Matsya Puran Part-2

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Matsya Puran Part-2

मत्स्यपुराण

(द्वितीय खण्ड)

[ सरल भाषानुवाद सहित जनोपयोगी संस्करण]

 

दो शब्द

पुराणों को मुख्य उद्देश्य धर्म-कथाओं और धर्म-इतिहास का वर्णन करना माना गया हैं,पर बहुसंख्यक पुराण में इनके अतिरिक्त विभिन्न कलाओं और विद्याओं का विवेचन भी बड़े विस्तारपूर्वक किया गया है। नारद पुराण, गरुड़ पुराण, अग्नि पुराण, विष्णु धर्मोत्तर पुराण आदि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। नारद पुराण में वेद के छ: गों-शिक्षा,कला व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छन्द शास्त्र का जैसा विस्तृत और विशद बर्णन किया गया है उसे देखकर आश्चर्य होता है ।गरुड़ पुराण में रोग और औषधियों का जितना वर्णन मिलता है, उससे उसे एक छोटा-मोटा पृथक, आयुर्वेद ग्रन्थ ही कहा जा सकता है । विष्णु धर्मोत्तर पुराण में राज-सञ्चालन सम्बन्धी सैकड़ों पृष्ठ व्यापी एक पूरा शास्त्र ही मौजूद ‘मत्स्यपुराण’ के इस दूसरे खण्ड में भी राजनीति, गृह निर्माण विद्या’ और ‘मूतिकला’ का पर्याप्त विस्तार के साथ वर्णन पाया जाता | है। इसमें केवल राजा के कर्त्तव्य और प्रजापालन का उपदेश दिया गया है,वरन् राजधानी का नगर किस प्रकार बसाया जाय, किलाबन्दी किस प्रकार की जाय, अपनी रक्षा और शत्रुओं का सामना करने के लिए उसमें क से अस्त्र-शस्त्रों, युद्ध-सामग्री और हर तरह के घायलों की चिकित्सा, जड़ी-बूटियों तथा औषधियों का संग्रह किया जाय इसको वर्णन दस-बीस अध्यायों में विस्तार के साथ किया गया है ।

प्रासाद, भवन, गृह आदि के निर्माण में भी इस देश की प्राचीन ‘वास्तु विद्या’ (इन्जीनियरिंग)का ज्ञान भली प्रकार प्रदशित किया गया | है। मकानों में द्वार किस तरफ बनाये जायें और खम्भों के निर्माण में | किन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है ? इसमें चौकोर से लेकर बनीस पहल तक के तरह-तरह के खम्भों का जो वर्णन मिलती है उससे उस जमाने के लोगों की कलाप्रियता का परिचय मिलता है।

देवताओं की मूर्ति निर्माण में तो काफी जानकारी का होना अनि बार्य ही है। प्रत्येक देवता की मूर्तिमें क्या विशेष लक्षण रचे जायें जिस से उसे ठीक-ठीक पहिचाना जाय और उसके समस्त साम्प्रदायिक चिन्ह उसमें स्पष्ट दिखाई पड़ सके ? उदाहरण के लिये विष्णु-भगवान् की मूर्ति निर्माण में वर्णन किये कुछ लक्षण यहाँ दिये जाते हैं || शंख, चक्र, पद्म और गदा धारण करने वाला—परम प्रशान्त उनका मस्तक छत्र के आकार से संयुत होता हैं । शंख के समान ग्रीवा, शुभ नेत्र, ऊँची नाक, सीप के से कान, परम प्रशान्त उरु वाला उनका रूप होता है। उनकी मूतिं कहीं आठ भुजाओं और कहीं चार भुजाओं से युक्त होती है । यदि भुजा बनाई जाये तो स्वंग, गदा, शर, दिव्य पद्म ये सब अयुध विष्णु जी के दक्षिण भाग में होने चाहिये और धनुष, खेटक, चक़ ये चार भुजा वाले स्वरूप में गदा और पद्म दक्षिण भाग में और शंख तथा चक्र वाम भाग में रखे जायें। उनके नीचे की ओर पैरों के मध्य भाग में पृथ्वी की कल्पना करनी चाहिये । दक्षिण भाग में प्रणति करते हुये गरुड़ और जाम के हाथों में पद्म धारण किये लक्ष्मी देवी को विराजमान करना चाहिये । विभूति की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को गरुड़ की स्थापना भगवान के सम्मुख भाग में करनी चाहिए। दोनों पाश्र्यों में पद्म से संयुक्त श्री तथा पुष्टि की स्थापना करे। विद्याधरों के ऊपर तोरण बनाने और उसे दुन्दुभिनाद करते हुए गन्धर्व, लतायें, सिंह और व्याध आदि से सजाये ।”

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