह वरदान दिये जानेके बाद इस सम्बन्भमें कश्यप ऋषिके द्वारा पूछे जानैपर गरुङने इस पुराणकों उन्हें सुना। कश्यपने इस महापुराणका असण करके गाविद्याके चलमें एक जर्ने हुए वृक्षकों भी गोजित कर दिया था। गरुड़ने स्वयं (भी) इस विद्या द्वारा अनेक अपनी माता विनताको मुक्त करवा सकेंगे। सभी देवताको प्राणियोंको जीवित किया था। ‘यक्षि ॐ ॐ म्या’ बहू ज्ञाप जीतकर अमृत ग्रहण करने में आपको सफलता प्राप्त होगी। करने योग्य गारुडौं पविद्या है। है कह! मेरे स्वरूप अत्यन्त शक्तिसम्पन्न होकर आप मेरे वाहन होंगे। वियोंके परिपूर्ण गुरुद्वारा कहे गये इस गुरुडमहापुराणको आप सुनें । विनाशको शक्ति भी आपको प्राप्त होगी। मेरी कृपासे आप गरुडपुराणके प्रतिपाद्य विषयोंका निरूपण सुतज्ञने कहा-है शौनक ! जिस गङमहापुरागकों (अपनी माताको दासतासे मुक्त कराने के लिये ) अमृत प्राप्त ब्रह्मा और शिवनें भगवान् विष्णुसे, मुनिश्रेझ व्यासने ब्रह्मासे करनेमें भी उन्होंने सफलता प्राप्त की।

और मैंने झ्याससे सुना था, उसे ही इस नैमिषारण्यमें आप जिन भगवान् विष्णुकं उदरमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड विद्यमान सबको मैं सुना रहा है। इस गरुडमहापुराणके प्रारम्भमें हैं, उनकी क्षुधाको भी उन्होंने ( अपनी भक्तिसे) शान्त सर्गवर्णन तदनन्तर देवार्चन, तीर्थमाहात्म्य, भुवनवृत्तान्त, किया। जिनके दर्शन या स्मरणमाशरों सपका चिनाश मन्यन्तर, वर्णधर्म, आश्रमधर्म, दानधर्म, राजधर्म, व्यवहार, हो जाता है, जिस गारुडमन्त्रके यनसे कश्यप ऋषिने व्रत, वंशानुचरित, निदानपूर्वक अष्टाङ्ग आयुर्वेद, प्रलय, जले हुए वृक्षको भी जीवित कर दिया था, उन्हीं धर्म, काम, अर्थ, उत्तम ज्ञान और भगवान् विष्णुको हरिरूप गरुड़ने इस गरुङमहापुराणका वर्णन श्रीकश्यपसे मायामय एवं सहज लौंलाको विस्तारपूर्वक कहा गया किया था। हैं। भगवान् वासुदेवके अनुग्रहसे इस गड़महापुराणके हैं शौनक ! यह मद्गरुङमहापुराण अत्यन्त पवित्र तथा उपदेष्टारूपमें ऑगड़ सब प्रकारले अत्यन्त सामर्थ्यवान् हो पाद्ध करनेर सब कुछ प्रदान करनेवाला हैं। व्यासजींकों जाये और इसके चमें उन्होके मान सनर ने साँध नमस्कार का * यथासन से कह रहा है। स्थिति तथा प्रलपके कारण भी बन गये। देब्रोंको जीतकर उसको मुनें।

(अध्याय )

* पुराणं गारुप यक्ष्यै सारं विष्णुकथायाम्

सृष्टि-वर्णन रुजी बोले-हैं जनार्दन ! आप सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, रुद्धके रूपमें सम्पूर्ण जगत्को विनष्ट करते हैं। सृष्टिके समय मन्वन्तर एवं वंशानुचरित इन सबको विस्तारपूर्वक वे हौं वराका रूप धारणकर अपने दाँतोंसे जलमग्न वर्णन करे ।

पृथिको उद्धार करते हैं। है शङ्कर संक्षेपमें ही मैं श्रीहरिने कहा- हे रुद! सर्ग आदिके साथ ही देवादिकों का वर्णन कर रहा है। आप उसको सुनें। पापोंका नाश करनेवाली सृष्टि-स्थिति एवं प्रलयरूप भगवान् सबसे पहले उन परमैश्वरमैं महत्त्वक सृष्टि होती हैं। विष्णुकी सनातन क्रीडाका अब मैं वर्णन करूगा, उसको माह महत्त्व उ झसका विकार हैं। पञ्च तन्मात्राओं आम् सुने। ।।

(रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द)-की उत्पत्तिमै युक्त नरनारायण-रूपमें उपास्य वे वासुदेव प्रकाशस्वरूप द्वितीय सर्ग है। उसे भूत-सर्ग कहा जाता है। इन पश्च परमात्मा परब्रह्म और देवाधिदेव हैं तथा इस जगत्को तन्मात्राओं से पश्चियी, जल, तेज, वायु तथा आकाश-रूपमें सृष्टि-स्थिति एवं प्रलयके कता है। यह सब जो कुछ दृष्ट- महाभूतोंकी सृष्टि होती हैं। तीसरी बैंकारिक सर्ग है, अद्दष्ट हैं, उन भगवान्का ही व्यक्त और अव्यक्त स्वरुप (इसमें कर्मेन्द्रिय एवं ज्ञानेन्द्रियोंकी सृष्टि आती हैं इसलिये हैं। वे हो रु एवं कानपर्ने विद्यमान है। जिस प्रकार इसे पेन्द्रिह भी कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति शुद्धिपूर्वक भाक कीड़ा करता है, उसी प्रकार श्यरूपमें भगवान् होती है, यह प्रात-मार्ग है। चौथा मर्ग मुख्य-सर्ग है । पर्बत विष्णु और अल्प काल एवं पुरुष (निराकार और वृक्षादि धावको मुख्य माना गया है। पाँचौं सर्ग ब्रह्मा की क्रीड़ा होती हैं। उन्हीं तीलाकों आप तिंर्य सगं कहा जाता है, इसमें तिर्यकुलता’ (पशु पक्षी भी सुनें।

आदि) आते हैं। इसके पश्चात् ऊध्वस्त्रोतको सृष्टि होती है। उन परमात्मा परमेश्वरका आदि और अन्त नहीं है, वे इस छठे सर्गको देंव-वर्ग भौं कहा गया है। तदनन्तर सातौं । हों ज्ञातुको धारण करनेवाले अनन्त पुरुषोंनम हैं। उन्हीं सर्ग अवकुयोतका होता है। यहीं मानुष-सर्ग हैं। परमेश्वरसे अव्यक्त की उत्पत्ति होती है और उन्होंसे आत्मा आठ अनुग्रह नामक सर्ग है। वह सात्त्विक | रूप में उत्पन्न होता है। इस अध्यक्त प्रकृतिसं पाहि. और तामसिक गुजों में संयुक्त है। इन

बुद्धिसे मन, मनसे आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे तेज, बैंकृत-सर्ग और तीन प्राकृत-सर्ग कहे गये हैं। कौमार तेजसे जल और उनसे पृथिवीको उत्पत्ति हुई है। नामक सगं न सर्ग हैं। इसमें प्राकृत और बैंकृत दोनों हे कटू ! इसके पश्चात् हिरण्मय अण्ड उत्पन्न हुआ। झुष्ट्रिय विद्यमान रहती हैं। इस अगड़में में प्रभु स्वयं प्रविष्ट होकर झगजुकी सृष्टिके हैं ! देयोंसे लेकर स्थायरपर्यन्त चार प्रकार की सृष्टि लियें सर्वप्रथम आर धारण करते हैं। तदनन्तर चतुर्मुख की गयी हैं। सुष्टि करते समय ब्रह्मासे सबसे पहले) ब्रह्माके रूपमें शरीर धारणकर यज्ञोगुणके आश्रयसै इन्हीं मानसपुत्र उत्पन्न हुए। तदनन्तर देव, असुर, पितृ और देवने इस चराचर विश्वको मष्टि कीं।

मनुष्य-इम सर्गचतुष्टयका प्रादुर्भाव हुआ। देव, असुर एवं मनुष्योंसहित यह सम्पूर्ण जगत् इसी इसके बाद जल-सृष्टिको इच्छासे उन्होंने अपने मनको अमें विद्यमान है। में ही परमात्मा स्वयं अष्ट्रा [ ब्रह्मा- सUि-कार्यमें संलग्न किया। मुष्टि-कार्यमें प्रवृत्त होनेपर आज्ञापति के रूपमें जगत्को संरचना करते हैं, विष्णुपमें जगत्को अह्माले तमोगुणका प्रादुर्भाव हुआ। अत: सृष्टिको अभिलाषा रक्षा करते हैं और अन्तमें संहर्ता शिवके रूप में ही देव रखनेवाले ब्रह्माको जाले सर्वप्रथम असुर उत्पन्न हुए। हैं संहार करते हैं। इस प्रकार एकमात्र में ही परमेश्वर अह्माके दर! नदनन्तर ब्रह्माने उसे मोंगले झुछ शरीरका परित्याग में मुष्टि, विपके रूप पालन और कस्पानाके समय किया तो उस शौरसे निकली हुई तमोगुणकी माने स्वयं ३. जिनका सोहा { आहा- गंधार निर्यकु (वक होता हैं इन् ।

तिनता’ कहते हैं, इसलियं पशु-पक्षियों को निर्यांना कहा जाता है। | इ-के द्वारा छा गये अन्न-जल का इनके उदर (पेट }-में बळ देती-तिराही गनिमें संचन होता है। | : ‘ नीता शट देताका माफ है, क्योंकि इनका आहार संघान परक और होता है ।।

‘अबक्रनीता’ शब्द मनुगका बाधक है, क्योंकि इनका भार-मंथन भवझ नीचंकी भौर ) होता है।

 

# मानमसृष्टिवर्णन, दक्ष प्रजापतिद्धारा मिथुनधर्मसे सृष्टिका विस्तार

रात्रिका रूप धारण कर लिया। उस राज्ञिरूप सृष्टिको क्रोधक मात्रा अधिक होता है। तदनन्तर ब्रह्मासे गन्धर्वोको देखकर यक्ष और राक्षस बहुत ही प्रसन्न हुए। उत्पत्ति हुई। गायन करते हुए इन सभीका जन्म हुआ था,

हे शिव ! उसके बाद सत्त्वगुणको मात्रा उत्पन्न होनेपर इसलिये इन्हें गन्धर्व और अप्सराको ख्याति प्राप्त हुई। | अनापति ब्रह्म के मुख देंसता उत्पन्न हुए। तदनन्तर जब उसके बाद ज्ञापन झाके यक्ष:स्थानमें स्वर्ग और उन्होंने सत्त्वगुण-समन्वित अपने इस शरीरका परित्याग द्युलोक उत्पन्न हुआ। उनके मुख से अज, उद्दर-भागलें तथा किया तो उसमें दिनका प्रादुर्भाव हुआ, इमलियें रात्रि में पार्छ-भागमें गौ, पैर-भागमें हाथीसहिंत अवं, महिष, कैंट |सुर और दिनमै पक्षी आँधक शक्तिशाली होते हैं। इसके और भड़कों जपनि हुई। उनके होमोसे फ ल एवं | पश्चात् ब्रह्माके उस साविक शरीरसे पितृगको उत्पत्ति हुई। औषधियों का प्रादुर्भाव हुआ।

इसके बाद ब्रह्माके द्वारा इस साविक शरीरका गौ, अज्ञ, पुरूष-में मेंय ( पवित्र हैं। घोड़े, वर | परित्याग करनेपर संध्याको उत्पत्ति हुई जो दिन और और गदहे शम्य पशु कहे जाते हैं। अब मुझमें अन्य रात्रिके मध्य अवस्थित रहती है। तदनन्तर ब्रह्माके रजोमय पशुको सुन-इन बन्य जन्तुओंमें पहले श्वापद ( हिंसक शरमें मनुष्योंका प्रादुर्भाव हुआ। जब ब्रह्मानं उसका व्याघ्रादि) पशु, दूसरे दो बुराँवालें, तसरै हाथीं, चौथे बंदर, परित्याग किया तो उससे ज्योत्स्ना (प्रभातकाल) उत्पन्न पाँच पक्षौं, इ कादि जलचर और सातवें मसूप हुई, जो माक्सयाकै नाम ज्ञानी जाती हैं। ज्यत्सा, बात्रि, जीव (त्मन्न हुए हैं। | दिन और सन्ध्या- ये चारों उस ब्रह्माकै हौं शगैर हैं। उन अह्माके पूर्वाद चारों मुसे ऋक, मनु, साम । तत्पश्चात् अह्माके गुमाय शरीरके आवायसे शुधा तथा अ = इन चार वेदोका प्रादुर्भाव हुआ।। उन्हीं के

और क्रोधका जन्म हुआ। उसके बाद ब्रह्मासे हाँ मुखसे ब्राह्मण, भुजाओंसे क्षत्रिय, ऊर भागसे वैश्य तथा भूख-प्यास में आतुर एवं रक्त मांस पोने-जानेवाले राक्षसँ मैंने शुद्र उत्पन्न हुए। इसके बाद उन्होंने भ्राह्मणोंके लिये राधा चौकी उत्पत्ति हुई। राक्षसोंसे क्षणके कारण राक्षस’ ब्रह्मलोक, क्षत्रियोंके लिये इन्द्रलोक, बैंश्योंके लिये वायुलोक कहा गया और भक्षणके कारण अक्षकों अक्ष-नामझी और शूद्रोंके लिये गन्धर्वलोकका निर्धारण किया। उन्होंने प्रसिद्धि प्राप्त हुई। जद्दनन्तर, अझाके से सर्प उत्पन्न ही ब्रह्मचारियोंके लिये अलोक, धर्मनिरल गहलमका हुए। ब्रह्माके केश उनके सिर से नीचे गिरकर पुन: उनके पालन करनेवाले लोगोंके लिये प्राजापत्यलोक, सिरपर आज हो गये—यह सर्पण हैं। इसी सर्पग्ण वानप्रस्थाश्नमियोंके लिये सप्तर्षिलोक और संन्यास तथा गतिविध] -के कारण उन्हें सर्वं कहा गया। उसके बाद इच्छानुकुल सदैव विचरण करनेवाले परम तानिधियों ब्रह्माकै क्रोधमें भूतों का जन्म हुआ। इसीलिये इन प्लानियोंमें लियें अक्षमालकका निर्धारण किया। (अध्याय ४)

मानस-सृष्टि-वर्णन, दक्ष प्रजापतिद्वारा मिथुनधर्मसे सृष्टिका विस्तार श्रीहरिने पुनः कहा- हे रुद्र ! प्रशात ब्रह्माने परलोकमें आग्यप, सुकालिन, उपहूत एवं दीप्य नामक मात रहुनेवारनी मानस-प्रजाओंको सृष्टि के अनन्तर सृष्टि विस्तार पितृगण उत्पन्न हुए। इन बर्हिपदादि सन पितृगनॉमें प्रथम करनेवाले मानस-पुत्रको सृष्टि की। उनसे धर्म, रुद्र, मनु, तन पितृगण अमूर्तरूप और शेष चार मूर्तिमान् हैं। सनक, सनातन, भग, सनकुमार, रुचि, श्रद्धा, मरीचि, कमलयॉन ब्रह्माके दक्षिण अँगूठेसे श्वार्यसम्पन्न इक्षा अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्य, पुलह, क्रतु यसष्ठ और नारदका अज्ञापन और वाम गठसे उनकी भार्या का जन्म हुआ। प्रादुर्भाव हुआ। साथ ही वषद्, अग्निष्वात्त, क़व्याद, प्रज्ञापतने अपनी उस पत्नीके भंसे अनेक शुभ लक्षणोंवालों ३. शिरसे सम सोंग अपनी रक्षा कों, बह राक्षस हैं। इन इंगि उक्षणका आशय यह है जिनमें अपना क्षण — मान आभाषक हैं, में राक्षस है। ३. क्ष धनके देवता हैं । ॐ नॐ तिचे पुत्र होते हैं। भामा मुशाजा प्रक भाग हैं । अन धन प्रदान करने के लिये धनकी कामना करने वाले भको अपेक्षा ते इसी भगाउन पक्ष नाम अनाना चाहिये। यसका न भी हो सकता है। इसके लिये

 

| * पुराणं गारुडं वक्ष्ये मार विष्णुकथाश्रयम्  

कन्याओंकों उत्पन्न किया और उन्हें ब्रह्माकै मानस पुत्रों का दक्षकन्या स्वभाने पितरोंसे मेंना तथा वैत जामवालों समर्पत कर दिया। उन्होंने सती नामक पुत्रौंका विवाह दो पुत्रियको जन्म दिया। में दोनों कन्याएँ ‘ब्रह्मवादिनी’ | के साथ किया, उनमें झड्के असंख्य महापराक्रमणालौं । मैनाका विवाह हिमाचलके साथ हुआ। हिमाचलने | मुनाक पनि हुई।

मैनासे मैनाक नामक पुत्र उत्पन्न किया हा नाथा गौरी दक्ष असाधारण रूपबतौ सुन्दर लक्षणोंवाली याति (पार्वती)-नामसे प्रसिद्ध पुजकों उत्पन्न किया, जो पूर्वजन्ममें नामक पुत्री भृगुको समर्पित कीं, जिससे भगुके धाता और सती थीं। विधाता नामक दो पुत्र हुए। उसी यातिको भगवान् शिव ! तदनन्तर भगवान् ब्रह्मानें अपने ही समान नारायणकी ज्ञों को नामक पत्री हैं, उनकी भी उत्पन्न हुई। गुणवाले स्वायम्भुव मनुको जन्म दिया और उन्हें प्रजापाननके उन के गर्भसे हॉरने ‘बल’ और ‘उन्माद’ नामके दो कार्यमें नियुक्त किया। इन ब्रह्मासे व तरूपाका पुत्रोंको उत्पन्न किया है।

आविर्भाव हुआ। सवंर्वैभवासम्पन्न महाराज स्वायम्भुव मनुने महात्मा मनुके आयति और नियति नामवाली दो तपस्याके प्रभावसे परम शुद्ध तपस्विनी उस शतरूपा नामक कन्याएँ हुई, जिनका विवाह भागपुन्न धाता और विधाताके कन्याको पन्नीरूपमें ग्रहण किया, जिससे शिंपन्नत और साथ हुआ। उन दोनों एक-एक पुत्रका जन्म हुआ। उत्तानपाद नामक दो पुत्र तथा प्रसूति, आकृति और देवहूति आपतिके गुर्भसे धाताने प्राण और निर्यातक गर्भसे विधानाने नामाको नौन प्रक्रियका जन्म हुआ। इनमैसें मनुने आकृति । ‘मृकण्डु’ को उत्पन्न किया। उन्हीं मृकण्डुसे महान नामक कन्याका विवाह प्रजापति ‘चि’ के साथ किया।

मार्कण्डेयको उत्पत्ति हुई।

प्रसूति तथा देवहूति क्रमश: क्ष एवं कर्दमुनिको प्रदान | मरौचकौं पञौं सम्भूतिने पौर्णमास नामक एक पुत्रको की गयीं। जन्म दिया। उस महात्मा पौर्णमासके दो पुत्र हुए, जिनका कृचिसे यज्ञ और दक्षिणाका जन्म हुआ। यज्ञको नाम दिया और सर्वंग है।

दक्षिणाके बारह पुत्र हुए, ओं महाबलशालों ‘ याम’ (देवगन अङ्गिराने दक्षकन्या स्मृतसे अनेक पुत्र और सिनीवाल, विशेष }-के नामले प्रसिद्ध हैं। कुहू शका तथा अनुमति नामक चार कन्याओंको जन्म दिया। दक्ष प्रजापतिनं ( प्रविसे) चौबीस श्रेष्ठ कन्याओंकी | अनसूयाने अत्रिने चन्द्रमा, दुर्वासा एवं मोगी दत्तात्रेय उत्पत्ति की। उन कन्याओंमें श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, मुष्टि, नामक तोन पुत्रोंको उत्पन्न किया। पुलकी पत्नों प्रीति मेंधा, क्रिया, बुद्धि, लम्जा, यम्, शान्ति, ऋझ और कीर्ति सोती नामक पुत्र हुआ। प्रापति पुनकी पत्नी क्षमासे नामक जो तेरह कन्याएँ थीं, उनकी पत्नीकै रूपमें कमंश, अचार तथा सहामु नामक तीन पुत्र उत्पन्न हुए। दक्षिणाके मुन्न धर्म स्वीकार किया। इसके बाद शेष जो क्रनुकी पत्नी सुमतिसे साठ हजार बालखिल्य ऋषियको ख्याति, सतौ, सम्भूत, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सनत, पनि हुई। में सभी धरना, अनुप परिमाणवान्ने तथा अनुसूया. ॐ. स्वाहा और स्वधा नामक ग्यारह कन्या मेंदीयमान । । समान होनस्थ हैं।

. उनका विवाह क्रमश: मुनिष्ट भूरा, महादेव, मचि, वसिष्ठकी पत्नी से रज, गात्र, ऊध्र्वबाहु, झारण, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ, अग्नि और अनघ, सुतपा और शुक्र-यें सात पुत्र हुए। ये सभी पितृगणोंके साथ हुआ। सप्त में।

झाने काम, लक्ष्मीने इर्प, अत्तिने नियम, तुहिने संघ | ॐ हुए ! जस दक्ष प्रजापतिने शरीरधारी अग्रिको स्याहा तथा पुष्टिने लोभनों उत्पन्न किया। मैधासे झुलका तथा नामक मुजी प्रदान की थी। इस स्याहादेवाने अग्निदेव पावक, क्रिमासे दह, तन और विन नामक तन का जन्म पवमान तथा शुचि’ नामक ओजस्वी तीन पुत्रको प्राप्त किया। हुआ। अखिने बोधकों, लाजाने विनयकों, वपुर्ने व्यवसाय * पाक, अमन और शुचि नमक तीन अग्नि की गयी हैं। इनमें विपु-सम्बन्ध भएको ‘प्रावक तथा मन्थन उत्पन्न अग्निकों ‘वमान” कहा आता है और में यह सूर्य नमकता है। यहीं ‘शुचि’ (नमक) आणि लाता है।

विक: मामा शुचिरधि में अ: । निर्म; विमानः स्याद् इतः पावक; मृतः ॥ ६ तपते मूर्यः शुचिरग्निची अमृत:। बृर्मा , पूर्वीभाग १३ । १५-१६ आचारकापडू]

 

  • धुववंश तथा दक्ष प्रजापतकीं साठ कन्याओंकी सलानियों का वर्णन

एवं शान्ति क्षेमकों उत्पन्न किया। ऋद्धिसे सुख और तिरस्कारपूर्ण व्यवहारको देखकर उनसे न रहा गया और कॉर्तिसे यश उत्पन्न हुए। ये सभी धर्मके पुत्र हैं। उन्होंने वहींपर अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया। वे ही धर्मके पुत्र कामकी पत्नी का नाम रति हैं, उसके पुत्रको सातौं पुनः हिमालयसे मैनाकें गर्भमैं उत्पन्न हुई और हुर्घ कहा गया हैं।

गौरीकै नाममें प्रसिद्ध होकर शम्भुकों पत्री बनीं। तदनन्तर दक्ष प्रजापतिने किस समय अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान उनसे गणेश और कार्तिकेय हुए। (सतोके देहत्यागसे किया। उस यज्ञमें रुद्र और सतौके अतिरिक्त निमन्त्रित अत्यन्त कुद्ध महातेजस्वी भृङ्गीश्वर पिनाकपाणि भगवान् दक्षकै सभी जामाता अपनी पतियों के साथ उपस्थित हुए। शरने अज्ञका विध्वंस करके उस इभको अङ्ग शाप ऐसा देखकर बिना बुलायें हीं सती भी इस यज्ञमें जा दिया कि तुम ध्रुवके संशमें मनुष्य होकर जन्म ग्रहण पहुँचीं, किंतु वह अपने पिता दक्षके द्वारा किये गये करोगे। (अध्याय ५)

धुववंश तथा दक्ष प्रजापतिकी साठ कन्याओंकी सन्ततियोंका वर्णन | श्रीहरिने ( रुइमैं ) कहा – उत्तानपादकीं सुरुचि नामक जो पृथिवींका एकछत्र सम्राट् था। उसने लवण- समुद्रकी घल्लो उत्तम और सुनीति नामवालीं भायखें ध्रुव नामक पुग्न पुग्न सामुहीके साथ विवाह किया। इस माचनबाई में उत्पन्न हुआ, उनमें भुवने दें। नारदको कृपा प्राप्त सामुद्दीने दस पुत्रको जन्म दिया। ये सभी प्राचैतम नामवाले पर्देशकै द्वारा देवाधिदेव भगवान् जनार्दनको आराधना धनुर्वेद निष्णात हुए। धर्माचरणाने निरत रहते हुए इन लोगनें। करके भेष्ट स्थान प्राप्त किया।

दस हजार वर्षोंतक जलमें विमान होकर अत्यन्त कमि तपस्या धुवके महाबलशाली एवं पराक्रमशील लिट्ट नामका की । ( तपस्याकै प्रभावसे) प्रजापतिका पद प्राप्त करनेवाले उन पुत्र हुआ। इसमें प्राचीन नामक पत्रकी उत्पत्ति तस्वयोंका सिसाह मारिघा नामक कन्याको छ । हुई। इसमें उदारध नामक पुत्रने जन्म लिया। इसके शिवके शापसे ग्रस्त क्षनें इसी मारिया गर्भसे पुन: दिसञ्जय नामक पुत्र हुआ। इसका पुत्र दिनु हुआ। रिमुले जन्म ग्रहण किया। इसमें सबसे पहले चार प्रकारको चाक्षुष नामक मुत्रने जन्म लिया। उसने चाक्षुष मनुकीं माना जाऔंकों सृष्टि कौं, किंतु महादेंवके शाप न ख्याति प्राप्त की थी। उस चाक्षुष मनुसैं रुरु उत्पन्न हुआ। मानस संतानौंकों अभिवृद्धि नहीं हुई। अत: इन प्रजापति तदनन्तर उसके भी ऐश्वर्यसम्पन्न अङ्ग नामबाला एक पुन ‘स्त्री-पुरुष के संयोगसे होनेवालों मैथुन सृष्टिको इच्छा की। हुआ। उस मुन्नामें बैंण ( वैन)-ने जन्म लिया, जौं नास्तिक इसके बाद दक्ष प्रजापति वीणों पुत्री असिक्नके एवं धर्मच्युत था। मुनियोंके द्वारा किये गये कुशाघातसे उस साथ विवाह किया। इस आँसक्नौके गर्भमैं उन दक्ष अधर्मी वेनकी मृत्यु हुई। उसके बाद पुत्र प्राप्त करनेके हजार पुत्र उत्पन्न हुए। नारदके उपदेशों में सभी भित्रीको लियें तपस्वियोंने इसके झरु-भागका मन्थन किया, जिससे अन्तिम सीमाको जाननेके लिये निकल पड़े, किंतु पुन: एक न झा, जो अत्यन्त द्रा और गवर्णका । झापस नहीं आये।। मुनियोंने उससे कहा ‘त्वं निपद’ अर्थात् तुम बैठो। इसीं हैं र ! इस प्रकार उन हजार पुत्रोंके नष्ट हो जानेपर शब्दके कथनसे इसकौं निषाद नामक प्रसिद्धि प्राप्त हुई दक्षने पुनः हजार पुत्रको जन्म दिया। ये सभी ‘शअलाश्व’ और वह विन्ध्याचलमें निवास करनेके लिये चला गया। नामसे प्रसिद्ध हुए। उन लोगोंने भी अपने बड़े भाइयों । तदनन्तर उन मुनियोंने पुन: उस वैनकै दाहिने हाधका मार्गका हो अनुसरण किया। पुओंके ऐसे विनाशकों देखकर मन्थन किया। इस मन्थन-कर्म जैनको विष्णुका मानसरूप ( क्रुद्ध) इक्षने नारदको ज्ञाप ६ दिया कि ‘तुम्हें भी धारण करनेवाला पृथु नामका पुत्र हुआ। राजा पृथुने प्रज्ञाकों (पृथ्वीपर) ज्ञन्म लेना होगा। अत: नारद कश्यपमुनिक जीवन-रक्षाके लिये पृथिवाँका दोहन किया। उस पृथुराजाका पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए। अन्तर्धान नामक एक पुत्र था। उससे हविर्धान नामक इसके बाद दक्ष प्रजापतिने असिक्नीसे साठ रूपवती पुत्रको उत्पत्ति हुई। उस हविर्धानका पुत्र प्राचीनअर्हि हुआ, कन्याओंको जन्म दिया, जिनमॅसे उन्होंने दो कन्याका संवा ग प अ ३–

 

* पुराणं गारुई मध्ये सारं विष्णुकथा भयम्

विवाह ङ्गिराके साथ किया। उनके द्वारा दो कन्याएँ में तीनों लोकोंके स्वामी हैं। कृशाश्व, इस कन्याएँ धर्म, चौदह कन्याएँ कश्यप तथा कश्यपकी पत्नी अदिक्षिसे द्वादश सूर्योको उत्पत्ति हुई अट्ठाईस कन्याएँ चन्द्रमाको द गाय। हे महादेब ! इसके हैं। उन्हें विष्णु, शक, अर्यमा, धाता, चहा, पूजा, चिस्यान्, पश्चात् इक्षने मनोरमा, भानुमती, विशाला तथा बहुदा नामक सविता, मित्र, बरुण, अंशुमान् तथा भग कहा गया हैं। ये चार कन्याओंका विवाह अरिष्टनेमिके साथ किया। ही द्वादश आदित्य कहे जाते हैं।

दक्ष प्रज्ञापत्तनें कृशाश्वको सुप्रा और जया नामक रोहिणी आदि जो प्रसिद्ध सत्ताईस नक्षत्र हैं, ये सब कन्याओंकों प्रदान किया। अरुन्धती, वसु, यामी, नाम्या, सोम (चन्द्रमा) की पत्रिप है। दितिके गर्भसे हिरण्यकशिप भानुमती, मम्चती, सल्या, भूत, साध्या तथा विश्वा- और हिरण्याक्ष नामक दो मुत्र उत्पन्न हुए जुधा सिंहिक में धर्मकों दस पत्रिय हो गयी हैं। अब मैं कश्यापको नामक एक कन्या भौं हुई, जिसका विवाह विप्रचित्तिके पायॉक नामको भी कहती हैं, उनके नाम हैं- अदिति, साथ हुआ। हियकशिपुके महापराक्रमशानौ चार पुत्र हुए। दिति, दनु, काला, अनायु, सिंहिका, मुनि, कद्, साध्या, उनके नाम अनुवाद ( अनुवाद), द (हाद), प्राद ( प्रह्लाद) इरा, झोभा, चिन्ता, सुरभि और सगा।

तक्षा संवाद (संवाद) हैं। उनमें प्रहाद विमपरायण भके | हे कद ! (धर्मकी पत्नी) विश्वासे विश्वेदेव और साध्यासे रूपमें प्रसिद्ध हुए। संादके आयुष्मान्, शिव और वाष्कल साध्यगणोंकी उत्पत्ति हुई है। वहीं मरन्चानु ताधा नामक तौर पुत्र हुए। मादके पुत्र विरोचन हुए। विरोचनमें वसुसें (आठ) वसुगणोंका आविर्भाव हुआ। हे शर! बलिको उत्पत्ति हुई। हे वृषभवज्ञ ! बलके सौं पुग्न हुए, भानुसे (द्वादश) भानु और मुहूर्तासे मुहूर्तगणोंकी उत्पत्ति जिनमें आग सबसे ज्येष्ठ है। हुई। लम्बासे घोष तथा यामस नागवथिका जन्म हुआ और हिरण्याक्षके सभी पुत्र महाबलवान् थे। उनके नाम उत्कर, सङ्कल्पासे सर्वात्मक अल्पका भय हुआ। शनि, भूततापन, महाभ, माया तथा कारनानाभ है।

आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष तथा इनके द्विमूर्धा, शङ्कर, अयोमुत्र, शङ्कशिरा, कपिल, प्रभास-बै आठ असे माने गये हैं। आपके वेडि , श्रम, शम्बर, एक चक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भान श्रान्त और वन नामक चार पुत्र हुए। ध्रुव पुत्ररूपमें वृषपर्वा, पुलोमा, महासुर और पराक्रमी विप्नचित्त नामक भगवान् कालका जन्म हुआ, जो लोककै संहारक हैं। पुत्र विग्यात हुए। सोमसे पुत्ररूपमें भगवान् वर्चा हुए, जिनकी कृपासे हो स्वर्भानुको कन्या सुप्रभा तथा वृषपर्वाकी पुत्रीं शर्मिष्ठा मनुष्य बर्चस्थ होता है। मनोहराको धरके हुहिण, हुत थी। इसके अतिरिक्त उसे उपदानवों और हयज्ञारा नामक हव्यवह, शिशिर, प्राण और रमण नामवाले पुत्र उत्पन्न हुए। दो अन्य अॅट्स कन्याएँ हुईं।

अनिलको पञका नाम शिवा हैं। अनिल और शिवाले बैंशानरकों दो पुत्रियाँ । उनका नाम मुलौंमा तथा पुलमज तथा अविज्ञातगति नामके दो पुत्र उत्पन्न हुए। कालका धा। उन दोनों परम सौभाग्यशालिनीं कन्याओंका अनल (अग्नि)-के पुत्र कुमार हैं, जिनकी उत्पत्ति विवाह मोंचिके पुत्र कश्यपके साथ हुआ था। इन दोनों शरकाननपर हुई थौ । कृतिकाओंके पानित पुत्र होने इन्हें साठ हजार श्रेष्ठ दानाय उरपन्न हुए। कश्यपके इन पुत्रको कार्तिकेय भी कहा जाता है। इनके शार, विशास्त्र और पौलोम और कास्नकल कहा गया है। नैगमेय नामक तीन अन्य छोटे भाई भी हैं।

विप्नचत्तिके पुत्रों का जन्म सिंहिकासे हुआ। उनके – महरि देवताको प्रत्यूष नामक वनुका पुत्र माना गया नाम व्यंज्ञा, शल्य, बलवान्, नभ, महाबल, वातापि, नमुचि, हैं। प्रभासचन्मुसे मिपात देवशिल्पी बिश्वकर्माको जन्म इवल, समान्, अंक, नरक तथा कास्ननाभ हैं। हुआ। विश्वकांक मानला अजेंक माद, अहिर्बुध्न्य, मादक कुलमें निवाकवच नामक दैत्योंको इत्पत्ति हुई।

झा था पराक्रमी रुद-ये चार पुत्र हुए। टाके नामासे सत्यगुणासम्पन्न छ: कन्याओंका चन्म हुआ। उनके विश्वरूप नामक एक महातपस्वी बुन्न हुआ। हुर, बहुरूप, नाम शुकी, श्येनी, भास, सुग्रीव, शुचि और गधिका हैं।

म्यक अपराज्ञिन. वयापि, शम्भ, कपा, वन, शुकॉमें शुक, अनुक यं वरनझोंके प्रतिपक्षी कारि मृगपाध, ज्ञई और कपाली- ये ग्यारह ह कहे गये हैं। जुत्पन हुए। चैनौसै बॅन भासीमें भामा, गृष्टिका आचारकाङ]

 

दैवपूजाविधान, विष्णुपूजोपयोगी वज्रनाभमण्डल, विष्णुदा तथा लक्ष्मीपूजा

गृश्न (गध), शुचिसे जलचर पक्षिगग तथा सुग्रयीमें अश्व, उन मदगणोंमें एकज्योति, हिंज्योति, त्रिज्योति, चतुज्यौति. कैंट और गधौंका जन्म हुआ। इसको तामावश कहा एकशुक, हिशुक्र तथा महाबलशाली त्रिशुक्ल-इन सातौंका गया है।

एक गम हैं। ईक, सक्, अन्यादुक, प्रतिसक, मित, विनताके गर्भसे गरूड और अरुण नामक दो थियात समत, मुमत नामयाले मतोंका परम सम्पन्न पुत्र हुए। सुरसाके गर्भसे अपरिमित होजसम्पन्न सहस्त्रों दूसरा गम है। ऋतजन्, सत्यज, सुषेण, सॅनमन्, अतिमित्र, सपकी उत्पत्ति हुई। कइसे भी अत्यधिक तेजस्वी सहस्रों अमित्र तथा दूरमित्र नामक मस्तका तसरा अजय गण हैं। सर्ष हुए। इन सभी सर्पोमें प्रधान सर्प शेय, वासुकि, तक्षक, त, ऋतधर्म, हित, वरुण, व, विधारण और दुर्मेधा । शङ्ग श्वेत, महापद्म, कम्बल, अश्वतर, एलापत्र, नाग, नाम्याले मतोंका चौथा गम हैं। ईश, सक्ष, एतादृक्ष, कर्कोटक और धनञ्जय हैं। इस सर्पसमूहको क्रोधसे मताशन, एतेन, प्रसों और सुत नामक महातपस्वीं परिपूर्ण ज्ञानें। इन सभके बड़े-बड़े दाँत हैं।

मरुतका पाँच गरी है। हेमान्, प्रसव, सुरभ, नादिस्य, क्रोधाने महाबलौ पिशाचोंको ऊत्पन किया। सुरभिसे ध्यनर्भास, विक्षिप तथा सह नामबाला मरतोंका छा गया गायों और भैंसोंका जन्म हुआ। इसे समस्त वृक्ष, लता- है। युत, बसु, अनाधृष्य, लाभ, काम, यी बिराद् तथा वल्लरी और तृगकी उत्पत्ति हुई।

उद्वेषण नामका सातव वायु-गण (स्कन्ध है। ख़गासे यक्ष-राक्षस, मुनिसे (नृत्य-गान करनेवाली) में सभी उनचास मरुद्गण भगवान् विष्णुके हौ रूप अप्सराएँ तथा रिशमें परम सत्त्वसम्पन्न गन्धर्व उत्पन्न हुए हैं। राजा, दानव, दैव, सूर्यादि ग्रह तथा मनु आदि इन्हीं दितिसे मरुत् नामक उनचास देवका जन्म हुआ। श्रीहरिका पूजन करते हैं। (अध्याय ६} । | देवपूजा-विधान, विष्णुपूजोपयोगी वज्रनाभमण्डल, विष्णुदीक्षा तथा लक्ष्मी-पूजा श्रीहरिने कहा-हे रूद्ध! धर्म, अर्थ, काम और ईशानाय नमः-इन मन्त्रोंसे शिवकै पाँचों मुखको नमस्कार मोक्ष प्रदान करनेवाली सूर्यादि देवोंको पूजाका में वर्णन करना चाहिये। करता हैं। हे वृषभध्वज ! ग्रहदेवताओंके आसनकी पूजाकर इसी प्रकार विष्णुपुजामें 3 बासुदेवासनाय नमः मन्त्रको निम्न मन्त्रों भगवान् विष्णुके आसनकी पूजा करें और-

वासुदेवमूर्तये | नमः सूर्यमूर्तयें। ह्रां हीं सः सूर्याय नमः नमः। नमो भगवते वासुदेवाय नमः

सोमाय नमः मङ्गलाय नमः बुधाय नमः। नमो भगवते सार्वणाय नमः अं नमो भगवते बृहस्पतये नमः। शुक्राय नमः शनैश्चराय नमः। प्रद्युम्नाय नमः अः नमो भगवते अनिरुद्धाय नमः= राहवे नमः केतवे नमः॥ तेजाश्चाद्धाय नमःमें इन मन्त्रों के द्वारा साधक हरिके चतुहकों नमन करें। आसन, आवाइन, पासा, आय, आचमन, स्नान, वस्त्र, उसके मद्नारायणाय नमः तम नमः॥ यज्ञोपवीत, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नमस्कार, प्रदक्षिणा और चिच्यावे नमः नमो भगवते नरसिंहाय नमः विसर्जन आदि उपचारों को प्रदान करके सूर्यादि ग्रहको भूः नमो भगवते वहाय नमः पं यं चैनतेयाय पूजा करनी चाहिये ।।

नामः वं सुदर्शनाय नमः वं ठं कं घे गदायै हां शिवाय नमः मन्यसे आसनको पूजाकर 5 हो नमः वं नं नं नं माझजन्याय नमः वं श्रियै शिवमूर्तये शिवाय नम:-मन्त्रसे नमस्कार करें और साधक मामः गं को पुष्टी नमः। यं वं सं वनमालायै शिवपूजामें सर्वप्रथम हां हृदयाय नमः ही शिरसे नमः सं को यमाय नमः चे में ये कौस्तुभाय स्वाहा हैं शिखायै वषट् हैं कवचाय हुँ। नमः। गुरुभ्यो नमः इदिभ्यो नमः चिंक्सेना नैत्रत्रयाय वौषट्। हु अन्याय नमःइन मन्त्रोंसे पडङ्गन्यास नमःइन मन्त्रोंसे भगवान् श्रीहरिके अवतारों, आन्दुओं एवं करे। तत्पश्चात् ह्रां सद्योजाताय नमः वामदेवाय वाहन आदिको नमस्कार करते हुए उन्हें आसनादि उपचार नमः हं अघोराय नमः नन्पुरुषाय नमः ह्री प्रदान करने चाहिये।

 

पुराणं गाकई ये सारे विष्णुकवायम्

 है वृषध्वज्ञा! भगवान् विष्णुकीं शक्ति देवी सरस्वतीकों ( ॐ अग्नयै नमः मन्त्रसे) [ग्न, दक्षिण दिशामें ( मङ्गलकारिणीं मुशामें हीं सरस्वत्यै नमःइस मन्त्रसे अमाय नमः मन्त्रसँ) यम, नैऋत्यकोगमैं ( निताये नमः दैवी सरस्वतीको नमस्कारकर निम्न मन्त्रोंसे पडङ्गन्यास मन्त्रसे) निति, पश्चिम दिशामें वरुणाय नमः मन्त्रसे) | करना चाहिये– – —

| वरुण, वायुकोण ( वायवे नमः मन्त्रसे) वायु, उत्तर हां हृदयाय नमः शिरसे नमः हे शिल्लाथै दिशा ( कुबेराय नमः मन्त्रसे) कुबेर और ईशानकोणमें नमः कश्वास नमः हौ चैत्रत्रयाय नमः ह्रः ईशानाय नमः मन्त्रसे) ईशान नामक दिक्पालको | अन्याय नमः ।।

स्थापना करे। उसके बाद उन सभी देयक गन्धादि इसी प्रकार श्रद्धा, भाङ, कला, मेधा, तुष्टि, पुष्टि, प्रभा उपचारोंके हारा पूजा करनी चाहिये । इससे साधक परमपदको तथा माँत- ये शौं सरस्वतौदेयकी आठ शक्ति हैं, इनका प्राप्त हो जाता है। पूजन निम्न नाममन्त्रोंसे करें- .

हुरिने पुनः कहा रुद्! दीक्षित शिष्यको | अद्धायै नमः ह्रीं अथै नमः कलाबै वस्त्रसे अपने दोनों नेत्र बंद करके अग्निमें देवताके नमः। हीं मैधायै नमः। हीं तुयै नमः पुथै मूलमन्त्र एक सौ आठ आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये। नमः। हीं प्रभायै नमः। हीं मत्यै नमः। . हैं ! मुन्नलाभके लिये द्विगुण (दो सौ सौलह].

[इन शक्तियों की पूजा करनेके पश्चात्] क्षेत्रपाल, गुरु साधनासिद्धिके निमित्त त्रिगुण (तीन सौ चौबौस) और और परम गुस्का : अॅमपालाय नमः गुरुभ्यों मोक्षप्राप्तिको कामनामें देशिक (उपदेष्टा आचार्य }-कों नमः। परमगुरुभ्यो नमःइन मन्त्रोंसे नमस्कार करना चाहिये कि यह चतुर्गुण ( चार सौ बत्तीस) आहुति इस चाहिये।

विष्णु-मन्त्र प्रदान करें। तदनन्तर कमलवासिनी सरस्वतीयको आसनादि उपचार विद्वान् देशिकको सबसे पहले भगवानुका ध्यान करना प्रदान करने चाहिये। पूजनके अनन्तार सूर्यादि देवताओंके चाहिये । तदनन्तर में वायवी कला में बौद्ध-मन्त्र]-से लियें प्रयुक्त होनेवाले मन्त्रों में उनका पवित्रा करना शिष्योंकी स्थिति, आनेय कला र बाँच्च-मन्त्र-द्वारा चाहिये।

 

उनको मनस्ताप-वेदना तथा सारुण कला ( वे सौज-मन्त्र हुरिने कहा-हैं शिव! भगवान् विष्णुको विशेष से हृदयको स्थिति { धर्मको अभिरुचि)- का विचार करें । पुजाके लिये पाँच प्रकारके रंगोंसे बने हुए चूर्णके द्वारा इसके बाद शिकको उस मम सैंज्ञमैं आत्मतेला निक्षेप यञ्जनाभ-मण्डलका निर्माण करना चाहिये, जो सोलह करके जीवात्मा और परमात्माके हॅक्य अर्थात् अभेद समान कोकोसे संयुक्त हो।

ज्ञानका चिन्तन करना चाहिये । तदनन्तर में आकाश-तत्यमें | वज्रनाभ मण्डल अनाकर सबसे पहले न्यास करें और कार का ध्यानकर शरीरमें स्थित अन्य कारणभूत बायु, इसके बाद भगवान् श्रीहरिकी पूजा करें। हृदयके मध्य अग्नि, ज्ञान तथा पृथिवीं-तत्त्वज्ञा चिन्तन करें। इस प्रकार भगवान् विष्णु, कमें सर्पण, सिरपर प्रद्युम्न, शिखा- प्रणय (काद)-मन्त्रका चिन्तन करते हुए प्रत्येक कारणभूत भागमें अनिरुद्ध, सम्पूर्ण शरीर में ब्रह्मा तथा दोनों हाथोंमें तत्त्वोंपर जो साधक बिजय प्राप्त करता है, वह शरीरधारी श्रीधरका न्यास करें। तत्पश्चात् ‘अई विष्णुः” (मैं हाँ विष्णु होनेके कारण उस पञ्चमहाभुतके ज्ञानपी शरीरको ग्रहण कर हैं)-ऐसा ध्यान करते हुए पद्मके कणिका-भागमें भगवान् लेता है। अत: है वृषभध्वज! अपने अन्त:करणमें इस सूक्ष्म शौहाँका स्थापना की। इस प्रकार मण्डलके पूर्वमें सर्षण, शरीरधारी । क्षेत्रज्ञ) ज्ञानको उत्पन करके प्रत्येक माहाभूतको दक्षिणमें प्रद्युम्न, पश्चिममें अनिरुद्ध और उत्तरमें ब्रह्मक उसमें संयुक्त करनेका प्रयत्न करना चाहिये। स्थापना करें। तदनन्तर ईशानकोणने श्रीधर तथा युवांदि मण्लादिके निर्माणमें ज़ों लोंग असमर्थ हैं, ये मात्र दिशाओंमें इन्द्रादि देवकी स्थापन करना चाहिये। यथा- मानसमाहुलको कल्पना करके भगवान् हरिका पूजन पूर्व दिशा । ॐ इन्द्राय नमः मन्त्रसे) इन्द्र, अग्निकोणमें करें। [शरीरमें ब्रह्मतीर्थादिक कन्पना की गयी है।

 

* नयथ्यहोर्चनविधि, पूजानुकमनिरूपण

अतएव] उसी क्रममें यह (मानसमण्डल भी) चार आं हृदयाय नमः श्रीं शिरमें स्वाम। * * द्वारोंसे युक्त हैं। हाथकों पद्य तथा गुलियोंकों पद्मपत्र कहा शिखायै वषट्। ६ मैं कवचाय हुम्। ६ औं नेत्रत्रयाय | गया है। हथेलों इस पद्मकी कणिका है और न उसके वौषट् । ॐ अः अस्त्राय फट्।’: । | केशर हैं, इसलिये साधकको उस हाथरूप कमलमें सूर्य, साधनारत भक्तको अङ्गन्यास करके आसनसहत | चन्ह, इन्द, अग्नि तथा यमसहित औहरिका ध्यान करके महालक्ष्मी पूजा करनी चाहिये।

इसके बाद चार प्रकारके वर्षों से अनुरश्रित पद्मगर्भ उसके बाद वह दैशिक सावधान होकर अपने उस चार द्वार और चौंसह अकोसे युक्त मण्डुलके मध्य लक्ष्मी हाधकों शिष्पके सिरपर रखें, [ क्योंकि हायमें विष्णु और उनके अङ्गका तथा एक फोगमें दुर्गा, गण एवं विद्यमान रहते हैं, अतः] यह हाथ स्वयं विष्णु-स्वरूप हैं। गुरुका, तदनन्तर अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करनेके लिये तत्पर उस हाथके स्पर्शमात्र शिष्यके समस्त पाप विनष्ट हो जाते साधक अग्नि आदि कोगों में क्षेत्रपाल देबोंकी पूजा करके हैं। तदनन्तर गुरु शिष्यकी विधिवत् पूजा को और उस हुयन करे। तत्पश्चात् यह–’ में ई ई ई श्रीमहालक्ष्म्यै झियाका नामकरण करें।

नमः- इस महामन्त्रसे पूर्व उल्लिखित परिवार सहित | औहरिने ( रुइसे ) कहा-[ अब मैं] सिद्धि प्राज्ञ श्रीमहालक्ष्मीदेवीका पूजन करें। | करनेके दिन स्थग्नि आदि की जानेवाली श्रींलक्ष्मौकी तदनन्तर उस साधकको 4 सौ सरस्वत्यै नमः। “

पूजा के सम्बन्धमें कह रहा हूँ। सबसे पहले- ॐ श्रीं ह्रीं में सौं सरस्वत्यै नमः।”ॐ ॐ वद्ध वद वाग्वादिन म्यास, महालक्ष्म्यै नम:-यह कहकर, साधक-‘भां श्रीं में मैं भी ‘ॐ हीं सरस्वत्यै नम:’-इन मन्त्रको कहकर सरस्वतीकों श्र:’- इन बौंज्ञमन्त्रोंसे क्रमश: हृदय, सिर, शिखा, कवच, नमस्कार करना चाहिये। नेत्र और अस्वमें इस प्रकारको घडङ्गन्यास को  नम नवव्यहोर्चनविधि, पूजानुकम-निरूपण श्रीहरिने ( कइसे ) कहा-(गरुड्ने) कश्यप ऋषिकों हैं। ऐसा मानकर आत्मतत्त्वकै ध्यानमें निमग्न हो जाय। ज्ञों नायब्यूहकी पुजाका वर्णन सुनाया था, उसकों (अव) इसके बाद शरीर तथा हाथमें तीन प्रकारका मन्त्र-न्यास मैं कह रहा हूँ, आप सुनें।

करना चाहिये। पहले द्वादशाक्षर बीजमन्त्र, तदनन्तर कहे साधक सबसे पहले [योग-क्रिमाके द्वारा] वात्माकों में जमन्त्र न्यास और बाद घडन्यास की। इसमें | मस्तक, नाभि और [इयरूप] आकाश नामक तत्त्वमें साधक साक्षात् नारायणस्वरूप हो जाता है। साधक इक्षिण प्रविष्ट करें। तदनन्तर यह ‘ई’ (इस अग्निबन) मन्त्रसे अङ्गइसे प्रारम्भकर मध्यमा अङ्गलिपर्यन्त न्यास करें। | भौतिक शरीरका शोधन करे। उसके बाद वह उसके बाद वह पुनः मम भनिपर ही हो भन्ने यं (इस वाय) बीजमन्त्रसे उस सम्पूर्ण शरीरके लायकी न्यास करके पुनः शरीरके विभिन्न अङ्गपर न्यास करें। भावना करें। तत्पश्चात् वह लं’ इस बौंज्ञमन्त्रको चराचर क्रमशः हृदय, रि, शिखा, कवच, मुख, नेत्र, उदर और जगत्- के साथ उस विलौंन हुए शरीर)- सम्प्लायत पट्-भागसँ अङ्गन्यास करते हुए दोनों बाहु, दोनों हाथ, होनेकी भाबना करें। इसके बाद वह ‘वं’ इस बीजमन्यसे दोनों ज्ञानु और दोनों पैरॉमें भी न्यास करना चाहिये। पुनः स्वयंमें अमरत्वको भावना करें। तदनन्तर [अमृत] तदनन्तर अपने दोनों हाथों को कमबत् आकृति प्रदान असुफ बच ‘मैं हीं पीताम्बरधा चतुर्भुज भगवान् श्री करके उसके मध्य-भागमें दोनों अशकों नविष्ट करे । समस्त शरीरकी रक्षक आवक शुन्छ ‘अन्न की कल्पना दोनों हाथों की जाती हैं।

 

24 अकया 54 55 56 काम करून त्या कामका तत्पश्चात् उसी मुलाकृति परमतत्थस्थरूप, अनामय, सर्वेश्वर भगवान् केशामके पास हीं अस्थत विमनादि शक्तिको भगवान् नारायणका चिन्तन करे।

अष्टदल-कमलपर विन्यस्त करके न शक्तिको कणिका इसके बाद इन्हीं बीजमन्त्रोंसे क्रमश: तर्जनीं आदि स्थापित करें। अङ्गलियोंमें न्यासा करके यथाक्रम सिर, नैत्र, मुख, कठ, इस प्रकार यान करके उस साधक यौंगपटक हृदय, नाभि, गुळ, जानुहय तथा पादसमें भी न्यास विधिवत् पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् वह पुन: मनसे करना चाहिये।

भगवान् विष्णुका अङ्गसहित आवाहनकर [जस योगपीछमें । बौंजमत्रोंसे दोनों हाथों में न्यास तथा घडङ्गन्यास करके उन्हें] प्रतिष्ठित करें। तदनन्तर पुदि चारों दिशाओं में | सम्पूर्ण शरीरमें न्यास करना चाहिये। वह असे कनवा अवस्थित चतुईन-कमनपर हृदयादिन्या अङ्गलितक पाँच बीजमन्त्रोंसे न्यास करे। उसके बाद कमलके मध्यभागमैं तथा कोणोंपर अस्त्रमन्त्रका न्यास करें। हाथके मध्य-भागमें नेत्रके बीजमन्त्रसे न्यास करनेका अर्थात् उसके पूर्व दलमें ‘हृदयाय नमः, दक्षिण दलमें विधान है। अङ्गन्यासमें भौं इस क्रमसे हदय-भागमैं हृदय, शिरसे स्वाहा’ पश्चिम इसमें ‘शिखायै वषट् उत्तर इलामें | मस्तकमें मस्तक, शिख़ामें शिया, दोनों जन-प्रदेशमें ‘कवचाय हुम् मध्यमें नेत्रत्रयाय वौषट् तथा कोणमैं

कवच, नेत्रद्वयमें नेत्र तथा दोनों हाथोंमें अस्त्र-बीजमन्त्रको ‘अस्त्राय फट् कहकर न्यास करना चाहिये। अर्यास्यात करना चाहिये।

तत्पश्चात् पूर्वाद दिशाओं में यथाक्रम सङ्कर्षण आदिके । तदनन्तर उन्हीं बीजमन्त्रोंसे दिशाओंको प्रतिबद्ध करके बीजमन्त्रको विन्यस्त करनेका विधान है। तदनन्तर छह साधक पूजनकी क्रिया प्रारम्भ करें। सबसे पहले एकाग्रचित्त पूर्व और पश्चिम दिशाके द्वारपर ‘ॐ वैनर्जयाय नमः होकर उसको अपने हृदय योगपौडका ध्यान करना कहकर वैनतेयको प्रतिष्ठित करें। इसके बाद दक्षिण द्वारपर चाहिये। उसके बाद वह आग्नेयादिसे पूर्व दिशामें ‘ॐ सुदर्शनाय नमः’, ‘ महाराय नमः’ का उच्चारण यथाक्रम धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यको विन्यस्त करके करके हजार अरोंवाले सुदर्शन चक्रको वह स्थापना करें। पुदि दिशाओं में अधमांदिका न्यास करे। था= अग्निकोणमैं तदनन्तर दक्षिण द्वारपर “ॐ अिझै नमः’ मन्यसे भीका व्यास 13. धर्माय नम:’, नैत्यकोणमें ‘ॐ ज्ञानाय नमः’, सायुजमैं करके उत्तर द्वारपर ‘ॐ लक्ष्म्यै नमः’ मन्त्रझैं लक्ष्मौकों ‘ वैराग्य नमः’ और ईशानकोणमें ‘ॐ ऐश्वर्याय नमः’, प्रतिल्लित करे। पूर्व दिशामें ‘ॐ अधर्माय नमः’, दक्षिण दिशामें ‘ॐ साधकको इसके बाद उत्तर दिशामें ‘ॐ गदायै नमः अज्ञानाय नमः’, पश्चिम दिशामें अवैराग्याय नमः’ तथा मन्त्रसे गदा, कोणोंमें ‘ॐ शायै नमः’ मन्त्रसे शङ्का वृतरे, दिशामें ‘ॐ अनैश्चर्याय नम:’ कहकर न्यास करें। व्यास करना चाहिये।

साधक इस प्रकार इन न्यास-विधियोंसे आच्छादित तत्पश्चात् उन बिष्णुदेवकै दोनों ओर आयुधका न्यास अपने शरीरको आराध्यका पीट और स्वयंकों उसका अग्नी चाहियें। विद्वान् साधक दक्षिणक और शाङ्ग ( धनुष) स्वरूप समझकर पुर्वाभिमुख उन्नत अवस्थामें स्थिर होकर तथा देयके चाय और इषु (बाणों)-का न्यास करें। इसी अनन्त भगवान् विष्णुको अपनेमें प्रतिष्ठित करें। तदनन्तर प्रकार दोनों भागने खड्ग और चर्मको न्यास करे। ज्ञानरूपी सरोवरमें उत्पन्न ऊपरी ओर उठौं हुई फकासे तदनन्तार, यह साधक मलके मध्य दिशाभंदके युक्त शतपत्राने आठौं दिशाओं में प्रसरित चैत आदल- अनुसार मुवादि दिशाओं में इन्दादि लॉकपालको प्रतिष्ठित कमलका ध्यान करे ।।

करें और उनके आयुधोंको भी रथापित करें। उसके बाद । तत्पश्चात् साधकको ऋग्वेदादिके मन्त्रॉसे सूर्य, चन्द्र विहान् साधकको ऊपरक और ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’ मन्त्र तथा स्वरूप महुलका क्रमश: एकके ऊपर एकका ब्रा तथा नौचैक और ‘ॐ अनन्ताय नमः’ मन्त्रले ध्यान करना चाहिये। उसके आद वह वांदि दिशाओंमें अनन्तका न्यास करना चाहिये।

 

नवव्यूार्चनविधि, पूजानुकमनिरूपण

इस प्रकार साधक सभी देवका न्यास एवं ध्यान करके अद्ययानि ब्रह्मा, ‘** हुँ विष्णये नमः’ मन्त्रसै विष्णु, ‘ क्षी उनको पूजा को और उनके सामने उनकी ही मुद्दाका सिंहाय नमः’ मन्त्रको नरसिंह तथा ‘ॐ भू: महाराहाय प्रदर्शन करें। अञ्जलिबद्ध होना प्रथम मुद्रा है। इसके नमः’ मन्त्रसे आदिवराहका पूजन करे। प्रदर्शनसे शीघ्र ही देवसिद्धि हो जाती है। दूसरी यन्दिन उपर्युक्त इन नौ देवताओं (वासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न, मुद्रा है और तीसरी मुद्रा हुदयासका है। इस मुद्रामें अनि, नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, नरसिंह तथा महाराह बायें हाथको मुट्ठीसे दाहिने हाथके अँगूठेको बाँधकर (नवव्यूह)-का वर्ण क्रमश: औत, अरुण, हरिद्रावत् पौत, बायें हाथके अँगूठेकों ऊपर जायें हुए इदयभागसे सलान नल, श्यामल, लोहित, मेघवत् श्याम, अग्निवत् मत एवं रखना चाहिये। पह-पूजामें मूर्तिभेदसे इन तीन मुद्राओंको मधु पिङ्गल हैं। अर्थात् बासुदेव श्वेत, बलदेव अरुण, प्रद्युम्न साधारण मुद्दा माना गया है। दोनों हाथोंमें अँगूठे हरिंद्रावत् पीत, अनिरुद्ध नौल, नारायण श्याम, ब्रह्मा कनिष्ठापर्यन्त तीन अंगुलियोंको नवाकर क्रमशः उन्हें मुक्त बक्ताभ, विष्णु मैघयत् श्याम, नरिसंह नवत् पाँच तथा करनेमें आठ मुद्राएँ बनती हैं।

वराहदेव मधु पिङ्गल वर्णकी तेजस्वी आभासे सुशोभित दोनों हाथोंके अँगूसे अपने-अपने हाथको मध्यमा, रहते हैं। अनामको तथा कनिष्ठा अँगुलियोंको नीचेक और झुकाकर . ( 5 ) # टं पं र्श बजामन्त्रसे गरुड, ‘( ) जं छ जों मुद्रा बनायी जाती है, उसको नरसिंह- मुद्रा’ कहते हैं। मैं’ बीजमन्त्र सुदर्शन , ” ॐ यं चे फं पं’ बीजमन्त्रले दाहिने हाथके ऊपर बायें हाथकों उत्तान स्थितिमें रखकर गदादेवी, ‘(ॐ) वं लं में से बीजमन्त्रसे शङ्ग’ ) में प्रतिमाके ऊपर धरे-धीरे घुमानेको ‘बाराही मुद्दा’ कहते हं भं है बौद्भमन्त्रमें श्रीलक्ष्म, ‘( ) गं ॐ वं हो हैं। भगवान् वाराहकों सदा ही यह प्रिय हैं। दोनों मुडिको शमन्य पुष्टि, ‘। ॐ वं वं मन्यसे वनमाला, उत्तान रखकर क्रमशः एक-एक अंगुल सौधे खोलते ‘( ॐ) इं सं’ बीजमन्त्र श्रीवत्स और ‘( ॐ ॐ ई पं में हुए सभीको खोल दें। तदनन्तर उन सभी अँगुलियोंकी बीजमन्त्रसे कौस्तुभमगि युक्त हैं। [इसके अतिरिक्त] मैं पुनः मुद्दा बाँध लें। यह ‘अङ्गमुद्रा’ कहलाती हैं। साधकको स्वयं अनन्त (विष्णु) हैं। सभी उस देवाधिदेव विष्णुके इन मुद्राओंका प्रदर्शन क्रमशः दसों दिक्पालोंके लिये अङ्ग हैं। .. . – करना चाहिये।

गरुड़ कमलके समान लान, गदा कृष्णवर्ण पुष्टि शिरीष भगवान् बासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध पुष्परंगके समान आभासे समन्वित तथा लक्ष्मी सुबर्ण क्रमश: प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ देवस्थानके कान्तिसे सुशोभित हैं। शङ्ख पूर्ण चन्द्रकी क्रान्तिके समान श्वेत अधिकारौ दैव हैं। साधकको- ‘ॐ अं वासुदेवाय नमः’ और कौस्तुभमणि नवोदित अरुणके सदृश वर्णवाला हैं। चक्र मन्त्रसे वासुदेव, ‘४ ओ बलाय नम:’ मंन्से बलराम, “ॐ सहस्र सूर्योकी कान्तके सदृश और वत्स कुन्द पुष्पके अं प्रद्युम्नाय नमः’ मन्यसे प्रद्युम्न तथा ‘* : अनिरुद्धाय समान श्वेत हैं। वनमाला पाँच घणसे युक्त पञ्चव और नमः’ मन्त्रमें अनिरुद्धकी पूजा करनी चाहिये। अनन्त भगवान मैंघकी भाँति श्याम वर्णका हैं। जिन अस्त्रों कार, तसत्, हूं, औं तथा भू-ये पाँच क्रमश: रंगोंका वर्णन यहाँ नहीं किया गया है, ये सभी विद्युत् नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, नरसिंह और महावराह भगवान् कान्तिके समान हैं । ( भगवान् विष्णुके इन समस्त अङ्गको) बीजमन्त्र हैं, इसलिये साधक- नारायणाय नम:’ ‘मुखौंकाक्ष’ नामक विद्यासें अर्थ्य और माद्यादि समर्पत मन्त्रसे भगवान् नारायण, ‘ॐ तत्सद् ब्रह्मणे नमः’ मन्त्रों करने चाहिये। (अध्याय ११)

 

* पुराणं गारुडं वक्ष्ये मारे विष्णुकधाश्रयम्

पूजानुक्रम-निरूपण औहरिने कहा-है रूह ! देव पूजनका जो क़म है, ( 5 ) तं इन्द्राय सुराधिपतये नमः । (३) अग्नये उसके ज्ञानके लिये पूजाविधिके क्लमकों कहा जा रहा है। तेजोंधपतयें ( नमः । ॐ ) यमाय धर्माधिपतये नमः ।। सर्वप्रथम साधकको ‘ॐ नमः’ मन्त्रसे परमात्माका स्मरण ( वं नैर्वताय रक्षभिपतयें ( नमः । ॐ यं वरुणाय करना चाहिये। तुदनन्तर बहू से ३ ब म्इन चीजमन्त्रोंके जानाधिपतघं । नम: । ) यों वाय प्राणाधिपतयें ( नमः ।। द्वारा शौंरक शुद्ध करके ‘ॐ नमः’ इस मन्त्र चतुर्भुज ( ६ ) ध धनदाय अनाधिपतये ( चमः ।( ) हां ईशानाय भगवान् विष्णुके रूपमें हों अपनैको मान लें। विद्याधिपतये ( नमः । ।

तत्पश्चात् करन्यास तथा देहन्पास करे। तदनन्तर इसके बाद क्रमशः पूर्वोक्त इन्द्र आदि दिक्पाल हृदयमें योगपीठक पूजाका विधान है। जिसकों इन देवताओंके निम्न आयुधको प्रणाम करने का विधान है

सम्राय ( नमः ] शाक्यै नमः अनन्ताय नमः माय नमः शनाय नमः दास : ] [ ] नाच ( अमः [ ] पाशा | वैराग्याय नमः ऐश्वर्याय नमः माँय नमः नमः वायै नमः ( 4 ) गदायै नमः

अज्ञानाय नमः आवैराग्याय नमः अनैश्वर्याय नमः [] त्रिशूलाय ( नमः पद्माय नमः आदित्यपपडलाय नमः चन्मपलास इसके बाद भगवान् अनन्त तथा अह्मदेवको इस मन्त्रको नमः। वझिमण्डलाय नमः विमलायै नमः। प्रणाम रे उत्कण्यै नमः ज्ञानायै नमः क्रियायै नमः { ) ले अनन्ताय पातालापतये ( नमः ।। ( ) योगायै नमः। प्रयै नमः सत्यायै नमः। ईशानायै स्त्र अह्मणे सर्वलोंकाधिपतये नमः ।। नमः सर्वतोमुख्यै नमः साझेपाङ्गवास हासनाय नमः। अब इसके बाद साधक भगवान् घामुदेबको नमस्कार

 

इसके बाद साधक कणिकाकें मध्यमें ‘अं वासुदेवाय करनेके लिये द्वादशाक्षर-मन्त्रको प्रयोग करें, साथ ही नम:’ कहकर भगवान् वासुदेवकों नमस्कार करके निम्न द्वादशाक्षर-मन्त्रकै बीजमन्त्रों और दशाक्षर-मन्त्र बौद्ध मन्त्रासे यादिन्यास करे मन्त्रोंको इस प्रकार नमस्कार करे आ पाय नमः । शिरसे नमः शिखायै नमः नमो भगवते वासुदेवाय नमः। कवाचाय नमः नेशासाय नमः आः म्याचे नमः नमः ने नमः नम: शं नमः। तदनन्तर– ‘आं सर्मणाय नमः अं प्रद्युम्नाय नमः अः गं नमः वं नमः नमः खां नमः हूं निहाय नमः : नारायणाय नमः तत्सतपणे नमः। नमः नमः। वां नमः यं नमः मः * हुई विप्पाचे नमः नर्सिाय नमः भूर्वराहाय नमः।इन नं नमः नमः नां नमः। रां नमः यं मन्त्रोंसे संकर्षण आदि अहदेवकों नमस्कार करे। नमः। शां मः यं मः।

तत्पश्चात् साधक निम्न मन्त्रों से भगवान् विष्णुके वाहन हादशाक्षर-म- * नमो भगवते वासुदेवाय, इक्षर एवं आयुधादिकों नमस्कार को मन्त्र- ॐ नमो नारायणाय नमः तथा अष्टाक्षर-मन्त्र ‘कं टं ज्ञं शो वैनतेयाय ( नाम: । ॐ यं सं सुदर्शनाय पुरुषोत्तमाय नमः- इन मन्त्रौंका यथाशक्ति ज्ञघ करके निम्न । ममः । । चे फ चे गदायै ( मम्: ।। च ल में से पाजन्याय मन्त्रसे भगवान् पुण्डरीकाक्षको नमस्कार – ( नमः । ईभ हे अिझै ( नमः ।। 1 ई में शं पुष्टी हूँ ममः । नमस्ते बुद्धरीकाक्ष नमस्ते विद्मभावन। धं यं यनमाला ( नमः ।। ई श श्रीवत्साय ( नमः । ॐ ई यं सुबाप्य नमस्तेऽस्तु महापुरुष पूर्वज ॥ कौस्तुभाय [ नमः । शं शाङ्कय ( नमः । ॐ धभ्यां हे पुण्डरीकाक्ष ! (कमलनयन) आपको नमस्कार है। ( नम: । च्चे चर्मणे ( नम: । ग्यं गाय । नमः । ॐ विश्वके कारणभूत ! आपको मेरा नाम है । हे ब्राह्मण्यदेव ! । तत्पश्चात् इन बीजमन्त्रों में इन्द्रादि दिक्पालको नमस्कार आपको नमस्कार है। हे महापुरुष ! हे पूर्वज !

 

* विमापारस्तोत्र

इस प्रकार भगवान् विष्णुको स्तुति करके साधकको वासुदेव और उन सभी देवोंका विसर्जन करें हुवन करना चाहिये। तदनन्तर साधक (महापुरुषविद्मा ‘गच्च गच्छ पर स्थान अत्र इँवों, निरञ्जनः ।। नामक) मन्त्रका विधिपूर्वक एक सौ आई आर जप करके गच्छन्तु दैवताः सर्वाः स्वस्थानस्थितिहेतवें ।’

अ प्रदान करें और ‘जितं तेन (यह स्तोत्र ही महापुरुषविह्या है देवाधिदेव भगवान् वासुदेव ! अब आप इस अपने है। इसी स्तोत्रमें उन भगवान् नारायणको प्रारम्बार प्रणाम परम स्थान प्राप्त करें, हॉपर निर्मल (प्रकाशकास्वरूप करना चाहिये।

परम ब्रह्मका निवास हैं। अङ्गदेव, सङ्कर्षणादि और इन्द्रादि । तत्पश्चात् [अग्निी स्थापना करके] साधक उसे दिक्पाल ! आप सभी देव अपने-अपने धान में निवासा अग्निदेवको पूरा करनेके बाद हवन करें। अपने (अथाविहित) करनेके लिये प्रस्थान करें।’ बीजमन्यसे देवाधिदेव भगवान् विष्णु तथा अङ्गमन्त्रों द्वारा सुदर्शन, श्रीहरि, अच्युत, त्रिविक्रम, चतुर्भुज, वासुदेव, अच्युताई आङ्गिक देवताको आहुति प्रदान करें। सबसे प्रद्युम्न, सङ्कर्षण और पुरुषसे युक्त देवोंका (एक जो समूह पहले मन्त्रविद् साधकको कुण्ड में कारकै हारा [ तीन है उसे) नवव्यूह माना गया है। इसमें इस परम तत्वका वैखाका ] उल्लेखन करना चाहिये और उसके बाद ओंग होने से यह इशारत्मक कहा जाता है। इसी नब में यज्ञकुण्डूका अभ्युक्षण करना चाहिये। तदनन्तर यथाविधि नरुद्ध तथा अनन्तका संनिवेश होनेसे यह एकादश व्यूह भामापूर्वक वनकुड़में न स्थापित करके उत्तम फल द्वादशात्मक कहलाता है।

आदिमें सर्वाधि उसकी पूजा करनी चाहिये। अनि चाक्नॉमें बम प्रधान देशको मना नेपार वाह पहले साङ्गपाङ्ग देय अझका मनमैं ध्यानकर महलमैं (साधकके घर आदिको रक्षा करता हैं । अतः निम्न उन सभीको स्थापित करें। तदनन्तर वह साधक वासुदेंव- मन्त्रोंमें चक्लादिक अशा करनी चाहिये मन्त्रमें एक सौ आठ बार आहुति दें। तत्पश्चात् वह सङ्कर्षण चक्राय स्वाहा। ॐ विचाय स्वाहा। सुबकाय आदि देवकै बीजमन्त्रसे उन छ: दैवको भी पूजा करके स्वाहा । ॐ महाचक्राय स्वाहा । ॐ अमुरातत् ई फट्। ६ अङ्ग ईमताभको नौन-तीन और दिक्पालको एक-एक में सवार हो । आहुति प्रदान करें। इसके बाद वन पूर्ण होनेपर साधकको उपर्युक्त मन्त्रोंमें की गयी पुजा द्वारकाचको ज्ञा पुनः एकाग्रचिन स्थित होकर पुमति देनी चाहिये। काही जाती हैं। इस प्रकार सम्पन्न की गयी चक्रको पूजा

ज्ञदनन्तर वह साधक चासे अतीत उस परमात्मा में “घर” सब प्रकार में रक्षा करनेवाली तथा मङ्गलदायिनी अपने आत्माकों सीन करें और निम्नलिखित मन्त्रमें हैं। (अध्याय १३) ।

विष्णुपञ्चरस्तोत्र | श्रीहरिने पुन; कहा-हैं ह ! अब मैं विष्णुपञ्जर नामक प्रतींच्र्या वृक्ष मां विष्णों त्वामहं शरणं गतः । स्तोत्र कहती हैं। यह स्तोत्र ( बड़ा हीं) कल्याणकारौं हैं। मुसलं शातनं गुह्म पुण्डरीकाक्ष रक्ष माम् ॥ उसे सुनें उन्म जगन्नाच्च भवानं शरणं गतः ॥ प्रवक्ष्याम्यधुना ह्येतद्वैमात्रं पञ्जर शुभम्। स्याङ्गमादाय चार्माश्च अज्ञस्मादिक हुने । नमो नमस्ते गोविन्द चक्रं गृह्य सुदर्शनम् ॥ नमस्ते रक्ष रक्षन ऐशान्यां शरणं गतः। मायां भास्छ म विष्णो सामई शरणं गतः ।  मानन्यं महाशमनुधोयं च मनम् ॥ गदां मोदी गुह्म पद्मनाभ नमोस्तु ते ।। ग्रा पक्ष म चिया आग्नेय्यां शुक” । याम्यां रक्षस्य मां सिष्यों त्वामहं शरणं गतः । चन्द्रमा समागम इगं चाइमस गया। हलमादाय सौनई नमसे पुरुषोभम् । नैनात्यां मां च पक्षस्व दिव्यमर्ने जुर्मारिन्। ३. ‘अक्षण’ नसके द्वा। पत्र कनेको शुक पोंग विधि हैं। ३. ‘पर’का अर्थ है- एक्षक । या चिम्का न हम सपका का है इसलिये ‘सिम्प प्नान’ कहा जाता है। ३. वामन्चून अध्याय १६ के अनुसार ‘

घ र’ पार इचित है।

 

* मुराणं गारुडं वक्ष्ये सारं विष्णुकधाश्रयम् +

वैज्ञग्रर्ती सम्प्रगृह्य श्रीयन्स कपभूषणम्॥ दैत्यविनाशक! मैं आपको शरणमैं हैं। हैं यज्ञवह (महावराह ! वायव्य रक्ष मां देव हयग्रीव नमोऽस्तु ते । । आप माझज्ञन्य नामक महाङ्ग और अनुघोष (अनुबोध वैनतेयं समाका न्वन्तरिक्षं ज्ञानार्दैन। नामक पद्म ग्रहणका अग्निकोणमें मेरी रक्षा करें। हैं। माँ रेक्षम्याजित सदा नमस्तेऽस्यपराजित। विष्णों! मैं आपकी शरणमें हैं। आप मेरी रक्षा करें। हे विशालाक्षं समाकम रक्ष मां त्वं मातले ।। दिव्य-शरीर भगवान् नृसिंह! आप सूर्यके समान देदीप्यमान अकृपा’ नमस्तुभ्यं महामन नमोऽस्तु हैं। और चन्द्धके समान चमत्त खड्गक धारकर चिित्रकोण काशीर्षाच्चङ्गुलीषु सत्य त्वं बाहुपञ्चरम् ॥ मेरी रक्षा करें। हे भगवान् हुअग्रव! आपको प्रणाम हैं। कृत्वा रक्षस्य मां विश्गों नमस्तें पुरुषोत्तम। आप वैजयन्ती माता तथा कप्में सुशोभित होनेवाले एतदुतं शराय वैष्णवं पञ्जर महत् ॥ श्रीवत्स नामक आभूषणसे विभूषित होकर वायुकोणने पुरा रक्षार्धमाशोन्याः कायामन्य यूपध्वाच।। मेरी रक्षा करें । हे जनार्दन! आप वैनतेय गरुडपर आरूढ़ नाशयामास सा पैन चामरं महिषासुरम् ॥ होकर अन्तरिक्ष में रक्षा करें। है अजित ! है अपराहत ! दानव रक्तबीजं च अन्यांश्च सुरकण्टकोन्। आपको सदैव मॅरा प्रणाम है। हैं कुर्मराज! आपको नमस्कार । ६३ । – Y४) महाविष्णों ! आप अपनी बाहकों पञ्जर ( रक्षक)- जैसा है गोविन्द ! आपको नमस्कार है। आप सुदर्शनचक्र स्वीकार करके हाध, सिर, अङ्गलों आदि समस्त अङ्ग लेकर पूर्व दिशा में क्षा करें। हैं विमों ! मैं आपक उपाङ्गसे युक्त मैं शरिरक रक्षा करें । हैं पुरुषोत्तम ! आपकों शरणमें हैं। है पद्मनाभ! आपकों में नमन हैं। आप अपनी नमस्कार हैं। कौमोदकी गदा घाणका दक्षिण दिशामें मेरी रक्षा करे । है है वृषध्यन्न ! मैंने प्राचीन काल सर्वप्रधम भगवती विष्णो! मैं आपकी शरणमें हैं। हे पुरुषोत्तम! आपको मेरा ईशानी कात्यायनीकी रक्षाके लिये इस विष्णुपञ्जर नामक प्रणाम है। आम नन्द नामक हला लैंकर पश्चिम दिशामें स्तोत्रको कहा था। इसी स्तोत्रकै प्रभावले उस कात्यायनीने मेरी रक्षा करें। हे विष्णों! मैं आपकी शरशमें हैं। हैं स्वयंको अमर समझनेवाले महिषासुर यीज और देवताओं पुण्डरीकाक्ष ! आप शातन नामक मुसल हाथमें लेकर उत्तर लियै कष्टक बने हुए अन्यान्य दानवोंका विनाश किया था। दिशामें मेरी रक्षा करें । हे जगन्नाथ ! मैं आपको शरणमें हैं। इस विष्णुपार नामक स्तुतिका जो मनुष्य भक्तिपूर्वक जप हे हों ! आपको मेरा नमस्कार है। आप खड्ग, चर्म (द्वान करता है, वह सदा अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करनेमें

आदि अस्त्र-शस्त्र प्रहणकर ईशानकोणमैं मेरी रक्षा करें। है सफल होता हैं। (अध्याय १३

ध्यान-योगका वर्णन | औहरिने पुनः कहा- अब मैं भोग तथा मोक्ष प्रदान में ही विष्णु हैं, मैं ही सभीका ईअर हैं, मैं हीं अनन्त करनेवाले योगको कह रहा हूँ। यौगियोंके द्वारा ध्यानगम्य हैं और मैं हौं छ; र्मयों’ (शोंक, मोह, वारा, मृत्यु, क्षुधा जो देव हैं, उन्हें ही ईश्वर कहा जाता है। हे महेश्वर ! उनके एवं पिपासा) से रहित हैं। मैं ही वासुदेव हैं, मैं ही जगन्नाथ लिये किये जानेवाले योगको सुनें । यह योग समस्त पापोंका और ब्रह्मरूप हैं। मैं ही समस्त प्राणियोंकि शरीरमें स्थित हुनेवाला विनाशक है। योगीको आत्मस्वरूप परमात्माकी स्वसंमें इस आत्मा औंर सर्वदैविमुक्त परमात्मा हैं। मैं ही शरीरधर्मको प्रकार भावना करनी चाहिये

| हत, वार” (समस्त प्रप), अक्षर (कुटस्थ चेतन भोक्ता)-से १. विशालाक्ष- वंशविशेष (शब्दकल्याइन)।

 

।। अकृपाकुर्मराज मंदिनीकोशा) ।।

. “शोरूमोही रामन्यू क्षुत्पिपासे मन:’ (शब्द्दकल्पद्रुमः: सवाणि भूतानि कुटम्य: उपते गत 4 अनुसार समक्ष प्रयङ्का क्षर हैं।अक्षरका अर्थ फुट है। बौधरमरम्यान | “कुरम्य वा 4G चेतन भक्त किया है।

अतीत, मनके साथ पाँच इन्द्रियोंमें मूल शक्तिरूपसे स्थित मैं रहित हैं और अहंकारजन्य विकारोंसे भी मैं रहित हैं। स्वयं अतीन्द्रिय (इन्द्रियोंमें अग्ना) होता हुआ इण, श्रोता मैं जगत्का साक्षी, जगत्का नियन्ता और परमानन्दस्वरूप एवं भता (गन्थ ग्रहण करनेवाला) हैं। आत्, स्वप्न एवं सुषुति- इन सभी अवस्थाओंमें

मैं इन्द्रियधर्मको हित, जगतुका साष्टा, नाम और गोत्रसे गनुका साक्षीं होते हुए भी मैं इन अवस्थाओंसे रिहत शून्य, मननशील सबके मनमें स्थित देवता हैं, किंतु मुझमें मन हूँ। मैं ही चुरोय अह्म और विधाता हूँ। मैं ही गुरूप हैं। नहीं है और न तो उसका धर्म ही हैं। मैं हौ विज्ञान तथा मैं ही निर्गुण, मुक्त, बुद्ध, शुद्ध-प्रबुद्ध, अजर, सर्वव्यापी, ज्ञानस्वरूप हैं। मैं हीं समस्त ज्ञान आश्रय, बुद्धिरूप गुहामें सत्यस्वरूप एवं शिवस्वरूप परमात्मा हैं। रिस्थत प्राणिमात्रा साक्षी (तटस्थ दवा) तथा सर्वत्र और इस प्रकार जो विद्वान् इन परमपद-परमेश्वरका बुद्धकी अधौनतासे मुक्त हैं। मैं हौ बुद्धकै धर्मोंसे भी शून्य ध्यान करते हैं, मैं निश्चय ही ईश्वरका सारूप्य प्राप्त कर हैं, मैं ही सर्वस्वरूप, सर्वगतमनस्वरूप और प्राणिमात्रके लेते हैं, इसमें संदेह नहीं हैं। है सुचात शङ्कर! आपसे ही किसी भी प्रकारक बन्धनसे सर्वथा विनिर्मुक्त तथा प्राणधर्म इस ध्यानयोगको चर्चा मैंने की है। जो व्यक्ति सदैव इस ( बुभुक्षा एवं पिपासा)-से विमुक्त हैं। मैं ही प्राणियोंका ध्यानयोगका पाठ (चिन्तन-मनन करता है, वह विष्णुलोककों प्राणस्वरूप हैं, मैं ही महाशान्त, भयशून्य तथा अहंकारादिसे प्राप्त करता है। (अध्याय १४)

 

विष्णुसहस्रनाम श्रीरुद्रने पूछा-हे प्रभो ! मनुष्य किस मन्त्रका ज्ञप पद्मनाभः पद्मनिधिः पाहतो गदाधरः ( धराधरः । करके इस अथाह संसार-सागरसे पार हो सकता है? आप परमः परभूतश्च पुरुषोत्तम ईश्वरः ॥ जप करनें-यौग्य उस श्रेष्ठ मन्त्रको मुझे बतायें। पद्मज्ञः पुण्डरीकः पद्ममालाधरः प्रियः। | श्रीहरिने कहा- हे रुद् ! परम ब्रह्म, परमात्मा, नित्य, पद्माक्षः पनागर्भश्च पर्जन्यः पद्मसीस्थितः ।। परमेश्वर भगवान् विष्णुको सहस्रनामसे स्तुति कानेपर । अपारः परमार्थश्च पराणां च परः प्रभुः । मनुष्य भवसागरको पार कर सकता है। हैं वृषभध्वज! मैं पण्डितः पण्डिनैश्च पवित्रः पापमर्दकः ।। उस पवित्र, भेष्ठतम् और जप करने-योग्य (विष्णु) शुद्धः प्रकाशरूपश्च म पवित्रः परिरक्षकः । सासनाम’ को कहता है। वह समस्त पापोंको चिनष्ट पिपासावतः पापः पुरुषः प्रकृतिसतमा । करनेवाला स्तोत्र है। आप उसे सावधान होकर सुने – प्रधानं पृथिवीपत्रं पद्मनाभः प्रियमद्दः ( प्रियंवदः )

वासुदेको महाविध्यार्चामन चासों बनाः ।। सर्वेज्ञः सर्वगः सर्वः वयित् सर्वदः सुरः परः | बालचन्द्रनिभ बालो बलभद्गो बलाधिपः ।। सर्वस्य जगतों आम सर्वदर्शी सर्वभूत्। बलिबधनकद्वेधा वरेण्य वेदवित् कविः सर्वानुग्रहकोयः सर्वभूतादि स्थितः वैदकर्ता वेदरूपों वेद्यो वेदपरिप्लुतः सर्वपून्यश्च सर्वाः सर्वदेवनमस्कृतः वेदाङ्गवेत्ता वैर्देशों बलाधारी बलार्दनः सर्वस्य जगतो मूर्त सकल निकालनलाः अधिकारों यशश्च बरुण वरुणाधिपः सर्वगोप्ता सर्वनिः सर्वकारणकारणम्। वीरहा बृहद्वीरो वन्दितः परमेश्वरः। सर्वध्येयः सर्वमित्रः सर्वदेवस्वरूपधृक् ।। आत्मा परमात्मा प्रत्यगात्मा वियत्परः ।। सर्याध्यक्षः मुराध्यक्षः सुरासुरनमस्कृतः। . ‘विज्ञान‘– परमार्थज्ञान . ‘ज्ञानब्यावहारिक ज्ञान . अक्षा पिपासा वा प्राणस्यशब्दकल्पद्रुम) ‘, ‘ का अर्थ यह हैनमस्ते अप इवा, अश्य एवं दृष्टिइन तीन अन्तत है। पानी का विवाह हुश हैं,

# पुराणं गाई मध्ये मार विकभा अयम्

दुष्टानां चासुराणां च सर्वदा घातकोऽन्तकः ॥ सत्यपाल सन्नाभः सिसिन्दिनः।। सिझमायः सिसि माध्यमिक सिसिः दीः ॥ आरणं जगतश्चैव भैयः सैमस्तींव छ। शुभकृोधनः सौम्यः सत्यः सत्यपराक्रमः ॥ सत्यम्: सत्यसाल्पः सत्यवत् सत्य ( अ )दस्तथा। धर्मो धर्मी च कर्मी च सर्वकर्मविवर्जितः ।। कर्मकर्ता च कमैय क्रिया कार्यं चैव छ। श्रीपतिपतिः श्रीमान् सर्वस्य पतिऋजितः ।। सर्देवानां पति शैव वृणीनां पतिद्धितः ।। पतिहरण्यगर्भस्य त्रिपुरापतिस्तथा।। पशन से पतिः प्रायौं वसूनां पनिय छ। पतराणघालस्यैव वरुणस्य पतिस्तथा।। वनस्पतींनां च पतिरनिलस्य पनि था। अनलस्य पतिय समय पतिय च ॥ कुबेरस्य पतिश्चैव : नक्षत्राणां पनिस्तथा। ओषधींन पति शैव वृक्षाणां च पनिस्तथा ॥ नागानां पनिरकंस्य दक्षस्य अनिवि छ। सुहद च पनि चैव पार्मा च पनिस्तथा ॥ गन्धर्वाणां पति औय असूनां पतिरुत्तमः। पर्वतानां पनि चैव निम्नगानां पनिस्तथा ॥ सुराणा छ : अवाः कपिलप पनिस्ता । लतानां च पतिऔंय बीरुधां च पतिस्तथा।। मुनींनां च पतिश्चैव सूर्यस्य पतितमः । पत्तनमः . ऑःशुम्म पतिय च॥ अह्मणां च पनि चैव राक्षसानां – अनितधा। किन्नराणां पति व द्विान । पतितमः ।। सरितां च पश्चैव समुदाणां पतिस्तथा। सरसां च ( रसानां च ) पनिचैव भूतानां च पतिस्तथा ।। वैतालार्ना पतिश्चैव कुष्माण्डानां पतिस्तथा। पक्षणां च पतिः वैशः पशूनां परिव च ।। महात्मा मङ्गलों में मन्द मन्दरः।। मैरुर्माता प्रमाणं च माधव मलजितः ॥ माता मानों महान् मृतिः । १ – मानवी मनुज 2 ] ३-झालाव: पर। महाशानों महाभागों मधुसूदन एव च। महावी मामा माईविचितः । मायामा मायया बद्धो मायया तु विजितः ॥ मुनिनुत मुनित्रों महाना (ग) को महाहनुः। महाबाहुर्महादान्त ( पाहादतों) मरन विश्वतः ॥ महावों महात्मा च महाकायों महोदरः। महापामाग्रीवो मामानी महामनाः ।। मागनिर्मकीर्निर्मारूपों महासुरः । मधुश्च माधवचैव महादेवो महेश्वरः ॥ मन्यों मनापी छ माननीयों मतेश्वरः [ महेश्वरः ।। मा. महाभागों मझौतोतमानुषः ।। मानवश्च मनुशैव मानवानां प्रियः । मृगश्च मुगपून्यक्ष मुगाण घ पतिस्तथा। बुभम्प च पतिय पतचैव बृहस्पतेः । पतिः शनैश्चरस्मैव : केन: पनिया ॥ लक्ष्मण लक्षणशैव लम्चौड़ों ललितस्तथा। नानालङ्कारमंयुक्त नानाचन्दनचर्चितः ॥ मानारसमल नानापुष्योपशोभितः । राम उमापतश्चैव सभार्य: : परमेश्वरः ।। नद रत्नहर्ता च कापी रूपववतः। महापग्ररूप सौम्यरूपस्तथैव च ॥ नीलामेघनिभः – शुः । कालमेघनिभस्तथा। भूमवर्णः पतया नानारूपो (नाना) ह्यवर्णकः ॥ चिरूप पदचैत्र शुक्लबस्तथैव च। सर्ववर्णो महायोगी यज्ञौ (यान्यौ ) यज्ञकृदेव च ॥ सुवर्णवर्णव चैव सुवर्णाख्यस्तथैव छ। संघर्गावपाच अवर्णः स्वर्णर्मनः ॥ मुवस्य प्रदाता च वास्तव ( सुवर्णाशास्तथैव च ) च। सुसस्य प्रियव सुवगांधतींव छ । सुपर्णी च महापर्णी सुपर्णस्य च कारणम् । वैनतेयस्तथादित्य : आदिशदिकरः शिवः ।। क्वार्ण मत अन्नधानस्य छ कारगम्। मनन करणे वैद्य कारण मनमस्तधा। कारणं चेतसय, आहारस्य कारणम्।

भूतान कार तद्वत् कारण च विभावसः ॥ आकाकारणं नन्, पश्चिम्याः कारणं परम्।। अन्य कारण चैव पार्ने कारण रामा। देहस्य कारणं चैव चक्षुपचैव कारणम्। ऑस्य का जन् कारणं च मचाया। पाः कारणं चैव मागम्यैव च कारणम्। स्तयो: कारण, तत् पादः क्याण तथा॥ याच कारणं नहत् पायोझैव तु कारणम्। इन्द्रय कारण चैव कुबेरस्य च कारणम्॥ यमस्य कारणं चैव ईशानस्य छ कारणम्। अक्षाणां कारणं चैव रक्षसां कारणं परम्॥ नपा कारणं ओई धर्मस्य तु कारणम्। जन्तून कारणं चैव वसूनां कारणं परम् ॥ मनून कारणं चैव पक्षिण का परम्। मुनीनां कारणं श्रेष्ठ योगिनां कारणं परम् ॥ सिद्धान कार चैत्र पक्षाण कारशे परम्। कारणं किन्नराणां च गन्धर्वाणां च कारणम् ॥ नदान कारणं चैव नद्दीन कारणम् परम्। कारणं च समुदाग वृक्षाण कारण तथा॥ कारणं वरुधां चैव लोका कारणं तथा। पानासकारणं चैव देवानां कारणं तथा।। अपर्णा कार चैव श्रेयस कारणं तथा। पशूनांकापर्ण चैव सर्वेषां कारणं तथा ॥ देहात्मा घेन्द्रियात्मा च आत्मा बुद्धस्तचैव च।। मनमा । तचापा घामाचेतसः । ॥ माग्रतः स्वपनामा महात्मा परमथा। प्रधानस्य परात्मा च आकाशात्मा का भा॥ या; परमात्मा से सम्मात्मा। तभव छ। गन्धस्य .. परमात्मा – छ पमात्मा पस्तथा।। झादात्मा चैव वागात्मा स्पर्शामा : पपाया। ओबामा या गात्मा च जिल्लामा मस्तश्वा । घाणान्मा चैव हस्तात्मा मादात्मा परमस्तथा। पश्चस्य तथधात्मा पायातमा परमस्ता ॥ इात्मा चैय झमात्मा का शान्ता ] मा च मनस्तथा। क्षमापतेरामा सत्या ( वश )मा घरमम्तथा ॥

ईशात्मा परमात्मा च शैयामा मविपतिः । यतर्वास तथा लशम खड्गी मुरातकः ( सुरान्तकः ।। हाँप्रवर्तनशील = अनी का हिते रतः । पनिरूपी च योगीं च योगियों इरिः शितिः ।। विमा घ मातश्च कमा घर्षा म(न) तितधा। संवत्सरों मोक्षकोंमोहर्मसकता। मकर्ता च दुष्टानां मायाव्यों वङवामुः। संवर्तः कालकत घ गौतम भृगुङ्गिराः ॥ अत्रिवमिवाः पुल पुलस्त्यः स एव छ। याज्ञवल्क्यों देवलचे व्यासश्चैव पराशरः ॥ शर्मदव गाङ्गेय वीकेशों युवाः । कॅशयः क्लेशान्ता च सुकः कर्णवतः ।। नारायण महाभागः प्रागम्य पति व छ। अपामय पनि भय व्यानस्य पतिरेव च ।। उदानम्य पतिः श्रेषः समानस्य पतिस्तथा। शब्दम्य च पतिः श्रेष्ठः स्पर्शस्य प्रतिय च ॥ पाणां च पतिक्षायः खगपागाईलायुधः । चक्रपाणिः कुली च भीमास्तथैव च। प्रकृतिः कौस्तुभवः पीताम्बरधरस्तधा। सुमुखो दुर्मुखश्चैव मुखेन तु विवर्जितः ।। अननोऽननरुपवा सुनखः सुरमन्दरः । सुपौल विभुञ्जिष्णुभबिष्णुयुधस्तथा ॥ हिरण्यकशिपॉन्तिाहिरण्याक्षविमर्दकः । निना पूतनाग्रा भास्करानयनाशनः ॥ कैशिनों दलनचैव मुष्टिकस्य बिमर्दकः। कंमदानसभेत्ता च चाणुरम्य ( मेनुकम्य) मर्दकः ॥ अनिष्टस्य मिन्ता छ प्रिय । पुर्व छ। अरः । कृपक्ष भरममावन्दितः ।। भगा भगवान् भानुतण भागतः स्वयम्। उद्धवद्धयस्पेंश युवेन विचिन्तितः ॥ स्वछ असल अब चलाचलववर्जितः । अारोपमश्चत्तं — गगनं पृधिवीं जलम् ॥ वायुअक्षुता औत्री शिम या आगमेव छ। वाक्पाणिपादनवनः पाथूपम्श्वस्तथैव च ॥ शनचैव सर्वश्च आतिदः झानिकृन्नरः

 

* पुराणं गाकई वक्ष्ये सारं विष्णुकथाश्रमम्

भक्तप्रिंस्तथा भर्ना भक्तिमान् भक्तिवर्धनः । भक्तस्तुत भक्तपः कनिदः – कीर्तिवर्धनः। कदाप्तिः क्षमाकान्तिभचैव इया परा।। द्वान दाता च कर्ता च देवदेवप्रियः शुचिः। शुचिमान् सुखद मोक्षः कामझाई: सापात् ।। सीववैद्मश्च मोक्षद्वार तथैव च। प्रज्ञाद्वारे सहस्राः सहस्त्रका एव च ॥ शुली ( सु:) सुकिरीटी च सुग्रीवः कौस्तुभस्तथा।। प्रद्युम्नझानिरुद्धश्च इयग्रीवध सूकरः ।। मत्स्यः परशुराम प्रहाद बलिय च। शरण्यचैव नित्यश्च युद्ध मुक्तः शरीरभृत् ।। ग्रदूषणन्ताच रावणस्य प्रमर्दनः। सीतापतिश्च वर्धिष्णुर्भरतश्च तथैव च।। कुम्भेन्डजिनिइन्ता छ कुम्भकर्णप्नमर्दनः। ननकान्तकश्चैय, देवान्तकविनाशनः ॥ दुष्टासुरनिहन्ता छ शम्बरास्तिथैव च।। नरकम निना च त्रिशीर्षस्य विनाशनः ।। यमलार्जुनर्भत्ता च तपोहितकरस्तथा। वादित्रं चैव वाच्च च बुद्धश्चैव वरप्रदः॥ सारः साग्नियः सौरः कालन्तृनिकृन्तनः ।। अगस्त्य देबलसँव नारद नारदप्रयः ।। प्रागानस्तथा व्यानो रजः सत्त्वं तमः शरत् । इदानश्च समान% भेषजं च भिषक् तधा॥ कुडम्यः स्वचषश्च सर्वदविवर्जितः । चक्षुरिन्द्रिग्रहीन वागजियवर्वांतः ॥ हुस्नेन्द्रिवहनश्च पादाभ्यां च विनः। पायुपसिना .. मनापविनतः ।। प्रबोधेन बिहानश्च अदथ्यो चैव विज्ञतः ॥ चैतमा सिगतवमान च विगतः ।। अमानेन विनश्च म्यानैन च विनतः । दानेन विहीन समानेन विजितः ।। आकाशैन थिहीन यामुना परिनतः । ऑग्नना च विहीनश्च अदकेन विज्ञतः ।। पृथिव्या व विहीन शब्देन छ चिवर्जितः । स्पर्शेन च विहींनश्च सर्वरूपवितः ।।

राण विगतश्चैव अर्धन परिर्वाजतः । शोंके तव वचसा परिवर्जितः ।। रविवर्जितऔंय. विकारैः अभिरेव च। कामेन नचैव क्रोधेन । परिवर्जितः ।। लोभेन सिगनभैय इभेन च विवशतः। सूक्ष्मचैव सुसूमश्च स्थूलात्सतस्तथा।। विशारद बलाध्यक्षः सर्वस्य ऑभकस्तथा। प्रकृतेः । भकश्चैव मतः भकस्ता ॥ भूतानां ऑभक व बुद्धेश्च ऑभकस्तथा। इन्द्रियाणां क्षोभक विषयक्षोभकस्तथा ॥ ब्रह्मणः ओभक चैव कृस्य ऑभकस्तथा।

अगम्यश्चक्षुरादेवाओवागम्यस्तथैव च ॥ त्वचा न गम्यः कुर्मश्च जिह्वाग्राह्यस्तथैव च। प्राणेन्द्रिगम्य एय याचाग्राह्यस्तथैव च।। अगम्यचैव पाणिभ्यां पागम्यस्तथैव च।। अग्राह्य मनसचैय बुद्ध्यामा हुरिंस्तथा।। अहं बुया तथा ग्राहक्षेतमा ग्राह्य एव च।

पाणिशाध्ययश्च गदापाणिस्तथैव च।। शाङ्गपायाश्च कृयाश्च ज्ञानमूर्तिः परतापः। तपस्वी ज्ञानगम्यो । ज्ञानी ज्ञानचित्र छ । ज्ञेयश्च जैयौनश्च ज्ञप्तिशैतन्यरूपकः। भाव भाव्यों भवको भावनो भवनाशनः ।। गोबिन्द – गोपनगपः । सर्वगोपीसप्रदः । गोपालगोगनिचैय – गौमतिंगधरस्तथा।। उपेन्द्रश्च नृसिंहश्च शरिचैव जनार्दनः ।

आरपोयो , बृहद्भानुहद्दीप्तिस्तथैव च।। दामोदरस्विकालवा कालज्ञः कासर्वातः । सियों द्वापरं बैनामजाद्वारे त्रिविक्रमः ।। विक्रमों दण्डू ( र) हस्तश्च कदण्डौं त्रिदण्डभृक्। सामभेदस्तथोपायः सामरूपीं च सापगः ।। सामवेद सर्वश्च सुकृतः सुतारूषणः। अथर्ववेदविच्चैव धवांधार्य एव च। यूपी चैव ऋग्थेद ऋग्धेदेषु प्रतिष्ठितः। अजुत्ता यजुर्वेद यजुर्वेदविदेकपात् ।। बहुप्रच्छ सुपाच्चैव तथैव च सहस्रपात्।

आचारका]।

 

चनुष्याच्च दिपायैव स्मृतियों यमो बली ॥ संन्यासी औय संन्यासानुराम एव च।

पन्ना गृहस्वाक्ष वानाम्यश्च भिक्षुकः ॥ ब्राह्मणः क्षत्रियों वैश्यः शूद्रों वर्गस्तथैव च। लदः शौनसम्पन्न हुशलपजिनः ॥ मोक्षयात्मसमाविष्टः स्तुतिः तोता च पूजकः । पुग्यो वाक्करणं चैव चाय चैव तु ज्ञाचकः ॥ घेतो याक चैय बाय चैव च यापयित्। वायगम्यतीर्थसासी तीर्थस्ती छ, नभन्। तीर्थादिभूतः सायश्च निरुतं त्वधिदैवतम्। प्रणवः प्रणवेशश्च प्रणयेन प्रवन्दितः ॥ प्रणवेन च लक्ष्यों मैं गायत्री च गदाधरः। शालग्रामनिवासी च शालग्रामस्तथैव च ॥ जलशायी योगशाय झायी शयः॥ मीभ च्च कार्य छ कारण थिवीधरः ।। प्रजापतिः शाश्वतश्च काम्यः कामबिना विराद। सम्राट् पृषा तथा स्वर्गौ रक्षम्यः साधिर्वलम् ॥ धनी धनप्नदों धन्यों यादवाना किने रतः । अर्जुनस्य प्रियश्चैव अर्जुन भीम एव च ॥ पराक्रमोदुर्विषहः सर्वशास्त्रविशारदः। सारस्वत : ‘महाभमः पारिजातस्तथा ।। अमृतम्य प्रदाता च ऑरोदः रमेव च। नात्मनस्य :- गोप्ता – गोवर्धनधनधा॥ कंसस्य : नाशनम्तवझस्ति । हस्तिनाशनः। शिपिविष्टः प्रसनश्च सर्वलोकार्तिनाशनः ॥ मुॐ मुद्रा करशैव सर्वमुद्राषिवर्जितः । ही दैहाँस्थितचैव देहस्य च नियामकः ।। होता ऑनियन्ता च ऑनयः अवर्ग तथा। त्यत्तिश्च स्पर्शयत्या स्पृश्यं च स्पर्शने तया ॥ पष्टा च चक्षु:स्थ नियन्ता अक्षुषस्तथा। दृश्यं चैव तु नियों इसजवा नियामकः ।। माणस्थ माणकद् भ्राता मार्गेन्द्रियाँनयामकः ।। वाक्य वक्ता च वक्तव्यों वचनं वानियामकः ।। माणिवः शिरपकमि हुयी निमकः । पदपथ गजा च ‘ गजव्यं गमनं तच्चा ॥ नियन्ता मादयों व पाभाक् झ विसकिन्।

मङ्गलच बुध इति पाः ॥ ३=गर्नेन्द्रमपत।।

विसर्गम्य नियन्ता च मुपस्थञ्चः सुखं तच्चा॥ उपक्थन्य नियता छ सदानन्दन । शत्रुघ्नः । कार्तवीर्यश्च दत्तात्रेयस्तव च। कसहित छ कार्नवीनकृन्तनः। काननम्मानमर्मयों न!: मेघमनिस्तथा।। अनप्रदानरूपी । न्न । छान्नादौन्नप्रवर्तकः ॥ धूमकुदमरूपश्च देवकीपुत्र । उनमः॥ देवयानन्दनों नन्दो शैहिसाः प्रिय पुत्र छ । वसुदैवयव – वसुदेवसुनस्तथा।। इन्दुभिहसपक्ष पुष्पहासतश्चैत्र छ। अट्टहासप्रियचैव सर्वाध्याक्षः भरोभरः ।। अच्युतश्चैव सत्येशः सत्याग्राश्च स्त्रियों वरः । कुक्मिण्या पत्तथैया मुक्मिण्या घन्लभस्तथा।। गोपीनां वल्लभश्चैव पुण्यश्लोकश्च विश्रुतः। वृषाकपिर्यों गुणों मला बुधस्तथा ॥ राहुः केतुर्ग्रहों ग्राहों गजेन्द्रमुखमेसर; १ । ग्राहस्य विनिहन्ता छ ग्रामणी कस्तचा ॥ किन्नरय छिन्दः स्वच्छ व छ। विरूषों विशात्नाको दैत्यमदन एव च ।। अनन्तपो भूलथों देवदानवसस्थितः। सप्तश्चः साजिश स्थानं स्थानान्त एव च ।। गच्च ज्ञार्ता मार्न ज्ञागरितं जवा। स्वप्नम्वः स्वप्नवत् धनम्यान धाम्नस्तथैव च । जाग्रस्थानमुप्तैश, विहींनों मैं चतुर्थकः । विज्ञानं वेझर्य छ जीवों जीवयिता ताया। भुवनाधिपतिःचैय. भुवनानां नियामकः । पातालवासी माताले सबंन्यविनाशनः ।। परमानन्द च धर्माणां च प्रवर्तकः । सुलभ दुर्लभचैव प्राणायामपरस्तधा। प्रत्याहारों धारक को प्रत्र कथा । भा कान्तिस्तथा चिः शवः स्फटिकमनिभाः ॥ अग्नाशैव गौरश्च सर्वः शुचिभिष्टुताः। वारों व चौपद् वधा वा दुनिया ।। पण नन्दयिता भी योद्धा भावयिती धा। ज्ञानात्मा व देहात्मा ५ (३) मा सवः ।। प्रदीपदी”च्च नन्दीशौभाग्नतत्तनाशनः ।

का पूरा गाकडं वक्ष्ये सारे विष्णुकधालयम् ॥

[ संक्षिप्त गमा चक्रपः श्रीपत्तिश्चैय नृपाणां चक्रवर्तनाम्॥ पञ्चन् द्विजको बिष्णुत्वं क्षत्रियों समाप्नुयात् । आँशश्च सर्वदेवानां द्वारकासँस्थितस्तथा।। | वैश्य अनं मुलं आ विष्णुभकाममन्वः ।। पुष्करः पुष्कयक्षः पुष्करदीय एव च ॥ हे वृषभध्वज! मैंने सर्वपापविनाशक, जगदीश्वर, भरतोंजनको जन्यः सर्वाकारविवशतः। देवाधिदेव, विष्णुके इस महननामका जो कीर्तन किया हैं, निराकारों निनिमित्त निरातको निराश्रयः । इसका पाठ करनेसे ब्राह्मण बिष्णुत्व अर्थात् विष्णुस्वरूप, इति नामसहस्रं वृषभप्याज कीर्तितम्। क्षत्रिय विजय, वैश्य धन तथा सुख और शुद् विष्णुकी देवस्य वियोगॅशस्य सर्वपापविनाशनम् ॥ भक्त प्राप्त करता हैं। ( अध्याय १५)

भगवान् विष्णुका ध्यान एवं सूर्यार्चन-निरूपण कने कहा- हैं आंख-चक्र और गद्दाको धारण ‘ॐ वाले श्वान प्रवल प्रबल छठ नमः।’ करनेवाले भगवान् हरि! आप पुनः देवदेवेश्वर शुद्धरूप सूर्यको यह मन्त्र साधकके समस्त पापका विनाश । परमात्मा विष्णुके ध्यानमा बर्णन करें।

करनेवाली हैं। इसे अग्नि-प्राकार, मन्ना भी कहते हैं। | हरिने का हैं ! संसाररूपी वृक्षका विनाश करनेवाले भगवान् सूर्यको प्रसन्न करनेवाला मन्त्र इस प्रकार है, में हरि ज्ञानरूप, अनन्त, सर्वव्याप्त, अजन्मा औंर अव्यय हैं। यह सूर्य-गायत्री मन्त्र कहलाता है-इस मन्त्र-ज्ञपके पश्चात् वें अविनाशी, सर्वत्रगामी, नित्य, महान्, अद्वितीय ब्रह्म हैं। साधकको सूर्य एवं गायत्रीका सकलीकरण करना चाहिये सम्पूर्ण संसारकै मूल कारण तथा समस्त चराचर गतिमान् ‘ॐ आदित्याय विद्महे, विमभावाय धीमहि, तन्नः सूर्यः परमेश्वर हैं। वे समस्त प्राणियोंके हृदयमें निवास करनेवाले प्रचोदयात्। तथा सभीके ईश्वर हैं, सम्पूर्ण जगत्का आधार होते हुए भी साधकको प्रत्येक दिशा-प्रदिशामें निम्नलिखित दिक्पाल वे स्वयं निराधार हैं। सभी कार्योंके कारण । देवोंके लिये प्रणाम निवेदन करना चाहिये सांसारिक विषयक आससे परै उनकी स्थिति हैं, ‘ॐ धर्मात्मने नमः’ पूर्वमें, ‘ अमाय नमः दक्षिणमें, वे निर्मुक्त है। मुक्त योगियोंके ध्येय हैं। वे स्थल शरिरसे * दण्डनायकाय नमः’ पश्चिममें, ‘ॐ दैवताय नमः रहित, नैत्र, माण, पाद, प्रायु, उपस्थादि समस्त इन्द्रियोंसे उत्तर में, ‘ॐ श्यामपिंगलाय नम:’ ईशानमैं, ‘ दीक्षिताय चिहन हैं। वे हरि मन एवं मनके धर्म सङ्कल्प-विकल्प नम:’ अग्निकोणमें, “ॐ वज्रपाणये नमः’ नैऋत्यकोणमें, आदिसे रहित हैं। वे बुद्धि ( भौतिक इन्द्रियविशेष)-ॐ ॐ भूर्भुवः स्वः नम:’ वायुकोग। उहित, बुद्ध धर्म-वियत, अहंकारसे शुन्य, चित्तसे अग्राह्य, है वृषध्वज ! साधकको चाहिये कि वह निम्नाति प्राण-अपान-व्यानादि वायुसे रहित हैं।

मन्त्रों से पूर्वाद दिशाओंसे प्रारम्भ करके ईशानकोणतक इरिने कहा- अब मैं सूर्यको पूजाका पुनः वर्णन चन्दादि ग्रहोंकी भी पूजा करे करता हैं, जो प्राचीन काल में भूगु ऋषिको सुनायी गयी थीं। ‘ॐ चन्झाय नक्षत्राधिपतये नमः । ॐ अङ्गारकाय | | काय नमः’_याद् भागवान सूर्यदेवको मूल भिनिताय मम:।” युभाष सोमसुताय नमः।” बागधगम मन्त्र है, ओ साधकको भोग और मोक्ष प्रदान करता है। सर्वविद्याधिपतये नमः।” शुक्राय महर्षयै भगुसुताय नमः।

निम्न मन्त्र अङ्गन्यास करके साधकको सूर्यदेवको पूजा ‘* शनैश्चराय सूर्मात्मजाय नमः।” राहवे नमः ।” करनी चाहिये । पाकेंतये नमः ।। ‘ खस्रोकाय त्रिदशाय नमः।”ॐ विच छ शिरसे निम्न तीन मन्त्रोंसे सूर्यदेवको प्रणाम करके उन देवकों नमः।” ॐ ज्ञानिने ठठ शिखायै नमः।” ॐ सहस्त्ररश्मये ठठ अर्यादि प्रदान करनेके लिये आवाहित करना चाहिये कवचाय नमः।”ॐ सर्वतोऽधिपतयें छठ अस्त्राय नमः । ॐ अनुरुकाय नमः।’ ‘ॐ प्रमधनाधाय नमः।”

 

मृत्युञ्जयमन्नाझपकी महिमा

बुधाय नमः।

हैं शिव! इसके बाद साधक ग्रिकोणमें ( आष्ट) भगवन्नपारमितामयूखमालिन् सकलजगत्पते देवकै हृदयको स्थापना करें। ईशानकोणमैं सिरको स्थापना समाभवाहन चतुर्भुज परमसिद्धिप्रद विस्फुलिङ्गपिङ्गल तत् करके नैऋत्यकोगमें शिक्षाका विन्यास करे। वह पुनः एकोहि इदमयं मम शिरसि गतं गृह गृह तेजोंग्ररूपम् अनग्न एकाग्रचित्त होकर पूर्व दिशामें इनके धर्म, वायुकोणमैं वल वल उठ नमः । उनके नेत्र और पश्चिम दिशामें उनके अस्त्रका विन्यास करें। उपर्युक्त मन्त्रको आवाहित इन अभीष्ट देवका निम्न इसी प्रकार अष्टलकमलके ईशानकोणमें चन्द्र, पूर्व मन्त्रमें विसर्जन करे दिशामें मंगल, अग्निकोणमैं बुध, दक्षिण दिशामें बृहस्त, ‘ॐ नमो भगवते आदित्याय वकिरणाय गच्छ सुर्ख नैऋत्यकोण शुक्ल, पश्चम दिशामें शनि, वायुकोण केतु | पुनरागमनाय।’ एवं उत्तर दिशामें ग्रहुके पूजनका विधान है। अत: | हैं ससरश्मि भगवान् आदित्य ! आपके लिये मैं आणाम (साधकको इन सभी हॉकी पूजा करके) द्वितीय कक्षा है। हे पातु। आप पुनः आगमनके लिये सुखपूर्वक पधारें। साथ ही द्वादश सूर्योकी पूजा भी करना चाहिये।

इरिने का है झड़ ! मैं पुन: सूर्य-पूजाको विधिका भूग, सूर्य, अर्यमा, मि, अरुण, सबिता, भाता, वर्णन करूँगा, जिसे मैंने पहले कुबेरसे कहा था। विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और बिष्णु-ये द्वादश सूर्य [सूर्यपूजा प्रारम्भ करने से पूर्व ] एकाग्रचिन्न होकर कहे गये हैं। पवित्र स्थानपर कर्णिकायुक्त अष्टलकमल बनाये। तदनन्तर द्वादश सूर्योकी पूजा करने के बाद पुदि दिशाओं में सूर्यदेवका आवाहन करें। तत्पश्चात् भूमिपर निर्मित कमलदलके इन्द्रादि देकौं अर्चना करे तथा जया-विजया-जयत एवं मध्यमें अन्वरूपी खखक भगवान् सूर्यकों उनके परिंकरके अपराजिता शक्तिकों और शेय, वासुकि आदि नागकी साध स्थापना की तथा इन्हें स्नान करायें। | पूजा करें। (अध्याय १६-१७)

मृत्युञ्जय-मन्त्र-जपकी महिमा सूतज्ञीने कहा—अब मैं मृत्युञ्जय-पूजाका वर्णन मन्त्रका जप करनेसे मनुष्य मृत्युको जीत लेता है। कठिन करूंगा, जिसकौं गरुड़ने कश्यप ऋषिसे कहा था। वह से-कठिन यिन-बाधाभोंको पार कर जाता है, पर साधकका उद्धार करनेवाली, पुण्यदायिनीं एवं सर्वदेवमय विजय प्राप्त कर लेता हैं। पूजा है, ऐसा सभीका अभिमत है।

भगवान् मृत्युञ्जय श्वेत कमलके ऊपर बैठें हुए बद सूतजींने कहा- मृत्युञ्जय-मन्त्र ‘ॐ जूं सः’ तीन हस्त तथा अभय-मुद्रा धारण कियें रहते हैं। तात्पर्य यह अक्षरोंवाला है। पहले ॐकारका वारण करके वे कि उनके एक हाधमैं अभाय-मुड़ा है और एक हाथमें (ई)-का उच्चारण करें। तदनन्तर विसर्गके साथ ‘स’ वरद-मुड़ा। दो हाथोंमें अमृत-कलश हैं। इस रूप | सः )-का जच्चारण करना चाहिये। यह मन् मृत्यु और अमृतें धका ध्यान करनेके साथ ही अमृतेश्वर भगवान्

दरिंदताका मर्दन करनेवाला हैं तथा शिव, विष्णु, सूर्य, यामाङ्ग रहनेवालों अमृतभाषण अमृतादेवका भी ध्यान आदि सभी देवोंका कारणभूत हैं। ‘ॐ जूं सः ‘यह महामन्त्र करना चाहिये। देवके दायें हाथमें कलश और बायें हाथमें | अमृतेश नामको वा भाता है। इस मका प नसे मल मोभित ना है। | मी सम्पूर्ण पाप नी है और न ही माना है शिन्। यदि एक मासतक अमृताचा साथ है अर्थात् मृत्यु के समान होनेवाले उसके कष्ट दूर हों अमृतेश्वर भगवानुका ध्यान करते हुए मानव ‘ॐ गं गः ज्ञानें हैं।

इस मन्चका तीन सन्ध्याओंमें आ जार जप करें तो यह इस मन्त्रको सौं बार जप करनेसे बैंदाध्ययनर्जीनत जरा, मुनु तथा महान्याधियोंसे मुक्त हो जाता है और पुण्यन तथा अज्ञानात फल व तीर्थ-स्नान-दान-मुम्पादिका ऑपर बिय प्राप्त कर लेता हैं। यह मन्त्र महान् शान्ति फन प्राप्त होता है। चीन संध्या में मुक सौ आठ बार इस प्रदान करनेवाला है।

 

* पुराणं गाकई वक्ष्ये सारं विष्णुकथाश्रयम्

अमृतेश्वर भगवान की पूजामें आवाहन, स्थापन, धन उसके बाद मूर्तिपर अथवा यज्ञके लिये अनों हुई ( प्रतिष्ठा, निधान, निवेशन कनेके बाद पाद्य, आचमन, बेदापर चित्रित के ऊपर सुन्दर पुष्प अर्पित करें। द्वापर मान, अयं, माला, अनुलेपन, दीप, वस्त्र, आभूषण, नैवेद्य, अवस्थित रहनेवाले देवका आवाहून और पूजन करने पान, आचमन, वजन (पंखेसे हवन करना). मुदा-प्रदर्शन, लिये पहले आधारशक्तिकी पूजा करे। तदनन्तर देवताको | मन्त्र जप, पान, दक्षिणा, आहुति, स्तुति, वाद्य और गीत प्रतिष्ठा करके उनके (देव) परिवारका पूजन करना चाहिये। तथा नृत्य, न्यासयोग और प्रदक्षिणा, साष्टाङ्ग प्रणति, क्योंकि विद्वानोंने बताया है कि मुख्य देव पूजाकै साथ मन्त्रशय्या, वदन आदि उपचारॉक निवेदित करके उनका उसके अङ्ग-परिवार आदिकी भी पूजा करने का विधान है। विसर्जन करना चाहिये।

आयुधों एवं परिवारोंके साथ धर्म आदिकौं तथा इन्द्र षडङ्ग प्रकारका पूजन जिसे परमैश परमात्माने अपने आदिकौं, युगों, बेंदों और मुहूर्ताको भी मुख्य देयके रूप मुलासे स्वयं कहा है, वह क्रम बनाया गया है, उसे जों पूजा करनी चाहिये। यह पूजा भुक्ति और मुक्ति प्रदान ज्ञानता है यहाँ पुजक हैं। षङ्ग-पूजा इस प्रकार हैं- करनेवालौं है। अतः साधक विद्वानकों उनकी षङ्कङ्ग-पूजा साधकको प्रारम्भमैं अयं प्रदान करनेके लियें प्रयुक्त करना चाहिये। पात्रकी पूजा करके अस्त्र अर्थात् फट् मन्त्रमें इस्तताइन दैवमलकीं मजा करनेके पूर्व मातृका, गणदेवता, (दाहिने हाथों द्वारा बायें हाथपर ध्न) करना चाहिये। नन्दों और गङ्गाकी पूजा करके देवस्थानके देहलीं- भागपर उसके बाद कवच (ई) मन्त्रसे शोधनकर अमृतकरणकौं महाकाल तथा यमुनाको पूजा करनी चाहियें। इस पूजा क्रियाको पूर्ण करें। तत्पश्चात् आधारशक्ति आदिकी पूजा, “# अमोधर भैरवाय नमः ।’ तथा ‘नं हे सः सूर्याय म: प्राणायाम, आसनोपशन तथा देहशुद्धि करके भगवान् कहना चाहिये। इसी प्रकार प्रारम्भमैं प्रणय मन्त्र कारकों अमृतेशका ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर अपनी आत्माको जोड़कर नामोच्चार करते हुए अनमें ‘नम:’ शब्दको प्रयोग देवस्वरूपमें स्वीकारकर अङ्गन्यास, करन्यास करके साधक करके शिव, कृष्ण, ब्रह्मा, गण, चपिंडका, सरस्वती और हृदयकमसमें स्थित ज्योतिर्मय आत्मदेवका पूजन करे। महालक्ष्मी आदिकी पूजा करनी चाहिये। ( अध्याय १८)

सर्पोके विष हरनेके उपाय तथा दुष्ट उपद्रवोंको दूर करनेके मन्त्र ( प्राणेश्वरी विद्या )। श्रीसूतजी बोले-हे ऋषियों ! अब मैं शिवद्वारा यदि सर्पदंशके समय दण्डी, शस्त्रधारी, भिक्षु तथा नग्न पक्षिराज गरुडको सुनाये गये प्राणेश्वर महामन्त्रका वर्णन प्राणीका दर्शन होता है तो उसे कालाका ही इन समझना करता है, किंतु उसके पूर्व उन स्थानोंका वर्णन करूँगा, चाहिये। हाथ, मुख, गर्दन और पीछमें सर्पके काटनेसे प्राण जहाँ सर्पक काटनेसे प्राणों जबित नहीं रह सकता। जीवित नहीं बचता है। | श्मशान, वल्मक (चौबी), पर्वत, कुओं और बृक्षके दिनके प्रथम भागके पूर्व अर्धा यामको भोग सूर्य करता कौंटर-इन स्थानों में स्थित सर्पके द्वारा काट लेनेचर यद हैं। उस दिखाकर भोंगके पश्चात् गणनाक्रममें ओं ग्रह आते उस दौत लगे स्थानपर तीन अचान्न अँाएँ बन जाती हैं तो हैं, उन ग्रहों के द्वारा यथाक्रम शैव यामका भोग होता हैं। वह प्राणी जीवित नहीं रहता हैं । घट्ठी तिथिमें, कर्क और इस कालगतिमें प्रत्येक दिन कुछ; परिवर्तनोंके साथ अन्य मेष राशि में आनेवाले नक्षत्रों तथा मूल, अश्लेषा, मघा शेष ग्रहोंका भोंग माना गया है। यथा-म्योतिषिोंने कान आदि क्रूर नक्षत्र में सर्पदंश होनेसे प्राणीका जीवन समाप्त चक्र के आधारपर रात्रिकालमें शेषनाग ‘सूर्य’, वासुकि नाग हो जाता हैं तथा काँग्छ, कटि, गाला, मधि-स्थान, मस्तक ‘अन्’, तक्षक नाग मङ्गल’, कर्कोटक नाग ‘बुध’, पद्म या कनपटीके अस्थिभाग और उदरादिमें काटनेपर प्राणी नाग ‘गुरु’, महापद्म नाग ‘शुक्र’, शंख नाग ‘शनि’ और जीवित नहीं रहता है। कुनिक नाग ‘राहु को स्वीकार किया।

 

+ सपके विष हरनेके जपाय तथा दुष्ट पद्भवको दूर करनेकै मन्त्र

रात या दिनमें बृहस्पतिका भौगकारन आनेपर सर्प, लाख जप करके सिद्धि प्राप्त की थी। देवोंका भी अन्त करनेवाला हो जाता है। अत: इस कालमें इसी प्रकार एक अष्टद्दल पद्मका रेखाङ्कनकर उसके सर्पद्वारा काटा गया प्राणीं बच नहीं सकता है। दिनमें शनि- प्रत्येक इलपर इस–’ सुवरे कुटविग्रहरूपिणि ग्रहको बेलाके आनेपर राहु अशुभ धर्मसे संयुक्त रहता है। स्वाहा’ मन्त्रों को दो वर्ण लिये तथा ‘ॐ अक्षि स्वाहा’ अत: वह अपने यामाई भौग और सन्धिकालको अवस्थितिमें इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलके द्वारा स्नान करानेसे विश्वविह्वल काल अर्थात् यमराजको गतिके समान गतिमान् रहता है। प्राणीका विष दूर हो जाता है।

रात्रि और दिनका मान लगभग तीस-तौंस घटौका ‘ॐ पक्ष स्वाहा’ इस मन्त्रके द्वारा अङ्ग-भागसे होता है। इस मामके अनुसार निर्मित कालचक्रमें चन्द्रमा सेंकर कनिष्ठापर्यन्त करन्यास तथा मुख-हृदय-लिङ्ग और प्रतिपदा तिथिको पादाङ्गष्ठ, द्वितीयाकों पैरसे ऊपर, नृतीयाकों में अङ्गन्यास करें तो विपधर नाग ऐसे मनुष्यकी गुल्फ, चतुको ज्ञानु पञ्चमीको लिङ्ग घशीको नाभि, छायाको स्वप्नमें भी लाँध नहीं सकता। जो मनुष्य इस सप्तमौकों दय, अष्टमीको स्तन, नवमीको कप्छ, दशमीको मन्त्रको एक लाख जप करके सिद्धि प्राप्त कर लेता है, वह नासिका, एकादशीको नेत्र, द्वादशौंकों कान, जयदशौकी अपनी दृष्टिमासे मत व्यक्ति के शरीरमें व्याप्त बिषको | भौंह, चतुर्दशीकों शास्त्र अर्थात् कनपटीं था मा एवं नष्ट कर देता है। | अमावस्याको मस्तक पर निवास करता हैं। परुषके दक्षिणाङ्में “हीं दीं भि भी कपडायै स्वाहा_इस मन्त्रका तथा स्त्रीकै वामभागमें चन्द्रकी स्थिति होती है। चन्द्रको जप सर्पदंशित व्यक्ति कानमें करनेपर बिपका प्रभाव स्थिति जिस अङ्गमैं होती हैं, उस अङ्गमें सर्पके इसपर क्षीण हो जाता हैं। प्राणी जीवित बच सकता है। यद्यपि सर्पदंशको शरीरमें यदि दोनों पैरके अग्रभागमें ‘अ आ’, गुल्फमें ‘ई’ नुमें उत्पन्न हुई मुच्छ शीघ्र समाप्त होनेवाली नहीं हैं, फिर भी उ ऊ’, कटिमें ‘ए ऐ’, नाभिमें ‘ओं, हृदयमें ‘औं’, मूवमें शरीर-मर्दनसे वह दूर हो सकती हैं। ‘ॐ’ तथा मस्तकमें ‘अ’ वर्णकम स्थापनकर ‘ॐ हंसः’ टिके समान निर्मल । सः’ नाम सीजमन्न, भन्ने साहा न्यास के साथ इस सीजका ध्यान साधकका परम मन्त्र हैं। बिषरूपीं पापको नष्ट करनेमें फूजन और जप करें तो वह सर्प विषकों दूर कर सकता है। समर्थं इस बीज-मन्त्रका प्रयोग सर्पदंशसे मूच्छित प्राणपर मैं (स्वयं) गरुड़ हूँ” यह ध्यान (भावना) करके करना चाहिये। इसके चार प्रकार हैं। प्रथम मात्रा बौद्ध साधकको विप-शमनका कार्य करना चाहिये। ‘ह’बीजमन्त्रका बिन्दुसे युक्त है। इस पाँच स्वरोंसे संयुक्त है। तीसरा छा: शरीर में विन्यास विषादिका हरण करनेवाला कहा गया हैं। स्वरोंवाला और चौथा विसर्गयुक्त है। प्राचीन समयमें पक्षिराज़ याम हाथमें ‘हंसः’ मन्त्रका न्यास करके जो साधक इस गरुड़ने तीनों लोकौंको रक्षाके लियें “ॐ कुरु कुनै स्या’ मन्त्रका ध्यान पूजन और जाप करता है, वह सर्प-विषकों इस महामन्त्री आत्मसात किया था। अतः सर्च एवं दा ने कई जा : योकि यह मन्च र नागो झणके विषको शान्त करनेके लिये इच्छुक व्यक्तिको नासिकाभाग और मैको श्वासनलिकाकों भी आँकनमें पूर्ण मुखमैं “; कलमें “कुस’ दोनों गुल्फोंमें ‘कुले तथा समर्थ है। यह मन्त्र शरीरको बच्चा मांस आदिमें व्याप्त दोनों पैरोंमें ‘स्याम’ मन्त्रका न्यास करना चाहियें। जिस सर्प-विषको भी विनष्ट कर देता हैं। भरमें उपर्युक्त मन्त्र भली प्रकार में लिखा रहता है, सर्प उम सर्पदंशको मूड़ित प्राणीके शरीर में 12 ईस’ मन्त्रका अरको छोड़कर चले जाते हैं। जो मनुष्य एक हजार बार न्यास करके भगवान् नीलकण्ट आदि देवका भी ध्यान इस मन्त्रकै ज्ञपसे भिमन्त्रित सूत्रकों कानपर धारण करता करना चाहिये। ऐसा करने में अह मन्य अपनी वायु के है, उसको सर्प-भय नहीं रहना। जिस घरमें इस मन्त्र द्वारा उस सम्पूर्ण विषका हरण कर लेता हैं।

अभिमन्त शर्कराखण्ड फेंक दिये जाते हैं, उस घरको भी प्रत्याँङ्गाको जड़को चावलकै जलके साथ पीसकर सर्प छोड़ देते हैं। देवताओं और असुरोंने इस मन्त्रका सात पौनेमें विषका प्रभाव दूर हो जाता है। पुनर्नवा, प्रियंगु,

 

+ पुराणं गाकई वक्ष्ये सारे विष्णुकधाश्रयम् +

यक्त्रज्ञ (माझौं), चैत, बृहत, कुष्माण्ड, अपराजिताकी आड़ लकड़ियोंको इसों मन्यसे अभिमन्त्रित का इन्हें आठ जड़, गैरू तथा कमलगट्टेके फलको जलमें पीसकर घृतके दिशाओंमें गाड़ दें तो उस कौलाति क्षेत्रमें वज्रपात साध लैंप तैयार करना चाहिये, इस प्रकार बना हुआ लैंप (विद्युत्-निपात) तथा इसकी गर्जनाका उपद्य नहीं होता। | भी शरोमें लगाने से विषको शान्त कर देता है। सर्पक गरुङद्वारा कहे गये इस मन्त्र आद्ध कौंलोको इस बार काटनेपर जो मनुष्य उग (गरम घूतका पान कर होता अभिमन्त्रितकर राषिके समय अपने अभीष्ट अँकी चारों हैं, उसके शरीरमें विषका अधिक प्रभाव नहीं बढ़ता। दिशाओं और विदिशाओंमें गाड़ देना चाहिये। इससे भी सर्पदंश होनेपर शिरीष नामक वृक्षके पश्चाङ्ग (पन्न, पुष्प, यहाँ विद्युत्-निपात, बज्रपतन तथा चूहा, टिडी आदिसे फरन, मुल एवं छाल)-के सहित गाजरकै बौनक पौंसकर होनेवाले पल्लवका भय नहीं रहा। सर्वाङ्गमें लेप करनेसे अधवा पीनेसे भी विषका प्रभाव में हु सदाशियाय नमः’ ऐसा कहकर साधक तर्जनी समाप्त हो जाता है।

अंगुलि द्वारा अनार-पुष्पक सद्शा कान्तिमान् एक पिका | “ॐ ‘ अमन्य, गौनस (गोंडअन) आदि विषैले निर्माण करें। उस पिंडके प्रदर्शनमाजसें ही दुष्ट जन, मेष,

सपके विषकों दूर करनेमें समर्थ है। इस मन्त्रके साथ विद्युत्, विय, राक्षस, भूत और डाकिनी आदि दलों | ‘अ’- का प्रयोगकर अर्थात् ‘ ही अ; ‘ का उच्चारण करते दिशाकों कर भाग जाते हैं।

हुए हृदय, ललाट आदिमें बिन्यास करके उसका ध्यान ‘ॐ ह्रीं गणेशाय नमः । ॐ ह्रीं स्तम्भनादिचकाय करनेमात्र ही सर्पादिका वशीकरण हो जाता है। इसका नमः।”ॐ ऐं ह्ये मॅलक्यामराय नमः।-इस मन्त्र पंद्रह हजार जप करके साधक गरुड़के समान सर्चगामी, संग्रहको रव-पिण्ड कहा जाता है। यह भैरव-पिण्ड़ विष अयि= विद्वान्, वेदविद् हो जाता हैं तथा दीर्घ आयुकों तथा पापग्रहोंके कुप्रभावको समाप्त करनेमें समर्थ हैं। यह प्राप्त करता है।

साधकके कार्यक्षेत्रको रक्षा और भूत-राक्षसादिक उपद्वीं सूतजीने पुनः कहा-ऋषियों ! अब मैं आप सभको शक्तियों को नष्ट करता है। शिवकै द्वारा कधित अत्यन्त गोपनीय मन्त्रको बतागा; ‘ॐ नमः’ यह कहकर साधक अपने हाथमें इन्हवञ्जका जिनसे अभिमन्त्रित पाश, धनुष, चक्र, मुहर, शूल और ध्यान करें। इस वज्रमुद्रासे विष, शत्रु और भूतगण विनष्ट पट्टिा नामक आयुधको धारण करके आज्ञा शत्रुओं पर भी हो जाते हैं। ‘ॐ हूँ ( क्ष) नमः’ इस मन्त्रसे बायें हाथमें विजय प्राप्त कर लेता है।

पाका स्मरण करें, जिससे सिंघ तथा भूतादिका विनाश मन्त्रोदारके लिये कमल-पत्रपर अवर्ग बनाकर पूर्व होता है। इसी प्रकार ‘ॐ ह्रां (ओं) नमः’ इस मन्त्रके (दिशा)-से शुरू करके क्रमशः ईशान-कोणतक जमन्त्र धारणसे उपद्वकारों मेष और पापग्रहोंक प्रभाव नष्ट हो (ॐ हीं हीं)-को सिखना चाहिये।’ॐकार अख़बीज है, जाते हैं। कृतान्त – यमराजका ध्यान करके साधक छेदक ”कार विष्णुबीज है और ‘ही’कार शियन है। अस्त्र (भालें)-से शत्रु-समूहका विनाश करे। ‘ॐ क्षण क्रिशूलके तीनों शौर्षपर ‘ही’ लिम्रक क्रमानुसार न्यास (म) नमः’ इस मन्त्रोच्चारकै साथ कालभैरवका ध्यान करे । मन्त्र ‘ हैं

करके मनुष्य पापग्रह, भूत, विपके प्रभावका शमन कर साक हाधिमें शूल प्रहण करे । तत्पश्चात् उसको सकता हैं। आकाशमें घुमाये, जिसे देखते ही दुष्ट ग्रह और सर्प नष्ट ‘ॐ लसद्धिजिक्ष स्वाहा’ इस मन्त्रका ध्यान करके हो जाते हैं। साधक धुम्रवर्गके धनुषकों हाथमें नैकर मनुष्य खेती-बाड़ौमैं विघ् ङ्कालनैयाले प्रह, भूत, विष और आकाशकी ओर भुसा उठाकर इस मन्त्रका चिन्तन करें। पक्षियका निवारण कर सकता है। ‘ व ( झर्ग ) नमः ऐसा करनेसे इष्ट विले मर्म, कुत्सित ग्रह, विनाशकारी मैच इस मन्त्रको रक्त-वर्णको स्याहौसे नगार निवाकर उसे

और राक्षस नष्ट होते हैं। यह मन्त्र तो शिलोककी रक्षा बजाना चाहिये। उसके शब्दोंको सुनकर पापग्रह आदि सभी करनेमें समर्थ है, मृत्युलोक विषयमैं कहना हौं क्या है? इपद्वकारों नच भयभीत हों उसें है।

 

# पत्रपून राधा शिवार्चनविधि #

पञ्चवक्त्र-पूजन तथा शिवार्चन-विधि सूतजींने कहा-हैं ऋषियों ! अब मैं पञ्चमुख शिवकीं होना चाहिये, जो अस्व है। इसके साथ हैं’ लिख देना पूजाका यर्शन करूँगा, जो साधकको भुक्ति और मुक्ति चाहिये – वह महामन्त्र हैं और सम्पूर्ण अर्थों को देनेवाला दोनों प्रदान करती है। साधकको सबसे पहले निम्न मन्त्रको है। साधक

मूर्तिके ऊभागसे लेकर मूर्तिके चरणपर्यन्त | जन इँसका आवाहन करना चाहियें

अपने दोनों हाथोंसे स्पर्श करें और महामुद्रा दिखाये; इसके ‘ॐ भूर्वथायें आदिभूताय सर्वाधााया मूर्तयें स्वाहा।’ बाद सम्पूर्ण अङ्गोंमें न्यास-करन्यास आदि करें।

पुनः ॐ ॥ सद्योजाताय नमः।’ कहकर साधक तदनन्तर वह अस्त्रमन्न ‘* फटू’ का उच्चारण करता सद्योजातका आवाहन करें। इन सयज्ञातकों आज कलाएँ हुआ दाहिनौं हथेली में स्पर्श करके शौधन करें। उसके बाद कहीं गयी हैं। उनका नाम सिद्ध, ऋद्धि, धृति, लक्ष्मी, अनिशा अँगुलीसे लेकर महामन्त्रसे ही तर्जनी अँगुलीतक मैया, कान्ति, स्वधा और स्थिति हैं। सद्योजातक पूजा न्यास करना चाहिये। करनेके पश्चात् ‘ॐ सिद्धयै नमः’ इत्यादिं मन्त्रोंसे उन अब मैं हृदय-कमल काँगकामैं अज्ञानको विधि भी आड़ करनाओंकी प्रज्ञा कनैका विधान है। तदनन्तर बतलाऊँगा। इसमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्यादी अर्चना ‘ॐ हौं यामदेवाय नमः’ इस मन्त्रसे साधक वामदेवकी करें। सर्वप्रथम आवाहन, स्थापन, पाद्म, अयं, आचमन, पुज्ञा करें। बामदेवकी नँह कलाएँ हैं, जिन इबा, रक्षा, स्नान अर्पित करें तथा अन्य विविध मानस उपचारोंकों आँत, पाल्या, कान्ति, तृष्णा, मत, क्रिया, कामा, बुद्धि, रात्रि, करके तदाकार हो जाय। उसके बाद आँग्नमैं आहूत बैंक शासन तथा मोहिनी कला कहा गया है। इन कलाओंके विधि कह रहा हैं। साधकको पूजा-स्थलपर अग्नि प्रश्चलित अतिरिक्त मनोन्मनी, घोरा, मोहा, क्षुधा, निद्रा, मृत्यु, माया करनेके लिये ‘ॐ फट् अस्त्रमन्त्रसे एक कुण्डका निर्माण तथा भयंकरा नामकी आठ कलाएँ । अघोरकी) हैं। करना चाहिये। तत्पश्चात् ‘ॐ है’ इस कवचमन्यसे उस नाका पूजन करनेके बाद साधक के एक अक्षर करके मानसिक से इसमें का |’ है नत्मरुपाच घम’ इस मन्त्रमें तत्परुषदेवकी पूजा विन्यास करें। उसके बाद साधकको हृदय अथवा शक्ति में करनी चाहिये। उनकी निवृत्ति, प्रतिज्ञा, विद्या, शान्तु और क्रमश: ज्ञानरूपी तेज धी अग्निक विन्यास करना चाहिये। सम्पूर्णा-यै च कलाएँ हैं। साधक कक्षाओं की पूजा तत्पश्चात् अग्निके निष्कृति-संस्कारको छोड़कर गर्भाधानादि करके ” ॐ ईशानाय नमः’ इस मन्यसे ईशानदेवको पूजा समस्त संस्कार करनेका विधान हैं। विकृति या मोक्ष करें। तत्पश्चात् ईशानदैवक निश्चला, निरञ्जना, शशिनी, संस्कार आहुतिके पश्चात् किया जाता हैं। [इसलिये अंगना, मचि और म्यालिनी नामको ज्ञों छ; कलाएँ हैं, आहुतिके पूर्व उस संस्कारका निषेध है।] समस्त संस्कारोंक उनकी पूजा करके पुजन पूर्ण करे।

बाद साधकों उस अवसित अग्निमें समस्त आकियों सूतजीने पुनः कहा- हे ऋर्थियों ! अब मैं शिवकी साथ मानसिकरूपसे शिवको आहुति देनी चाहिये। अर्चनाका वर्णन करूंगा, जो भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान तदनन्तर कमलाङ्कित गर्भवाले उस मण्डल में नलकण्ठ करनेवाली है। बारह अंगुलके माप बिन्दहारा (किस शिवका पूजन करना चाहिये। इस मण्डूसके अग्निकोणमैं पात्रमैं) भगवान् शिवको मूर्ति बनानी चाहिये। उसमें शान्त, अर्धचन्द्राकार कल्याणकारों एक अग्निकुण्ड बनाना चाहिये। सर्वगत और निराकारका चिन्तन करना चाहिये। बिन्दुबारा तदनन्तर अग्निदेवताके असे युक्त हुदयादिमें व्याप्त बनायीं गयीं मूर्तिमें ऊपरकीं और पाँच बिन्द लगाने चाहिये, करनेका विधान है। उसके बाद मण्डलके अन्तर्गत बने हुए ज्ञों शिवको मुख है। वह छोटे आकारमें होना चाहिये और कमलकी कर्णिकापर सदाशिवकी तथा दिशाऑमें अस्त्रक नीचेकों और मूर्तिके अनुसार बिन्दु लगाकर बड़े-बड़े अङ्ग पूजा करे। अनाने चाहिये। मूर्तिके अधोभागमै छटा बिन्द विसर्गके साथ अन्य श्रेष्ठ पश्चात्त्योंमें स्थित पृथ्यौं, जल आदि तत्वको

 

यहाँ ब्राह्मपूजन तथा मानसपूजन दोनों का एक साथ वर्णन है।

* पुराणं गारुडं वक्ष्ये सारं विष्णुकथाभयम् +  

दौंक्षा बतलायी जाती है। इन दोनों शान्तियोंके लिये पृथक्- क्रमशः विमला और ईशानादि शक्तियोंकी स्थापना करके पृथक् रूप सौ-सौ आतिय पाँच बार देनी चाहिये। पूजा करनी चाहिये । ऐसा करनेसे उपासकको परम सुखकी तत्पश्चात् साधक पूर्णाहुति देकर प्रसन्नतापूर्वक त्रिशूली प्राप्ति होती है। [इन शक्तियोंकी पूजाके लिये पृथक्-पृथक् भगवान् शिवका ध्यान करे। जमन्त्र निर्दिष्ट है । अथा। उसके बाद प्रापश्चत्त शुकेि लिये आठ बार आइति ॐ पद्मायै नम:'( अग्निकोणमैं), “औं दीप्तायै नमः देनी चाहिये। ग्रह आहुति अस्त्र-बीज़ ‘ई फट् मन्त्र (नैऋत्यकोणमैं), * सूक्ष्मायै नमः’ (बायपकोणमैं), प्रदान करनेका विधान है। इस प्रकार संस्कारसे शुद्ध हुआ । जयायै नम:’ (ईशानकोणमैं), १ भद्गायै नमः ” ( पूर्व वह साधक नि:संदेह शिव-स्वरूप हो जाता है। दिशामें), ‘शें विभूत्यै नम:'( दक्षिण दिशामें), ‘रौं विमलायै शिवकी विशेष पूजामें साधकको चाहिये कि वह नमः’ (पश्चिम दिशामें), ‘रं अमौघिकायै नमः’, ‘ प्रथम-‘ हा आत्मतत्याय स्वाहा’, ” ही विपासाय विसुतार्थं नम:’ (उत्तर दिशामें) और ‘३ सर्वतोमुमैं नाम: स्याहा’ तथा ‘ हैं शिवतत्त्वाय स्वाहा’- ऐसा उच्चारण (मण्डलके मध्यमें)। इसके बाद शिवस्यरूप सूर्यप्रतिमाको करके आचमन करें। तत्पश्चात् उसे मानसिक रूपमें सूर्यासन प्रदान करके ‘हां है ( है ) सः’ इस मन्यसे भगवान् । कन्द्रका स्पर्श करना चाहिये। उसके बाद भस्म-धारण सूर्य अर्चना करें और फिर निम्न मन्त्रोंसे न्यास करें और तर्पण आदि क्रियाओं को सम्पन्न करना चाहिये। * * * कु छ नमः’, ‘ॐ भूर्भावः स्वः शिरसे इयं प्रपितामहेभ्यः स्वधा’, ‘ॐ ह्रां मातामध्यः स्वधा’ और स्वाहा’, ‘ॐ भूर्भुवः स्वः शिखायै वौषट्,’ॐ हं ग्वालिन्यै ‘* हां नमः सर्वमातृभ्यः स्वभा’ इन मन्त्रों तर्पण करें। ममः’, ‘कवचाय हुम्’, “ॐ हं अस्त्राय फट्स’, ‘ हूं इसों निसें पिता, पितामह, प्रमातामह तथा वृद्धप्रमातामह फट् गर्दै नमः’, ‘ॐ हूं फट् दीक्षितायै नमः।

आदिका भी तर्पण करें और फिर प्राणायाम करना चाहिये। साधकको अङ्गन्यासके पश्चात् निम्न मन्त्रोंसे सूर्यादि। इसके बाद आचमन तथा मार्जन करके साधकको सभी नग्नक मानस पूजा करनी चाहिये । शिवके गायत्रीमन्त्रका जप करना चाहिये। वह मन्त्र इस ‘ॐ मः सूर्याय नमः, ॐ सों सोमाय नमः, ॐ में प्रकार है

मंगलाय नमः, ॐ बुं बुधाय नमः, ॐ गं अस्पतये नमः, | ” हां जन्मशाय चि माग्विलाय धीमहि, तन्नों में भार्गवाय नमः, ॐ शं शनैश्चराय नमः, कद्भः प्रचोदयात् ।।

३ ई नमः, ३ क नवे नमः, ॐ नमाय नमः। अर्थात् प्रणबसे मुक्त ‘कृ’ बीजशक्तिको सम्पन्न जन इस प्रकार सूर्यदेव आदिको पूजा करके साधकको महेश्वरका हम सभी चिन्तन करते हैं। यामीकी पवित्रताके आचमन करना चाहिये। उसके बाद वह कनिष्ठिका आदि लिये उनका हम ध्यान करते हैं। वे रुद्र हम सभीको अंगुलियों में करन्यास तथा पुन: निम्नाडित मन्त्रको अङ्गन्यास

सन्मार्गपर चलनेके लिये मॅरणा प्रदान करें।

शिव-गायनौमत्र-ज्ञपके पश्चात् सूर्योपस्थान करके सूर्य- ‘ॐ हां हृदयाय नमः, ॐ ही शिरसे स्वाहा, शिवायै मन्त्रोंसे सूर्यरूप शिवकी पूजा करनी चाहिये। इन मन्त्रोंका वौषद्, ॐ हैं कवचाय हुम्, ॐ हौं नेत्रत्रयाय वौषद्, ॐ ह्रः स्वरूप इस प्रकार है अस्त्राय फट्।’ ‘ हां ही हैं हैं हैं । शिवसूर्याय नमः।’ ‘ॐ है तदनन्तर भुतशुरू करें तथा पुन: न्यास करे । अयस्थापन काय सुर्यमूर्तये नमः । ॐ मः सूर्याय नमः ‘ करके उस जलसे अपने शरीरका प्राप्त करना चाहिये।

इस पूजाके बाद कामश: नामके आदि और अन्तमें इसके बाद वह साधक शिवसहित नन्दी आदिकी पूजा “नम:’ शब्दको प्रयोग करके दी तथा पिङ्गल आदि की। ” हाँ शिवाय नमः’ मन्त्रसे पद्ममें स्थित शिवकी पूजा भूतनायकका स्मरण करें। तदनन्तर अग्न आदि कणोंमें करके नन्दी, महाकाल, गङ्गा, यमुना, सरस्वती, श्रीवत्स, “ॐ विमलायै नमः, ॐ ईशानायै नमः’- आदि मन्त्रमें वास्तुदेवता, ब्रह्मा, गणपति तथा गुरुकी पूजा करें।

* पञ्जवक्त्र-पूजन तथा शिवार्चन-विधि के तत्पश्चात् साधकको पद्मकै मध्यमें शक्ति एवं अनन्तुशियों जयति सर्वत्र यः शिवः सोऽहमेव च ॥ देवकी पूजा करके पूर्व दिशामें धर्म, दक्षिणमैं ज्ञान, पश्चिममें यत्कृतं यत् करिष्यामि झन् सर्वं सुकृतं तव। वैराग्य, उत्तमें ऐश्वर्य, अग्निकोणमैं अधर्म, नैपमैं अज्ञान, उच्च प्राता चिंधनेता च नान्यों नाथोऽस्ति में शिन्न । वायव्य अथैराग्य, ईशानमें अनैश्वर्य, पद्मको काँकामैं यामा ।

(। २६-२१) और येवा उसके बाद पूर्व आदि दिशाओंमें रौदी, काली, हे प्रभो! आप गुह्य-से-गुह्य तत्त्वोंके संरक्षक हैं। आप शिया तथा असता आदि शक्तियोंकों पूजा करनी चाहिये। मेरे किये हुए जघको स्वीकार करें । हे दैव ! मुझे सिद्ध

तदनन्तर साधकको शिवके आगे स्थित पीठ मध्यमें प्राप्त हो। आपकी कृपासे आपमें मेरी निष्ठा बनी रहे। हे ‘ॐ हौं कलवकरण्यै नमः, ॐ हौं चलचिकरिण्यै नमः, रुद्! हे भगवान् शङ्कर! मरे द्वारा सर्वदा पाप-पुण्यरूप जों ॐ ॐ बलममश्चिन्यै नमः, ॐ सर्वभूनदमन्ॐ नमः, ॐ कर्म किया जाता है, उसे आप नष्ट करें। मैं आपके इन मनोमन्यै नम:’-इन मन्त्रोंसे कलविकरण एवं बलविकरण कल्याणकारी चरणोंमें पड़ा है। हैं शिय! आप अपने भक्तको आदि शक्तियोंको पुजा करनी चाहिये। साधक भगवान् सर्वस्य देनेवाले हैं। आप हौं भौक्ता हैं. हैं शिव ! यह दृश्यमान शिवके लिये आसन प्रदानकर महामूर्तिको स्थापना करे। सम्पूर्ण जगत् भी तो आप ही हैं। है शङ्कर! आपकी विजय तदनन्तर मूर्तिकै मध्यमें शिवको इद्दिष्ट करके आवाहन- हो। सर्वत्र जब शिव ही हैं तो मैं भी वही हैं। जो कुछ मैंने स्थापन-सन्निधान-सन्निरोध-सकलीकरण आदि मुद्रा दिखायें किया हैं और जो कुछ भविष्यमें झगा, वह सब आपके र , पाद्य, आचमन, अभ्यङ्ग, उद्वर्तन तथा स्नानौय द्वारा ही किया हुआ है। आप रक्षक हैं। आप विश्वनायक जल समर्पित करें एवं अरिण-मन्थन करके पूज्यदेवकों है। हें शिव ! आपके अतिरिक्त मेरा कोई स्याम नहीं हैं। वस्त्र, गन्ध, पुष्प, दीप और नैवेद्यमें चरु समर्पित करे। (हुरिने पुनः कहा है कट्स!) इसके बाद मैं नैवेद्य अनन्तर आचमन ६ करके मुखशुद्धिके लिये शिवपूजाकी दूसरी विधि कह रहा हैं ताम्बूल, कद्वर्तन, छत्र, चामर, मित्रक (यज्ञोपवीत) इस विधिके अनुसार गणेश-सरस्वती-नन्दी-महाकाल प्रदानकर परमकरण (अर्चनीय देवमें सर्वोत्कृष्टताका भाव) गङ्गा-यमुना, अस्त्र तथा वास्तुपतिदेवको पूजा मण्डूलके करे। तदनन्तर साधक आराध्यके साथ तदाकार होकर द्वारपर करनी चाहिये और साधक पूर्वाद दिशाओंमें इन्द्रादि उनका जप करे तथा विनम्रभाव स्तुतिकर इन्हें प्रणाम सभी दिक्पालकी पूजा करे। उसके बाद कारणभूत समस्त करे। इसी दयादिन्यास आदिके साथ पूर्ण कौं गयौं पुजाको तत्वोंकी पूजा करें। ‘घड्ङ्गपूजा’ यह नाम दिया गया है।

उन तत्त्वमें ‘मृधियों, जल, तेज, वायू और आकाश’ इस प्रकार शिवपूजन पूर्ण करनेके पश्चात् साधकको ये पञ्चमहाभूत हैं। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द- ये अग्नि आदि चतुर्दिकु कणों, मध्यभाग तथा पूर्वाद दिशाओं में उनका पाँच तन्मात्राएँ हैं। वाक्, पाणि, पाद, घायु एवं अग्नि आदि दिग्दैवताओं तथा इन्द्रादि दिक्पालों की पूजा उपस्थ-ये पाँच कर्मेन्द्रिय और और, चकू, भु, जिल्ला करनी चाहिये। तदनन्तर, उसको इन देयके मध्य स्थित तथा भ्राण- ये पाँच ज्ञानेन्द्र हैं। इनके अतिरिक्त चण्डेश्वरको पुजाकर उनके लिये निर्माल्य समर्पत करना मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार–चे अन्त:करशचतुष्टय हैं। चाहिये। उसके बाद यह निम्नाङ्कित स्तुति क्षमापन ( क्षमा- इनमें ऊपर ‘पुरुष’ की स्थिति है। इ (पुरुष)-कों शिव याचना) करके उनका विसर्जन करें कहा जाता है। .!’ गुह्यातिगुगोमा चे गुहागास्मत्कृतं जपम्। इन तत्त्वक साथ राग (गानशास्त्रीय रागविशेष }. बुद्धि सिर्भिवतु में इंच वात्मासादात् स्वयि स्वितः ।। विद्या, कला, काल, निर्यात, माया, शुचिया, ईश्वर किञ्चित् किसने कर्म सदा सुकनदुष्कृतम्। और सदाशिव जो सबके मूल हैं, उनकी भी पूजा होनी तन्में शिवपदस्थस्य फुच्च क्षमय शङ्कर॥ चाहियें। इन मस्त तत्चोंमें जो शिव और शक्ति अर्थात् शिव दाना शियों भोक्ता शियः सर्वमिदं जगत् । पुरुष एवं प्रकृतिका तत्व अनुस्यूत हैं, उसको ज्ञानकर ज्ञानौ ।

 

* पुरा गाई बसें सारे विद्याथम्

साधक जींसमुक्त होकर शिमलव हो जाता हैं। इन तत्वोंमें ऑष्ठ वौजपूरक (बिजौरा नींबू) स्थित रहता है। इच्म, ज्ञान ज्ञों शिवतत्त्व हैं, वहीं विष्णु है, वहीं ब्रह्मा है और वहीं और क्रिया नामक तौन शक्तियाँ उनके तीन नेत्र हैं। ऐसे ब्रह्मतत्त्व है। ये दैव सर्बदा कल्याणक भावना अवस्थित रहते हैं, भगवान् सदाशिवका मङ्गलमय ध्यानस्वरूप इस प्रकार इसलिये इन सदाशिव कहा गया है। हैं—वें देय पद्मासनपर विराजमान रहते हैं। उनका व ऎसे मूर्तिमान् देवका चिन्तन करनेवाला साधक सदैव शुक्ल हैं। सदैव सोलह वर्षकी आयुमें स्थित रहते हैं। ये कालभपसे रहित हुता है। इस प्रकार शिवोपासना करनेवाले पच मुखोंवाले हैं। उनके दसों हाथों में क्रमश: दक्षिणभागकी साधकको न तो अकालमृत्यु होती है और न शौत तथा और अभयमुद्रा, प्रसादमुद्रा, शक्ति, शूल तथा खट्वाङ्ग और कृष्णादि कारणोंसे ही उसकी मृत्यु होती है। वामभागको और सर्प, अक्षमाला, डमरू, नीलकमल तथा भगवती त्रिपुरा तथा गणेश आदि देवकी पूजा-विधि सूतजींने कहा-अब मैं गणेश आदि देवकों तथा त्रिपुरायै नम:’ अह मन्त्रोच्चार करते हुए उस त्रिपुराशक्तिको त्रिपुरादेवीको पूजाको कहूँगा, जो अपने भक्तोंको सर्वदा नमस्कार करें।

अभीष्ट प्रदान करनेवाली तथा श्रेष्ठ है। साधकको सबसे पहले साधक इसके बाद भगवत त्रिपुरा पद्मासन, मूर्ति गणपतिर्देवके आसन एवं उनके मूर्तस्वरूपका पूजन करके और हृदयादि अङ्गको प्रणाम को। तत्पश्चात् उस पद्मपीठपर न्यासपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। साधक ‘ग’ आदि अह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, बीजमन्त्रले निम्न तिमें हुदयादिन्यास करें-

चामडा और चण्डिक-इन आठ देवियोंकी मुला करें। ॐ ग दयाय नमः, ॐ गीं शिरसे स्वाहा, ॐ गं इन दैवियाँको पूजाके बाद ‘भैरव’ नामक देयकों पुजाको शिखायै वषद्, मैं कवचाय हुम्, * ग नेत्रत्रयाय वौषद्, विधान है। असिताङ्ग, रुक, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, अपाती, मः अस्त्राय फट्। भीषण तथा संहार नामवाले ये आठ भैरव हैं। इस न्यासके पश्चात् साधकक-‘ ॐ दुर्गायाः पादुकाभ्यां भैरव-पूजाके पश्चात् रति, ति, कामदैव, पञ्चबाण, नमः, ॐ गुरुपादुकाभ्यां नमः-मन्त्र माता दुर्गा और योगिनी, बटुक, दुर्गा, विघ्राज्ञ, गुरु और शैत्रपाल-देका गुरुकीं पादुकाओकों नमस्कार करके देय त्रिपुराके आसन भी पूजन करें।

और मूर्तिको प्रणाम करना चाहिये। तत्पश्चात् वह (साधक) साधकको पद्मगर्भ-मण्डल या त्रिकोणपींड बनाकर ‘ॐ हीं दुर्गे दक्षिण-इस मन्त्रसे हृदयादिन्यास करें और उसपर और बृदयमें शुक्ल वर्णवाली, वरदायिनी, अक्षमाला, फिर इसौं मन्यसे ‘स्ट्सचण्ड़वा, प्रचण्डदुर्गा, चण्ड्रोमा, चण्ड्रनायिका, पुस्तक एवं अभय-मुहासे सुशोभित भगवती सरस्वतीका बण्डा, चुद्धवतीं, अण्डरूमा, चण्डिका तथा दुग’– इन नौं भी ध्यान करना चाहिये। एक लाख मन्त्रका जप और बन शक्तयोंका पूजन करें। तदनन्तर वज्र, खङ्ग आदि मुद्राओंका करनैसे भगवतीं त्रिपुरेश्वरीं साधकके लियै सिद्धिदात्री हो प्रदर्शनकर इसके अग्निकोणमैं सदाशिव आदि देवकी पूजा जाती हैं। पूजामें देवोंके आसन तथा पादुकाकी पूजाका भी करें। अतः साधक पहले ‘ॐ सदाशिवमहाप्रेतपद्मासनाय विधान हैं। विशेष पूजन मन्त्रन्यास तथा मण्डलादि-पूजन नमः’ कहकर प्रणाम करें। तत्पश्चात् ‘ॐ ऐं क्लीं ( ) सौं भी करना चाहिये। (अध्याय ३४-३६)

-अपासनाननः सितः यशवप्किः॥ पाधव: का: वैर्दभिश्चैव धारयन्। अभई भाई फक्त शुलं मामीश्वरः । इ8: कॉमिकच भुजंगं चाक्षसूकम्। इमरकं नौतनं आपुरमतमम्॥ (३। 4==५६)

आधारकापड़] • गोपालजीको पूजा, लोक्यमोहून-मन्त्र तथा श्रीधर-पूज्ञनविधि ।

सर्यों एवं अन्य विषैले जीव-जन्तुओंके विषको दूर करनेका मन्त्र सूतजीने का अब मैं सपदि विभिन्न बिषैले जीव- सपके लिये विषरूपिणों हों, तुम्हारा नाम विरथनारायणी जन्तुओंके काटने कष्ट पहुँचानेवाले विषकों दूर करनेमें हैं तथा तुम शुकमणा हो और कानों में शक पहनी हुई समर्थ मन्त्रको कह रहा है, जो इस प्रकार है- हो। विशाल मुखवालौं, भयंकर एवं प्रचण्ड स्बभाजबालौ ।

‘ॐ कणिचिकीणिकक्वाशी घणी भूतारिणि चण्डादेव! हार्योंमें चरनन्-शक्ति पैदा कर, शत्रुका हनन । फणिविधिणि विरथनारायणि उमें दह दह इस्तें चप कर, हनन कर। सब प्रकारके विषका नाश करनेवाली हैं। हें माहेश्वर महामुशि छालामुखि शङ्कुकणि शुकमपट्टे देवि! मेरे सर्वाङ्गमें फैले हुए विषको प्रभावहीन कर शत्रु इन इन सर्वनाशिनि स्वेदय सर्वाङ्गशोणितं प्रशिक्षस है। इस विषकों तुम देख रहीं हैं। [उस काटनेवाले जन्तुको मनसा दैवि सम्मोहय सम्मोस कस्य हृदये ज्ञाता शस्य सम्मोहित करो, सम्मोहित कों। हे देवि! तुम मेरी रक्षा कों, हृदयें स्थिती। कञों रौद्रेण रूपेण त्वं देवि रक्ष रक्ष मां रक्षा करो। इस प्रकार प्रार्थना एवं चिन्तन करके ‘ई मां है हूं मां हैं फफफ उठ स्कन्दमेतलाबालग्रशविषारी फफफ ‘इसका उच्चारण करे तथा ‘स्कन्दकों मैलारूप

* शाले माले हुर दुर विषोंकाररहिविषवेग हा हा बालग्रहों, शत्रुओं और विषका हरण करनेवाली हैं शाला ज्ञाबर ई शवर आकौलवैगै सधैं विचमेघमाले माला ! नाना प्रकारके विपके बैंगका हरण कर, इण कर। सर्वनागादिविषाणाम्। ऐसा उच्चारण करें और ‘ ई गवरि ई’ शयर कहकर | इस मन्त्रका प्रयोग करते समय माहेश्वरी उमादेवीसे वेगपूर्ण गतिशीलोंमें अधिगतिशील सर्वत्र च्यापिनी प्रार्थना करें कि हैं इमै! तुम रुके हुदसमें तरपन्न हुई मॅयमालापण देवि! मेरे सभी नागादि विषज्ञतुझसे । हों और इसमें रहती हों। तुम्हारा रौद्र रूप है। तुम्हें उत्पन्न विषका हरण करो। रौंह भी कहा जाता है। तुम्हारा मुख ज्वालाके समान [इस प्रकार चिन्तन और प्रार्थना करते हुए रोगीके प्रति ज्ञाम्यन्यमान हैं तथा तुमने अपने कटादेशमैं क्षुद्र घण्टिका स्पर्शादि करते हुए मन्त्रपाठ करे।] लगीं करधनी पहन रखी हैं। तुम भूतकीं प्रिय हों,

श्रीगोपालजीकी पूजा, त्रैलोक्यमोहन-मन्त्र तथा श्रीधर-पूजनविधि सूतजींने कहा है ऋषियों! मैं भोग और मोक्ष मण्डलके मध्यमै शक्तिकी और कूर्म, अनन्त, पृथ्वी, धर्म, प्रदान करनेवालों श्रीगोपालजी तथा भगवान् श्रीधर विष्णुको ज्ञान तथा वैराग्यकी अग्नि आदि कोणोंमें पूजा करें। पूजाका वर्णन कर रहा है, इसे सुनें । पुज्ञा प्रारम्भ करने वायव्य-कोणके साथ उत्तर दिशामें प्रकाशात्मक एवं पहले पूजा-मण्डलके द्वारदेशमें गङ्गा और यमुनाकै साथ ऐश्वर्यको पूजा करें। ‘गोपीजनबल्लभाय स्वाहा’यह धाता और विधाताको, के साथ श. पद्मनिधि एवं गोपालमन्त्र है। मृतक मूर्व दिशा आरम्भ करके शार्ङ्गधनुष और शुभकी मूसा करनी चाहिये तथा पूर्व क्रमशः आलों दिशाओंमें जाम्बवती और सुशीलाके साथ। दिशामें भद्र और सुभड़की, दक्षिण दिशामैं चणा और रुक्मिणी, सत्यभामा, सुनन्दा, नाग्नजती, लक्ष्मणा और प्रचरको, पम दिशामें बल और बस्नक, उत्तर दिशामें मित्रबिन्दाकी पूजा करनी चाहिये ज्ञाय और विजयक तथा चा वापर श्री, गण, दुर्गा साथ ही श्रीगौमानके ज्ञ. चक्र, गदा, पद्म, मुसल और सरस्वतीको पूजा करनी चाहिये।

वङ्ग, पाश, अङ्कश, श्रीवत्स, कौस्तुभ, मुकुट, वनमाला, मण्डलकै आँग्न आदि कोणोंमें और दिशाओंमें परम इन्द्रादि ध्वजवाहक दिक्पाल, कुमुदादिगण और विष्वक्सेनका भागवत नारद, सिद्ध तथा गुरुका एवं नल-कुबरका पूजन मुजन करके श्रीलक्ष्मीसहित कृष्णकीं भी अर्चना करनी करें। पूर्व दिशामें विष्णु, विष्णुतपा तथा विष्णुशक्तिकीं चाहिये। अर्चना करें। इसके बाद विष्णुकै परिवारकी अर्थना करे। गौपौजनवल्लभके मन्त्र जपनेसे तथा उनका ध्यान

 

* पुराणं गाकडं वक्ष्ये सारं विष्णुकथाभयम् *

करनेझैं एवं उनकी साङ्गपाङ्ग) पूजा करनेमें साधक आगच्छ।—इस मन्त्रसे धरदेवका आवाहन तथा पूजन | सभी कामनाओंको पूर्ण कर लेता है। कना चाहिये। त्रैलोक्यमोहन श्रीधरके मन्त्र इस प्रकार हैं

इस मुके पश्चात् श्रियै :-इस मन्त्र श्रीं ( श्रीः ) श्रीधराय प्रैलोक्यमोहनाय नमः मनी लक्ष्मीका पूजन करना चाहिये।आं दयाय नमः पुरुषोत्तमाय त्रैलोक्यमोहनाय नमः विष्णवे त्रैलोक्यमोहनाय औं शिरसे नमः‘, ‘ अं शिखायै मः,” मैं नामः अँक्यमोहनाब विम्याचे नमः। कवचाय नमः, नेत्रत्रयाय नमः‘, ‘ ; जाय | – ये मन्त्र समस्त प्रयोजनको पूर्ण करनेवाले हैं। नमः, शाय नमः‘, ‘* प्रयाय नमः‘, ‘ चकाम आँसूतजी पुनः बोलेअब मैं धर भगवान् नमः, गदायै नमः, भवाय नमःकौस्तुभाय (विष्णु) को मङ्गलमयी भूजाका वर्णन करता है। नमः‘, ‘ कानमालायै नमः‘, ‘ पीताम्बराय नमः,’ साधकको सर्वप्रथम १६ औं दयाय नमः, श्रीमागे नमः, नारदाश्च मःगुरुभ्यो नमः‘, शिरसे स्याहा, अं शिखायै वषद्, कवचाय हुम्, ‘* इनाय नमः, अग्नये नमः‘, ‘ अमाय नमः‘, श्रीं नेत्रत्रयाय वौषट्, मः अस्त्राय फट्इन मन्त्रोंसेनितये नमः‘, ‘ वरुणाय नमः वायवे नमः, अङ्गन्यास और कन्यास करना चाहिये। तदनन्तर भगवानुको सोमाय नमः‘, ‘ ईशानाय नमः‘, ‘ अनन्ताय शहू, चक्र, गदास्वरूपणी मुद्दा प्रशतकर ज्ञा चक्र तथा नमः‘, ‘ ब्रह्मणे नमः‘, ‘ सत्याय नमः‘, ‘ जमें गदापद्मसे सुशोभित आत्मस्वरू श्रीधर भगवान् पुरुषोत्तमका नमः‘, ‘ तमसे नमः‘, ‘ विष्वक्सेनाय नम:‘–इत्यादि |

ध्यान करना चाहिये। तत्पश्चात् स्वस्तिक या सर्वतोभद्- मन्त्रको पन्यास, अस्त्र-पूजा तथा उक्त देय-परिवारकी माटुलमें धरदेवको पूजा करनी चाहिये।

पूजा करनी चाहिये। सर्वप्रथम शाईधनुष धारण करनेवाले देवाधिदेव भगवान् तदनन्तर सपरिंकर भगवान् विष्णुका अभिषेक करके विष्णुके आसनको पूजा करनी चाहिये। | वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, पुष्य, धूप, दीप तथा नैवेद्य निवेदित

‘ॐ श्रीधरासनदेवता आगत’ इस मन्त्रसे आवाहन करके प्रदक्षिणा करें। मूल मन्त्रको शप १०८ बार करें और करके ‘ॐ समस्तपनिंबारायाच्युतासनाय नमः’, ‘ॐ भान्ने किया हुआ जप अभीष्ट देव भगवान् श्रीधरको समर्पित

म;”,’ विधात्रे नमः’, ‘ॐ गङ्गायै नमः’, ‘ अमुनायै कर दें। नामः’, ‘ॐ आधारशक्त्यै नमः’, ‘* कर्माय नमः, तत्पश्चात् विद्वान् साधकको चाहिये कि मुहूर्त भर

1: ‘ । धर्माय नम:’. अपने हृदयद्रेशमें स्थित विशुद्ध स्फटिक मणिके समान ‘ॐ ज्ञानाय नमः’, ‘ॐ वैराग्याय नमः’, ‘ॐ ऐश्वर्याय क्रान्तिमान्, करोड़ों सूर्यके सदृश प्रभावाले, प्रसन्नमुख, नमः’, ‘ॐ अधर्माय नम:’, ‘ अज्ञानाय नमः’, सौम्य मुद्दावाले, चमचमाते हुए धवन-मकराकृति-कुण्डलोंसे ॐ अथैराग्याय नमः”, अनैश्चर्याय नमः, ॐ काय सुशोभित, सिर पर मुटको किये हुए, शुभलक्षासम्पन्न नमः, ”ॐ नालाय नमः”, “ॐ पद्माय नमः’, ‘ विमलार्य अङ्गवाले तथा वनमालासे अलंकृत परब्रह्मस्वरूप श्रीधरदेयका | नमः,’ ” इत्कविण्यै नमः’, ‘ॐ ज्ञानायै नमः’, ध्यान करें। ॐ क्रियायै नमः’, ‘ गायै नमः’, ‘5 प्रायै नमः’, इसके बाद इन स्तोत्रमैं भगवान्की स्तुति करनी ‘ॐ सत्यायै नमः’, ‘* ईशानायै नमः’, ‘ॐ अनुग्रहायै चाहिये

नम:’-इन मन्त्रोंसे श्रीधरके आसनका पूजन करके निवासाय देवाय नमः ऑपतये नमः। | हे काह!) पूर्वोक्त धाता, विधाता, गङ्गा आदि देयोंकी मुला धराय सशाङ्कय प्रदाय नमो नमः ।। करना चाहिये । तदनन्तर हुरिका आवाहन करके पूजन करे। घलभाष शान्ताय मतं च नमो नमः। जसके बाद हाँ औधय त्रैलोक्यमोइनाम सियाचे नमः। श्रीपर्वतनिवासाय नमः श्रेयस्कराय छ के श्रीगोपालज्ञीकी पूजा, जैलोक्यमोहन-मन्त्र तथा श्रीधर-पूजन-विधि ।

प्रेयसां पतये चैव अयाय नमो नमः ।। श्रीश्वराय विषाचे नमः। नमः श्रेयःस्वरूपाय कराय नमो नमः ॥ -यह मन्त्र देवाधिदेव परमेश्वर विष्णुका याचक है। गयाष घण्याय नम भूयो नमो नमः। यह समस्त रोगको हरण करनेवाला तथा सभी ग्रहोंका स्तोत्रं कृत्वा नमस्कृत्य देवदेवं विसर्जयेत् ॥ शमनकर्ता है। यह सर्वपापविनाशक और भुक्ति-मुक्ति इति रुड़ समापाता पूजा विस्पोर्महात्मनः। प्रदायक है। यः कति पल्लाभका स यानि परमं पदम् ॥ साधकको इन मॉक द्वारा अङ्गन्यास करना चाहिये।

(३३ । १५-१५) ‘ॐ हां दयाय नमः, ॐ हैं शिरसे स्वाहा, ॐ हैं। है देव! आप लक्ष्मीनिवास और श्रीपति हैं, आपको शिखायै वषट्, ॐ हैं कवचाय हुम्, ॐ हौं नेत्रत्रयाय वौषट्, मेरा नमस्कार हैं। आप श्रीधर हैं, शाङ्गपाणि हे पूर्व : छः अस्त्राय फट्।’ | साधकको लक्ष्मी प्रदान करनेवाले हैं, आपको मेरा आत्मसंयम साधकको चाहिये कि यह आङ्गन्यास | नमस्कार है। आप ही बताभ, शान्तिस्वरूप तथा करके आत्ममुद्रा प्रदर्शित करे। तदनन्तर हुदाहामें विराजमान | ऐश्वर्यसम्पन्न देंव हैं, आपको मैं प्रणाम है।

श-घक़से युक्त, कुन्द-पुष्य और चन्द्रमाके समान शु आप श्रीपर्वतपर निवास करनेवाले हैं, समस्त मङ्गलोंके कान्तिवाले, श्रीवत्स और कौस्तुभमसे समन्वित, वनमाला स्वामी, सर्वकल्याणकर्ता तथा सर्वमङ्गलाधार हैं, आपकों तथा इजहार धारण किये हुए परमेश्वर भगवान् विष्णुका । मैं बार-बार नमस्कार है। आप कल्याण और ऐश्वर्य प्रदान मान करें।

करनेवाले हैं, आपको मेरा नमन है। आप शरण देनेवाले तदनन्तर ‘विष्णुमण्डलमें अवस्थित होनेवाले आप तथा सर्वश्रेष्ठ हैं, आपकों बारम्बार प्रणाम है। सभी देवगणों, पार्षदों तथा शक्तियोंका मैं आवाहन करता इस प्रकार देवाधिदेव और भगवान् विष्णुका स्तवन है, पहाँपर आप सब पधाएँ’- ऐसा कहकर और नमन करके उनका विसर्जन करना चाहिये। भक्तिपूर्वक ‘ समस्तपरिवारामाच्युताय नमः, ॐ धात्रे नमः, इस पूजा करनेवाला परमपदक प्राप्त करता है। जो ॐ थियात्रे नमः, ॐ गङ्गायै नमः, ॐ यमुनायै नमः, विष्णुपूजाको प्रकाशित करनेवाले इस अध्यायका पाठ # शनिधये नमः, ॐ पद्मनधये नमः, ॐ अपाय नमः, करता है, यह इस लोकमें समस्त पापोंसे मुळ होकर अमापाय नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ आधारशी अन्तमें विष्णुके घरमपदको प्राप्त करता है। नमः, ॐ कूर्माय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ श्रियै नमः रुने का है प्रभो ! हे जगत्के स्वामी! पुनः उम ॐ धर्माय नमः, ॐ ज्ञानाय नमः, ॐ वैराग्याय नमः, प्रकारका पुजा-विधिको बतानेको कृपा करें, जिसके द्वारा ॐ ऎश्वर्याय नमः, ॐ अथर्माय नमः, ॐ अज्ञानाय नमः, इस अत्यन्त दुस्तार भवसागरको पार किया जा सकता है। ॐ अवैरायाय नमः, ॐ अनैऋर्याय नमः, ॐ वं मत्वाब श्रीहरि बोले-है वृषभध्यज! मैं विष्णुदेव पूजन- नमः, ॐ ई जसे नमः, ॐ ने तमसे नमः, ॐ ॐ कन्दास विधानकों कह रहा हैं। हैं महाभाग ! इस भोंग और मोक्षको नमः, ॐ नं नालाय नमः, ॐ ला पाय नमः, ॐ ॐ देनेवाले कल्याणकारी पूजनके विपसमें सुनें। अर्कमावलाय नमः, ॐ ॐ सोममलाय नमः, ॐ चं | हैं रुद्र! सर्वप्रथम मनुष्यको स्नान करना चाहिये। हमलाय नमः, ॐ विपलायै नमः, ॐ कर्मियै नमः, तदनन्तर संध्यासे निवृत्त होकर यज्ञमण्डपमें प्रवेश करना ॐ ज्ञानायै नमः, ॐ क्रियायै नमः, ॐ योगायै नमः। चाहिये। हाथ-पैरका प्रक्षालनकर विधिवत् आचमन करके ॐ ॐ नमः, ॐ सत्यायै नमः, ॐ शानायै नमः। न्यासविधिके अनुसार दोनों हाथोंके द्वारा व्यापक रूपमें # अनुयै नमः-इन नाममन्त्रमै गन्ध-पुष्पादि उपचारोंक मुलमन्त्रको करन्यास करना चाहिये। हैं ! उन विष्णुगु- द्वारा धाता, विधाता, गङ्गा, यमुना आदि दैवताओंका देवकै मूलमन्त्रकों कह रहा हैं, आप सुनें नमस्कारपूर्वक पूजन करना चाहिये।

 

* पुराणं गारुडं वक्ष्ये सारं विष्णुकथाश्नमम्

तदनन्तर है कुद् ! सृष्टि तथा संहार करनेवाले, गदायै हुं फट् नमः, ॐ त्रिशुला फट् नमः, ॐ चक्राय सभी पापोंको दूर करनेवाले परमेश्वर भगवान् विष्णुका हूं फट् नमः, ॐ पद्माय हुं फट् नमः, तथा ॐ यौं विष्वक्सेनाय मण्डनमें आवाहन करके इस विधिसे उनका पूजन करना नमः।

हैं महादेव! इस प्रकार इन मन्त्राँसे अधिकारी मनुष्योंकों जिस प्रकार सर्वप्रधम अपने शारीर न्यास किया चाहिये कि वे बिके विभिन्न अङ्गकी पूजा करें, तदनन्तर जाता है, उसी प्रकार प्रतिमामें भी सर्वप्रथम न्यास करना ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुका पूजन करके इस स्तुतिले उन चाहिये। तत्पश्चात् मुद्राको प्रदर्शनकर अयं पाद्यादि उपधारोको अविनाशी परमात्म प्रभुका स्तवन करें अर्पण करना चाहिये। उसके बाद स्नान, वस्त्र, आचमन, विष्णवे देवदेवाय नमो मैं भविष्णवें ॥ गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्यरूपमें चरु र्पत करके विष्यावे वासुदेवाय नमः स्थितिकराव छ। उन देवकों प्रदक्षिणा करनी चाहिये। तदनन्तर उनके असिष्णवे नमशैव नाम: लबशायिने ।। मन्त्रका जप करके इस जप-पूजनको उन्हें ही समर्पित कर देवानां भवें चैव यज्ञान प्रभवे नमः ॥ देना चाहिये।

मुनना प्रभचे नित्य अक्षा भविष्यावें ॥ ‘ हे वृषभध्वज! उन श्रीधरदेवकी पूजा उनके मूल मन्त्र जिष्याचे सर्वदेवानां सर्वगाय महात्मने। करनी चाहिये । है त्रिनेत्र! इस समय मैं उन मन्त्रको भी मान्छङ्वन्याय सर्वेशाय भानों नमः ॥ कह रहा हैं, जिनसे न्यास तथा विष्णुके परिवार, दिग्देवता सर्वलोकहितार्थाय लोकाश्यक्षाय वै नमः।

और आयुध आदिकी पूजा करनी चाहिये। उन्हें आप सुनें १. सर्वगोप्चें सर्वक सर्वदविनाशिने ॥ | हां दयाय नमः, ॐ ही शिरसे नमः, ॐ हूं शिखायै वरप्रदाय शान्ताय चण्याय नमो नमः॥

नमः, ॐ है कयचाय नमः, ॐ हौं नैत्रत्रयाय नमः, ॐ हः झारप्रयाय सुरूपाय धर्मकामार्थदायिने ॥ | अस्त्राय नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ शाय नमः, ॐ पद्माय ।

| ( ३१ । ३४-३५) नमः, ॐ चक्राय नमः, ॐ गदायै नमः, ॐ यमाय नमः, देवाधिदेव, तेजोमूर्त भगवान् विष्णुदेवके लिये नमस्कार | ॐ कौस्तुभाय नमः, ॐ वनमालायै नमः, ॐ पीताम्बराय है। संसारको स्थिति ( पालन) करनेवाले वासुदेव विष्णुके नमः, ॐ ङ्गाय नमः, ॐ मुसलाय नमः, ॐ पाशाय नमः, लिये नमन हैं। प्रलयके समय संसारको अपने मूल कारण | ॐ अशाय नमः, ॐ शाय नमः, ॐ शराय नमः, प्रकृत्रिमें तीन करके आत्मसात्कर शयन करनेवाले विष्णुको | ब्रह्मणे नमः, ॐ नारदाय नमः, ॐ पूर्वीसभ्यो नमः, प्रणाम है। देवोंके अधिपति तथा यज्ञोंके अधिपति विष्णुको | ॐ भागवतेभ्यो नमः, ॐ गुरुभ्यो नमः, ॐ परमगुरुभ्यो नमन है। मुनियों तथा यक्षोंक प्रभु और समस्त देवघर नमः, ॐ इन्द्राय सुराधिपतये सवाह्नपरिवाराय नमः, विजय प्राप्त करनेवाले, सबमें व्याप्त रहनेवाले, महात्मा, अग्नये तेजोंधपतये सवाहनपरेवाय नमः, ॐ यमाय ब्रह्मा, इड-रुद्रादिके वन्दनीय सर्वेश्वर भगवान् विष्णुके मैंताधिपतयें सथानपरिबाराय नमः, ॐ निलये उधिपतये लिये नमस्कार है। सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ वरुणाय जलाधिपतये समस्त लोकौंको कल्याण करनेवाले, लोकाध्यक्ष, सयानपरिवाराय नमः, ॐ वायचे प्राणाधिपतये सर्वगोता, सर्वकर्ता तथा समस्त दुष्टोंके विनाशक भगवान् सचाहनपरिवाराय नमः, ॐ सौमाय नक्षत्राधिपतये विष्णुके लियें नमन है। वर प्रदान करनेवाले, परम शान्त, । समानापरवानाय नमः, ॐ ईशानाय विद्माधिपतये सर्वत्रैछ, शरणागतकी रक्षा करनेवाले, सुन्दर रूपवाले, धर्म सयानपरिवारास नमः, ॐ अनन्ताय नागाधिपतयें काम तथा अर्थ—इस त्रिवर्गके प्रदाता भगवान् विष्णुके सवाहनपरिवाराय नमः, ॐ ब्रह्मणे लोकाधिपतये लियें बार-बार प्रणाम हैं। मचानपरिबाराय नमः, ॐ वज्राय हुं फट्स नमः, ॐ शक है शङ्कर ! इस प्रकार ब्रह्मस्वरूप, अपच, परात्पर – हुं फट् नमः, ॐ पडाय हुं फट् नमः, ॐ उल्लङ्काय हुँ , भगवान् विष्णुकी स्तुति करके अपने हृदयमैं इनका ध्यान नमः, ॐ पाशाय हुं फट् नमः, ॐ यजाय हुं फट् नमः, ॐ

# पनवार्चनविधि #

करनी चाहिये और मूल मन्त्रका जप करना चाहियें। जो पूजाविधको कहा है। है ! जो विद्वान् पुरुष इसका अधिकारी अप्ति ऐसा करता है, वह भगवान् विष्णुको पाठ करता है, यह विष्णुभक्त हो जाता हैं। इसे ज्ञों सुनता प्राप्त कर लेता है। है कुद् ! इस प्रकार मैंने आपसे इस हैं अथा सुनाता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। रहस्यपूर्ण, परम गुण, भुक्ति-मुक्तिप्रद और उत्तम विष्णु को पञ्चतत्वार्चन-विधि मद्देमारने का है श-चक्र-गदाधर। आप ये यासुदेव कृष्ण जगत्के स्वामी, पीतवर्णके कौशेय अञ्चतत्त्वक उस पूजा-विधिक मुझे बतानेकी कृपा करें, (शिम) वस्त्रों से विभूषित, सहस्र सूर्यको किरण जिसका ज्ञान प्राप्त कर लॅनेमात्र ही मनुष्य परमपदको समान तेंज:स्वरूप तथा दैदीप्यमान मकराकृति-कुलसे प्राप्त कर लॅता हैं। मभित हैं, मैं ना भगवान् कृष्णका अपने हुदय श्रीहरिनें कहा है सुन्नत शिव! मैं आपसे पञ्चतत्त्व- कमालमें ध्यान करना चाहिये । तदनन्तर भगवान् सकर्षका मुजा विधिको कह रहा है. यह दिव्य, मङ्गलस्वरूप, ध्यान करे। उसके आद अथाक्रम प्रद्युम्, अनि तथा कल्याणकारी, रहस्यपूर्ण, श्रेष्ठ तथा अभीष्टोंकी सिद्धि श्रीमन्नारायणके स्वरूपका ध्यान करके उन देवाधिदेवसे करनेवालौं है। हैं महादेव ! ऐसे उस परम पवित्र कलिदोष- प्रात इन्द्रादि देवका ध्यान करके मूल मन्त्र द्वारा दोनों विनाशक पूजन-विधिका आप श्रवण करें।

हाथोंसे व्यापक रूपमैं करन्यास करें, तत्पश्चात् अङ्गन्यासके है सदाशिव! एक ही परमात्मा जो वासुदेव श्रीहरि हैं, मन्त्रको अङ्गन्यास करें। है महादेव ! सुन्नत ! उन न्स एवं चे ही अविनाशी, शान्त, सनातन, सतु-स्वरूप हैं। वे ध्रुव पूजा मन्त्र इस प्रकार है (नित्य, अल), शुद्ध, सर्वव्याप्त जथा निरञ्जन हैं। जें ही ‘ॐ आं हृदयाय नमः, ॐ ॐ शिरसे नमः, ॐ ॐ विष्णुदेव अपनी मायाकै प्रभावसे पाँच प्रकारसे अवस्थित हैं। शिखायै नमः, ॐ ऐं कवचाय नमः, ॐ ओं नेयाय नमः वे जगत्का कल्याण करनेवाले हैं। वे हीं अद्वितीय विष्णु ॐ अः अस्त्राय फट्, ॐ समस्तपरिवारापाध्युताय नमः, यासुदेव, संकर्षण (बलराम), प्रद्युम्न, नरुद्ध तथा ॐ धाचे नमः, विधाों नमः, ॐ आधारशक्यै नमः, नारायणस्वरूपसे पाँच रूपों (तत्त्व में स्थित हैं। * कुमांय नमः, अनाथ ममः, ॐ अधिव्यै नमःहे वृषध्य! जनार्दन थिके उक्त पञ्चपोके याचक अमय नमः, ॐ ज्ञानाय नमः, ॐ मैंग्माय नमः, मन्त्र इस प्रकार हैं ॐ ऎसर्याय नमः, ॐ अधर्माय नमः, ॐ अनानास ममः, ॐ वासुदेवाय नमः, ॐ ॐ संकर्षणाय नमः, ॐ ॐ ॐ अनैश्चर्याय नमः, ॐ ॐ अमलाप नमः, सों प्राय नमः, अ आ; अनिकाय ममः, ॐ ॐ मारायणाय सोपमहलाय नमः, ॐ वं वहिपालाय नमः, ॐ वं नमः वासुदेवाय पराह्मणे शिवाय जैनोरूपाय व्यापिने । | – ये पाँच मन्त्र उक्त पाँच देवताओंके वाचक हैं, जो सर्वदेवाधिदेवाय नमः, ॐ पाञ्चजन्याय नमः, ॐ सुदर्शनाय भी पालक, महापातक कि विनाशक, पुण्यजनक तथा नमः, ॐ गद्दायै नमः, ॐ पद्माय नमः, ॐ शिथै नमः, समस्त रोगोंको दूर करनेवाले हैं। अब मैं आपसे मङ्गलमय लियै नमः, पुष्यै नमः, ॐ गीत्यै नमः, शायै नमः, पातत्त्वाचन-विधिको कह रहा हैं। हैं शिव ! इसकौं जिसे मीन्यै नमः, ॐ इन्द्राय नमः, अग्नये नमः, ॐ यमाय विधिसे और जिन मन्त्रों द्वारा सम्पन्न करना चाहिये, नमः, ॐ चितये नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ यायचे नमः, उसका आप श्रवण करें।

|ॐ सोमाय नमः, ॐ ईशानाय नमः, ॐ अनन्ताय नमः -इन पाँच बैंकों मूलामें सर्वप्रथम स्नान करके आसमें ममः, ॐ विनाय मः।। विधिवत् संध्या करना चाहियें। तदनन्तर हाथ-पैर धोकर तत्पश्चात् ‘ॐ पाय नम:’ ऐसा कहकर स्वस्तिक पूजा-गहमें प्रवेश करके विद्वान् साधकको चाहिये कि बहू और सर्वतोभद्रादि मण्डलोंका निर्माण करके इस माहुनमें

आचमन करके मनोनुकुल आसन लगाकर बैठ ज्ञाय इन्हीं मनसे का पूजन करना चाहिये। और-“* औं रम्-इन मन्त्रोंसे शोषणादि क्रिया करे। मूल मन्त्र पाय आदिका निवेदन करके स्नान, वस्त्र,

 

* पुराणं गारु वक्ष्ये सारं विष्णुकथाश्रयम् +

आचमन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य प्रदान करके आदि तथा अत्तसे रहित सनातन प्रभुकों आरआर नमस्कार नमस्कार तथा प्रदक्षिणा करनी चाहिये। है शङ्कर ! इसके है। सृष्टि और संहारकर्ता, ब्रह्माके भी स्वामी तथा ज्ञा चक्र, बाद यथाशक्ति मूल मन्त्रका जपकर इसे प्रभुको समर्पित गदाधारी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। नमस्कार है।”

कनिकालके दोषोंको नष्ट करनेवाले, देवोंके आँश ! तदनन्तार भगवान् वासुदेवाका स्मरणकर इस स्तोत्रका आपकों बारम्बार प्रणाम हैं। सम्पूर्ण जगत् रूपी मूल वृक्षका पाठ को हेदन करनेवाले, मायाका भेदन करनेवालें, यात-में नौक ॐ नमो वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च ॥ धारण करनेवाले, तीर्थस्वरूप, सत्व, रजम् तथा तमोरूप एवं प्रद्युम्नामादिदेवायोनिरुद्धाय नमो नमः। वस्तुत: निर्गुण तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव-इन तीन रूपोंमें नमो नारायणायैव नराणां पतये नमः ॥ अवस्थित रहनेवाले मोक्षदायक भगवान् विष्णु परमेश्वरको मरपून्याय कीत्र्यास सतुत्याय वरदाय छ। नमस्कार है। मोक्षके द्वारभूत, धर्मस्वरूप, निर्माणारूप, समस्त अनादिनिधनायैव पुराणाय नमो नमः ।। अभीष्टों को प्रदान करनेवाले परब्रह्मस्वरूप आपके लिये सृष्टिसंहारक च असणः पतये नमः। बार-बार नमस्कार हैं। इस गहन संसारसागर में मैं इव हा नयों में वेदवेयाय शचक्रधराय च।। हैं, आप मेरा उद्धार करें। हैं देवदेवेश्वर ! हे जगत्के स्वामी ! कलिकल्मषहर्षे च सुशाय नमो नमः। आपके अतिरिक्त मेरा कोई भी रक्षक न हैं। सर्वत्र व्याप्त संसारवृक्षों च, मायाभेजें नम नमः ॥ रहनेवाले है भगवान् विष्णु ! मैं आपको शरणमें हैं। बहुरूपास तीर्थाय त्रिगुणायागुणाय च। हैं भगवन्! ज्ञानरूपी दौपकको अवलितकर मैं ( अज्ञानरूपों) ब्रह्मविष्यत्रीशरूपाय मोक्षदाय नमो नमः ॥ अन्धकारों दूर करके मुझे प्रकाशित कर दें। मोक्षद्वारा धर्माय निर्वाणाय नमो नमः। इस प्रकार समस्त कष्टोंको दूर करनेवाले देवेश सर्वकामप्रदायैव अग्रस्थापिणे । भगवान् वासुदेवकों स्तुति करके हे नीललोहित शिव ! अन्य संसारसागरें ऑरें निमग्नं मां समुदर। , वैदिक स्तोत्र-पाठसे भी स्तुति करके पश्चतत्त्वसे युक्त उन त्वाइयों नास्ति देयेरा नास्ति माना गाभा । भगवान् विष्णका अपने हृदयसमें ध्यान करें। इसके बाद त्वामॅच सर्वगं विष्णु गलो हं शरणं ततः। विसर्जन करना चाहिये। इस प्रकार हैं शङ्कर! सम्पूर्ण ज्ञानदीपप्रदानेन तमामुक्तं प्रकाशय ॥ कामनाओंको प्रदान करनेवाली वासुदेवकी श्रेष्ठ पुजा [३३।३०-३८ कहाँ गयीं। इस पूजाके करनेमासे मनुष्य कृतकृत्य हों हे वासुदेव ! हे संकर्षण (अलराम ! आपको नमस्कार जाता हैं। हैं। हैं प्रद्युम्न, आदिदेव, अनिरुद्ध ! आपके लिये नमस्कार में रूद् ! जो व्यक्ति इस पञ्चतत्त्वार्चनकों पढ़ता है, सुनता हैं। है नारायण ! नराधिपति ! आपको नमन है, कौर्तन करने हैं अथवा दुसरौंको सुनाता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त योग्य, मनुष्योंसे पूजनीय, स्तुति करने योग्य, घर देनेवाले, होता है। (अध्याय ३२)

सुदर्शनचक्र-पूजा-विधि कुड़ने कहा है शङ्-गदाधर ! उस सुदर्शनकी पूजाके तथा पद्म धारण करनेवाले, सौम्य आकृतिबाले, किरीट विषयमें मुझे बताये, जिसे करनेसे ग्रहदोष और रोगादि- भगवान् विष्णुदेवका आवाहन करके गन्ध, पुष्प, धूप, दीप सभी कष्ट विनष्ट हो जाते हैं।

आदि विविध उपचारोंसे पूजा करें। हरिंने कहा-ॐ वृषभध्वज! सुदर्शनचक्रफी पुजा- पूजाके अन्त मूल मन्त्रका १०८ बार जप करें । विधिकों मैं कह रहा हूँ. आप सुनें। सर्वप्रथम स्नान करकें हैं रुद् ! ज्ञों इस प्रकार सुदर्शनचक्रका उत्तम पूजन करता इरिका पूजन करें। साधकको चाहिये कि अपने निर्मल एवं है, वह इस सॉकर्मे समस्त रोगोंसे विमुक्त होकर विष्णुलोकको शुभ हुद्दय-कमलमें भगवान् सुदर्शनदेव विष्णुका यान आप्त करता हैं। मन्त्र-जपके पश्चात् सभी व्याधियों को बिना करे। हे महादेव! इसके बाद माइल श, चक्र, गदा करनेवाले इस स्तोत्रका पाठ करना चाहिये

 

* भगवान् इयग्रीवके पूजन विधि +

नमः . सुदर्शनाचैव सहस्त्रादित्यवर्चसे ।। रे (चक्रकै अवयव}-वालें, नैत्रस्वरूप, सर्वदुष्टविनाशक वालामालाग्नदीप्ताय लाराम चचे। तथा सभी प्रकारके पापोंको नष्ट करनेवाले आपको नमन सर्वदुष्टविनाशाय सर्वपातकर्माने। हैं। सुचक्र तथा विचक्र नामधारी, सम्पूर्ण मत्रका भेदन सुधक्काय विचक्राय सर्वमन्त्रविभेदिने। करनेवाले, जगको सृष्टि करनेवाले, पालन-पोषण करनेवाले प्रसय जगानें जगद्विवसिने नमः ॥ एवं ज्ञातुका संहार करनेवाले है सुदर्शनचक्र! आपको पालनार्थाय लोकानां दुष्टासुरविनाशिने ।। नमस्कार हैं। (संसारकी रक्षा करनेके लिये) देवताओंका माय चैव सौम्याय नाणाय च नमो नमः ।। कल्याण करनेवाले, दुष्ट राक्षसोंका विनाश करनेवाले, नमश्चक्षुःस्वरूपाय संसारभयभैदिने। दुष्टोंका संहार करने के लिये बग्न-स्वरूप एवं प्रचण्ड माघापरभेने च शिवाय च नमो नमः || स्वरूप और सजनके लिये सौम्य-स्वरूप धारण करनेवाले मानिग्रछपाय मागां पतये नमः ।। आपको बारम्बार नमस्कार हैं। जगत्के लिये नेत्रस्वरूप कालाय मृत्यवें चैव भीमाय च नमो नमः ॥ संसारभयकों काटनेवाले मायारूपी पिंजाइँका भेदन करनेवाले, भक्तानुग्रहदात्रे च भक्तगोप्ने नमो नमः ।। कल्याणकारी सुदर्शनचक्नको नमस्कार हैं। ग्रह एवं विष्णुरूपाय शान्ताय घायुधानां धराय च।। अतिग्रस्वरूप, ग्रहपति, पलस्वरूप, मृत्युस्वरूप, पापात्माऑक विज्ञस्याय घसाय नाम ‘भूयो नमो नमः ।। लिये महाभयंकर आपके लियें बार-बार नमन हैं। भक्तपर अनि स्तोत्रं महत्पुण्यं चक्रम्य तव कीर्तितम् ॥ कृशा करनेवाले, उनके अभिरक्षक, विष्णुस्वरुप, शान्तस्वभाव, छ: पनु परया भक्त्या चिालक स गच्छति।। समस्त आयुधको शक्तिको अपनेमें धारण कर स्थित रहनेवाले चक्रपूजाविधिं यश्च पठेहड़ जिनेन्द्रियः । । बिष्णु शस्त्राभूत है |दर्शनचक्र! आपके लिये बारम्बार स पार्ष भस्मसात्या विष्णुलोकाय कल्पते ॥ नमस्कार है।

६ ३३ । ८–१६) हे शङ्कर! सुदर्शनचक्रके इस मत्स्य शाली स्तोत्रका सहस्सों सूर्य के समान तेज:सम्पन्न सुदर्शनचक्नके लियें जो मनुष्य परम भक्तसे पाठ करता है, वह बिष्णुलोकको नमस्कार है। तेजस्थौ किरणोंकी मालाओंसे दीप्त हजारों प्राप्त करता हैं। ( अध्याय ३३)

भगवान् हयग्रीवके पूजनकी विधि रुड़ने कहा–४ पौकैश ! हे गदाधर! आप पुनः करन्यास करना चाहिये। देवार्चनविधिको बतायें। आपके द्वारा बार-बार देय – हैं शङ्कर! वे हयग्रीव देव शङ, कुन्दपुष्य, चन्द्रुके पूजननिधिको सुनकर भी मुझे नृप्ति नहीं हो रही हैं। सदृश श्वेतवर्ण, कमलनाखतन्नु और उतधातुको कान्तिकें | श्रीहरिने कहा है कुद् ! अब मैं यौव नामके समान हकान्तिको धारण करनेवाले, गौकें इधक भौना देयके पूजनविधानकों कहता हैं, आप सुनें। उसकै करनेसे और करोड़ों सुके सदृश प्रतिभासित होनेवाले, शह. जगनुके स्याम भगवान् विष्णु अत्यन्त संतुष्ट हो जा। चक्र, गदा तथा पद्मको धारण किये हुए चार भुजाम्राले हैं।  हैं शङ्कर ! उस पूञ्जनका मूल मन्त्र हुअग्रवद्देवका हीं वे सर्वव्यापी देवता मुकुट, कुण्डल, वनमालासे सुशोभित, वाचक है। वह परम पुण्यशाली मन्त्र इस प्रकार है- सुदर्शनचक्रसे युक्त, सुन्दर-सुन्दर कपलोंवालें, पताम्वर कों ‘ॐ सौं क्षौं शिरमें नम:’ यह प्रणय-युक्त मन्त्र सभी धारण किये हुए हैं। सभी देयोंसे युक्त उन विराट्दैवकों प्रकारको विद्याओंको प्रदान करनेवाला है।

अपने भावना करके अङ्गमञोंमें तथा मूल मन्त्र न्यास ‘ॐ झां हृदयाय नमः, ॐ क्ष शिरसे स्वाहा, ॐ धू करना चाहिये। इसके पश्चात् मूल मन्त्रमै हौं शङ्ख पद्यादिको शिषायै वषद्, ॐ नैं कवचाय हुम्, ॐ नेत्रत्रयाय मङ्गलमयी मुद्राएँ प्रदर्शित करना चाहियें। हैं शङ्कर! इस सौषद्, ॐ ह्यः अस्त्राय फट्-इन मन्त्रोंसे अङ्गन्यास और प्रकार मुद्राएँ दिखा करके मूल मन्त्र विष्णुका ध्यान करके अर्चा करनी चाहिये।

 

* पुराणं गारुडं यथै सारं विष्णुकधाञ्जयम् +

इनका व्यास भी करना चाहिये। न्यास करनेके पश्चात् देवों | हैं रुद्र! इसके बाद हयग्रवके आसनके संनिकट और असुरोसे नमस्कृत देवाधिदेव परमेश्वर भगवान् हयग्रीवका | अस्थत रहनेवाले जौ अन्य देय हैं, उनका आवाहन पुन: ध्यान करना चाहिये और जड़-चक्रादि मङ्गलमयी करना चाहिये । यथा मुद्राएँ प्रदर्शित करनी चाहिये। उसके बाद पाद्य, अयं, * हुयग्रीवासाम्य भाग छ देवताः ।

आचमन तथा स्नान प्रदान करें। हे वृषध्वज! उन्हें वस्त्र -इस प्रकार आवाहन करके स्वस्तिक या सर्वतोभद्- दान करनेके बाद आचमन दानकर उनको सुन्दर मरक्षके अन्तर्गत इन देवका पुन करके द्वारपर, धाता यज्ञोपवीत समर्पित करना चाहिये और उन्हें पाह्य, अध्य और विधाताकी पूजा सम्पन्न करनी चाहिये।

आदि प्रदान करना चाहिये। अनन्तर मूल मन्त्रमें भैरवदेवको हे वृषध्वज! ‘ममतपरिवाराय अच्युताय नमः- इस पाह्यादि प्रदान करते हुए उनका विधिवत् पूजन करना मन्त्रसे मण्डलकं मध्यमें भगवान् विष्णुका पूजन करके चाहिये। द्वारपर गङ्गा, महादेव तथा शङ्ख एवं पद्म नामक निधिक है शिव! इसके आद शुभदायिनी तथा ऐश्वर्य प्रदान पूजा करके अग्रभागमें गरुड़ तथा मध्यभागमें आधार करनेवाली परमादेवी लक्ष्मीको पूजा करें। पूर्व दिशा नामवाती शक्ति की पूजा करनी चाहियें।

‘ॐ शाय नम:’ कहकर शड्का, दक्षिण दिशामें | हैं महादेव ! तदनन्तर कुर्म, अनन्त एवं पृथ्वींका पुजान ‘ॐ पद्माय नम:’ कहकर पद्मका, पश्चिम दिशामें ‘ॐ

करे और अग्निकोणमें धर्म, नैऋत्यकोशमें ज्ञान, वायुकोणमें चक्काय नमः’ में चक्रका तथा उत्तर दिशामें ‘ॐ गदायै नमः वैराग्य तथा ईशानकोणमैं ऎश्वर्यका पूजन करना चाहिये। मैं गद्दाका यथाक्रम पुजन करें। इसके बाद पूर्व दिशामें अधर्म, दक्षिण दिशा में अज्ञान, पश्चिम इस प्रकार पुनः पूर्व दिशामें ‘ नाङ्गाय नमः’ में दिशामें अवैग्य तथा उत्तर दिशामें अनैश्चर्यका भौं पुजन पाङ्ग दक्षिण दिशामें ‘ॐ मुसलाय नम:’ से मुसल, पश्चिम करना चाहिये। इसके बाद मण्डलाके मध्य सन्च, जस् तथा दिशामें ‘ॐ पाशाय नमः’ में पाश, उत्तर दिशा में तामस्-इन तीन गुणको पूजा करके मध्यभागमें ही कन्द, ‘४ अंकुशाय नम:’ में अंकुश तथा मध्य ‘ सशराब नाल और पद्यकीं विधिवत् पूजा करें। तदनन्तर मध्यदैशमैं धनुषे नमः’ कहकर शरयुक्त धनुषकों पूजा करनी चाहिये।

अर्क, सोम और अग्निमण्डलका पूजन करना चाहिये। हे ! पुनः पूवं आदि चार दिशाओंमें श्रौत्स, | है चपनज़! विमाना. कमी, ज्ञान, सिपा, मोंगा, कौस्तुभ, सनमाना और मसमय पीताको पुजा करके प्रह, सत्या, ईशाना तथा अनुग्रह्म नामक यै शक्तियाँ हैं। पुनः शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् हयग्रीवको पूजा करें। पुदि दिशाओं में पूर्व, दक्षिण पश्चिम तथा उत्तरमें अस्थत तदनन्तर ‘ॐ ब्रह्मपों नमः’ में ब्रह्मा, ‘ नारदाय मध्यपत्रपर यथाक्रम, ‘ॐ बिमलायै नमः’, ‘ॐ अकर्षण्यै नम:’ में नारद, ‘ॐ सिद्धाय नमः’ में सिद्ध, ‘ गुरुभ्यो नमः’, ‘ॐ ज्ञानायै नमः’, “ॐ क्रियायै नमः’, ‘ योगायै नमः’ से गुरु, ‘ घरगुरुभ्यो नमः’ में परगुरु और नमः’ इत्यादि मन्त्रों से विमलादि शक्तियोंका पुजन करना ‘ॐ गुरुपादुकाभ्यां नमः’ में गुरुपादुकाकी पूजा करें।

चाहिये। कल्याणकाम व्यक्तिकों चाहिये कि ये अनुग्रह तत्पश्चात् ” सवानाय सपरिवाय इन्द्राय नमः’, | नामक शक्तिको मृज्ञा पद्मकी कणिकामें के अनमें ‘ सधानाच समरियाग्राम में नाम:, समाय नमः मम; ‘ इस मुन्नासे हो ।

‘ नि*तये नमः’ ‘ॐ वरुणाय नमः’, “* यायवे नमः’, | इस विधिसे स्नान, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य ‘ सोमाय नमः, ॐ ईशानाय नमः’, ‘ॐ अनन्ताय

समर्पण करके देयके आसन मङ्गलमय पूजन करना चाहिये। नामः’, ‘ॐ ब्रह्मणे नम:’-इन मन्त्रोंसे पूर्व आदि दिशाओं में इस पूजाके पश्चात् देवाधिदेव भगवान् हयग्रवदेवका मण्डलमें ऊर्ध्वदिशापर्यन्त इन्द्र, अग्नि आदि सभी दिग्-देवताओंकी आवाहन करना चाहिये। आवाहन करके समाहित होकर पूजा करनी चाहिये।

 

* गायत्रींन्यास तथा संध्याविधि

इसके बाद ‘ॐ यज्ञाय नमः’, ‘ॐ शक्तये नमः’, त्रिगुणायागुणायैव ब्रह्मविष्णुस्वरूपिणे। * पवाय नमः’, ‘ बङ्गाय नमः’, ‘ॐ पाशाय नमः’, कर्जे जे सुशाय सर्वगाय नमो नमः ।। * ध्वजाय नमः’, ‘३० गदायै नमः” त्रिशुलाय नमः’

[३४ | ५४==५४) “ॐ चक्राय नम:’, ‘ॐ घयाय नम:-इन मन्त्रोंसे यज, सर्वविद्माधिपति, अश्वशिर भगवानको नमस्कार हैं।

शक्ति आदि आयुधकी पूजा करें। विद्यास्वरूप, विद्याप्रदायक उन देवके लियें बार-बार नमन । तत्पश्चात् ईशानकोणमें ‘ॐ विष्वक्सेनाय नमः’ इस है। शान्तुस्वरूप, त्रिगुणात्मक, सुर तथा असुरोंका निग्रह मन्त्रको विष्वक्सेनकी पूजा करे। इसी प्रकार अनन्तकी भौ करनेवाले, सभी दुष्टोंका विनाश करनेवाले, सर्वलोकाधिपति पुजा करै । है वृषभध्वज ! भगवान् हयग्नवकै मूल मन्त्र ब्रह्मस्वरूप उन देय हयग्यके लियें नमस्कार है। महेश्वरके गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य द्वारा उनकी पूजा करनीं लियें भी वन्दनीय, शङ्-चक्रधारी, जगतकै आदि कारण, चाहिये। तत्पश्चात् उन ( देव सग्रीव की प्रदक्षिणा करके परम उदार तथा सभी प्राणियोंका हित करनेवाले दैवके नमस्कार करें और यथाशक्त मूल मन्त्रको जपकर उन्हें लिये नमस्कार है। त्रिगुणात्मक, त्रिगुणातीत, ब्रह्मा-विष्णुस्वरूप, समर्पित कर दें। तदनन्तर दैवेश्वर भगवान् इयग्नकी इस जगानुक के कर्ता, मह, ईश्वर तथा सर्मथ्यापक जन प्रकार स्तुति करनी चाहिये।

भगवान् हयग्रीसको बारम्बार नमस्कार है। ॐ नमो हुयशरमें विद्याध्यक्षाय वै नमः ॥ इस प्रकार स्तुति करके अपने हदअकमलके मध्य नमो विद्यास्वरूपाय विद्यादाने नमो नमः। शङ्ग चक्र और गदाको धारण करनेवालें, करो सूर्योक नमः शान्ताय देवाय त्रिगुणायात्मने नमः ॥ समान कान्तिमानु, सर्वाङ्गसुन्दर, अविनाशी महेश्वरके भी ईश, सुरासुरनिन्छ सर्वदविनाशिने। देवाधिदेव, परमात्मा हुअग्नीयका मान करना चाहिये। सर्वलोकाधिपतये समरूपाय मैं नमः ॥ हैं शङ्कर! इस प्रकार मैंने भगवान् इयग्नौवकी पूजा नमसन्याय शचक्रराय छ। विधिका वर्णन किया। परम भक्तिपूर्वक जो इसका पाछ मम आह्माय दान्ताय सर्चसन्वहितास च॥ करता है, वह परमपदको प्राप्त होता हैं। (अध्याय ३४)

 

गायत्रींन्यास तथा संध्या-विधि श्रीहरिने कहा है शर! अब मैं गायत्रीदेवीके (पुजन) अक्षर तथा चतुष्पादके प्रत्येक चरणमें छ; अक्षर होते हैं। न्यासादिका वर्णन करूँगा, आप इसका श्रवण करें। इस जपमैं त्रिपदा और पुजनमें चतुष्पदा गायत्री मन्त्रको प्रयोग ( गायत्र-मन्त्र)-के ऋषि विश्वामित्र, दैवता साँवता, मस्तक करनेके लिये कहा गया हैं। ब्रह्मा और शिक्षा रद्ध हैं। ये विष्णुके हृदयमें रहनेवाली हैं। जप, ध्यान, यज्ञादि कृत्य एवं पूजनके कायमें नित्य में विनियोग-कालमें एफनेा है। इनका प्रादुर्भाव कात्यायन- इस सर्वपापविनाशिनी गायत्रीदेवीका विधिवत् अपने अङ्गोंमें गौत्रमें हुआ है, तीनों लोक इनके चरण हैं ताथा ये पृथ्वीको न्यास करना चाहिये। कोसमें स्थित रहती हैं। गायत्रीदेवीक स्वरूपको इस प्रकार पैर के अंगुष्ठ-भागमें, गुल्के मध्यमें, दोनों जंघाओं, जानकर [गायत्री मन्त्रका] आरह लाख जप करना चाहिये। दोनों भानुओं, ऊर्फ ‘भाग, गुस्थान, अपडकोष, नाही, इस मन्त्रके त्रिपाद तथा चतुष्पाद अर्थात् तीन चरण नाभि, शरीरकै उदरभाग, दोनों स्तन, हृदय, कण्ठ, ऑष्ठ, तथा चार चरण होते हैं। त्रिपादके प्रत्येक चरणमें आड़ मुख, ताल, दोनों स्कन्धप्रदेश, दोन नैन और भौंहों तथा -जिम गमत्र-मन्त्रको जप किया जाता है, वह शिक्षा गायत्री कहलाती हैं। जिसे मावोम्” यह जीका चतुर्थ पाई है। इस चम्पदा गायीका प्रयोग सुबमान. पुनन आदिमें होता है। ३- मुफ मैरक मुह पायौं । ३- गनु (मुरना) | ४- क्र—मुटनेक आपका भाग।

 

* पुराणं गारुई वक्ष्ये सारे विभ्याधासम् +

मस्तकमैं इस (गायत्र-मन्त्रका न्यास करके क़मज्ञा: गायत्री सिरके साथ तीन बार उच्चारण करनेको प्राणायाम | पूर्व, दक्षिण, उत्तर तथा पश्चिम दिशामें इनका न्यास करना कहते हैं। द्विज प्राणायामोंके द्वारा मानसिक, चाचिक तथा | चाहिये।

कायिक दयको भस्म कर लेता है। इसीलिये यथाविधि हैं झड़ ! इन गायत्रौदेवीके मन्त्रके वर्षों ( इंगों-कों कहू यधानियत सभी कालमें प्राणायामपरायण होना चाहिये। रहा हूँ। क्रमश: इसके (चौबीस) अक्षर इन्द्रनीलम, प्रातः ‘सूर्य’ इस मन्त्रके द्वारा, मध्याह्नमें ‘आपः अग्निसश, पौत, श्याम, कपिलवणं, चैत, विद्युत्भ, मुन’ इस मन्त्रमैं तथा सायंकाल ‘अग्निश्च मा मन्युश्च’ मौक्तिकवर्ग, कृष्ण, रक्त, श्याम, शुक्ल, पौंत, अंत, इस मन्त्रके द्वारा यथाविधि आचमन करके प्रणव-मनसे पद्मरागतुल्य, आङ्वर्ग, पाण्डुर, रक्त, आसबके समान युक्त ‘आप हि ‘इस ऋचासे कुशोदकके द्वारा मार्जन करते रक्तकृगमञ्जित, सूर्यसदृश, सौम्य, श्वेत, शङ्कौं आमाके हुए प्रत्येक पदपर जल सिरपर छिड़के समान तथा चैत हैं।

रजोगुणसे इत्पन्न होनेवाले पाप, तमोगुण और अज्ञानजन्य गायत्रोदेवके मन्त्रको जप करके मनुष्य जिन-जिन माघ, जाग्रत्, स्वप्न और सुशिको स्थिति में होनेवाले पाप पर्श करता है और नेत्रों में जिनका-जिनका तथा कार्यक, वाचिक एवं मानसिक ये नत्र जाप इन नौ अवलोकन करती हैं, में सभी पवित्र हो जाते हैं। गायनमें मुन्से (मार्जनहारा भम हो जाते हैं।

हो सर मन्ना नहीं हैं, ऐसा समझना चाहिये- मास्तम:स्वमत्थान् जाग्रस्थानमाप्तिान्। | यह्मस्पृशति हुन् यच्च पश्यति चक्षुषा। वाङ्मन:कर्मज्ञान् हौंषान् नयैतान् नभईन् । , पूतं भवति तत् सर्वं गायत्र्या न पर बिंदुः । (३६ ॥ ६) (३५॥ ११) दाहिने हाथमें जल लेकर उसे ‘इपदा’ मन्त्र द्वारा हरिने पुनः कहा–हें रुद्र ! अब पापविनाशिनौं अभिमन्त्रतकर सिरपर छोड़ दें। अघमर्षण मन्त्रक तौन, संध्याको विधिका वर्णन कर रहा हूँ। उसे आप सुनें । तन् छ:, आज अथवा बारह आवृत्त करके अघमर्षण करे। बार प्राणायाम करके संध्या मानका उपक्रम करें। प्राणवायुको तत्पश्चात् ‘दं त्या ‘जथा ‘चित्र’- इन मन्त्रको सूर्योपस्थान संयतकर प्रणवमन्त्र (कार) तथा सप्त व्याहतसे युक्त करना चाहिये। इससे दिन तथा रात्रिमें किये गये समस्त यत्री मन्त्रका ( आप म्योतीरममृतं भवः स्वरोम् ] इस पाप सों क्षण नष्ट हो जाते हैं।

१-यह संध्याका प्रकाश प्राणायाम प्रारम्भ किया गया है, पशु प्राणायाम पुर्ण संज्योपासनमें माताधार, पशिशोकण, पिल्लामन्थन्, गधाण आदि करनेका विधान है। तत्पत् आचमन, मान, भूमिशनको अनन्तर संकल्प करके ” ‘मामा’इस मन्त्र आयमन करना माहियें। तदनन्तन गाय-मन्त्र शिक्षण मने के पश्चात् विनिगमक प्राणायाम करने नि है। न संध्योपासना जानने के लिये गनसको कति निक-सूनाप्रकाश पन्थ देखना चाहिये।

३- सध्या संध्याकाल लेना है। यह हाल भात, माब एवं मध्यमें आता है।३-मूर्य मा मन्युश्च मन्यतया गझतेय; पापै गुञ्जन्ताम् । माया पापमझामनमा गाचा हप्तामा मात्र भरना जिम्मा किल्ला इन मवि इमामापोभूतनी सु जातिय मुनि स्वाहा।। ७ प्रः ६, ७ ३५ | – आपः पुनातु पृथिव पृयों पता पुनातु माम्। अनन् ब्रह्मणस्पतिर्मयता सुनातु माम् । बिमभोग्यं च सहा मdि मम् । आई ।

सुन मामापोसतां च यः स्वाहा। मैं आः प्र १०, अ २३). ५-३, ६ मा -ji मनपुगत मन्यतेच; मार्गयों जवानाम् । यदा झापाका मनमा बाचा हप्तापां पयामुदाँण झिम्मा अरूतदयतुम्पनु । किञ्च दुरिन मणि इदमहमपो मृतयोनी मखें पॉति जुहोमि स्वाहा। { ** = १०, ८ ३४) -भात हि मयोभुवम्ता ने ऊने दालना । पाहे जाप माझमें ।। यो : सितम उसस्तस्य भाजतेह नः। शतारिख मत: ॥ तुमा अन् । गमाम त यस्य क्षुपाय जिगध। आची जनगधा च 1; ॥ [ प ११ ॥ ५ -५.२ } | – इमादिव मुमभान; स्पिन; बात मलादि ॥ भूतं पाविजेणेाज्यमापः शुन्नु पैनम:॥ [जुः ।। ३) ।

ऋतं च सत्यं चाभोद्धाममोजायला ॥ ततो मत । तत: समूह वः ॥ समदर्शवाद स्वर अमापन । होरान विदाहस्य मियतों वो ॥ सूर्यविन्दममी धाता धापूर्वकम्पयत्। दिवं च युधि घान्तरिक्षमयों न: । हजारोंद हैं 8 | १६ | हैं। ५= उदु यं जातवेदमं देवं वहन्ति केनवः । ॐ श्विाय मूबंई स्वाहा ॥ (यजुः 91 ४५ ) १३- पिनं देवनागुदगो बमजस्य मम्मम्याग्नेः । झापा यावाभिवों अराई मूर्य आत्मा जगतस्तम् स्वाहा।।

 

+ देवी दुर्गाका स्वरूप, सूर्यपान तथा माहेश्वरीपूजनविधि

प्रात:कालकी संध्या वझ होकर तथा मध्याहू एवं ( परोसेसाबदौम्-का सर्वाङ्गमैं न्यास करे। संध्याओके सायंकालको संध्या बैठकर करनी चाहिये। प्रणव (कार) समय इस कथित विधिसे न्यास करके वेदमाता गायत्रीका और महाब्याडतियों अर्थात् ‘भू, भुवः स्वः’ में संयुक्त ज्ञप करनेवालेका सब प्रकारसे कल्याण होता है। प्राणायामके करके गायत्री मन्त्रका इस बार जप करनेसे इस अनन्तर सभी अङ्ग न्यास करें। जन्मकै पाप, सौ बार जप करने पर मुवंज्ञन्मकै माप तथा विपदा गायत्री ब्रह्मा-विष्णु और शिवस्मरूपा है। इसके हुशार बार गायत्रौंका जाप करनेमें तीन मुगके पापा नष्ट हो ऋषि, छन्द और विनियोगको भलीभीत जानकर जप जानें हैं

करना चाहिये। ऐसा करनेसे साधक सभी पापसे विमुक्त इभिन्मानिने शतेन तु पुरा कृतम्। होकर अह्मलोकको प्राप्त करता हैं। शिंग तु सोंग गायत्री हुनि दुष्कृतम् ॥ ‘परजससायदम्’ यह गायत्रका तुरीय पाद कहा  (३६॥ १०) ज्ञाता है। जो व्यक्ति संध्योपासन न काता हैं, उसको प्रात:कालमें गायत्रीं रक्तवर्णा, मध्याह्नकालमें सावित्री सूर्यदेव विनष्ट कर देते हैं। तुरीय पादके ऋषि निर्मल तथा शुक्लवर्णा और सायंकालमें सरस्वती कृष्णवर्णा कहो गयो छन्द गायत्री एवं देवता परमात्मा हैं। हैं। गायत्री-मन्त्रको प्रथम पाहुति ‘भू: ‘का ‘ॐ भूः जो मनुष्य योग और मोक्षको प्रदान करनेवाली हृदयाय नम:’से हृदयमें, द्वितीय व्याहत भुव: “का परमश्रेष्ठा देवीं गायत्रीका जप करता है, उसके महान्-मैं ‘ॐ भुवः शिरसे स्वाहा’से सिर में तथा तृतौय व्याहत महान् पाप नष्ट हो जाते हैं। ‘स्व:’का ‘ॐ स्वः शिखायै वषट् ‘से शिखामैं न्यास करें। प्रातः, मध्याहू एवं सायं-इन तीनों संध्याओंमें १०८ गायी-मन्त्र अधम पाद ( तत्सवितुर्वरेण्यं का कवचमें, या ३८ बार, गायत्री मन्त्रको जप करनेवाला व्यक्ति ब्रह्मलोक द्वितीय पाद ( भाग देवस्य धीमहि -का नेत्रोंमें तथा नृतीय ज्ञानेका अधिकारी हो जाता है। पाद धयो यो नः प्रचोदयात् का अस्त्र और चतुर्थं बाद (अध्याय ३५-३७)

 

देवी दुर्गाका स्वरूप, सूर्यध्यान तथा माहेश्वरीपूजनविधि

श्रीहरिने कहा-हे रुद्र! नवमीं आदि तिथियोंमें ‘ॐ भुजावालों या आठ भुजा अथवा चार भुज्ञावाली दुर्गा देवी को दुर्गे दक्षिण-इस मन्त्रमें देवी दुर्गाका पुन करना भी ध्यान करना चाहिये। महिषासुर का वध करनेवाली में चाहिये। मार्गशीर्ष (अगहन}-मासकीं तृतीया तिथिसे आरम्भ देवी सिंहपर विराजमान रहती हैं। करके नामक्रम अनुसार गौरी, कालों, उमा, दुर्गा, भद्दा, वासुदेवने कहा है रुड़ ! सूर्याचनमें भगवान सूर्यंका कान्ति, सरस्वती, मला, जिरा, लक्ष्मी, शिवा और नागयो- इस प्रकार मान करना चाहिये। रूपमैं उन देयाँको मुना कनेवाले अधिकृत मनुष्का वा में भगवान् सूर्य तेज:स्वरूप, उक्त वर्णवाले, चैत पद्मपर (प्रियज्ञान या प्रिय वस्तुओं) से वियोग नहीं होता। विराजमान, एक चक्रवातें उधपर समासन, दो भुजाओं दुर्गादेवीके अट्ठारह हाथ हैं। उन हाथोंमें खेटक घण्टा, युक्त तथा कमल धारण करनेवाले हैं। इस रूपमैं उनका दर्पण, तर्जनी-मुद्दा, धनुष, ध्यज, डमरू, परशु, पाश, शक्ति, सदैव ध्यान करना चाहिये। मुहर, शुल, कपाल, ज्ञक (याण), अंश, , चक्र और औरिने पुन: कहा-हे मध्यन ! [ अच] मैं माहेश्वरी शलाका– ये सभी सुशोभित रहते हैं। इनसे सुसञ्जिता उन पूजाका वर्णन कर रहा हैं, उसे सुनो-पहले स्नान तथा अष्टादशभुजा देवीका स्मरण करना चाहिये।

आचमन कर लें। इसके बाद आमनपर बैठकर न्यास अाईस भुजावाली या अट्ठारह भुज्ञावाली अथवा बारह करके मण्डलमें महेश्वरको पूजा करें। हैं महेशान ! हरकी १ =गायत्री, सावित्री एवं सरस्वती–में मापत्रके ही तीन स्वरूप हैं।

३-ऑटक–पटांत भयमुद्रमादपनि अनेन इति टक;” अस व्युत्पत्तिके अनुसार, भय उत्पन्न करनेवाली मष्टि (इप बिशेष)-को चटक या लेट कहते हैं । यह देखक हाथ ता है गणि जेंद्र सिंहारकारकः । देवोहातौ नित्यं मम र कुब च ।। ( शारदीय दुर्गापूजापति, अन्न- पूजा

 

* पुराणं गार्ड में सारे विष्णुकधाभयम्

[ संक्षिप्त गरुडपुराणाङ्ग

पूजा परिवारके साथ को। हे रुद्! ‘॥ शिवासनदेयता सच्चजातको आठ कलाएँ जाननी चाहिए, जो पूर्व आगन्न-इस मन्त्रसे आसनके देवताओंझा आवाहन आदि दिशा में स्थित हैं। उनको पुजा [गन्ध आदिसँ] इस क। मण्डलके मुख्य द्वारपर झान, गन्ध आदिद्वारा ‘ ही प्रकार करनी चाहिये- ‘ॐ हां सियै नमः’ में सिकौ, गणपतये नमः’ मन्त्र गणपतिकी, ‘ॐ सरस्वत्यै नमः’ ‘ॐ ह वै नमः’ में ऋद्धिक, हा चितायै नमः | मनसे सरस्वतीको, ‘ हा नन्दने नमः’ मन्त्रको नन्दक, -मैं विद्युताकी, ‘ॐ हाँ लक्ष्म्यै नम:’ से लक्ष्मीकी, ‘: । | ‘ॐ हां पाकालाय नमः’ मन्वने महाकाली, ‘ हां यथायै नमः’ में बोधाको, 18 ही काल्यै नमः’ में । गङ्गायै नमः’ मन्त्रमें गङ्गाकी, ‘ हुई लक्ष्म्यै नमः’ मन्त्रसे कालीकी, ‘ वा स्वायै नमः’ से स्वधाक और ‘ॐ हां लक्ष्मोकी, ‘ॐ हा माकलायै नमः’ मन्नमें महाकनाक प्रभायै नमः’ में प्रभाकी अर्चना करनी चाहिये। तथा ‘ॐ हीं अस्त्राय नमः’ मन्त्रको अस्त्रकी पूजा करे। हे वृषध्वज्ञ ! वामदेवकी तेरह कलाएँ जाननी चाहिये, | इसी प्रकार ‘ । अणे यावधपतये नमः’ में उनको भी पूजा गन्ध-पुण्य आदिसे करनी चाहिये। उनको | वाधिपतिकी, ‘ हा गुरुभ्यो नमः’ से रुकी, 15 अजामें पलें । * । बामदेवाय नमः’ कहकर माम दैव को आधारशक्त्यै नमः’ मैं आधारशक्तिकी, ” हां अनन्ताय पुसा करनेके बाद उनकी कलाका पूजन करना चाहिये। | नमः’ में अनन्तकी, ** # अमाय नमः’ में धर्मकों, जैसे—’ ही उसे नमः” से जसुकी, ‘ हा रक्षामै ॐ वं ज्ञानाम नमः ॐ ज्ञानाकी, ‘ हा वैराग्याय नमः ॐ नमः’ में रक्षाको, ‘ ही जुन्यै नमः’ से तिकी, ‘ॐ हां वैराग्यकी, ‘ॐ हाँ अर्याय नमः’ में ऐश्वर्यकी, ‘ हां कन्यायै नमः’ से कन्याक, “ॐ ॥ कामायै नम:’ से। अधर्माय नम:’ से अधर्मकी, ‘ हां अज्ञानाय नमः’ में कामाकों, ‘ॐ हाँ जनन्यै नम:’ में जननीकी, ‘ हा

अानकी, ‘ॐ वं अवैराग्याय नमः’ से अवैराग्यकी, क्रियायै नमः” से क्रियाक, ‘* का वृधे अमः’ में वृद्धिकी, | ‘ॐ गं अनैश्चर्याय नमः ॐ अनैश्वर्यकी, ‘ हा ऊदुर्वच्छन्दाप • हां कार्यायै नमः’ में काकी, ‘ॐ हा रा ( भा-यै | नमः’ में ऊदच्छन्दकी, ‘ हो भन्दाय नमः’ में नाम; ‘मैं रा [ था)-त्रि (ओं)-की, ‘ ही भामण्यै नमः’ में । अधदकी, ‘ ही पद्माय नमः’ में पद्मकी, ‘ हा भामणींकी, ‘ॐ हां महिन्यै नमः’ में मोहिनीकों और शिकायै नमः। ॐ काकी, ‘ । सामा4 नमः’ में ‘ । (ख) आर्य नमः’ में न वाकी अर्चना वामाकी, ‘ ही बंक्षायै नमः’ में प्रेझाकी, ‘ हां ही करनी चाहिये। नमः’ में रौदोकी, ‘ॐ हा काल्यै नमः’ में कालीकी, हे वृषध्वज! तत्पुरुषको चार कलाएँ हैं। पहले ‘ॐ हां | ‘ॐ का कलविकरायै नमः’ से कलविकरणीकी, ‘ॐ हां तत्पुरुषाय नमः ‘इस मन्त्रद्वारा तत्पुरुपकी पूजा करे। तद्न्तर बलप्रमश्चिन्यै नम:’सें बलप्रमथिनीकी, ‘ इ समतदमन्यै ‘ में निवृत्यै नमः’ में निर्वानिकी, ” को प्रतिवायै नमः’ में मम; ‘ से सर्वभूतधमनीकी, ‘ॐ ह्यां मनॉमन्यै नमः’ में प्रतिष्ठाकी, ‘ हा विद्यायै नम:’ से विद्याकी और ‘ हो। मनोन्मौकी, ‘ मलचिंताय नमः’ में मण्डलतियकी, शान्त्यै नमः’ से शान्तिको पूजा करनी चाहिये। ‘ॐ हां हौं है शिवमूर्तये नमः’ में शिवमूर्तिकीं, * हाँ अघोरकों भैरव-सम्बन्धी छ: कलाएँ जानना चाहिये। विधिपतये नम:से विद्याधिपतिकी और ‘ । हीं हैं इनकी पूजामें पहले ‘ॐ हाँ योग्य नमः’ मन्त्रा शिवाय नमः’ मैं शिवकी पूजा करै ।

। अपोंरकी मुन्ना करने के पश्चात् ‘ । मायै नमः’ में अनन्तर ‘ॐ हां हुदाय नम:’ हैं हृदयकी, “ॐ ॐ उमाकी, ‘ॐ हीं क्षमायै नमः’ में क्षमाकी, ‘ॐ को निद्राचे | शिरसे नमः’ में सिरकी, ‘शिखायै नमः’ में शिखाक, नमः’ में निहाकौं, ” हां ध्यायै नमः’ में व्याधिकों, | | | कवचाय नमः’ में कवचकी, ‘ॐ हौं नेत्रत्रयाय ‘ का शुभायै नमः”मैं क्षुधाक तथा ‘ॐ हीं नृणायै नम:’ | नमः’ में नेत्रत्रयक, १ ः अस्त्राय नम:’ में अस्त्रकी में नृणाझी पूजा करनी चाहिये।

और ‘ॐ गं सजानाय नमः” से सद्योजातको गुजा करें। हे वृषभध्वज ! ईशानदंगकी पाँच कलाएँ हैं, इनकों आचार

 

पिके परिवारोंपकी विधि ।।

पूजामें ‘ॐ हां ईशानाय नमः’ इस मन्त्रसे ईशानकी पूजा नमः’ में सर्वलोकाधिपति ब्रह्माका और ‘ॐ हा धूलिचपडेश्वराय करनेके पश्चात् ‘ॐ हां समित्यै नमः’ में समितिकी, नमः’ में भूलिचण्डेश्वरका आवाहन, स्थापन, संनिधान, ‘ॐ अं अङ्गदायै नमः’ मैं अङ्गदाको, ६ का कृष्णायै संधि तथा सकतकरण करना चाहिये। नमः’ मैं कृणाक, *** ह मरीॐ नमः”मैं मरीचिक्की और तदनन्तर तत्त्व-न्यास करके मुद्रा दिखानी चाहिये । ‘ॐ हां चालायै नमः’ में चालाको पुजा को। तथा ध्यान करना चाहिये। इसके बाद पाद्य, आचमन, । तदनन्तर हे शर! ‘ॐ हा शिवपबारेभ्यो नमः’ में अयं, पुष्प, अभ्यङ्ग, उद्वर्तन और स्नान तथा सुगन्धानुलेपन, शिवपरिवारका, ‘ हा काय सुराधिपतये नमः ॐ सुराधिपतिं वस्त्र, अलंकार, भोग, अङ्गास, धूप, दीप, नैवेद्य इन्का , ‘ हां अग्नये तेजोऽधिपतये नम:में तेजोऽधिपति अर्पण, करोद्वर्तन, पाद्य, अयं, आश्चमन, गन्ध एवं ताम्बूल अग्निका, “ॐ हां यमाय पैंताधिपतये नमः’ में पैंताधिपत निवेदन करने के बाद गाँत, वाद्य, नृत्य महेश्वरकों यमका, ‘ॐ हां नितयें रक्षौधिपतये नमः”मैं रौंऽधिपति संतुष्टकर छन्न आदि समर्पित करना चाहिये। मुद्राका निर्तिका, ‘ॐ वरुणायलाधिपतये नमः ‘में जलाधिपतिं प्रदर्शन करके आवाहित देखके आपका ध्यान, जप वरुणशा, ‘ॐ हां चायचे माघाधिपतयॆ नमः’ में प्राणाधिपति तथा तादात्म्य-भावसे मूलमन्त्रद्वारा जप और पूजाको वायुका, ‘ॐ ह्रां सोमाय नैत्राधिपतये नमः’ में नेत्राधिपति समर्पत करें। समका, ‘ॐ हां ईशानाय सवविद्याधिपतये नमः’ में इस प्रकार विविध कामनाओंकी सिद्धि के लिये विश्वावसु सर्वविद्याधिपति ईशानका, ‘ॐ ह्रां अनन्ताय नागाधिपतयें गन्अयं तथा देवी कालरात्रि आदिकी उपासना कान नमः ‘में नागाधिपति अनन्तका, ‘ ही क्यों सर्वलोकाधिपतये चाहिये। (अध्याय ३८-४१)

वकै पवित्रारोपणकी विधि श्रीहरिने कहा- हे महादेव ! अमङ्गलका नाश करनेवाले तन्तुकै देवता हैं। है रुद्ध! उस पवित्रकमें एक सौ आठ या भगवान् शिवकै पवित्रापणकै पूजा-विधानकों कह रहा पचास अथवा पच्चीस तन्तु होने चाहिये। ये क्रमश: उत्तम, हैं। यह पूजा आषाढ़, श्रावण, मात्र या भाद्रपद मास होती मध्यम तथा कनिष्ठ है। पबित्रकर्मे इस ग्रन्थिका मान हैं। हैं। पवित्रारोपणकी इस पुजामें पवित्रक (जनेऊ) बनानेके अतएव प्रत्येक चार अंगुल या दो अंगुल अथवा एक लिये सत्ययुग आदिके भेदसे सूत्र-धारणका नियम हैं। अंगुलको अन्तर देकर एक-एक ग्रन्थिका बन्धन देना जैसे— सत्ययुगमें सुवर्णक, जैतामैं रजतके, द्वापरमैं ताम्रके चाहिये । हे सदाशिय! उन ग्रन्थियों के नाम इस प्रकार हैं और कलियुगमें कन्याकै हाधसे बनायें गयें कपासके सूत्र प्रकृति, पौरुषी, वीरा, अपराजिता, जया, चिया, रुद्रा, (सूत}-कौं ग्रहण करना चाहिये। सूत्रकों लेकर पहले उसे अजिता, मनोन्पनी तथा सर्वमुखी। तिगुना करके पुनः उसका तिगुना करना चाहिये । इस प्रकार हैं शिव ! ग्रन्थिबन्धनकै पश्चात् उस पवित्रकको कुंकुम, नवगुणित सूत्रसे पवित्रकका निर्माण करके वामदेवमन्त्र चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थोंसे रिञ्जत करना चाहिये। जसमें ग्रन्धि देनी चाहिये। तदनन्तर हैं शिव ! सच्चजातमन्त्रमें उस गन्धानुञ्जित पवित्रकको दैवको समर्पित कर देना उसका प्रक्षालन करके अघोरमन्यसे उसका शोधन करना चाहिये। तदनन्तर यथाविधि सभी क्रियाको करके चाहिये। तत्पुरुषमन्यसे उसमें बन्धन तथा ईशानमन्त्र हैं देवेश ! हैं महेश्वर! आप अपने गगक साध यहाँ पर तन्तुदेवताओंको सुगन्धित धूप दिखाना चाहिये। आमन्त्रित हैं। प्रात:काल पर आपका पूजन करूँगा।

तन्तुओंमें क्रमश:-ॐकार, चन्द्र, अग्नि, ब्रह्मा, नाग, अत: आप यहाँ पर उपस्थित रहें।’-इस प्रकार देवताको । शिपिंखध्वज, सुर्य, विष्णु और शिवका बाप्त है-ये नौ निमन्त्रित करे और गौत-वादके द्वारा त्रि-जागरण करें। का घराणं गारुडे सध्ये सारे विद्याश्रयम् ।

प्रातः जुन आमन्त्रित पवित्रकोंको भगवान् महेश्वर के पास विद्यालयको मुद्धा करके आत्मतत्य और देवताको पूजन स्थापित करके चतुर्दशी तिथि मान करें और सबसे पहले इन निर्धारित मन्त्रोंसे करें सूर्य तथा झड़की पूजा करे, तदनन्तर ललाटस्थ विश्वरूपका हौं ही शिवतत्वाप ममः, ॐ ही ( हीः ) विसातत्त्वाय ध्यानकर अपने आत्मस्वरूपकी पूजा करें।

नमः, ॐ हं हः ] आत्मासाय नमः, ॐ ही ही है । तत्पश्चात् अस्त्रमन्त्रको प्रॉक्षित और हृदयमन्त्रके द्वारा सर्वतत्त्वाय नमः। अर्पित तथा संहितामन्त्रोंसे भूपित पबित्रकको भगवान्को भगवान् महेश्वरको पवित्रक विधिपूर्वक निवेदितकर समर्पित करना चाहियें। सबसे पहले शिवतत्त्य और स्वयं भौं धारण करना चाहिये। (अध्याय ४२)

विष्णके पवित्रारोपणकी विधि हरिने कहा- वृषभध्यश! अब मैं आपसे शुदका सनसे बना हुआ पवित्रक प्रशस्त माना गया है। विष्णकै पवित्रारिपका वर्णन करूंगा, जो भौग तथा मोक्ष कास या पद्मज्ञ (कमल) में निर्मित पथिक समस्त दोनोंक देनेवाला है। प्राचीन समयमें हों उन्हें देवासुर- गणक लिये प्रशस्त है। संग्राममें [ अपनी विजय न होते देखकर] ब्रह्मादि देवगण कार, शिव, चन्द्रमा, अग्नि, ब्रह्मा, ज्ञेष, सूर्य, गणेश विक शरणमैं गयें। उन सबकी प्रार्थना सुन करके विष्णाने और विष्णु-इन नौ देवताओंका इस पवित्रकके तन्तुओंमें विजय-प्राप्तिके लिये उन्हें अपने गलेका हार, पवित्र नामक निवास है।

वैयक तथा एक ध्वज प्रदान किया और कहा कि इन्हें ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र-यें पवित्रकके तीन सूत्रोंक देंतें ही दानव नष्ट हो जायँगे। तभीसे उन पवित्रकही देवता हैं। जो उनमें अधिष्ठित रहते हैं। इन सूत्रको सुवर्ण, पूजा आरम्भ हुई।

इन : उजत, तास, यस या मिट्टींके बने हुए पात्रमें रखना चाहिये। | हैं हर ! प्रतिपदासे लेकर पौर्णमासीतक जिस देवताकी एक सौ आठ जन्तुका सुत्र उत्तम, चौवन तन्तुका सुत्र ज्ञों तिथि कहीं गयी है, उसके अनुसार ही उस तिथिमैं उन मध्यम तथा सत्ताईस तन्तुका पवित्रक कनिष्ठ होता हैं। दैवताओंका पवित्रारोपण करना चाहिये। हैं शिव ! शुक्ल- इन पवित्र प्रत्येक ग्रन्थि पौंकों कुंकुम, हल्दौ पक्ष हो अथवा कृष्णपक्ष, द्वादशी तिथिमें विष्णुके लिये या चन्दनसे चर्चितकर उपवास रखते हुए उन्हें शास्त्रसम्मत पवित्रारोपणका विधान है। व्यतीपातयोग, उत्तरायण, दक्षिणायन, पात्रमें रखकर अधिवासित करें। चन्द्र तथा सूर्यग्रहण, विवाहादि मङ्गल एवं वृद्धि-काय तथा पवित्रकको थक्-पृषक अभिमन्त्रित करके उसका गुरुजनके आगमन इत्यादि अवसरोंपर यह पूजा करनौ सम्यक् दर्शन तथा पुन: पूजन करना चाहिये और अन्नपूर्वक चाहिये। पवित्रकके उद्देश्यसे भी नित्य ज्ञान हो सकता है; उसका चम्बाच्छादन करके उसे मण्डलस्य दैवप्रतिमाके किंतु वर्षाकालमें इसका पूजन आवश्यक हैं। समक्ष यत्नपूर्वक स्थापित कर देना चाहिये। | हे रुद्र! इन पविञकोंका निर्माण वर्णानुसार होना ब्रह्मादि अन्य देवकी स्थापना करके कलशकी पूजा चाहिये, जैसे-जाह्मर्गौका पवित्रक कौशेय’, कपास, शौम करें। मण्डलका निर्माण करके नैवेद्य समर्पित करें। | अघी शास्त्रले निर्मित होना चाहिये। क्षत्रियों का पवित्रक पवित्रको पुन: अधिवासित करके हैं नीं यार छन्। कौशेयसूत्रसे, वैश्योंका झौमसूत्र तथा वल्कलसूत्रसे’ और घुमाकर येदीको वेष्टित करे। तदनन्तर अपनेको तथा हैं कौश-विशेष कौके कोर्स बननेवाला बस्छ । देशमी वस्त्र ।। | – म=ीं, केकी डास या अन्य जातियों ने बस्छ ।

३- मकान- भग्नपत्र नामक वृक्षविशेष अथवा अन्य मुलामा छालखानें क्षकी छालमें मना न (अकल शस्त्र मान आचारकाज़ ] मममूर्तिक म्यानका निरूपण के

कलश, घी, अग्निकुण्ड, विमान, मण्डप और गृहको सूत्रसे चाहिये वेष्टित करके एक सूत्र देवताकै मस्तकपर अर्पित करें। पवित्रं वैष्यावं तेजः सर्वपानकनाशनम् ॥ | इस प्रकार सम्पूर्ण सामग्री निवेदितकर महेश्वर विष्णुको धर्मकामार्थसिद्ध्यर्थं स्वकपड़े धारयाम्यहम्। पूजा करके इस मन्त्रका पाठ करना चाहिये (४३। ३४-३५) आवाहितोंसि देवेश पूजार्थं परमेश्वर ॥ [हे देव!] यह बिष्णु-तेजस्वरूप, सर्वपाप-विनाशक तत्प्रभातेऽर्धयिष्यामि सामप्याः संनिधौं भव। पवित्रक हैं। मैं धर्म, काम तथा अर्थ-इस त्रिवर्ग को ४३ । ३८-३१) सिद्धके लिये इसे अपने कप्ठमें धारण करता हैं। अनन्तर हे परमेश्वर ! देवदेवेश्वर ! आप यहाँपर पुजाके लिये इस प्रकार प्रार्थना करे आवाहित हैं। इस समस्त सामग्रीको प्रभातकालमें मैं आपका – वनमाला यथा देय कौस्तुभ सतत आदि। पूजन करूंगा। आपकी निधि यहाँ बनी रहें। तद्वत् पवित्र तन्तुना माला वं हृदये धर॥

  • एक शत्र या तौंन यात्रिनाक पवित्रकको अधिवासित (४३। ४१ कर स्वयं रात्रि जागरण करके प्रातःकाल भगवान् हैं देव! आपके हृदयपर जिस प्रकार वनमाला और कॅशयका पूजन करें और निर्मित पवित्रफको उन देवकों कौस्तुभ विराजते हैं, इसी प्रकार तजुक बनी हुई यह अर्पत करे। पविकको धूपसे धूपित करके मन्त्रक द्वारा माला और पवित्रक आप अपने हृदयपर धारण करें। अभिमन्त्रित भी करना चाहिये।

इस प्रकार प्रार्थना करके ब्राह्मगको भोजन कराकर | गायत्री मन्त्रमें पूजित इस पवित्रकके द्वारा देव-पूजन और उन्हें दक्षिणा देकर उसी दिन सायंकाल या दूसरे दिन करके उसे मन्त्र पढ़कर देवताके समक्ष स्थापित कर दें- पुनः उसी प्रकार पूजा सम्पन्न करके निम्न मन्त्र पढ़ते हुए विशुद्धग्रन्थिकंगम्यं महापातकनाशनम्। विसर्जन को . सर्वपापक्षयं । दैव तवा . भारयाम्यहम्॥ सांवत्सरीमिमा पूजा सम्पाद्म विधिचन्मया।

(। ३३) ब्रज पवित्रकैदान विष्णुलोकं विसर्जितः ।। हे देव ! यह पबित्रक विशुद्ध रूपसे ग्रथित, सुन्दर तथा | (४३। ४३) महापातकोंको नष्ट करनेवाला और सम्पूर्ण पापका … हे पवित्रक! मैंने इस संवत्सरों सूजाको विधिवत् क्षय करनेवाला है। इसे मैं आपके समक्ष स्थापित करता सम्पादित किया है। इस समय मेरे द्वारा विसर्जित आप है। तदनन्तर इस मन्त्रका पाठकर स्वयं भी धारण करना विष्णुलोकको पधारें। (अध्याय ४३)

ब्रह्ममूर्तिके ध्यानका निरूपण हरिने कहा-है ! भगवान्को पवित्रक आदिको ब्रह्मका अभेददर्शन) करूं, उसे महब्रह्म (प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न मुकर, सका न करके साधक हरि बन जाता है। मेरा पन्ना-में ज्ञानको भावना [ब्रह्म एवं निविषय-नित्य स्वरूप हो जाता है) । अब मैं मायाजालको नष्ट करनेवाले ज्ञानमैं अभेदभाव) करनी चाहियें।। ब्रह्मकै ध्यानका वर्णन करता हैं। आप सुनें- अह्मका ध्यान ही समाधि है। मैं ब्रह्म हैं। इस रूपमै ब्रह्मकें ध्यानके लिये प्रवृत्त प्राज्ञा (विशेष साधक) सदा स्वयंको अवस्र्थात ही ब्रह्मका ध्यान है। स्वयंसे अपनी वाणी एवं मनको नियन्त्रताकर अपनी आत्मामैं हीं अभिन्न अझ देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण, अहङ्कार, ज्ञानस्वरूप ब्रह्मका अशन को और जिस प्राज्ञको यह उरकट पञ्चमहाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश). इच्छा हों कि मैं अपनी आत्मामें ब्रह्मका दर्शन [ज्ञोंच- पशुतन्मान (गन्थतन्मामा, सतन्मात्र, रूपतन्मात्र, स्पर्शजन्मात्र, एवं शब्दतन्मात्र) विविध गुण, जन्म और भोजन, शयन प्राणायाम है। इन्द्रियों पर विजय प्रत्याहार और ईश्वरका आदि भोगसे सर्वथा हित, स्वप्रकाश, निराकार, सदा चिन्तन करना ध्यानावस्था है। मनको नियन्त्रित करना हौं निरतिशय, नित्य आनन्दस्वरूप, अनादि, नित्य, शुद्ध, धारणा है और ब्रह्ममें मनको केन्द्रित करने की जो स्थिति बुद्ध, सर्वत: परिपूर्ण, सत्यस्वरूप, परमसुखस्वरूप, अमापद होती है, वह समाधि है। यदि पहले इस योंगके द्वारा चञ्चल एवं तुरी (शूटस्थ निरञ्जन परब्रह्म) के रूपमें वेदोंमें चित्त स्थिर नहीं होता तो इस मूर्ति (परमेश्वर-का इस वर्णित हैं।

प्रकार चिन्तन करना चाहिये हैं वृषभध्वज! अपनी आत्माको उधों और शरीरकों जो हृदयकमलकों काके मध्य विराजमान रहनेवाले उथ समझना चाहिये । बुद्धि उसमें सारथि तथा मन लगाम हैं तथा शङ्ख, चक्र, गदा और कमलसे सुशोभित हैं, जो है। इन्द्रियोंकों उस रथमें तें हुए अश्वकै रूपमैं स्वीकार श्रीवत्स तथा कौस्तुभमणि, वनमाला एवं लक्ष्मीसे विभूषित किया गया है। ये इन्द्रियों हो रूप, रस, गन्ध आदि हैं, जो नित्य-शुद्ध, ऎश्वर्यसम्पन्न, सत्य, परमानन्दस्वरूप, विषयका अनुभव करती हैं।

आत्मस्वरूप, परमब्रह्म तथा परम ज्योति:स्वरूप हैं- ऐसे में इन्द्रिय और मनमें युक्त आत्माकों हीं मनीषियने चौबीस स्वरूप (अवतार)-वाले, शालग्रामको शिलामें भोंसा कहा हैं। जो मनुष्य विज्ञानपी साधिसे युक्त हैं, विराजमान, द्वारकादि शिलाओंपर अवस्थित रहनेवाले परमेश्वर मनरूपी लगामको अपने वशमें रखता है, वहीं उस ध्यानके योग्य हैं और पूजनीय हैं। मैं भी यहाँ हैं-ऐसा परमपदक प्राप्त करता है, फिर वह उत्पन्न नहीं होता। जो समझना चाहिये। विज्ञानरूपीं सारथि नियन्त्रित मनरूपीं लगामवाला मनुष्य इस प्रकार आत्मस्वरूप नारायणका यम-नियम है, यह स्वर्धनी’ ( अज्ञान) से पार हो जाता हैं और वहीं इत्यादिक योगकें धनोंसे एकाग्रचित्त होकर जो विष्णुको परमपद हैं।

ध्यान करता है, वह मनोभिलषित इच्छाओं को प्राप्त कर | इस योगको परम साधनामें अहिंसादि धर्मोको यम वैमानिक देव हो जाती है। यदि निष्काम होकर तथा शौंचादिक कर्मोको नियम कहा गया है। पद्मादि उन हाँरको मूर्तिका ध्यान और सावन करे तो मुक्ति आसन हैं। प्राग, अपानादिक वायुपर विजय प्राप्त करना प्राप्त हो जाती है। ( अध्याय 😉

१ शब्दकल्पद्रुमके=’भूनर्यात कम्पपति शान्’-इमा पुनके अनुसार ‘धुम’ शब्द कम्मित कर, वालके लिये प्रमुछ होता है। इसलिये ही झनुमाए “व:’ शब्दका मोक्षु अर्थ मनका मोक्षको कम्पित प्रतिबन्धित कानेवासे अज्ञान “स्य’ कह सकते हैं। इस तरह | भाइकों पर कर लेना ही ‘वनी’ कों पर बना समरना चाहिये।

आत्मानं धनं विद्धि शरीरं रथमेव तु बुद्धिं साधं विद्धि मन: अग्रमेव च। इन्द्रियाणि हयानाहुबिंयास्तेषु गोगः आमेन्यमनस्क भयमनीषि: यतु विज्ञानवानामा मुन मनमा सदा में तु तापमाप्नोति हि भूगों जायते विज्ञानाधिर्यस्तु मन:पहचान:

 

धुन्या: परमाप्नोति रागि : परमं पदम्। (४४।६-६) ३-टपटूमके अनुसार द्वारकामें होनेगानों तक्षशिला भों भगवान् शिफाकी मूनि मानी जाती है। इसलियें से गव नदीमें होनेवानी चक्रयुक्त शिला (शालग्रामशिला]-में विष्णुका सादा संनिधान है, जैसे हो द्वारकाफौं शिक्षा भौं विष्णुका झनधान हैं।

-वैमानिक देशकदृमके-‘विगतं मानम् ऊमा म्य’– इस त्पत्ति के अनुसार निरुपमैपक विमान काहा जा सकता है। विमान शव वैमानिक:’ इस व्युत्पत्तिके अमर वैमानिक शब्द भी निरुपमे जपमाहित] = मा बौफ हो कता है। मसियें अकृत वैमानिक देव’ का अर्थ निरुपय- जगभारत-मतानु देव महावित किया जा सकता है।

भार]

  • विविध शालग्रामशिलाओंके लक्षण । विविध शालग्रामशिलाओंके लक्षण श्रीहरिने कहा-है वृषभध्वज ! अब मैं प्रसंगवश चक्र, पद्य, गदा, शंखसे युक्त शालग्राम ‘हरि गदा, पद्म, शालग्रामका लक्षण कहता हैं। शालग्रामशिलाओंके स्पर्शमात्र चक्र, शंख-चिसे शोभित शालग्राम ‘ श्रीकृष्ण’ नामको करो जन्मौके पाप नष्ट हो जाते हैं। केंाव, नारायण, गोविन्द प्रसिद्ध है और शालग्रामशिलाके द्वारदेशपर चिह्नित दो चक्र तथा मधुसुदन आदि नामोंवाली विभिन्न शालग्नामशिलाएँ भारण करनेवाले, शुक्लवर्णयाले भगवान् वासुदेव हैं। इन होती हैं, जो शंख, चक्र आदि चिसे सुशोभित रहती हैं। सभी कार्यों एवं नामोंको धारण करनेवाले हे गदाधर भगवान् इन शिलाक सक्षम इस प्रकार हैं-

विष्णु! हम सबको आप रक्षा करें। | शंख, चक्र, गदा तथा पद्यकै चिड़से सुशोभित जिला दो चक्रोंसे युक्त, रक्त आभावाली और पूर्व भागमैं पद्म ‘केशव, पद्म, कौमोदकी गदा, चक्ल तथा शंखके चिहसे चिढ़से अंकित शालग्रामशिला ‘संकर्षण की मूर्ति होती है, सुशोभित शिला ‘नारायण वक़ शंख, पद्म तथा गदा किंतु ऑटे-छोटे चक्नवाली तथा पीतवर्गको होनेपर वह चिहसे विभूषित शिला माधव और गदा, पद्म, शंख्या तथा शिक्षा प्रद्युम्न’ कही जाती है। यदि शालग्रामशिला बड़ी चक्रके चिह्नमें शोभायमान शिला ‘गोविन्द’ नामसे ज्ञानी तथा छिमें संयुक्त शिरोभागवाल और वर्तुत्वाकार हों तो भाती है।

जसे ‘अनिरुद्ध’ नामक शालग्नाम-मूर्ति कहते हैं। जो । | पद्म, शंख, चक्र, गदासे युक्त विष्णु नामकी, शंख, द्वारमुखपर नीलवर्णकी तीन रेखाओंसे युक्त होती हैं और पा, गदा तथा घसे मुक्त “मसदन’ नामको, गदा, चक्र, जिसका शेष सम्पूर्ण भाग कृष्ण्यमसे सुशोभित रहता शंख, पद्ममें संयुक्त ‘विराम’ नामकी, चक्र, गदा, पद्म, है, वह शालग्रामशाला ‘नारायण’ शिलाके नाम ज्ञानी शंखसे चिहित ‘वामन’ नामकी, चक्र, पद्म, शंख एवं गदासे जाती हैं। समन्वित ‘आँथर’ नामकों और पद्म, गदा, शंख, चक्नमें जिस शिश्नाके मध्यमें गदाके समान बैरवा हो, यथास्थान ऑकत हृषीकेश’ नामक शालग्राम-मूर्ति की गयी हैं। नाभिचक्र उन्नत हो तथा बक्षस्थल विस्तृत हो, वह ‘नृसिंह इन ईंयमयोंकों आरआर नमन है।

नामवाली शालग्रामशिला है और इन चिोंके साथ ही | पद्म, चक्र, गदा, शंख-चिमूरित शालग्रामशिला उसमें तीन विन्दु अथवा पाँच विन्दु हों तो वह “कपिल’ ‘पद्मनाभ’ शंख, चक्र, गदा, पद्मायुक्त शालग्नामशिला नामक शिक्षा है, वह शिला म सबकी रक्षा करें । उसका “दामोदर चक्र, शंख, गदा तथा पद्मसे संयुक्त शालग्रामशिला मुज़न ब्रह्मचारियोंकों करना चाहिये । विषम परिमाणवाले दो ‘वासुदेव शैव, पद्म, चक्र, गदा-चिसै समन्वित नामशिला चक्रोंसे चिह्नित शक्ति-चिहसे युक्त शिस्नाको चानाज़’ शिला ‘संकर्षण शंख, गदा, पद्म, चक्रसे सुशोभित शालग्रामशिला कहते हैं। यह हम सबकी रक्षा करें। नीलवर्णवाल, तीन ‘प्रद्युम्न’ तथा गदा, शंख, पद्म और चक़से शोभित रेखाओंसे युक्त, स्थूल तथा विन्दुयुक्त शिला ‘कुर्ममूर्सि’ हैं। शालग्रामशिला भनि नामसे अभिहित हैं। इन्हें बारम्बार और वहीं अगर बलाकार हैं तथा उसका पीछेका भाग प्रणाम है।

झुका हुआ हो तो वह शिला “कृष्णा” कही गयी है, वह पद्म, शंख, गदा, चक्रके चिह्नसे विभूषित ‘पुरुषोत्तम’ हम सबकी रक्षा करे। पाँच देखावालीं शिला ‘श्रीधर नामकी, गदा, शंख, चक्र, पद्म-चिह्नसे विभूषित ‘अधक्षज़’ नामकी कही जाती है। गदासे अंकित शिला ‘वनमाला नामकी, पद्म, गदा, शंख, चक्रसे विभूषित ‘नृसिंह’ नामको, है- ये हम सबकी रक्षा करें। गोलाकार तथा छोटी जिला पद्म, चक्र, शंसा, गासे अंकित ‘अच्युन’ नामकी और ‘वामन’ शिला है, बायें भाग चक्रात शिला ‘सुरेश्वरको शंख, चक्र, पद्म, गासे सयुक्त ‘नार्दन’की शालग्राम-मूर्ति मूर्ति हैं। विभिन्न रंगोंवाली, अनेक रूपोंवाली, नागके समान है-इन देवनार्मोंसे अभिहित मूर्तियों को नमस्कार है। फणसे युक्त शिला ‘अनन्तक’ हैं। स्थूल हो, नोलवकों

गदा, घ, पद्म, शंखमें अंकित शालग्राम ‘उपेन्द्र हो और मध्यमें नीलवर्गका चक्र हो तो वह ‘दामोदर” हैं सोनिया गदाप्को नाम ‘कौमोदकी’ है।

 

* पुराणं गारुई वक्ष्ये सारे विष्णुकथाश्रयम् *

शिरला है। संकुचित द्वारवालौं, रक्तवर्णवाली, लम्ची खाऔंवाली, आकृतिवाली ‘लक्ष्मीनारायण’ नामवाली शिला हम सबकीं। दियुक्त, एक चक्र तथा एक कमलयालो चिताणं शिक्षा रक्षा करें। ‘ब्रह्मशिला’ है, ये सब हम सबकी रक्षा करें। विस्तृत एक चक्रवारों शालग्रामको ‘सुदर्शन’ कहते हैं, छिट्वाती तथा स्ल घालीं शिला ‘कृष्णशिला तथा उनके रूप में गदाधारी श्रीविष्णु हम सबकौं रक्षा करें। बिधाकार शिला ‘विमाशिला” हैं। अंकाकै आकारवालौं, ६ चाक़ होनेसे शालग्रामशिलाक ‘लक्ष्मीनारामा’ संज्ञा पाँच खावालौं तथा कौस्तुभ-चिल्लप्से युक्त शिला ‘हयग्नय’ होता है। जिसमें तीन चक्र है, वह (शिला) ‘त्रिविक्रम’को शिला है। एक चक्र तथा एक कमलसे अंकित, मग तथा मूर्ति है, चार चक़याली चतुह, पाँच चक्रथाली ‘वासुदेव रत्नोंकी आभासे युक्त कृष्णवर्णक शिला बैकुण्ठ’ शिला छः चक्रयाली शालग्रामशिला ‘प्रागुन सात चक्रथाली और द्वार खावाली, विस्तृत कमलसदशा शिला ‘मास्यशिला’ शिला ‘संकर्षण आठ चक्रवाल ‘पुरुत्तम नव चक्रवाल है–थे हम सबकी इक्षा करें। दाहिनी ओर इंग्रवामुक्त, शिला ‘नवव्या इस वक़वाली ‘दशावतार’ तथा ग्यारह श्यामवर्णसे समन्वित, रामघझसे अंकित त्रिविक्रम’ नामवासी चक्रवाती शिला ‘अनिरुद्ध” कहलाती है। ये हम सबकी शिला हम सबकी रक्षा करें। द्वारका स्थित, शालग्राममें रक्षा करें। बारह चक्रोंसे युक्त शिला ‘दादशात्मा’ है। निवास करनैमानें गदाधारीं भगवानकों नमस्कार हैं। एक बारहमैं अधिक चक्रकी शिला ‘अनन्त’ चामवालीं हैं। द्वारवाली, चार चक्रॉसे युक्त, वनमालासे विभूषित, ज्ञों मनुष्य इस विष्णमूर्तिमय स्तोत्रका पाठ करता है, स्वर्णरेखासमन्वित, गोपदसे सुशोभित तथा कदम्बके पुष्पकी उसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है। (अध्याय ४५) वास्तुमण्डल-पूजाविधि || श्रीहरिने कहा- गृहनिर्माणके प्रारम्भमैं जिसके करने से इन आह्म देवोंका पूजन करके बुद्धिमान् व्यक्तिको समस्त विन नष्ट हो जाते हैं। संक्षेपमें उस वास्तुपूजाकी विधि चाहिये कि वह ईशानादि चारों कॉपर स्थित देवताओंको कहता है, यह पूजा ईशानकोणसे प्रारम्भ होकर इक्यासी पुजा करें। यथा- ईशानकोणमें आप (ल), अग्निकोणमें पदवाले मण्डपके अन्तर्गत पूर्णं की जानी चाहिये। सावित्री, नैऋत्यकोणमैं जय और वायुकोणमैं ददेवक इस मण्डलके ईशानकोणमें वास्तुदेवताका मस्तक पुजा करे। नवपद् परिमापके मध्यमें ब्रह्माकी पूजा करनौं होता है। नैत्यकोसमें उनके दोनों पाद तथा अग्नि और चाहिये और उनके समीप ही अन्य आठ देवताओंका भी वायुकोणमें दोनों हाथ होते हैं। आवास अर्थात् भवन, गृह पूजन करें। दिक क्रमसे न पूजनीय देवके नाम इस आदि, नगर, ग्राम, व्यापारिकपध, प्रासाद, उद्यान, दर्ग, प्रकार हैं देवालय तथा मठ आदिके निर्माणमें वास्तुदेवताकी स्थापनापूर्वक अर्यमा, सविता, विवस्वान्, विबुधाधिप, मित्र, राजयक्ष्मा, पूजा करनी चाहिये। आईस’ देवता बाह्यभागमें ज्ञया तेरह पृथ्वीधर र अपवत्स- ये आठ देव हैं, जो ब्रह्माके चारों देवता अत:भागमें अवस्थित रहते हैं।

और मण्डलाकार स्थित हैं। यथा-ईश, शिखीं, पर्जन्य, जयन्त, आलिशायुध, दुर्गनिर्माणमें ईशानकोणसे नैऋत्यकोणपर्यन्त सूत्रद्वारा सूर्य, सत्य, भूरा, आकाश, वायु, पूषा, वितध, ग्राहक्षेत्र, किया गया पैखान वंश कहा जाता है और अग्निकोणसे अम, गन्धर्व, भृगुराज, मृग, पितृगग, दौवारिक, सुग्रीव, ज्ञब वायुकोंगपर्यन्त दुसरी रेखा खींचों जाती है तो वह वंश पुष्पदन्त, गणाधिप, असुर, शेष, पाप, रोग, अहिमुख, रेखा, दुर्धर रेखा कहलाती हैं। वंश खापर ईशानकोणमें भल्लाट, सौम, सर्प, अदिति तथा दिति-मैं वास्तुमण्डलके आँदति, दुर्धरयोग विन्दुपार हिमवन्त, नैत्यकोण अर्थात् बाह्य देव हैं।

वास्तुमण्डलकै अन्तिम नैर्ऋत्य विन्दुपर जायन्तकै पुजनाका १-मुमानमें ‘इविंशति’ मात्र है, वास्तवमै द्वात्रिंशत् पाठ होना चाहिये।

 

वास्तुमण्डलपूजाविधि

तत्पश्चात् दुर्धर-रेवाके प्रारम्भमें अग्निकोणपर यथासाध्य वास्तु संकुचित या विस्तृत क्षेत्रफलको नायिका तथा अन्तिम छोर वायुकोणपर कालिकादेवीको राशिको बसुओंको संख्या अर्धात् आठसे पहले भाग हैं, पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर शुक्र अर्थात् इन्द्रसे लेकर उसके बचे हुए शेष भागको यम माने। पुनः उक्त गन्धर्वपर्यन्त उक्त वास्तुदेवोंकी पूजा करके भवन निर्माणका वास्तुशकों आसे गुणा करें, जो गुणनफल हों इसकों कार्य प्रारम्भ करना चाहिये।

ऋक्ष भाग अर्थात् सप्ताईससे भाग में, जो शेष हों उसे अक्ष वास्तु (भवन) के सम्मुभागमें देवास, अग्निकोणमैं मा नारााँश कहते हैं और जो भागफल है, यह अव्यय पाकशाला, पूर्व दिशामें यज्ञ-मण्य, ईशानकोणमें काष्ठ या कहलाता है। प्रस्तरसे बनीं पट्टिकाओंके द्वारा घिरा हुआ सुगन्धित पदार्थों उस अक्षराशिको चार गुणा करके गुणनफलमें नौसे तथा पुष्पोंको खनेका स्थान, उत्तर दिशामें भाण्डारागार, भाग हैं, जो शैषांश हो उसका नाम स्थित है। इस स्थित वायुकोणमें गौशाला, पश्चिम दिशामें खिड़की तथा जलाशय, अपर वास्तुमण्डलका निर्धारण करना चाहिये। ऐसा नैऋत्यको समधा, कुश, इंधन तथा अस्त्र-शस्त्रका दैवल ऋषिका अभिमत है। कक्ष, दक्षिण दिशामें सुन्दर शय्या, आसन, पादुका, जस, उछ वास्तुराशिको आठसे गुणा करके जो गुणनफल अग्नि, दौंप और सञ्चन भृत्योंसे युक्त अतिथिगृहका निर्माण हों उसे पिण्ड़ कहते हैं। उस पिण्डको साटमें भाग देना करना चाहिये।

जो शेषांक हों इसके द्वारा गुरुस्वामौके जौवन | गृहके बीच समस्त रिंभागमें कुप, जलसिंचित मरण और परिजनों के विनाशका निर्धारण होता है।

कलौंगृह और पाँच प्रकारकै पुष्यपादपौंकों सुनियोजित मनुष्यकों चाहिये कि वास्तुमण्डलकै मध्यमें ही सदा करें। भवनके बाह्य भाग चारों ओर पाँच हाथ ऊँची गृहका निर्माण करें। उसके पृष्ठभागमें न करे। इस प्रकार दीवाल बनाकर वन और उपवनसे आच्छादित भगवान् वास्तुमाहुलके वामपार्श्वमें भी गृह-निर्माण करना उचित विष्णुका मन्दिर बनाना चाहिये।

क्योंकि बामपार्श्वमें वास्तुदेव सोयें रहते हैं। | इस मन्दिरकै निर्माणकार्य प्रारम्भमैं चौंसह पदको अत: इसमें गृह-निर्माण नहीं करना चाहिये।

वास्तुमण्डल बनाकर वास्तुदेवताकी विधिवत् पुजा करे। सिंह, कन्या तथा तुला राशि रहनेपर उत्तर दिशाके इक्त रौतिके अनुसार वास्तुमएलके मध्य भागमें चार द्वारका शौधन करें और इस प्रकार वृक्षकादि अन्य ऑर्गत हा जसा उनके समीपस्थ प्रत्येक दो राशियोंके रहनेपर पूर्व-दक्षिण तथा पश्चिम द्वारका शोधन पदपर अर्यमादि आठ देवकी पूजा करनी चाहिये। करना चाहिये ( क्योंकि भाद्रपद, आश्विन तथा कार्तिकमासमें । तदनन्तर कर्णभागपर कार्तिकेय आदिका पूजन करके, पूर्व दिशामें मस्तक, उत्तर दिशामें पृष्ठ, दक्षिण दिशामें दोनों ओर पार्थ विदुओं पर दो-दों पद्दकी दूरीसें स्थित क्रॉड और पश्चिम दिशामें चरम फैलाकर वास्तुनाग सोये अन्य पार्श्वे देवका पुजन करें। तत्पश्चात् वास्तुमके तें हैं। अत: उत्तर दिशाका द्वार इस कालमें प्रशस्त होना ईशानादि कोंगोंपर क्रमश: चरक, विदारी, पूतना और हैं। वृश्चिक, धनु एवं मकर राशि अर्थात् मार्गशीर्ष, पौष और पापराक्षस नामक दैवशक्तियों की पूजा करन] चाहिये। माघमें वास्तुनागका सिर दक्षिण, पृष्ठ पूर्व, कौड़ पश्चिम और उसके बाद यास भाग हैतुफादिं देयका पूजन करें। पैर, उत्तर दिशा रहता है। जिससे उस समय पूर्व दिशाका इनके नाम हैतुक, त्रिपुरान्तक, अग्नि, वैताल, यम, द्वार-शौधन उचित हैं। कुम्भ, मन और मैंच राशि अर्थात् अग्निाि , कालक, काल और एकपाद हैं। उनकी पूजा फाल्गुन, चैत्र तथा वैशाखमासमें वास्तुनागका मस्तक करने के पश्चात् ईशानकोणमें भीमरूप, पातालमें प्रेतनायक, पश्चिम, पृष्ठ दक्षिण तथा पैर उत्तर-पूर्व दिशामें रहता है। आकाशमैं गन्धमाल तथा उसके बाद क्षेत्रपाल देवको पूजा अत: दक्षिण दिशा के द्वारका शौधन इस कालमें श्रेयस्कर करनी चाहिये । इसी प्रकार वृष, मिथुन और कर्कराशि अर्थात् पेष्ठ, के पुराणं गावं ये सारे विद्यापम् ॥

आषाढ़ तथा प्रावणमासमें वास्तुनागका सिर उत्तर, पृष्ठ होता है तो हानि होती है। पश्चिम, क्रॉड पूर्व और पैर दक्षिण दिशामें रहता है। उस अतः उपर्युक्त विधिसे प्रासाद या भवनको निर्माण समय पश्चिम द्वारका शोधन करना उचित होता है। करके उसके पूर्वमें पीपल, दक्षिणमैं पाकड़, पश्चिममें। । वास्तु विस्तारकै अनसार आधे भागमें द्वारका निर्माण अगद, इनमें गूलर तथा ईशानकोणमैं मैंमलका वृक्ष करना चाहिये। इस प्रकार आठ दिशाओंमें आठ द्वार कहे लगाना चाहिये, जो अरके लिये शुभ फलदायी होते हैं। इस गमें है।

| प्रकार पूति वास्तु प्रासाद और घरके विनोंका नाश । यदि उपर्युक्त शास्त्र-सम्मत विधि द्वार-शोधन नहीं करनेवाला होता है। (अध्याय ४६) –… म १ . ” || – – सब-न | आँसुमीने पुनः कहा- शौनक ! अब मैं प्रासाद- चतुर्थांश होना चाहिये।

निर्माण एवं उसके लक्षणेंक विषयमें कह रहा है। आप सुनें। बुद्धिमानोंको चाहिये कि वे उस देवप्रासादमें चारों । सर्वप्रथम कुशल वास्तुविद्की देख-देखने चारों दिशाओमें दिशाओंमें निर्गम (बाहर निकलनेके) द्वार रखें। गर्भगृहक चौंसठ-चौंसद पद परिमापका एक चतुष्कोण भूखण्ड चतुर्दिक भित्तियोंमें प्रत्येक भित्तिका पाँच भाग करके तैयार करना चाहिये। जिसमें अड़तालीस पद-परिमाण- उसके मध्यके पाँचवें भाग द्वार लगाना चाहिये। ऐसा ही भूमिमैं वालका निर्माण करें। साथ ही चारों दिशाओं में गर्भगृहके प्रत्येक द्वारका मान वास्तुविद् विद्वानोंने निर्धारित कुल बारह द्वार (वारादरी) बनायें जायें।

किया है। गर्भगृहके समान ही उसके अग्नभागमें मुखमण्डप प्रासादको ऊँचाईके परिमाणको अर्थात् पृथ्वीतलपर बनाना चाहिये। यह प्रसादका सामान्य लक्षण कहा गया है। प्रासादका बनाया गया ऊँचा ज्ञों धरातल है, उसको अब मैं लिङ्गनर्माणकै परिमाणको कह रहा हैं। प्रासादिक जंघा (कुर्सी) कहते हैं। भवनको यह जंघा हैं शौनक! लिङ्गकै परिमाणके अनुसार उसकी पीडका मानव अंघकी अपेक्षा हाई गुना अधिक होनी चाहिये। निर्माण होना चाहिये। पीठभागका दुगुना चारों ओर पीटका उसके ऊपर निर्मित होनेवाले गभागके विस्तार-परिमापको गर्भ भाग हो। पौगभके अनुसार ही उसकौं भिरि शुक्रांन्नि कहते हैं। गर्भभागको पुन: तीन अथवा पाँच भागमें उसके विस्तारके अर्धपरिमाणमें उस लिङ्गपट्का जंघा विभक्त करना चाहिये और शुक्रॉग्निके द्वारकी ऊँचाई भाग निर्मित करें। शिर भागकी आधीं करनी चाहिये । चार शिखर बनाकर हे शौनक जंघा-भागकै परिमाणको अपेक्षा द्विगुणित उसके तीसरे भागपर वैदि-बन्धन करें। उसके चतुर्थं ऊँचा शिखर होना चाहिये। पौंठ और गर्भभागके मध्य ज्ञों भागापर पुन: प्रासादकै कम्त-भागका निर्माण करना चाहिये । परिमाण हो, उस परिमाणके अनुसार शुक्रांघ्रिभाग निर्मित । अथवा भवनका निर्माण करनेके लिये भूमिखड़कों समान होता है। द्वारनिर्माप्याके समय पहले जैसा कहा जा चुका । सोलह भागमें विभक्त करके उस सोलहवें भाग चतुर्थ- हैं, शेष कार्य वैसे ही होगा। लिङ्गका परिमाण बताया जा चुका भागकै मध्यमें गर्भगृहका निर्माण करवायें। बचे हुए बारह हैं। अब द्वारका परिमाण कहते हैं। चार हाथ (छ: फुट) भागमै भित्ति (हवाल)-का निर्माण करे। चतुर्थभागकी का द्वार बनाया जाय, जो वास्तुसे आठव हिस्सा होता है। ऊँचाईके अनुसार ही अन्य भित्तियोंकी ऊँचाईको परिमाण स्वेच्छानुसार, इसका दुगुना विस्तार हो सकता है। निश्चित करना चाहिये । भित्तकी ऊँचाईक मानकी अपेक्षा द्वारके सदृश पीके मध्यभागको छिद्रयुक्त हो जाना। शिखरकों कैचाई दो गुनी हों। मन्दिरके चारों ओर बननेवाले चाहिये । पादिक, होषिक तथा भित्तिद्वार परिमाणकै अनुसार प्रदक्षिणा-भागका विस्तार शिखर भागकी ऊँचाईके मानका हो उसके अर्थ-धं परिमाणकौं दरौपर निर्मित करें। इस

  • चारों शिम्बोके पगें ऊपर हिस्संक कण्ठभाग में हैं। चार

गर्भभागकें विस्तारके समान ही मण्डपके बंधाभागका प्रासादसे निकले है। गज, नृषभ, हंस, गरुड़, सिंह, सम्मुख, निर्माण करके उस जंघाभागके द्विगुणके परमाणमें ऊँचे भूमुख, भूधर, जींजय तथा पृथिवीधर-इन प्रासादोंम उद्धव शिखरभागको निर्मित करे। शुक्रांघ्रिभागको पहलेको हो ‘मालिका’ (मणिक) नामक वृत्तायत प्रासादसे हुआ है। भत बनवाका निर्गम अर्थात् द्वारभागको ऊँचा हीं बनवाये- बत्र, घा, मुष्टिकव, वक़स्वस्तिक, साङ्ग, गदा, ऐसा मण्डपनिर्माणका मान है। इसके अतिरिक्त शेष प्रासाद- वृक्ष, विजय तथा श्वेत-इन नौ प्रासादोंका प्रादुर्भाव भागाकै स्वरुपकों का शिबिटप नामक प्रसादसे हुआ है। प्रासाद-मण्डपके अग्रभागमें बेवेंद्र अर्थात् जिंदारीका इसके अतिरिक्त विकण, पद्माकार, अर्धचन्द्राकार, चतुष्कोण निर्माण करवाना चाहिये, जिसके क्षेत्रभागमें देवगण विद्यमान तथा षोड्शकोणीय प्रकारसे भी मण्डपके संस्थानका निर्माण रहते हैं। इस प्रकार प्रासादके मानका अवधारण करके या अहाँ-तहीं किया जा सकता है, जो क्रमश:-म्प, ऐश्वर्य, भागका निर्माण करें।

आयुवर्धन, पुत्रलाभ और स्त्रौप्राप्ति करानेवालें होते हैं। | इस निर्माणकार्यमें प्रासादकै चारों और एक पाइ