इतने घाव झेलकर भी गर्व से खड़ा है ये ‘मंदिर’

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जिस मंदिर को मुगलों ने कई बार लूटा, कई विदेशी ताकतों ने इस मंदिर को जड़ से उखाड़ फेंकने की नाकाम कोशिश की, कई बार इस मंदिर की संपत्ति को लूटा गया, जितना बार इस मंदिर को नष्ट करने के लिए दुष्ट पैदा हुए, उतने ही बार इस मंदिर के पुनः निर्माण के लिए पुण्य आत्माओं ने जन्म लिया।

आज हम आपको भारत के इतिहास के सबसे रहस्यमई, अद्भुत और आश्चर्यजनक मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिस इतिहास के बारे में हर भारतवासी को जरूर जानना चाहिए। हम बात कर रहे हैं सोमनाथ मंदिर की, जो की एक हिंदू मंदिर है। जिसकी गिनती भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में होती है। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह मे स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण चंद्रदेव ने करवाया था। इस मंदिर का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है।

इतने घाव झेलकर भी गर्व से खड़ा है ये 'मंदिर'

यह मंदिर हिंदू धर्म के उत्थान-पतन का प्रतीक रहा है। अत्यंत वैभवशाली होने के कारण इतिहास में कई बार इस मंदिर को तोड़ा गया तथा पुनः निर्मित किया गया। वर्तमान भवन का पुनः निर्माण का आरंभ भारत के स्वतंत्रता के पश्चात लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने करवाया। और 1 दिसंबर 1995 ईस्वी को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।

सोमनाथ मंदिर विश्व प्रसिद्ध धार्मिक पर्यटन स्थल है। मंदिर के प्रांगण में रात 7:30 से लेकर 8:30 बजे तक 1 घंटे का साउंड लाइट शो चलता है। जिसमें सोमनाथ मंदिर का बड़ा ही सुंदर तरीके से सचित्र वर्णन किया जाता है। लोक कथाओं के अनुसार यहीं पर भगवान् श्रीकृष्ण ने अपना देह त्याग किया था। इस कारण इस क्षेत्र का और भी ज्यादा महत्व बढ़ गया।

प्राचीन हिंदू ग्रंथों के अनुसार सोम अर्थात चंद्र ने प्रजापति राजा दच्छ की 27 कन्याओं के साथ विवाह किया था। लेकिन अपनी सभी पत्नियों में वह रोहिणी नाम की पत्नी को सबसे अधिक प्यार और सम्मान दिया करते थे। अपनी बाकी बेटियों के साथ यह अन्याय होते देख क्रोध में आकर राजा दक्ष ने चंद्रदेव को श्राप देते हुए कहा, कि अब से हर रोज तुम्हारा तेज कम होता रहेगा। इस श्राप के फलस्वरुप हर दूसरे दिन चंद्र देव का तेज घटने लगा। श्राप से विचलित होकर चंद्र देव ने भगवान शिव की आराधना शुरू कर दी। चंद्र देव की आराधना से भगवान शिव प्रसन्न हो गए और चंद्र देव के श्राप का निवारण किया। कहते हैं कि चंद्रदेव का कष्ट दूर होते ही उन्होंने भगवान शिव की स्थापना यहां करवाई, और तब से यहां विराजित भगवान शिव का नाम सोमनाथ पड़ गया।

इतने घाव झेलकर भी गर्व से खड़ा है ये 'मंदिर'

एक दूसरे मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण भालूका तीर्थ पर विश्राम कर रहे थे तभी एक शिकारी ने उनके पैर के तलवे में पदचिन्ह को हिरण की आंख समझकर धोखे में तीर मारा था। यहीं पर से भगवान श्रीकृष्ण ने अपना देह त्याग किया, और यहीं से वह बैकुंठ के लिए प्रस्थान कर गए। इस स्थान पर बड़ा ही सुंदर कृष्ण मंदिर भी बना हुआ है।
प्राचीन धर्म ग्रंथों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण चंद्रदेव ने किया था। बुद्धिजीवी कोई धार्मिक ग्रंथों के आधार पर विश्वास नहीं करते। इसीलिए इस मंदिर का मूल निर्माण और तिथि अज्ञात है। प्राया काल में सोमनाथ मंदिर को नष्ट किया गया और फिर से इसका निर्माण किया गया। गुजरात के वेरावल बंदरगाह में स्थित इस मंदिर की महिमा और ख्याति दूर दूर तक फैली हुई थी। अरब यात्री अलबरूनी ने अपने यात्रा विक्रांत में इसका वर्णन किया है। जिस से प्रभावित होकर महमूद गजनबी ने सन 1024 में सोमनाथ मंदिर पर हमला किया। उसने यहाँ से 20 लाख दीनार की लूट की, और मंदिर को भी खंडित कर दिया था। इसके बाद प्रतिष्ठित की गई शिवलिंग को 1300 ईसवी में अलाउद्दीन की सेना ने खंडित करने की चेष्टा की, इसके बाद भी कई बार मंदिर को खंडित किया गया।

सबसे पहले एक मंदिर ईसा के पूर्व में अस्तित्व में था जिस जगह पर दूसरी बार मंदिर का पुनर्निर्माण सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने किया। आठवीं सदी में सिन्ध के अरबी गवर्नर जुनायद ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी। प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका तीसरी बार पुनर्निर्माण किया. मंदिर का बार-बार खंडन और जीर्णोद्धार होता रहा।

इतने घाव झेलकर भी गर्व से खड़ा है ये 'मंदिर'

गजनवी के हमले के बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका र्निर्माण कराया। साल 1297 में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर कब्जा किया तो इसे फिर गिराया गया। मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः 1706 में गिरा दिया। इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के पूर्व गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बनवाया था।

विश्व प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर आदि अनंत है। इसका सर्वप्रथम निर्माण काल अज्ञात है। हर काल में इस मंदिर को बुरी ताकतों ने लूटा और शिवलिंग को खंडित किया गया। इन सबके बावजूद, आज भी अपने भक्तों के लिए सोमनाथ मंदिर में विराजित शिवलिंग और यह मंदिर पूरे भव्यता के साथ इस दुनिया के सामने खड़ा है। यह मंदिर उन सभी बुरी ताकतों के लिए एक मिसाल है, और सबसे बड़ा उदाहरण है… जो यह दर्शाता है कि आखिर कितना भी अंधेरा हो, जीत हमेशा उजाले की ही होती है। और चाहे कितनी भी बुराई हो जीत हमेशा सच्चाई की ही होती है।

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