यजुर्वेद संहिता

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यजुर्वेद संहिता

यजुर्वेदसंहिता

भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् 

वाजसनेयमाध्यन्दिनशुक्ल

यजुर्वेदसंहिता

अथ प्रथमोऽध्यायः॥

 

 

. ॥ॐ इथे वोजें त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणः | आप्यायध्वमच्या 5 इन्द्राय भागं प्रज्ञावतीरनमीत्रा ; अयक्ष्मा मा स्तेन ईशत |

माघश सो घुषाः अस्मिन् गोपतौ स्यात बह्वीर्यजमानस्य पशून्पाहि ।।१।।

 

ये कण्डिका कर्म में सन्न हैं, यज्ञके साधनोंउपकरणों तथा यकर्ताओं दोनों पर घटित होती हैं। प्रस्तुत कण्डिका | मैं पलाश शाखा को कहना तथा उसे शुद्ध करना, ककड़े को गाय से अलग करना , गाय को संप्रेषित करना एवं शाखा को अम्यागार में स्थापित करना आदि क्रियाएँ सम्पन्न करने का विधान है

 

हे यज्ञ साधनों ! अन्न की प्राप्ति के लिए सवितादेव आपको आगे बढ़ाएँ । सृजनकर्ता परमात्मा | आपको तेजस्वी बनने के लिए प्रेरित करें । आप सभी प्राण स्वरूप हों । सृजनकर्ता परमेश्वर श्रेष्ठ कर्म करने के लिए आपको आगे बढ़ाएँ। आपकी शक्तियां विनाशक न हों, अपितु उन्नतिशील हों । इन्द्र (देव-प्रवृत्तियों) के लिए अपने उत्पादन का एक हिस्सा प्रदान करो । सुसंतति युक्त एवं आरोग्य-सम्पन्न बनकर क्षय आदि रोगों से छुटकारा पाओ । चोरी करने वाले आपके निर्धारक न बनें। दुष्ट पुरुष के संरक्षण में रहो मातृभूमि के रक्षक को छत्रछाया में स्थिर बनकर निवास करो सज्जनों की संख्या | में वृद्धि करो तथा याजकों के पशु- धन की रक्षा करो ॥१ ।।

 

.वसोः पवित्रमसि द्यौरसि पृथिव्यसि मातरिश्वनों घर्मोऽसि विश्वधा असि परमेण धाम्ना दृ६४ हस्व मा ह्वार्मा ते यज्ञपतिङ्घर्षीत् ॥२॥

प्रस्तुत कण्डिका दर्म (पवित्राधिष्ठित देवता) , दुग्ध पात्र एवं खा पात्र को सम्बोधित करती हैं | है यज्ञ साधनों ! आप (अपने यज्ञादि कर्मो से) वस्तुओं को पवित्र करने के माध्यम हों, द्युलोक और पृथ्वी ( के संतुलन कर्ता ) हों । आप हो प्राणों की उष्णता हो, सबके धारक हो महान् शक्तियों को धारण कर प्रगतिशील बनो, इन्हें बिखरने मत दो । आप से सम्बन्धित यज्ञपति (सेवा का दायित्व सँभालने वाले) भी कुटिल न बनें ||२ ॥

 

. वसोः पवित्रमसि शतधारं वसोः पवित्रमसि सहस्रधारम् देवस्त्वा सविता पुनातु वसोः पवित्रेण शतधारेण सुष्वा कामधुक्षः

प्रस्तुत कण्डूिका में गोदुग्ध रूपो हवि को शुद्ध करने की क्रिया का विधान है१.३

आप ( दर्भमय पवित्र बसु) सैंकड़ोंसहस्रों धाराओं वाले, ( वस्तुओं को } पवित्र करने वाले साधन हो | सबको पवित्र करने वाले सविना, अपनों सैकड़ों धाराओं से वस्तुओं को पवित्र करने वाले साधनों में ) तुम्हें पवित्र बनाएँ । हे मनुष्य ! तुम और किस (कामना) की पूर्ति चाहते हो ? अर्थात् किस कामधेनु को दुहना चाहते हो ? ॥३॥

 

[दृष्टा ऋषि गोदुग्ध में सन्निहित पोषक तत्वों को अंतरिक्ष में पृथ्वी पर सहस्रों धाराओं में प्रवाहित होते देखते हैं यज्ञ की प्रक्रिया को इसी विराट् दर्शन से जोड़ना चाहते है ।। . सा विश्वायुः सा विश्वकर्मा सा विश्वधायाः इन्द्रस्य त्वा भाग 5. सोमेनातनच्मि विष्णो हव्ययं रक्ष ।।४।।

प्रस्तुत कण्डिका पूर्वांना प्रश्न के उत्तर में दोड्नकर्ता पुरुष, दुग्ध रूपी वि एवं पोषणकर्ता विष्णु को सम्बोधित है

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