Matsya Puran Part-2

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Matsya Puran Part-2

मत्स्यपुराण

(द्वितीय खण्ड)

[ सरल भाषानुवाद सहित जनोपयोगी संस्करण]

 

दो शब्द

पुराणों को मुख्य उद्देश्य धर्म-कथाओं और धर्म-इतिहास का वर्णन करना माना गया हैं,पर बहुसंख्यक पुराण में इनके अतिरिक्त विभिन्न कलाओं और विद्याओं का विवेचन भी बड़े विस्तारपूर्वक किया गया है। नारद पुराण, गरुड़ पुराण, अग्नि पुराण, विष्णु धर्मोत्तर पुराण आदि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। नारद पुराण में वेद के छ: गों-शिक्षा,कला व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छन्द शास्त्र का जैसा विस्तृत और विशद बर्णन किया गया है उसे देखकर आश्चर्य होता है ।गरुड़ पुराण में रोग और औषधियों का जितना वर्णन मिलता है, उससे उसे एक छोटा-मोटा पृथक, आयुर्वेद ग्रन्थ ही कहा जा सकता है । विष्णु धर्मोत्तर पुराण में राज-सञ्चालन सम्बन्धी सैकड़ों पृष्ठ व्यापी एक पूरा शास्त्र ही मौजूद ‘मत्स्यपुराण’ के इस दूसरे खण्ड में भी राजनीति, गृह निर्माण विद्या’ और ‘मूतिकला’ का पर्याप्त विस्तार के साथ वर्णन पाया जाता | है। इसमें केवल राजा के कर्त्तव्य और प्रजापालन का उपदेश दिया गया है,वरन् राजधानी का नगर किस प्रकार बसाया जाय, किलाबन्दी किस प्रकार की जाय, अपनी रक्षा और शत्रुओं का सामना करने के लिए उसमें क से अस्त्र-शस्त्रों, युद्ध-सामग्री और हर तरह के घायलों की चिकित्सा, जड़ी-बूटियों तथा औषधियों का संग्रह किया जाय इसको वर्णन दस-बीस अध्यायों में विस्तार के साथ किया गया है ।

प्रासाद, भवन, गृह आदि के निर्माण में भी इस देश की प्राचीन ‘वास्तु विद्या’ (इन्जीनियरिंग)का ज्ञान भली प्रकार प्रदशित किया गया | है। मकानों में द्वार किस तरफ बनाये जायें और खम्भों के निर्माण में | किन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है ? इसमें चौकोर से लेकर बनीस पहल तक के तरह-तरह के खम्भों का जो वर्णन मिलती है उससे उस जमाने के लोगों की कलाप्रियता का परिचय मिलता है।

देवताओं की मूर्ति निर्माण में तो काफी जानकारी का होना अनि बार्य ही है। प्रत्येक देवता की मूर्तिमें क्या विशेष लक्षण रचे जायें जिस से उसे ठीक-ठीक पहिचाना जाय और उसके समस्त साम्प्रदायिक चिन्ह उसमें स्पष्ट दिखाई पड़ सके ? उदाहरण के लिये विष्णु-भगवान् की मूर्ति निर्माण में वर्णन किये कुछ लक्षण यहाँ दिये जाते हैं || शंख, चक्र, पद्म और गदा धारण करने वाला—परम प्रशान्त उनका मस्तक छत्र के आकार से संयुत होता हैं । शंख के समान ग्रीवा, शुभ नेत्र, ऊँची नाक, सीप के से कान, परम प्रशान्त उरु वाला उनका रूप होता है। उनकी मूतिं कहीं आठ भुजाओं और कहीं चार भुजाओं से युक्त होती है । यदि भुजा बनाई जाये तो स्वंग, गदा, शर, दिव्य पद्म ये सब अयुध विष्णु जी के दक्षिण भाग में होने चाहिये और धनुष, खेटक, चक़ ये चार भुजा वाले स्वरूप में गदा और पद्म दक्षिण भाग में और शंख तथा चक्र वाम भाग में रखे जायें। उनके नीचे की ओर पैरों के मध्य भाग में पृथ्वी की कल्पना करनी चाहिये । दक्षिण भाग में प्रणति करते हुये गरुड़ और जाम के हाथों में पद्म धारण किये लक्ष्मी देवी को विराजमान करना चाहिये । विभूति की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को गरुड़ की स्थापना भगवान के सम्मुख भाग में करनी चाहिए। दोनों पाश्र्यों में पद्म से संयुक्त श्री तथा पुष्टि की स्थापना करे। विद्याधरों के ऊपर तोरण बनाने और उसे दुन्दुभिनाद करते हुए गन्धर्व, लतायें, सिंह और व्याध आदि से सजाये ।”

इसी प्रकार प्रत्येक देवता के विशेष चिन्हों का मूर्तियों में दर्शाने का पूरा विवरण दिया गया है। अन्त में सब मूर्तियों के अङ्ग अनुपात के अनुसार कितने बड़े और छोटे होने चाहिये इसको भी स्पष्ट कर दिया गया है । एक जगह कहा गया है कि “मूर्ति की कटि अठारह अगुल की होनी चाहिए । स्त्री-मूर्ति की कटि बाईस अगुल की रखी जाती हैं और दोनों स्तन बार-बारह अगुल के होते हैं। नाभि के मध्य का परीणाहू बयालीस अ गुल का अभीष्ट होता है। पुरुषों में यह विस्तार पचफन अगुल होता है । दोनों कन्धे छः-छः अ गुल के बताये गये हैं। ग्रीन। अझ अगुल और दोनों भुजाओं का अयाम ब्यालीश अगुल का होता है।” इसी प्रकार शरीर के प्रत्येक अङ्ग की हथे लियों और पाँच अंगुलियों तक की नाप ठीक-ठीक बताई गई हैं, जिससे मूर्ति सब प्रकार से सुन्दर दिखाई दे और उसमें कहीं वेडौलपन

न हो । और भी कई अन्य महत्वपूर्ण विषय इस खण्ड में मिलते हैं। भृगु, अङ्गिरस, अत्रि, कुशिक, कश्यप, वसिष्ठ आदि सभी प्रमुख ऋषियों के नाम, गोत्र, वंश, प्रवर स्पष्ट रूप में दिये गये हैं। ये ऋषि भारतीय संस्कृति के आदि जनक माने जाते हैं और अधिकाँश पौराणिक उपा ख्यान इन्हीं बंशों से किसी न किसी रूप में सम्बन्धित हैं। नरसिंह और वाराह अवतारों के चरित्र के विषय में भी मत्स्य पुराण का वर्णन कुछ विशेषता लिये हुए है । देवासुर संग्राम में दोनों पक्षों के सेना नायकों तथा वीरों का परिचय और उनका संग्राम कवि कल्पना का अच्छा परिचय देने वाला हैं । सावित्री सत्यवान की कथा इस पुराण में भी छ: सात अध्यायों में दी गई है और उसको वर्णन शैली प्रभावशाली हैं । मंगल -अमंगल सूचक शकुनों, तरह-तरह के स्वप्नों और अङ्गों को फड़कने का जो फलादेश दिया गया हैं वह् । अधिकांश पाठकों को आकर्षक जान पड़ेगा । ।।।

अठारहों पुराणों के स्तर पर विचार करते हुए “मत्स्य पुराण को महत्वपूर्ण ही माना जायगा । यह न बहुत अधिक बड़ा है और न बहुत छोटा और पुराण के पांचों अंगों के साथ इसमें पर्याप्त जीवन पयोगी और समाज की दृष्टि से प्रगतिशील विद्याओं और कलाओं का परिचय दिया गया है । यद्यपि हम एक हजार पृष्ठ में सब बातों को पूरे विस्तार के साथ नहीं दे सकते तब भी संशोधित संस्कारण मैं पाठकों को सभी आवश्यकीय बात का ज्ञान हो सकेगा और वे स्वयं इसके महत्व को अनुभव कर सकेंगे ।

६१नरिसंह माहात्म्य वर्णनइदानीं श्रोतुमिच्छामो हिरण्यकशिपोर्वधम्

नरसिहस्य माहात्म्यं तथा पापविनाशनम् ॥१ पुरा कृतयुगे विप्रा हिरण्यकशिपुः प्रभुः दैत्यानामादिपुरुषश्चकार महत्तपः ।२ दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि जलवासी समभवतु स्नानमौनधृतव्रतः ।३ : शमदमाभ्याञ्च ब्रह्मचर्येण चैव हि ब्रह्मा प्रीतोऽभवत्तस्य तपसा नियमेन ।४।११ ततः स्वयम्भूर्भगवान् स्वयमागम्य तत्र है। विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्त भास्वता ।५

: आदित्यैर्वसुभिः साध्यैर्मरुद्भर्देवतस्तथा – – – रुद्र विश्वसहायैश्च यक्षराक्षसपन्नगः ॥६ दिभिश्चैव विदिभिश्च नदीभिः सागरैस्तथा

नक्षत्रैश्च मुहूर्तेश्च खेचरैश्च महाग्रहः ॥७॥

ऋषिगण ने कहाहै मुनिवर ! इस समय में हम लोग हिरण्य कशिपु के वधके विषय में श्रवण करने की इच्छा रखते हैं तथा भगवान्

१० ]

 नरसिह प्रभु के माहात्म्य को भी सुनना चाहते हैं जो सम्पूर्ण पापों का

विनाश करने वाला है । १। महा महषि श्री सूत जी ने कहा है विप्र वृन्द्र ! पहिले कृत युग में हिरण्यकशिपु राजा दैत्यों का आदि पुरुष था और उसने दश सौ दश हजार वर्ष तक महान् घोर तपश्चर्या की थी। वह स्नान-मौन और व्रतको धारण करने वाला होकर जलमें ही निवास करने वाला हो गया था २३। इसके अनन्तर उस हिरण्यकशिपु दैत्य | राज के उस महान् उग्र तप से और नियमों के परिपालन से शमदम और ब्रह्मचर्य के द्वारा ब्रह्माजी उस पर बहुत प्रसन्न हो गये थे। जब

अत्यधिक प्रसन्न हो गये तो स्वयम्भू भगवान् स्वयं ही वहाँ पर उसके तप के स्थल पर आ गये थे । सयुक्त-सूर्य के समान वर्ण वाले भास्वान् विमान के द्वारा ब्रह्माजी ने वहां पर पदार्पण किया था । उस समय में उनके साथ आदित्य, वसुगण, साध्य, मरुद्गण, दैवत, रुद्र, विश्व सहायक, यक्ष, राक्षस, पन्नग, दिशायें, विदिशायें, नदियाँ, सागर, नक्षत्र, मुहूत्त, खेचर और महान ग्रह सब थे ।४-७। ।

देवैञ ह्मर्षिभिः सद्धि सिद्ध : सप्तर्षभिस्तथा राजषिभिः पुण्यकृभिर्गन्धर्वाप्सरसाङ्गणैः ८। चराघरगुरुः श्रीमान् वृतः सर्वे दिवौकसः ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रष्ठो दैत्यं वचनमब्रवीत् ।६।। प्रीतोऽस्मि तव भक्तस्य तपसोऽनेनसुव्रत ! वरं वरय भद्र ते यथेष्ट काममाप्नुहि ।१० ।। देवासुगन्धर्वा यक्षोरगराक्षसाः मानुषाः पिशाचा वा हुन्युर्मान्देवसत्तम ! ।।१

ऋषयो बा मां शापः शपेयुः प्रपितामह यदि में भगवान् प्रीतो वर एष वृतोमया ।१२। चास्त्रेण शस्त्रण गिरणा पादपेन शुष्केण चाद्रण दिवा निशाऽथवा ।१३८

 

नरसिंह माहात्म्य वर्णन ]      

भवेयमहमेवार्कः सोमवायू ताशनः सलिलञ्चान्तरिक्षञ्च नक्षत्राणि दिशो दश ।१ अहं क्रोधश्च कामश्च वरुणो वासबो यमः ।। धनदश्च धनाध्यक्षो यक्ष: किंपुरुषाधिपः ।१५

ब्रह्माजी जब वहाँ आये थे तो वे देवगण, ब्रह्मर्षि, सिद्ध और | सप्तषियों के साथ में थे। बड़े २ राजर्षि, पुण्यवान्, गन्धर्व, अप्सराओं के समुदाय तथा समस्त दिवौकसों के साथ में वै चरों और अचरोंके गुरु ब्रह्मवेत्ताओं में परम श्रेष्ठ श्रीमान् ब्रह्माजी परिवृत थे । वहाँ पहुँचकर जगदगुरु ब्रह्माजी ने उस दैत्यराज से यह वचन कहा था ॥६-६। हे मुन्नत ! तुम मेरे परम भक्त हो। मैं इस समय में आपके इस अत्यन्त उग्र तप से परम प्रसन्न हो गया हैं । आपका कल्याण हो, अब जो भी कोई वरदान मुझसे चाहते हो माँग लो और जो भी आपकी परम अभीष्ट कामना हो उसे प्राप्त करलो ।१०। वह् ब्रह्माजी का वचन सुनकर हिरण्यकशिपु ने कहा–हे देव सत्तम ! मैं यही चाहती हैं कि देब, असुर, गन्धर्व, यक्ष, उरग, राक्षस, पिशाच और मानुष कोई भी मेरा हनन न करें ।११। हे प्रपितामह ! ये ऋषिगण भी अपने शापों के द्वारा मुझे अभिशप्त न करने पावें । यदि भगवान् आप मुझपर पूर्णतया प्रसन्न हो गये हैं तो मैं आपने यहीं वरदान प्राप्त करना चाहता हैं।१३ हे भगवन् ! मेरी मृत्यु का साधन कोई भी अस्त्र, शस्त्र, गिरि, पादप, आदि न होवे अर्थात् इनमें किसीके भी द्वारा मैं न मारा जा सके। मैं किसी भी शुष्क स्थल में अर्थात् भूमि पर और अद्र भाग में अर्थात् | जल में न मरू । मुझे दिन में तथा रात्रि में किसी भी समय में मृत्य | न आवे अर्थात् मुझे दिन और रात में कोई भी न मार सके ॥१३॥ है। ब्रह्मन् ! मैं ही सूर्य हो जाऊ तथा सोम-वायु और हुताशन मैं ही बन जाऊँ अर्थात् इन सबको शक्ति मेरे अन्दर ही हो जावे । मैं ही सलिल | अन्तरिक्ष, नक्षत्र, दशों दिशाएं हो जाऊ” अर्थात् इन सबकी शक्ति मेरे मत्स्य पुराण ही अन्दर उपस्थित हो जाबे । हिरण्यकशिपु ने कहा कि मैं क्रोध, काम वरुण इन्द्र, यम, धनद, धन का स्वामी, किम्पुरुषों का अधिप यक्ष हो जाऊ” अर्थात् इन सबकी क्षमता मेरे ही अन्दर हो जानी चाहिए और मेरे सामने ये सब शक्तिहीन हो जावें ॥१४-१५।।

एते दिव्या वरास्तात ! मया दत्तास्तवाद्भुत: सवन् कर्मान् सदा वत्स ! प्राप्स्यसे त्वं संशयः १६ एवमुक्त्वा भगवान् जगामाकाश एवं हि – – – वैराजं ब्रह्मसदनं ब्रह्मषिगणसेवितम् १७ :. ततो देवाश्च नागाश्च गन्धर्वा ऋषिभिः सह वरप्रदानं श्रुत्वैव पितामहमुपस्थिताः १८

  • वरप्रदानाद्भगवन् ! बधिष्यति नोऽसुरः | तत्प्रसीदाशु भगवन् ! वधोऽप्यस्थ विचिन्त्यताम् १६ भगवन् ! सर्वभूतानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः

स्रष्टा त्वं हव्यकव्यानामब्यानासब्यक्तप्रकृतिबु धः ।२७ सर्वलोकहितं वाक्यं श्रुत्वा देवः प्रजापतिः आश्वासयामास सुरान् सुशीतैर्ववचनाम्बुभिः ।२१

अह्माजी ने कहा—-है तात ! ये सब दिव्य वरदान हैं और बहुत ही अद्भुत हैं किन्तु मैंने तुमको ये सभी वरदान दे दिये हैं। है वत्स ! तुम अपने सम्पूर्ण कामों को सदा प्राप्त कर लोगे-इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है । १६ । इस प्रकार से उन भगवान ब्रह्माजी ने कहा था और फिर आकाश के मार्ग से ही ब्रापिस चले गये थे। ब्रह्माजी उस समय में ब्रह्मर्षि गणों से सेवित ब्रह्माजी के घर वैराज को चले गये थे ।१७। इसके पश्चात् देव, नाग, गन्धर्ब आदि सब ऋषिगण के साथ इन वरों के प्रदान को सुनकर ही ब्रह्माजी पितामह के समीप में उपस्थित हुए थे ।१८। देवगण ने कहा–हे भगवन् ! आपके इस प्रकार के बर दानों के दे देने से तो यह हमारा सबका वधकर डालेगा । हे भगवन् !

नरसिंह माहात्म्य बर्णन ] इसलिये आप प्रसन्न होइये और शीघ्र ही इसका कोई वध होने का वध होने का उपाय भी मोचिये ।१६। हे भगवान् ! आप तो समस्त भूतों के आदि कर्ता है और स्वयं प्रभ हैं। आप हृव्य-द्रव्यों के सृजन करने वाले हैं । अव्यक्त प्रकृति और परम बुध हैं। इस समस्त लोकों के हित करने वाले वाक्य को सुनकर प्रजापति देव ने सब सुरों को मुशीतल वचन रूपी मुन्दप जलों के द्वारा समाश्वासन दिया था । २१ ।।

अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं तपसः फलम् तपसोऽन्तेस्य भगवान् वधं विष्णुः करिष्यति ।२२ तच्छत्वा विबुधा वाक्यं सर्वे पङ्कजजन्मनः ।। स्वानि स्थानानि दिव्यानि विप्रा जग्मुमुदान्विताः ।२३ लब्धमात्रे वरे चाथ सवः सोबाधत प्रजाः ।। हिरण्यकशिपु दैत्यो वरदानेन दर्पितः ।२४ आश्रमेषु महाभगवान् मुनीन् शंसितब्रतान् सत्यधर्मपरान् दान्तान् धर्षयमास दानवः ।२५ देवास्त्रिभुवनस्थांश्च पराजित्य महासुरः त्रैलोक्यं वशमानय स्वर्गे वसति दानवः ।२६ यदा वरमदो सिक्तश्चौदितः कालधर्मतः यज्ञियानकरोद्द त्यानयज्ञियाञ्च देवताः ॥२७ तदादित्याचे साध्याश्च विश्वे वसवस्तथा ।।। सेन्द्रा देवगणायक्षाः सिद्धद्विजमहर्षयः ।२८ शरणं शरणं विष्णुमुपतस्थुर्महाबलम् ।। देवदेव यज्ञमयं वासुदेवं सनातनम् ।२६

 देवगणो ! उस असुर ने तपस्या की हैं अतएव उसका फल तो | उसे अवश्य ही प्राप्त करना ही था । इस तप के फल के अन्त हो जाने  मत्स्य पुराण पर इसका वध भगवान् विष्ण, हीं करेंगे ।२२। है विप्रो ! उस समय में सव देव पङ्कज से जन्म ग्रहण करने वाले पितामह के इस वाक्य को श्रवण कर प्रसन्नता से युक्त होकर अपने २ दिव्य स्थानों को चले गये थे ।२३। ऐसे वरदानों के प्राप्त होने के साथ ही वह दैत्यराज सम्पूर्ण प्रजाओं को बाधा पहुँचाने लगा था । वह दैत्यराज हिरण्यकशिपु बरदान प्राप्त करने से अत्यन्त दर्पित हो गया था अर्थात् उसे बड़ा घमंड हो गया था ।२४। वह दानव जो अपने-अपने श्रिमों में रहने वाले महाभाग मुनिगण थे और जो शसित व्रतों वाले सत्यधर्म में परायण एवं परम दमनशील सत्पुरुष थे उन सबको घर्षित करने लगा था ।२५। त्रिभुवन में स्थित देवों को उस महासुर ने पराजित करके पूर्ण त्रैलोक्य को अपने वश में ले लिया था और वह दानव स्वयं स्वर्ग | में निवास किया करता था। जिस समय में वह वरदान के मद से अत्यन्त ही उरिसक्त हो गया था तब वह काल के धर्म से प्रेरित हो । गया और उसने दैत्यों को यज्ञिय बना दिया था और अयज्ञियों को देवता कर दिया था।२४-२७॥ उस समय में आदित्य, साध्य, विश्वेदेवा वसुगण इन्द्र के सहित देवगण, यक्ष, सिद्ध, द्विज, और महर्षि, वृन्द सबके सब महान् बन सम्पन्न भगवान् विष्ण, की शरणागति में पहुँचे थे जो प्रभु देवों के भी देव-यज्ञमय सनातन वासुदेव थे और आप हीं। हमारे शरण अर्थात् रक्षक हैं-यह प्रार्थना करने लगे थे ।२८-२६॥

 

नारायण ! महाभाग ! देवास्त्वां शरणंगताः त्रायस्व जहि दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपु प्रभो ! ३० त्वं हि नः परमो धाता त्वं हि नः परमो गुरुः त्वं हि नः परमोदेवो ब्रह्मादीनां सुरोत्तम 1३१ भयन्त्यजध्वममरा अभयं वो ददान्यहम् तथैव त्रिदिवं देवाः प्रतिपद्यत मा चिरम् ।३२ १५ एषोऽहं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पतम् ।। अबध्यममरेन्द्राणं दानवेन्द्र निहन्म्यहम् ३३ एवमुक्त्वा तु भगवान् विसृज्य त्रिदशेश्वरान् वधं सङ्कल्पयामास हिरण्यकशिपोः प्रभुः ।३४ सहायश्च महाबाहुरोंकारं गृह्य सत्वरम् अथोंकारसहायस्तु भगवान् विष्णुरळ्ययः ।३५

देवगण ने भगवान् विष्ण से कहा है नारायण ! आप तो महान् भाग वाले हैं । हम समस्त देवगण आपकी शरणागति में उपस्थित हो गये हैं । हे प्रभो ! आप हमारी रक्षा करो और इस दैत्येन्द्र हिरण्यक शिपु का वध करो ॥३०॥ हे सुरोत्तम ! हम सबके आप ही परम धाता हैं और आप ही हमारे परम गुरु हैं-आप ही हमारे सर्वोपरि विराज | मान देव हैं और ब्रह्मा आदि सब मैं आप सवश्व ध्ठ देव हैं ।३१। भग | वान् विष्ण ने कहा-है अमर गणों ! भय का पूर्ण रूप से त्याग करदो मैं आपको अभय का दान करता हैं । हे देवताओं ! पूर्व की ही भति आप सब लोग अपने त्रिदिन को पुनः बहुत ही शीघ्र प्राप्त कर लोगे । ३२। यह मैं ही बरदान प्राप्त करने ये अत्यन्त घमन्ड में भरा हुआ जो यह दैत्यराज है उसको गणों के सहित मार दूंगा जो कि यह दानवेन्द्र अन्य संग अमरेन्द्रों के द्वारा अवध्य हैं । ३३। इस प्रकार से कहकर भगवान् ने उन सब त्रिदशेश्वरों को विसर्जित कर दिया था और फिर प्रभु ने उस दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपु वध के करने के लिए मन में संकल्प किया था ३४। सहायता करने वाले महाबाहु प्रभु ने बहुत शीघ्र ओङ्कार का ग्रहण किया था। इसके अनन्तर अश्यय भगवान् विष्ण, ओङ्कार की सहायता वाले हो गये थे ।३५॥

हिरण्यकशिपुस्थानं जगाम हरिरीश्वरैः ।। तेजसा भास्कराकारः शशी कान्त्येवचापः ।३६ नरस्य कृत्वाद्ध तनु सिंहस्याद्ध तनु तथा । मत्स्य पुराण नारसिंहेन वपुषा पाणि संस्पृश्य पाणिना ।३७ : ततोऽपश्यत विस्तीर्णा दिब्यां रम्यां मनोरमाम् । सर्वकामयुतां श्वभां हिरण्यकशिपोः सभाम् । ३८ : विस्तीर्णा योजनशतं शतमध्यर्द्ध मायताम् । वैहायसी कामगमां पञ्चयोजनविस्तृताम् ।३६ जराशोककलमापेतां निष्प्रकम्पा शिवां सुखाम् । वेश्मर्थ्यवर्ती रम्या ज्वलन्तीमिव तेजसा ।४ अन्तःसलिलल संयुक्त विहित विश्वकर्मणा । दिब्यरत्नमयैवृक्षैः फलपुष्पप्रदेयु ताम् ॥४१ ।। नीलपीतसिंतश्यामः कृष्णलॅहितकैरपि ।।

अवतानैस्तथा गुल्मर्मञ्जरीशतधारिभिः |४२

ईश्वर हरि भगवान् हिरण्यकशिपु के स्थान को गये थे । उस समय में वह तेज से भास्कर के आकार के तुल्य और कान्ति से एक दुसरे चन्द्रमा के समान थे । नर का आधा शरीर बनाकर तथा आधा शरीर सिंह का धारण करके नरसिंह वपुसे युक्त होकर, पाणि के द्वारा पाणि का स्पर्श करते हुए हरि हिरण्यकशिपु की सभा में पहुंचे थे । वहाँ पहुँचकर उन्होंने अत्यन्त विस्तीर्ण ,दिव्य, रम्य, मनोरम, समस्त काम में समन्वित और शुभ्र दैत्यराज हिरण्यकशिपु की सभा का अवलोकन किया था ।३६-३६। वह सभा स योजन विस्तार वाली-शत | मध्यद्ध, वैहायसी, काम पूर्वक गमन करने वाली तथा पाँच योजन विस्तृत थी।३६। हिरण्यकशिपु की सभा जरा शौक और कलम से अपेत अर्थात् रहित थी तथा निष्प्रकम्प–शिव–सुखप्रद–वेश्म और हुम्र्यों से संयुत रम्य एदां तेज से जाज्वल्यमान जैसी थीं ।४। इस सभा के मध्य में सलिल रहता था और इसकी रचना विश्वकर्मा के द्वारा की गयी थी । वह सभा परम दिव्य फल-पुष्प प्रदान करने वाले रत्नों से परिपूर्ण वृक्षों से समन्वित की। नील-पीत-सित-श्याम-कृष्ण

 

१७ लोहित अवतारों से युक्त तथा मंजरी इतधारी गुल्मों में संयुक्त वह सभा थी जिसकी अवर्णनीत शोभा हो रही । १-४२।।  सिताभ्रघनसङ्काशी लवन्तीव व्यदृश्यत ।|

रश्मिवती भास्वरा च दिव्यगन्धमनोरमा १४३ सुमुखा न च दुःखा सा न शीता न च धर्मदा। न क्षतपिपासे बलानि वा प्राप्यतां प्राप्नुवन्ति ते ४४ नानारूपैरुपकृतां विचिरति भास्वरैः ।। स्तम्भैन विभूना सा च शाश्वती चाक्षया सदा ॥४॥ सर्वं च कामाः प्रचुरा ये दिव्या ये च मानुषाः ।। रमयुक्तं प्रभूनच भक्ष्यभोज्यमनन्तकम् ।४६ पुण्यगन्धस्त्रजश्चात्र नित्यपुष्पफलद्र माः । उष्णे शीतानि तोयानि शीते चोष्णानि संनि च ।४७ पुष्पिताग्रा महाशाखाः प्रधालांकुरधारिणः । । नतावितानसंच्छन्ना नदीषु च सर:मु च ४८, वृक्षान् बहुविधांस्नत्र मृगन्द्रो ददृशे प्रभुः । । गन्धर्वन्ति च पुष्पाणि रसवन्ति फलानिच ४६ सित भघा में वे सदृश वह सभा लवन करती हुई जैसी दिखलाई दिया करती थी । रश्मियों से युक्त-परम भास्कर और दिब्यगन्ध से समन्वित एवं मनोहर थी १४३। सुन्दर मुखों से परिपूर्ण दुःख से रहित न अधिक शीत-युक्त और न धूप को प्रदान करने वाली थी । वहाँ पर जो भी पहुँच जाया करते थे वे फिर भृग्य-प्यास और ग्लानि को प्राप्त नहीं हुआ करते थे । नाना प्रकार के रूपों वाने—विचित्र और भास्कर स्तम्भों से उपकृत वह सभा थी । बह विभृता नहीं थी प्रत्युत शाश्वती तथा सदा अक्षया थी। उस सभा में सभी कामनाए चाहे वे दिव्य हों या मानुषी हों प्रचुर मात्रा में विद्यमान रहा करती थीं। रस से युक्त अन्त से शून्य प्रभूत भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थ उस में रहा करते थे ।४५। मत्स्य पुराण ।४६। इस दैत्यराज की महासभा में पुण्य गन्ध वाले वृक्ष बारहों महीने | नित्य ही पुष्प और फलों के प्रदान करने वाले थे। वहाँ पर उष्णकाल में शीतल और शीत काल में उष्ण अल रहा करते थे ।४७। नदियों में और सरोवरों में ऐसे वृक्ष थे जिनके अग्रभाग पुष्यित थे जिनकी महान् शाखायें थी और जो प्रबालांकुरों के धारण करने वाले थे तथा लताओं के वितानों से सच्छन्न थे ।४६। मृगेन्द्र प्रभु ने वहाँ पर इस प्रकार के बहुत-सी तरह के वृक्षों को देखा था जिनमें गन्ध से युक्त पुष्प थे और रस से समन्वित फल थे ।४६।।

तस्यां सभायां दैत्येन्द्रो हिरण्यकशिपुस्तदा स्त्रीसहस्रः परिवृतो विचित्राभरणाम्बरः ।५० अनर्थ्यमणिवज्राचशिखाज्वलितकुण्डलः आसीनश्चासने चिशे दश मल्वप्रमाणतः ॥५१ दिवाकरनिभे दिव्ये दिव्यास्तरणसंस्तुते दिव्यगन्धर्वहस्तत्रमारुतःसुसुखोववौ ।५२ हिरण्यकशिपुर्दैत्य आस्ते ज्वलितकुण्डलः उपचेरुमहादैत्यं हिरण्यकशिपु तदा ।५३ . .. दिव्यतानेन गौतानि जगुर्गन्धर्वसत्तमाः विश्वाची महजन्याच प्रम्लोचेत्यभिविश्रुता ।५४ दिब्याथ सौरभेयी समीची पुञ्जिकस्थली मिश्रकेशौचरम्भाचचित्रलेखाशुचिस्मिता १५५ चारुकेशी घृताची मेनका चोर्वशीतथा   एताः सहस्रशश्चान्या नृत्यगीतविशारदाः

५६ … उस समय में उस सभा में वह दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपु समवस्थित था जो स्त्री समुदायों की सहस्र संख्यासे परिबृत था तथा विचित्र अभ रण और वस्त्रों से समलंकृत था ।५ । बहुमूल्य मणि और बच्चों की रश्मियों की शिखाओं से ज्वलित कुण्डलों वाला था

१६ युक्त विचित्र सिंहासन पर वह दैत्यराज समबस्थित था । वह सिंहासन सूर्य के समान परम दिव्य एवं दिव्य आस्तरण से संस्तृत था । वहाँ पर दिव्य गन्ध के वहन करने वाला सुन्दर सुख का देने वाला वायु बहन कर रहा था ।५१-५२। वहाँ पर जाज्वल्यमान कुण्डलों वाला हिरण्य कशिपु दैत्यराज स्थित था। उस समय में हिरण्यकशिपु दैत्यराज की परिचर्या बहुत सी अप्सराए कर रही थीं ।५३। श्रेष्ठ गन्धर्वगण दिव्य मान के द्वारा गीतों का गान कर रहे थे । विश्वाची, सहजन्या, अभि बिश्चत, दिव्या, सौरभेयी, सुमीची, पुजिक स्थली, मिश्र केशी, रम्भा शुचिस्मित वाली चित्र लेखा-चारु कैशौघृताची-मेनका और उर्वशी ये और सहस्रों अन्य अप्सराए जो नृत्य तथा गीतों के गायन करने में परम विशारद उस दैत्यराज की परिचर्या कर रही थीं ॥५४॥५६॥

उपतिष्ठन्त राजानं हिरण्यकशिपु प्रभुम् ।। तत्रासीनं महाबाहु हिरण्यकशिपु प्रभुम् ।५७ उपासन्त दितेः पुत्राः सर्वे लब्धबरास्तथा। तमप्रतिमकर्माणं शतशोऽथ सहस्रशः ॥५८ बलिवरोचनस्तत्र नरकः पृथिवीसुतः । प्रह्लादो विप्रचित्तश्च गविष्ठश्च महासुरः ५५६ सुरहन्ता दुःखहन्ता सुनामी सुमतिर्वरः । घटादरो महापाश्र्वः क्रथनः कठिनस्तथा ।६० र ४ विश्वरूपः सुरूपश्च सबलश्च महाबलः । । दशग्रीवश्च बालीच मेघवासा महासुरः ।६१ घटास्यो कम्पनश्चैव प्रजनश्चेन्द्रतापनः । दैत्यदानवसंघास्ते सर्वे ज्वलितकुण्ड़लाः ॥६२ स्रग्विणो वाग्मिनः सर्वे सदैव चरितव्रताः । सर्वे लब्धवराः शूराः सर्वे विगतमृत्यवः ।६३

मत्स्य पुराण वहाँ पर उस महती राज सभा में समवस्थित महान बाहुओं वाले महाराज हिरण्यकशिपु प्रभु की सेवामें सब उपस्थित होकर सेवायें कर रहे थे ।५७। दिति के सभी पुत्र जिन्होंने वरदान प्राप्त कर लिए थे वे सब सैकड़ों और सहस्रों की महा संख्या में अप्रतिम कर्म बाले उस दैत्य राज की उपासना कर रहे थे। उन दैत्यों में बलि, विरोचन, नरक पृथ्वी सुत प्रह्लाद-बिप्रचित्त महासुर गविष्ठ-सुहन्ता दुःख हुन्ता सुनामा, सुमति अर, अटोदर, महापाश्वं, क्रथन, कठिन, विश्वल्प,सुरूप सबल, महावक, दृशीव, बाली, महासुर मेघ बासा, घटस्य, कम्पन, प्रजन, इन्द्र तापन आदि थे । इन सब दैत्य दानवों के संघ थे जो सभी जाज्वल्यमान कुलों वाले थे । ५६-६६। सभी लोग स्रावी अर्थात् मालाधारी–वामी और सदैव चरित व्रत वाले थे। इन सभी ने वर दान प्राप्त कर लिए थे—सब शूर वीर और मृत्यु के भय से रहित थे।

 

एते चान्ये बहवो हिरण्यकशिपु प्रभुम् ।१२।। उपासन्ति महात्मानः सर्वे दिव्यपरिच्छदाः ।६४ विमानैवविधाकारैजमानै रिवाग्निभिः ।। महेन्द्रवपुषः सर्वे विचित्राङ्गदबाहवः ।६५ भूषिताङ्गा दितेःपुत्रास्तमुपासत सर्वशः तस्यां सुभायान्दिव्यायामसुराःपर्वतोपमाः ॥६६ हिरण्यवपुषः सर्वे दिवाकरसमप्रभाः श्रुतन्न दृष्टं हि हिरण्यकशिपोर्यथा ।६७ ।। ऐश्वर्यदैत्यसहस्य यथा तस्य महात्मनः कनकरजतचित्रवेदिकायां परिहृतरत्नविचित्रवीथिकायाम् ददर्श मृगाधिपः सभायां सुरचितरत्नगवाक्षशोभितायाम् ।६८ कनकविमलहारविभूषिताङ्ग दितितनयं मृगाधिपोददर्श दिवसकरमहाप्रभालसं तन्दितिजसहस्रशतैर्निषेन्यमाणम् ।६६

नरसिंह हिरण्यकशिपु युद्ध वर्णन ]

ये तथा अन्य बहुत-से दिव्य परिच्छन्दों वाले सब असुरगण महान् | आत्मा वाले उस प्रभु हिरण्यकशिपु की उपासना कर रहे थे ।६।। विविध भाँति के आकार प्रकार वाले अग्निके सदृश भ्राजमान विमानों के द्वारा अद्भुत अङ्गदों से समलंकृत बाहुओं वाले और महेन्द्र के तुल्य वपु को धारण करने वाले-भ पित अङ्गदोसे युक्त सब दिति के पुत्र सभी ओर से उस दैत्यराजको समुपासना कर रहे थे। उस महान् राजसभा में जो कि अत्यन्त दिव्य थी सभी असुरगण पर्वत के समान विशालथे । ।।६५-६६। सभी लोग हिरण्य वपु वाले वहाँ पर थे जिनकी दिवाकर के तुल्य प्रभा थी दैत्यों में सिंह के समान उस महान् आत्मा वाले हिरण्य | कशिपु का जैसा ऐश्वर्या था वैसा न तो कभी किसी को देखा गया था | और न कहीं पर सुना ही गया था । जिस सभा में स्थित होकर वह | मृगाधिप नरसिह देख रहे थे वह भली भाँति निमित गवाक्षों से सुशो भित थी और परिहृत किये हुए रत्नों से विचित्र वीथिका वाली थी तथा सुवर्ण एवं चाँदीकी निमित अदभूत वेदिका से समन्वित थी। उन मृगाधिप मरसिह प्रभु ने सुबर्ण के बिमल हारों से विभूषित अङ्गों वाले तथा सूर्य के तुल्य महती प्रभा से युक्त और सैकड़ों एवं सहस्रों दैत्योके द्वारा सेवित उस दिति के पुत्र हिरण्यकशिपु को देखा था ।६७-

 

६२अन्य दानवों के साथ नरिसंह का युद्ध ततो दृष्ट्वा महात्मानं कालचक्रमिवागतम् नरसिंहवपुशन्नं भस्मच्न मिवानलम् ।। हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रह्लादोनाम वीर्यवान् दिव्येन चक्षुषा सिहमपश्यद्द वमागतम् ।२।

२२ ।। मत्स्य पुराण तं दृष्ट्वा रुक्मशैलाभूतपूर्वान्तनुमाश्रितम् विस्मिता दानवाः सर्वे हिरण्यकशिपुश्च सः ।३ महाबाहो ! महाराज ! दैत्यानामादिसम्भव ।। श्रुतं नदृष्टं नासिहमिदं वपुः ।४ महाबाहो ! महाराज ! दैत्यानामादिसम्भव दित्यान्तकरणं घोरं संशतीव मनो मम ।५। अस्य देवाः शरीरस्थाः सागराः सरितश्च याः हिमवान्पारियात्रश्च ये चान्ये कुलपर्वताः ॥६ चन्द्रमाश्च सनक्षत्र रादित्यैर्वसुभिः सह ।। धनदो वरुणश्चैव यमः शक्रः शचीपतिः ।।७

महर्षि श्री सूतजी ने कहा—जिस समय में नरसिंह भगवान् उस सभा में पहुँचेथ तो उस समय में हिरण्यकशिपु के पुत्र वीर्यवान् प्रह्लाद ने महान् आत्मा वाले नरसिंह के शरीर में छिपे हुए साक्षात् आये हुए कालचक्र के समान तथा भस्म में छन्न अग्नि में समान उनको आरम्भ में देखा था । १-२॥ वहाँ पर स्थित सब दानवों ने और हिरण्यकशिपु ने भी पूर्व शरीर में समाश्रित सुवर्णके पर्वत की अभी वाले उन नरसिंह प्रभ को देखकर सभी को उस समय में बहुत विस्मय हो गया था ।३। उसी समय में प्रलाद ने कहा था-है महान् बाहुओं वाले ! है महा | राज ! हे दैत्यों के आदि जन्मधारी ! मैंने तो अब तक ऐसा नरसिह | वपु र कभी देखा है और न कहीं पर सुना ही है । यहे अब्यक्त प्रभव (जन्म) ब्राला–परम दिव्य क्या रूप सामने आ गया है ! मेरे मन में तो ऐसा ही संशय हो रहा है कि यह कोई घोर स्वरूप बाला दैत्यों के अन्त कर देने वाला ही यहाँ आकर सम्पस्थित हुआ है।४-५। इनके इस विशाल शरीर में समस्त देवगण स्थित हैं—सब सागर-समस्त नयाँ, हिमबान्, पारियात्र और अन्य सब कुल पर्वत भी इनके शरीर में विद्यमान हैं । समस्त नक्षत्रों के साथ तथा वसुगण और आदित्यों के नरसिंह हिरण्यकशिपु युद्ध वर्णंन

३ सहित चन्द्रमा भी इन में वर्तमान हैं । धनद (कुवै र)–वरुण-यम् और शची का पति इन्द्र देव भी इनके इस नारसिंह शरीर में विद्यमान दिख लाई दे रहे हैं ।६-७॥ मरुतो देवगन्धव ऋषयश्च तपोधनाः नागा यक्षाः पिशाचाश्च राक्षसा भीमविक्रमाः ।८ : ब्रह्मा देव: पशुपतिललाटस्था भ्रमन्ति वै स्थावराणि सर्वाणि जङ्गमानि तथै ।६। भवांश्च सहितोऽस्माभिः सर्वे दैवगणैर्वृतः विमानशतसङ्कीर्णा तथैव भवतः सभा ।१० सर्वत्रिभुवनं राजन् ! लोकधर्माश्च शाश्वताः ।। दृश्यन्ते नारसिहेऽस्मिस्तथेदमखिलं जगत् ।११। प्रजापतिश्चात्र मनुर्महात्मा ग्रहांश्च योगाश्च महीरुहाश्च उत्पात्कालश्च धृतिर्मतश्च रतिश्च सत्यञ्च तपो दमश्च १२ सनत्कुमारश्च महानुभावो विश्वे देवा ऋषयश्च सर्वां।। क्रोधश्च कामश्च तथैव हर्षा धर्मश्च मोहः पितरश्च सर्वं १३ प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा हिरण्यकशिपुः प्रभुः ।। उवाच दानवान् सर्वान् गणश्च गणाधिपः ।१४ मृगेन्द्रा गृह्यतामेष अपूर्व सत्वमास्थितः ।। यदि वा संशयः कश्चिदबध्यता बनगोचरः १५

मरुद्गण, देव, गन्धर्व, तप के ही धनों वाले सव ऋषि वृन्द, नाग यक्ष, पिशाच, भीम विक्रम चाले राक्षस, ब्रह्मा, देव पशुपति ये सब इनके ललाट प्रदेश में स्थित हुए भ्रमण कर रहे हैं । सम्पूर्ण स्थावर तथा सभी जङ्गम जीव इनके शरीर में दिखाई दे रहे हैं ।८-६। सब देवों से परिवृत हम सबके सहित आप भी इनके शरीर में स्थित देखे जा रहेहैं । सैकड़ों विमानोंसे संकीर्ण यह आपकी महती राजसभा तथा हे राजन् यह संपूर्ण त्रिभवन और समस्त शाश्वत लोक धर्म इस नार मत्स्य पुराण

सिह शरीर में दिखाई दे रहे हैं । इयो भांति यह् सम्पूर्ण जगत्-महात्मा प्रजापति मनु-सब ग्रह–योग—-महीरुद्र इसमें दृष्टिगत हो रहे हैं । १ | ।१३। इनके अतिरिक्त इस्पात का काल—धृति- मति–रति—सत्य –तप-दम इसमें विद्यमान हैं । महानुभाव मनत्कुमार–विश्वेदेवा— सन ऋषिगण-क्रोध–काम-हुई-धर्म—मोह- सब पितृगण इनके इस महान त्रिशाल एव परम दिब्य शरीर में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रहे । । ।१३। इस प्रकार के बहे हुए वचन का श्रवण कर वह गणों का

अधिप प्रभ, हिरण्यकशिपु समस्त दानवों और गणो से यह बोना था। —-देखो, आप सब मिलकर इस अत्यन्त अइभ त अपर्व सत्र के रूप में संस्थित नरसिह को पकड़ लो और यदि कुछ भी मजय हो तो इन वन में भ्रमण करने वाले को मार ड़ालो ।१४-१५।

ते दानवगणाः सब मृगेन्द्रभीमविक्रमम् रिक्षिपन्ता मुदितास्त्रासयामासुरोजसा १६८ सिंहनादं विमुच्याथ नरसिंहो महाबलः ।। त्रभञ्ज तां सभां सत्र व्यादितास्यइवान्तकः सभायाभज्यमानायांहिरण्यकशिपुःस्वयम् ।।१ चिक्षेपांत्राणिसिंहम्य रोषाद्वाकुललोचनः ।१८ सर्वास्त्रणामथ ज्येष्ठ दण्डमस्त्र सुदारुणम् कालचक्र तथा घोर विष्णुचक्र तथा परम् ।१६ पैतामहं तथात्युग्रत्रैलोक्यंदहनं महत् ।। विचित्रमशनीञ्चैब शुष्कोद्र चाशनिद्वयम् ॥२० रौद्र तथोग्रशुलञ्च कंकालं मुसलं तथा

मोहनं गोषणं चैव सन्तापनविलापनम् ।२१ हिरण्यकशिपु के इस आदेश को प्राप्त करके वे समस्त दानवगण उस भीम विक्रम बाले मृगेन्द्र पर परोप करते हुए बहुत ही प्रसन्न हो | रहे थे और वे सब अपने ओज के अलसे उन न सिह प्रभु को त्रामदेने

२५ लगे थे ।१६। उस समय में महान् बलशानी नरसिंह प्रभु ने एक सिंह नाद करके उस सम्पूर्ण हिरण्यकशिपु की सभाका फैलाये हुए मुहबाले अन्तकः काल के समान भङ्ग कर दिया था ।१६। जिस समय में वह पूरी सभा भज्यमान हो गई थी तब हिरण्यकशिपु ने स्वयं ही रोप से ब्याकुल नेत्रों वाला होकर उन नसिह भगवान् के शरीर पर अपवे ही अस्त्र के प्रयोग आरम्भ कर दिया था । समस्त अस्त्रों में सबसे बड़ा महान् दारुण दगड अस्त्र–पोर काल चक्रू-गरोत्तम विचङ्ग तथा अत्यन्त ही उग्र पितामह का अस्त्र जो इस महान् लोक्य के दाह कर देने वाला था इन सब अस्योंसे हिरण्यकशिपु ने नारसिह वपु पर प्रहार किये थे । विचित्र अशनी तथा शुरूक और आद् दोनों प्रकार के अनि रौद्र तथा उग्रशूल, कङ्काल, मुसल, मोहन, शोषण, सन्नापन, विलापन नाग वाले अस्त्रों में इतराज ने नरसिह प्रभ के शरीर पर डर-डर कर प्रहार पर प्रहार किए थे । १८-३१।

बयिब्यं मथनं चैब कपालमथ कैकरम् ।। तथाप्रतिहत शक्ति क्रौञ्चमस्त्र तथैव ।२३।। अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैव सोमास्त्र शिशिरं तथा है ? कम्पनं शतनञ्चैव त्वाष्ट्रञ्चैव सुभैरवम् ।२३ : 1 कालमृदुगर मक्षोभ्यं तपनञ्च महाबलम् ।१। सुवर्तनं मादनञ्च तथा मायाधरं परम् ।२४ ।। गान्धव मस्त्रं दयितमसिरत्नं नन्दकम् 3 प्रस्वापनं प्रमथनं वारुणं चास्त्रमुत्तमम् ।।१। अस्त्र पाशुपतचैव यस्याप्रतिहता गतिः ।२५ अस्त्रं यशिरश्चैव ब्राह्ममस्त्रं तथैव १।। नारायणास्त्रमेन्द्रञ्च सार्पमस्त्रं तथाभुतम् ।२६८ पैशाचमस्त्रमजित शोषद शमनं तथा।। महाबलं भावनं प्रस्थापन विकम्पने २७॥

मत्स्य पुराण, – एतान्यस्त्राणि दिब्यानि हिरण्यकशिपुस्तदा

असृजन्नरसिंहस्य दीप्तस्याग्नेरिबाहुतिम् ॥२८

 वायव्य, मथन, कापाल, कैङ्कर, अप्रतिहता शक्ति, क्रौञ्च अस्त्र | ब्रह्म शिरास्त्र, सोमास्त्र शिशिर, कम्पन, शतत्र, वाष्ट्र, सुभैरव, काल मुदगर, अक्षोभ्य, महाबल, सम्वत्त न, मादन, परममायाधार, गान्धि मस्त्रदयति, असिरत्न, नन्दक, प्रस्वपिन, प्रमथन, उत्तम वारुणास्त्र और पाशुपत अस्त्र जिसकी गति अप्रतित हुआ करती है ।२२-२५॥ हमशिर अस्त्र, ब्रह्मास्त्र, नारायणास्त्र, ऐन्द्र, अद्भुत सार्प अस्त्र, वैशा चास्त्र अजित, शोषद, शामन, महाबल, भावन, प्रस्थापन, विकम्पन इन सब अस्त्रों को जो महान दिव्य थे दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने भग वान नरसिंह के शरीर पर छोड़ दिया था किन्तु वे सब अस्त्र उनके शरीर का स्पर्श करते ही ऐसे नष्ट भ्रष्ट होकर भस्मसात् हो गये थे जिस तरहसे प्रदीप्त हुई अग्निमें हवि पड़ते ही जल कर भस्म हो जाया करती है ।२६-२८।

 

अस्त्रैः प्रज्वलितैः सिंहमावृणोदसुरोत्तमाः विवस्वान् धर्मसमयेहिमवन्तमिवांशुभिः ।२६ ह्यमर्षानिलोधूतो दैत्यानां सैन्यसागरः क्षणेन प्लावयामास मैनाकमिव सागरः ।३०।  प्रासैः पार्शश्च खङ्गश्च गदाभिमु सलैस्तथा वज्ररशनिभिश्चौव साग्निभिश्च महाद्र मैः ।३१ ।। मुद्गभिन्दिपालैश्च शिलोलूखलपर्वतैः शतघ्नीभिश्च दीप्ताभिर्दण्डैरपि सुदारणैः !३२ ते दानवाः पाशगृहीतहस्ता महेन्द्रतुल्याशनिवन्नवेगाः समन्ततोऽभ्युद्यतबाहुकाया स्त्रितोस्त्रिशीर्षा इव नागपोशा ।३३ सुवर्णमालाकुलभूषिताङ्गाः पीतांशुकाभोगविभाबिताङ्गाः मुक्तावलीदामसनाथकक्षा हंसा इवाभान्ति विशालपक्षाः ।३४

नरसिह हिरण्यकशिपु युद्ध बर्णन )

उन असुरोत्तमों ने प्रज्वलित अस्त्रों के द्वारा उन’ नृसिह प्रभु को आवृत कर दिया था जैसे घाम के समय सूर्य हिमालय को अपनी किरणों से कर देता है ।२६। अमर्ष की अग्नि से अद्भूत दैत्यों के उस सेनारूपी सागर ने क्षण भर में मैनाक को समुद्र की भाँति सबका प्ला वित कर दिया था ।३०। असुरों की उस विशाल सेना ने प्राश-पाश, खग, गदा, मूसल, वज्र, अगनि, अग्नि के सहित महान दूम, मुगर, भिन्दिपाल, शिला, उलूखल, पर्वत, दीप्त शतघ्नी और गुदारुण दण्ड अदि के द्वारा नृसिह प्रभु पर प्रहारों की भरमार कर दी थी । ३१-३३ पाशों को हाथों में ग्रहण करने वाले, महेन्द्र के समान अशनि वज्रके वेग से युक्त सभी और से अभ्युद्यत बाहु और काया वाले वे सब दानव तीन शीर्षों वाले नागपाशों की भाँति स्थित थे ।३३। सुवर्ण की मालाओं के समूह में विभूषित अङ्गों वाले तथा पीत वर्ण के वस्त्र रूपी भोग से त्रिभावित अङ्गों से युक्त और मुक्तावली की माला से समन्वित कक्षों से संयुत विशाल पक्षो वाले हसों के तुल्य वे दानवगण शोभित हो रहे थे ।३४।।

तेषां तु वायुप्रतिमौजसां वै केयूरमौलोबलयोत्कटानाम् तान्युत्तमाङ्गान्यभितो विभान्ति प्रभातसूर्या शुसमप्रभाणि ।३५ क्षिपदभरुग्र ज्वलितैर्महाबलैर्महास्त्रपूगैः सुसमावृतो बभौ गिरिर्यथा सन्ततवर्षभिर्धनैः कृतान्धकारान्तरकन्दरोद्रमैः ३६ तैर्हन्यमानोऽपि महास्त्रजालैर्महाबौदैत्यगणैः समेतैः नाकम्पताजी भगवान् प्रतापस्थितप्रकृत्या हिमवानिवाचलः ।३७ सन्त्रासितास्तेन नृसिहरूपिणा दितेः सुताः पावकतुल्यतेजसा ।। भयाद्विचेलुः पवनोद्ध, ताङ्गा यथोर्मयः सागरवारिसम्भवाः १३८

वायु के समान ओज से युक्त, केयूर-मौली और बलय से उत्कट उन दानवों के उत्तम अङ्ग सभी ओर से प्रातःकाल के सूर्य की किरणों के तुल्य प्रभा वाले शोभित हो रहे थे ।३५॥ बहू नरिसह प्रभु महान ३६ ] ।

मत्स्य पुराण अस्त्रों के समूहों से अन्न -भाँनि आवृत होकर कन्दराओं के अन्दर अन्ध कार कर देने वाले इमों में और निरन्तर वर्षा करते हुए मैचों से पर्वत की भाँनि मृशोभित हो रहे थे 1३६! महान बनवानृ—-सब ओर से एकत्रित हुए उन दैत्य गण के द्वारा महान् अस्त्रों के जल से हुन्यमान भी वह नृसिह प्रभु उसे युद्ध स्थल में प्रताप से स्थित प्रकृति के द्वारा हिमाचल की भाँति बिल्कुल भी कल्पायमान नहीं हुए थे ।३७। उन नृसिह के रूपधारी भगवान के द्वारा जिनका पावक के समान तेज था। ने सब दिति के पुत्र दैत्य सन्क्रमित कर दिये गये थे और वे राब भय से भीत होकर पवन से उद्धृत अङ्गों वाली सागर के जल में समुत्पन्न जमियों की भउ भय से विचलित हो गये थे अर्थात् भयभीत होकर इधर-उधर भाग गये थे ।३८।

इट। क का है। ६३-नरसिह-हिरण्यकशिपु युद्ध-वर्णन स्वराः खरमुखाश्चैव मकराशीविषाननाः । ईहामृगमुखाश्चान्ये वरामुखसंस्थिताः ।। बालसूर्यमुखाश्चान्ये धूमकेतुमुखास्तथा । अद्ध चन्द्रार्धवक्त्राश्च अग्निदीप्तमुखास्तथा ।२ हंसकुक्कुटवक्त्राश्च व्यादितास्या भयावहाः ।। सिहास्यालेलिहानश्च काकगृध्रमुखास्तथा ॥३

द्विजिह्वकावक्त्रशीर्षास्तथोल्का मुखसंस्थिताः । महाग्राहमुखाश्चान्ये दान बलदपिताः ।४ शैलसंवर्मणस्तस्य शरीरे गुरवृष्टिभिः । अवध्यस्य मृगेन्द्रस्य न व्यथाञ्चक्र सहवे ।५ एवं भूयोऽपरान् घोरानसृजनु दानवेश्वराः । ॥

अन्य दानवों के साथ नरसिंह का शुद्ध ] मृगेन्द्रस्योपरि ऊ द्धा निश्चसन्त इवोरगाः ।६। । ते दानवरा घोरा दानवेन्द्रसमीरिताः । । विलयं जग्मुराकाशे खद्योता इव पर्वते । । भहर्ष प्रवर मुतजी ने कहा—-उस मह’न् भीषण युद्ध में बहुत से । दानवों ने नृसिह भगवान से युद्ध किया था जिनके नाम ये हैं-खर,वर मुख, मकर राशी, बिग्यानन, ईहामृगमन्च, बराह मुख, बाल मूर्यमुख, धुमकेतु, मुख, अद्ध चन्द्रर्ध में , अनदीप्तमुख, हम कुक्कुट मुख ब्यादितास्य, भयावह सिहास्य ने लिहान, काक गृध्रमुख, द्विवक्त्र, द्विशोष, कामुख, महाग्राह भग्छ आदि महान् भीषण मुखाकृतियों वाले अन्न के घाट में परिपूर्ण दानव थे जो गैन के समान संव वाले और वध्र ः अयोग्य भगवान् मृगेन्द्र के शरीर में निरन्तर रोकी बर्षा में भी गद्ध में कितन् मान भी व्यथा न कर सर्वेः थे। १-५॥ इमी प्रकार में फिर इस बार उन दानश्वरों ने अत्यन्त क्रोधित होकर गर्म इवाम छोड़ते हुए फुस्कारें करने वाले सर्पो की भाँति मृगेन्द्र प्रभु के शरीर के ऊपर दूसरे परम घोर अश्त्रों को छोड़ा था ।६। वे सच । दानवेन्द्रों के द्वारा प्रक्षिप्त किए हुए अतीव घोर दानवीय शर पर्वत में स्वद्यौतों की भनि आकाश में जा विलय को प्राप्त हो गए थे ।$। उन

 

ततश्चक्राणि दिव्यानि दैत्या क्रोधसमन्विताः मृगेन्द्रायासृजन्नाशु ज्वलितानिसमन्ततः ।८ – |- तैरासीगगनं चक्र: मुम्गतद्भिरितस्ततः

युगान्ते सम्प्रकाशद्भिश्चन्द्रादित्यग्रहेरिव तानि भवणिचक्राणिमृगेन्द्र णाशमात्मना ।। ग्रस्तान्युदीर्णानि तदापावकाचिः समानिदै ।१०।। तानि चक्राणि वदनं चिशमानानि भान्ति वै भेधोदरदरीष्वेव चन्द्रसूर्यग्रहा इव ।११ हिरण्यकशिपुत्यो भूयः प्रासृजदूजिताम् मत्स्य पुराण शक्ति प्रज्वलितां घोरां धौतशस्त्रतडित्प्रभाम् ॥१२॥ तामापतन्तीं संप्रेक्ष्य मृगेन्द्रः शक्तिमुज्वलाम् हुकारेणैव रौद्रण वभञ्ज भगवास्तदा ।१३ ।। रराज भग्ना सी शक्तिम गेण महतले ।। * विस्फुलिङ्गा ज्वलिता महोल्केवदिवश्च्युता ।१४

इसके उपरान्त उन दैत्यों ने महान् कोध से समन्वित होकर चारों ओर से प्रज्वलित होने नाले दिव्य चक्रों को नरसिंह प्रभुके शरीर पर बड़ी ही शीघ्रता से छोड़ दिया था।६। इधर-उधर गिरने वाले उन | चक्रों से युग के अन्त में भली भाँति प्रकाश लाने वाले चन्द्र-सूर्य ग्रहों की भ ति उस समय में आकाश था।६। अशमात्मा उन मृगेन्द्र (नरसिंह) के द्वारा बे समस्त. चक उस समय में अग्नि की अचयों के तुल्य ग्रस्त और उदीर्ण होते थे ।१०। वे सब चक्र जो दानवों के द्वारा भरसिह प्रभु पर छोड़े गये थे उन्हीं के मुख्नमें प्रवेश प्राप्त करते हुए बादलों से युक्त धाटियों में चन्द्र-सूर्य ग्रहों के समान शोभा दे रहे थे।११। हिरण्यकशिपु दैत्यराज ने पुनः अत्यन्त प्रज्वलित, परम धोर, धौत शस्त्र विद्यत की प्रभा से समन्वित अतीब अजित शक्ति का प्रहार नरसिंह भगवान पर किया था ।१३। उस समय में अत्यन्त समुज्वल अपने ऊपर आपतन करती हुई शक्ति को देखकर नृसिंह भगवान् ने महान् रौद्र हुङ्कार की अनि से ही उसका भंजन कर दिया था ।१३। महीतल में मृगेन्द्र भगवान के द्वारा भग्न की हुई वह शक्ति विस्फुलिगों से य क और प्रज्वलित दिवलौक से च्यत महोल्का के समान शोभित हो रही थी । ।१४।

नाराचपङक्तिः सिंहस्य प्राप्ता रेजे विदूरतः ।। नीलोत्पलपलाशानाः मालेवोज्ज्वलदर्शना ।१५।। में गजित्वा यथान्यायं विक्रम्य यथासुखम् तत्सैन्यमप्सारितवान् तृणानेव मारुतः 1१६ ।।

३१  अन्य दानवों के साथ नरसिंह का युद्ध ततोऽयमवर्ष दैत्येन्द्रा व्यसृजन्त नभोगताः नगमात्रैः शिलाखण्ड़गिरिशृङ्ग महाप्रभः। १७ तदश्मवर्ष सिंहस्य महान्मूद्धनिपातितम् दिशोदश विकोण वे खद्योतप्रकरा इव १८ तदाश्मौर्घदैत्यगणाः पुनः सिंहमरिन्दमम् ।। छायायां चक्रिरे मेघा धाराभिरिव पर्वतम् ।१९। तं चालयामासुत्यौघादेवसत्तमम् ।। भीमवेगोऽचलश्न ष्ठः समुद्र इव मन्दरम् ।२० ततोऽश्मवर्षविहिते जलबर्षमनन्तरम् धाराभिरक्षमात्राभिः प्रादुरासीत् समन्ततः ॥२१॥

नृसिह भगवान के शरीर पर प्राप्त हुई नाराचों की पंक्ति में ही नीलोत्पल के पलाशों की उज्ज्वल दर्शन वानी माला के समान दीप्ति हो रही थी ।१५। नृसिंह महाप्रभु ने न्यायानुसार गर्जना करके और सुखपूर्वक बल-विक्रम दिखाकर उस दानवेन्द्र की सेना को तिनको के अग्रभागों को वाय, की तरह अपसारित कर दिया था ।१६। इसके उपरान्त दैत्येन्द्रों ने आकाश में स्थित होते हुए नग मात्र शिला खण्डों के द्वारा, महुत प्रभा से युक्त गिरि के द्वारा पाषाणों की वर्षा का विसर्जन कर रहे थे । बह पत्थरों की महान् वर्षा नरसिह प्रभु के मस्तक पर डाली गयी थी और वह दशों दिशाओंमें खद्योतों के प्रकरों की भाँति विकीर्ण हो गयी थी । १५७-१८। अरियों के दपन करने वाले नृसिह प्रभु को फिर उन दैत्यों के गुणों ने पाषाणों की वृष्टि में डाले हुए पत्थरों के द्वारा मेघ जैसे अपनी वर्षाई हुई जल की धाराओं में पर्वत को ढक दिया करते हैं वैसे ही छाया में कर दिया था । १६ । उन दैत्यों के विशाल समुदायों ने देवों में परम श्रेष्ठ नृसिंह महाप्रभु को जिस प्रकार से भीम वेग वाला सागर अचलों में श्रेष्ठ मन्दराचल को चलायमान कर दिया जाता है इसी तरह से चलायमान कर दिया था

मत्स्य पुराण

२६। मके उपरान्त उस पाषाणों में की गई वर्षों के अनन्तर जल की वृष्टि में अक्षमात्र धाराओं के द्वारा चारों ओर से प्रादुर्भूत हो गये थे

।। नभसःप्रच्युताधारास्तिग्मवेगाः समन्ततः आवृत्य सर्वतो व्योमदिशश्चोपदिशस्तथा ।२२। धारा दिवि सर्वत्र वसुधायाञ्च सर्वशः ।। E 1 स्पृशन्ति ता देवं निपतन्तोऽनिशं भुवि ।२३ बाह्यतो ववृषुर्वर्ष नोपरिष्टाच्च ववृषुः मृगेन्द्रप्रतिरूपस्य स्थितस्य युधि मायया ।२४ ।। हतेऽयमवर्षे तुमुले जलवर्षे शोषिते

भोऽसृजड़ानवो मायामग्निवायुसमीरिताम् ।२५ महेन्द्रस्तोयदः भाद्ध सहस्राक्षो महाद्य तिः महता तोयवर्षेण शमयामास पावकम् ।२६ तस्यां प्रतिहतायां तु मायायां युधि दानवः

असृजत् घोरसंकाशं तमस्तीव्रसमन्ततः ।२७ तमसा संवृते लोके दैत्येष्वात्तायुधेषु स्वतेजसा परिवृतो दिवाकर इवावभौ ।२८ मा

। आकाश से अत्यन्त तीव्र वेग वाली मिरी हुई धारायें चारों ओर से आवृत करके सभी व्योम-दिशाओं और उप दिशाओं को घेर करके हो रही थी तथा दिवलोक में और सर्वत्र पृथ्वी में निरन्तर गिरती हुई धारा” इस भूमण्डल में इन नृसिहदेव का फिर स्पर्श नहीं कर रही थीं ॥२२-२३। वे धारायें बाहर से बरस रहीं थीं किन्तु इनके ऊपर वे नहीं बरस रही थीं। उस युद्ध स्थल में एक मृगेन्द्र के प्रतिरूप धारण करने वाले प्रभु को माया से उस तुमुल पाषाणों की वषकि हृत होनेपर तथा जल की वर्षा के कदम शोषित कर डालने पर फिर उस दानगर्ने अग्नि और बायु से समीरित माया का सृजन किया था ।२४-२५। अन्य दानवों के साथ नरसिंह का युद्ध उस समय मैं महान् छ ति वाले सहस्र महेन्द्रदेव ने जलदों के द्वारा महान् जल की दृष्टि से उस मायाकृत अग्नि का शमन कर दिया था। जब वह माया भी प्रतिहत करदी गई तो उसके पीछे युद्ध में उस महा दानब ने चारों ओर से महान् घर तम का बड़ी ही तीव्रता के साथ बिशेष रूप से सृजन किया था ।२६-२७ सम्पूर्ण लोक तम से जब परि वृत हो गया था तो उस समय में आयुधों के धारण करने वाले उन दैत्यों के विशाल समुदाय में वह महाप्रभ, नृसिंहदेव अपने ही तेज से परिवृत होकर दिवाकर के समान शोभा सम्पन्न हो गये थे ।२६।।

त्रिशाखां भृकुटीञ्चास्य ददृशुर्दानवा रणे ।

ललाटस्थां त्रिशूलांकां गङ्गां त्रिपथगामिव ।२६ ततः सर्वासु मायासु हुतासु दितिनन्दनीः । हिरण्यकशिपु दैत्यं विवर्णी शरणं ययुः ।३० ततः प्रज्वलितः क्रोधात् प्रदहन्निव तेजसा । तस्मिन् ॐद्ध तु दैत्येन्द्र तमोभूतमभूज्जगत् ।३१ आबाह प्रवहश्चैव विवहोऽथ ह्म दावहः । परावहः संवहश्च महाबलपराकुमाः ।३२ तथा परिवहः श्रीमानुत्पातभयशंसनाः । इत्येवं क्षुभिताः सप्त मरुतो गगनेचराः ॥३३ ॥ ये ग्रहाः सर्वलोकस्य क्षये प्रादुर्भवन्ति वै । । ते सर्वे गगने दृष्टा व्यचरन्त यथासुखम् ।३४ अन्यङ्गते चाप्यचरन्मार्ग निशि निशाचरः । । संग्रहः सहनक्षत्रै:राकापतिररिन्दमः ।३५ रणस्थल में स्थित दानवों ने फिर इन नृसिंह प्रभ, की तीन शाखाओं वाली भृकुटी को त्रिशूलसे अङ्कित ललाट प्रदेश में स्थित त्रिपथ गामिनी गङ्गा की भाँति दर्शन किया था। इसके अनन्तर जब सभी की गयी मायाऐहत हो गयी थीं तो वे सब दितिके पुत्र महारै त्यगण बिवर्ण

मत्स्य पुराण होकर दैत्यराज हिरण्यकशिपु की शरणागति में प्राप्त हो गये थे ।२६ ३। इसके पश्चात् वह मानो अपने ही तेज से सबको प्रदग्ध कर रहा था ।वह दैत्यराज महान क्रोधसे प्रज्वलित हो गया था ।जब वह दैत्येन्द्र इस भाँति क्रुद्ध हो गया तो उस समय में सम्पूर्ण जगत् अन्धकार से | परिपूर्ण हो गया था ।३१। उत्पातों के भय को सूचित करने वाले और महान बल तथा पराक्रम से युक्त आवह्, प्रवह, विवहू, उदावह, पराबह संवह और परिवह ये सात प्रकार के मरुत परम क्षुभित होते हुए आकाश में सञ्चरण करने वाले दिखलाई दे रहे थे ।३२-३३। जो ग्रह सम्पूर्ण लोकों के क्षय होने के समय में प्रादुर्भत हुआ करते हैं वे सभी अहू यथा सुख आकाश में विचरण करते हुए देखे गए थे। रात्रि में निशाचर मार्ग में अन्यगत हो जाने पर विचरण कर रहा था और अरिन्दम राकापति को नक्षत्रों के सहित संग्रहीत कर लिया गया था

विवर्णताञ्च भगवान गतो दिवि दिवाकरः कृष्णं कबन्धं तथा लक्ष्यते सुमहद्दिवि ॥३६ ।। अमुञ्च्वाचिषां वृन्दं भूमिवृत्तिर्विभावसुः गगनस्थञ्च भगवानभीक्ष्णं परिदृश्यते ।३७ सप्त धूम्रनिभा घोराः सूय्य दिवि समुत्थिताः ।। सोमस्य गगनस्थस्य ग्रहास्तिष्ठन्ति शृङ्गगाः ।३८ वामेन दक्षिणे चैव स्थितौ शुकबृहस्पती ।। शनैश्चरो लोहिताङ्गो ज्वलनाङ्गसमुद्यतो ।३६ समें समधिरो हुन्तः सर्वे ते गगनेचराः ।। शृङ्गाणि शनर्कर्पोरा युगान्तावर्तिनो ग्रहाः ।४० चन्द्रमाश्च सनक्षत्रैग्र हैं सह तमोनुदः चराचरविनाशय रोहिणी नाभ्यनन्दत ।४१‘:

अन्य दानवों के साथ नरसिंह का युद्ध ]

३५ गृह्यते राहणा चन्द्र उल्काभिरभिहन्यते । उल्काः प्रज्वलितश्चन्द्र विचरन्ति यथासुखम् ।४३ भगवान दिबाकर दिवलोक में विवर्णता को प्राप्त हो गए थे और वह उस सुमहान् दिवलोक में कृष्ण कबन्ध की भाँति दिखलाई दे रहे थे ।३६। अचयोंका बृन्द यह भूमि वृत्ति, विभावसु और गगनमें स्थित भगवान् अभीक्ष्ण में परिदृश्यमान हो रहे थे । ३७॥ दिवलोक में धूम्र के तुल्य महान् घोर सात सुर्यं समुत्थित होगये थे । ३८। उसके बाम भाग में और दक्षिण भाग में शुक्र और बृहस्पति ग्रह स्थित हो गये थे । शनै श्चर और लोहितरङ्ग अनिके अङ्गके समान छ ति वाले थे । वे सम्पूर्ण गगन चर समरूप से ही समाधिरोहण कर रहे थे। ये युगान्त में अवि तं न करने वाले महान घोर ग्रह शनैः-शनैः शृङ्गों पर अधिरोहण करते थे । तमका नोदन करने वाला चन्द्रमा नक्षत्रों और ग्रहों के सहित चरा चर सबके विनाश करने के लिए रोहिणी के अभिनन्दन नहीं कर रहा था ।।३६-४१। राहु के द्वारा चन्द्र निगृहीत हो रहा था और उल्काओं से उसका अभिहनन किया जा रहा था । प्रज्वलित उल्काए’ सुख पूर्वक चन्द्रमा में विचरण कर रहीं थीं ॥४२॥

देवानामपि यो देवः सोऽप्यवर्षतशोणितम् । । अपतन् गगनादुल्का विद्यदू पमहास्वनाः ।४३ जुन अकाले च द्रुमाः सर्वे पुष्पन्ति च फलन्ति च । । । | लताश्च सफलाः सर्वा येचाहुत्यनाशनम् ।४४ . । फलैःफलान्यजायन्त पुष्पैःपुष्प तथैव च ।

६ उन्मलन्ति निमोलन्ति सन्तिच रुदन्ति च ।४५ – . विक्रोशन्ति च गम्भीरा धूमयन्ति ज्वलन्त च।।

प्रतिमाः सर्वदेवानां वेदयन्ति महद्भयम् ।४६ ।

  • आरण्यैः सह संसृष्टा ग्राम्याश्च मृगपक्षिणः । चक्रः सुभैरवं तत्र महायुद्धमुपस्थितम् ॥४७ । मत्स्य पुराण नद्यश्च प्रतिकूलानि वहन्ति कलुषोदकाः । न प्रकाशन्ति च दिशो रक्तरेणुसमाकुलाः ।४८ वनस्पत्यो न पूज्यन्ते पूजनार्हाः कथञ्चन । वायुवेगेन हन्यन्ते भज्यंते प्रणमन्ति च ।४९

ज्योतिष के अनुसार युगान्तकारी महान् भीषण ग्रहों की स्थिति जो उस समय हुई थी-वह जतला कर उसका प्रतिफल बतलाते हुए कहते हैं कि समस्त देवों का भी जो देव है वह भी इस भीषण ग्रहोंकी स्थिति के कारण रक्त की वर्षा कर रहा था और गमन से महान् घोर ध्वनि करने वाली विद्य तुके स्वरूप में स्थित उल्काओं का पतन हो रहा था ।४३॥ अकाल में ही सब बृक्ष भुष्प और फल देने वाले होगये थे जो कि महान् उत्पात के सूचक थे । सम्पूर्ण सतायें भी फलों से युक्त होगई थीं जो दैत्यों के विनाश को स्पष्टतया बतला रही थीं ।४४। फलों में | से फल और पुष्पों के द्वारा पुष्पों की उत्पत्ति होने लग गयी थी । ये सब उन्मीलित और निमीलित हुआ करते थे तथा कभी-२ हँसतेथे और किसी समयमें रुदन करने वालेथे । ये सल महाविनाश की सूचना करने वाले हो गये थे ।४५। समस्त देवों की प्रतिमाएं जो अति गम्भीर थी

धूमित बन रही थी और प्रज्वलित हो जाया करती थीं । ये सभी | महान भय के समागम को प्रकट कर रही थीं और महान् असगुन को ज्ञात कराती थीं । ग्राम्य पशुगण और पक्षिवृन्द आरण्यक(जंगली) पशु पक्षियों के साथ संतुष्ट होने लगे । वहाँ पर अत्यन्त भैरव महान् युद्ध करने लगे थे । कलुषित जलों से युक्त होकर सभी नदियाँ प्रतिकूल रूप से बहने लगी थीं । सभी दिशाए लाल वर्ण की रेणुओं से समाकुल होकर प्रकाश नहीं करने वाली हो गई थीं। पूजन करने योग्य वनस्प तियाँ किसी भी समय में पूज़ित नहीं थीं और वायु के वेग से वे सब हुन्यमान-भञ्जन शील और नीचे की ओर झुकी हुई हो गई .४६। ६।।

अन्य दानवों के साथ नरसिंह का युद्ध ]

[ ३७ यदा सर्वभूतानां छाया परिवर्तते ।। १० अपराह्णगते सूर्ये लोकानां युगसंक्षये ।५ तदा हिरण्यकशिपोर्दैत्यस्योपरि वेश्मनः भाण्डागारे युधागारे निविष्टमभवन्मधु ।।१।। असुराणां विनाशाय सुराणां विजयाय ।। दृश्यन्ते विविधोत्पाता घोराघरनिदर्शनाः ॥५२ एते चान्ये बहवो घोरोत्पाताः समुत्थिताः दैत्येन्द्रस्य विनाशाय दृश्यन्ते कालनिर्मताः ।५३ मेदिन्यां कम्पमानायां दैत्येन्द्रण महात्मना महीधरा नागगणा निपेतुर्नमितौजसः ॥५४ विषज्वालाकुलैर्वक्त्रर्विमुञ्चन्तो हुताशनम् ।। चतुः शीर्षा:पञ्चशीर्षाःसप्तशीषश्च पन्नगः ॥५५ वासुकिस्तक्षकश्चैव कर्कोटकधनञ्जयौ ।। एलामुखः कालिकश्च महापद्मश्च वीर्यवान् ॥५६ सहस्रशीर्षा नागो वै हेमतालध्वजः प्रभुः शेषोऽनंतोमहाभागो दुष्प्रकम्प्यःप्रकम्पितः ॥५७ ।। दीप्तान्यन्तर्जलस्थानि पृथिवोधरणानि

तदा क्र द्धन महतो कम्पितानि समन्ततः ।५८

जिस समय में समस्त प्राणियों की छय्या परिवत्तित नहीं होती है। और लोकोंके युग संक्षय में सूर्य भगवान् अपराह्न गत हो जाया करते हैं ।५०। उस समय में दैत्यराज हिरण्यकशिपु के निवास-गृह के ऊपर भाण्डागार और आयुधागारये मधु निविष्ट हो गया था ।५१। घोर निदर्शन वाले विविध भाँति के स्वरूप वाले महान् उत्पात इन असुरों के विनाश के लिए तथा देवगणों की विजय प्राप्त होने के लिए दिखाई दे रहे थे ।५२। अन्य भी और जो बहुत-से अत्यन्त घोर उत्पात उठ खड़े हुए थे ये सब काल बलीके द्वारा विनिमत उम दैत्येन्द्र के सर्वतो भाव

। । मत्स्य पुराण से विनाश के लिए ही दिखाई दे रहे थे ।५३। उस महान् आत्मा वाले दैत्येन्द्र के द्वारा कम्पायमान इस मोदिनी में अमित ओज़ से सम्पन्न महीधर और नागगण गिर गये थे ।५४। चार शीर्ष बाले-पाँच फणों से युक्त और मात मस्तकों वाले पन्नग (सर्प) विष की ज्वालाओं से समाकुल मुख से हुताशन का विमुञ्चन कर रहे थे । प्रमुख पन्नगो में वासुकि-तक्षक-कर्कोटक–धनञ्जय-एलामुख-कालिक और महान् वीर्य शाली महापद्म एवं सत्र शीर्षों वाला-नग-हेमतालध्वज–प्रभु शेष और महाभाग अनन्त-दुष्प्रक-य–प्रकम्पित—ज़ल के अन्दर स्थित | रहने वाले दीप्त और पृथिबी धारण थे । उस समय में ये सब चारों

और में महान् कद्ध उसके द्वारा कम्पित हो गये थे ।५५-५८।

नागास्तेजोधराश्चापि पातालतलचारिणः हिरण्यकशिपुर्दैत्यस्तदा संस्पृष्ट्वान्महीम् ॥५६ संदष्टौष्ठपुटः क्रोधाद्वाराह इव पूर्वजः ।। नदी भागीरथी चैव सरयूः कौशिकी तथा ।६० यमुना त्वथ कावेरो कृष्णवेणी निम्नगा। सुबेणी चे महाभागा नदी गोदावरोतथा ॥६१ चर्मण्वती सिन्धुश्च तथा नदनदीपतिः कलमप्रभवश्चैव शोणोमणिनिभोदकः नर्मदा शुभतोया तथा वेत्रवती नदी ।। गोमती गोकुलाकीर्णा तथा पर्वसरस्वती ।६३ मही कालमही चैव तमसा पुष्पवाहिनी ।।

जम्बूद्वीपं रत्नबर्ट सर्वरत्नोपशोभितम् । ६४ | तेज के धारण करने वाले और पाताल तल में संचरण करने वाले नगि भी कम्पायमान हो गये ये । उस समय में दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने इस मही को स्पर्श किया था और यह क्रोध से अपने होटों को

अन्य दानवों के साथ नरसिंह का युद्ध ] काटता हुआ पूर्वज बाराह की भाँति हो गया था । समस्त नद और नदियाँ भौं प्रकम्पित हो गये थे जिनके प्रमुख नाम ये हैं-भागीरथी नदी सरयू, कौशिक, यमुना, कावेरी, कृष्णवेण, निम्नगा, सुवेणी,महाभागा गोदावरी नदी, चर्मण्वती, सिन्धुलद, नद नदीपति, कमल प्रभन और मणि के सदृश स्वच्छ जल वाला शोण नद- शुभ तोया मर्मंदा, वेत्रवती नदी-गोमती, गोकुलाकीर्णा तथा पूर्व सरस्वती, मही, कालमही, तमसा और पुष्प बापिनी ये सभी नद और नदियाँ प्रकम्पित होगये थे। जम्बू द्वीप और सब प्रकार के रत्नों के उपशोभित रत्म भी कम्पायमान थे । ।५ ६-६४।

सुवर्णप्रकटुञ्चैव सुवर्णाकरमण्डितम् . महानदञ्च लौहित्यं शैलकाननशोभितम् ॥६५ पत्तनं कोशकरणं ऋषिवी रजनाकम्

मागधाश्च महाग्रामा मुडाः शुङ्गास्तथैव ॥६ सुह्मी मल्ला विदेहाश्च मालवाः काशिकोसलाः ।।

भवनं वैनतेयस्य दैत्येन्द्र णाभिकम्पितम् ।६७ कैलासशिखराकारं यत् कृत विश्वकर्मणा रक्ततोयो महाभीमो लौहित्यो नाम सागरः ।६८ उदयश्च महाशैल इच्छुितः शतयोजनम् सुवर्णवेदिकः श्रीमान् मेघपङक्तिनिषेवितः ॥६९

भ्राजमानोऽर्कसदृशैर्जातरूपमयैद मैः ।। शोलेस्तालै स्तमालैश्च कणिकारश्च पुष्पितैः ॥७०,

सुवर्ण के आकरों (खानों) से मण्डित सुवर्ण प्रकट तथा शैल और काननों से शोभा संयुत लौहिष महान ऋषि और वीरजनों की खान कोशकरण पत्तन, मागध, महाग्राम, मृड तथा शुङ्ग, सुवा, मल्ल, विदेह पालव, काशी, कोसल और वैनतेय का भबन ये सब देश और स्थल उस दैत्येन्द्र हिरण्यकशिपुके द्वारा अभिकम्पित होगये थे । ६५-६७। यह मत्स्य पुराण भवन कैलास पर्वत के शिखर के समान आकार वाली थी और विश्व कर्मा के द्वारा इसकी रचना की गयी थी । महान् भीम स्वरूप वाला। जिसका जल रक्त वर्ण का था ऐसा लोहित नाम बाला सागर-उदय महाशयल जिसकी सौं योजन ऊचाई थी—मेघों की पंक्तियों से निषे वित सुवर्ण वैदिक ज्ञो पुष्पित कणिकार, शाल, ताल, तमाल, सूर्य के सदृश जात रूपमय द्रमों से भ्राजमान था ।६८-७०।

अथोमुखश्च विख्यातः सर्वतो धातुमण्डतः तमालवनगन्धश्च पर्वतो मलयः शुभः ॥७१ सुराष्ट्रश्च सवाल्हीकाः शूरभरास्थैव भोजाः पाण्ड्याश्च वङ्गश्चाकलिङ्गास्ताम्रलिप्तका ७२ तथैवोड्राश्च पौण्डूश्च बॉमचूडाःसकेरलाः क्षोभितास्तेन दैत्येन सदेवाश्चाप्सरोगणः ७३ अगस्त्यभवनञ्चैव यदगम्यङ्कृत पुरा सिद्धचारणसङ्घश्च विप्रकीर्ण मनोहरम् ।७४ विचित्रनानाविहगं सुपुष्पितमहाद्मम् ।। जातरूपमयैः शृङ्ग गंगनं विलिखन्निव ।७५ चन्द्रसूर्या शुसंकाशैः सागराम्बुसमावृतैः ।। विद्युत्तवान् सर्वः श्रीमानयतः शतयोजनम् ॥७६ विद्यतां यत्र सङ्घाता निपात्यन्ते नगोत्तमे ।। ऋषभः पर्वतश्चैव श्रीमान् वृषभसंज्ञितः ७७

अयोमुख परम विख्यात था जो सभी ओर से धातुओं से मण्डित | था तथा तमाल के बनो की गन्ध से युक्त मलय पर्वत परम शुभ था । सुराष्ट्र, बालीक, शूर, आभीर, भोज, पाण्य, बङ्ग, कलिङ्ग, ताम्र लिप्त, उड्गा पौण्डू, बासचूड़, केरल इन सव देशों को उस दैत्य ने क्षोभ युक्त बना दिया था और देवों के सहित अप्सराओं के समुदाय | को भी क्षुब्ध कर दिया था ।७१ । ३३ । ७३। अगस्त्य भवन अन्य दानवों के साथ नरसिंह का युद्ध ]

जो कि पहिले अगम्य कर दिया था वह सिद्ध-चरणों के समूहों से विप्रकीर्ण और अत्यन्त मनोहर या १७४। उसमें विचित्र भाँति के अनेक विग रहते थे तथा सुन्दर पुष्पोंसे युक्त महान वृक्ष लगे हुए थे। उसने सुवर्णमय शिखर इतने ऊचे थे मानो वे गगनको लिखित बना रहे हैं । ।७५ । वह सागर के जलों से समावृत चन्द्र सूर्य की किरणों के सदृश विद्युत वाला शोभा से सुसम्पन्न सौ योजन पर्यन्त आयति वाला था । जिस नगोत्तम पर विद्युतों के संघातों का निपातन किया जाता था

ऋषभ और भी सम्पन्न वृषभ संज्ञा वाला पवत था ।७६-७।।

कुञ्जरः पर्वतः श्रीमानगस्त्यस्य गृहं शुभम् विशालाक्षश्च दुर्धर्षः सर्पाणामालयः पुरी ७८

तथा भोगवतीचापि दैत्येन्द्र गाभिकम्पिताः महासेनो गिरिशैव पारियात्रश्च पर्वतः ७६ चक्रवांश्च गिरिश्रध्ठो वाराहश्व र्वतः प्राग्ज्योतिषपुरञ्चमापि जातरूपमय शुभम् ।। यस्मिन्वसति दुष्टात्मा नको नाम दानवः विशालाक्षश्च दुद्धर्षों मेघगम्भीरनिस्वनः ॥६१ षष्टिस्तत्र सहस्राणि पर्वतानां द्विजोत्तमाः ।। तणादित्यसंकाशो मेरुस्तत्र महागिरिः ८२ यक्षराक्षमगंधर्वं नित्यं सेवितकन्दरः हेमग महाशैलस्तथा हेमसखोगिरिः ८३। कैलासश्चौव शैलेन्द्रो दानवेन्द्र कम्पितीः हेमपुष्परसक्षेत्र ते बैखानसं सरः |८४

श्री से सम्पन्न कुञ्जर पर्वत अगस्य का परम शुभ गृह था भोग बती भी उस दैत्येन्द्र के द्वारा अभिकम्पित हो रही थी । महासेन पर्वत पारियात्र गिरि-चक्रलान् श्रेष्ठ गिरि, वाराहू पर्वत-प्राग्ज्योतिषपुर जो परम शुभ और जातरूप मय था । जिसमें दुष्ट आत्मावाला नरक नाम मत्स्य पुराण घारी दानव निवास किया करता था वह मेघ के समान गम्भीर ध्वनि वाला दुर्धर्ष विशालाक्ष था ।७८-८ १। हे द्विजोत्तम ! वहाँ पर साठ हजार पर्वत थे और वहाँ तरुण आदित्य के सदृश महान् गिरि मेरु था ८२॥ यक्ष, गन्धर्व, राक्षसों के द्वारा नित्य ही जिसकी कन्दराओं का सेवन किया जाता था वह महान् ग ल हेम गर्भ था तथा हेम सखा गिरि था ।६३। ये समस्त महाशैल और शैलो का प्रमुख स्वामी कैलास को भी इस दानवेन्द्र ने कम्पित कर दिया था। उसने हेम् पुष्प इस त्रि में खानस सरोवर को भी प्रकम्पित कर दिया था |८४।।

कपितं मानसञ्चौव हंसकारण्डबाकुलम् त्रिशृङ्गपर्वतञ्चौव कुमारी सरिद्वरा |८५ तुषारचयसञ्छन्ना मंदरश्चापि पर्वतः ।। उशीरबिंदुश्च गिरिश्चन्द्रप्रस्तथाद्रिराट् ।८६ प्रजापतिगिरिश्चौव तथा पुष्करपर्वतः ।। देवाभ्रपर्व तश्चैव यथा रेणुकोगिरिः ।८७ : क्रौञ्चः सप्तषशैलश्च घूम्रवर्णश्च र्वा तः एते चान्ये गिरयो देशी जनपदास्तथा ।८८ नद्यः ससागराः सर्वाः सोऽकम्पयत दानवः ।। कपिलश्च महोपुत्रो व्याघ्वांश्चैव कम्पितः ।८६ खेचराचौव सतीपुत्राः पातालतलवासिनः गणस्तथा परोरौद्रो मेघनामांकुशायुधः ६० ऊध्र्व गो भीमवेगश्च सर्व एवाभिकम्पिताः गदी शूली करालश्च हिरण्यकशिपुस्तदा ।६१

हंसों और कारण्डबों से समाकुल मानस सरोबर को भी कम्पाय | मान कर डाला था । त्रिशृङ्ग पर्वत, सरिताओं में परम श्रेष्ठ, तुषार के समुदाय से सञ्छन्न कुमारी नदी, मन्दर पर्वत, उशीर बिंदु गिरि, | अद्रियों का राजा चन्द्रप्रस्थ, प्रजापति गिरि, पुष्कर पर्वत, देवाभ्रपर्वत, अन्य दानवों के साथ नरसिंह की युद्धे  

४३ रेणुक गिरि, क्रौञ्च, सप्तषि, शैल, धूम्रवर्ण पर्वत तथा अन्य गिरिगण, देश तथा जनपद, सागरों के सहित समस्त नदियों आदि को उस महा दानव ने कम्पित कर दिया था। मही का पुत्र कपिल और व्याघवान् पर्वत को भी कम्पायमान बना दिया था ।६५-६६। खेचर, सतीपुत्र, पाताल तल के निवासिगण, पर द्र, मेघ नाम वाला अकुशायूध, ऊवंग और भीम वेग ये सभी अभिकम्पित हो गये थे। उस समय में हिरण्यकशिपु गदा के धारण करने वाला, शूल धारी और महान् कराल हो गया था । ६०-६१।

जीमूतघनसकाशो जीमूतघननिस्वनः | जीमूतघननिर्घोष जीमूत इव वेगवान् ।६२ | देवादितिजो बीरो नृसहं समुपाद्रवत् ।। समुत्पत्य ततस्तीक्ष्णैमृगेन्द्र महानखः ।६३ तदोंकारसहायेन विदार्य निहतोयुधि मही कालश्च वशी नभश्च ग्रहाश्च सूर्यश्च दिशश्चसर्वाः। नद्यश्च शैलाश्च महार्णवाश्च गताः प्रसादन्दितिपुत्रनाशात् ॥६४ ततः प्रमुदिता देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।। तुष्टुवुर्नामभिदिव्यौरादिदेवं सनातनम् ॥६५ यत्त्यी विहितं देव ! नासिहमिदं वपुः एतदेवाचयिष्यन्ति परावविदोजनाः ॥६६ भवान् ब्रह्मा रुद्रश्च महेन्द्र देवसत्तमाः ! . भवान् कर्ता विकर्ता लोकानां प्रभवाप्ययः ॥६७, पराञ्च सिद्धाञ्च परञ्च देवं पञ्च मन्त्रं परमं विश्च परञ्च धर्मपरमञ्च विश्व त्वामुहुरग्रय पुरुषं पुराणम्।६८

उस हिरण्यकशिपु का स्वरूप उस काल में जीमूत कृष्णमेघ के समान था और मेघके ही तुल्य घोर ध्वनि वाला यह था । उसकीघोर मत्स्य पुराण गर्जना भी देष के ही तुल्य थी तथा जीमूत के समान ही वेग से युक्त था।६२। इस प्रकार के स्वरूप वाला वह दिति का पुत्र और देवों का शत्रु था उस वीर नै नृसिह महाप्रभु, पर आक्रमण किया था। इसके अनन्तर उसी समय में ओडार की सहायता वाले मृगेन्द्र ने उछाल मारकर अपने परम तीक्ष्ण विलाल नखों से उस दानवेन्द्र हिरण्यकशिपु को पकड़ कर विदीर्ण कर दिया था और नृसिह प्रभु के द्वारा वह युद्ध में निहत हो गया । दिति पुत्र के विनाश हो जाने से यह मही-काल वशींनभ, सूर्य, सम्पूर्ण ग्रह, समस्त दिशाएँ, नदियाँ, शैल और महा सागर सब परम प्रसन्नता को प्राप्त हो गए थे।६३ ६४। इसके पश्चात् सब देव वृन्द-ऋषिवर्ग और तापस गण परम प्रमुदित हो गये थे

और फिर उन्होंने दिव्य नामों के द्वारा उन सनातन आदि देव का स्तन किया था ।६ ५। उन्होंने कहा-हे देव! आपने जो यह नारसिह वपु धारण किया है आपके इसी स्वरूप का परावर वेत्ती जन अर्चन किया करेंगे । ६६। ब्रह्माजी ने कहा है भगवान् ! आप ही ब्रह्मा, रुद्र महेन्द्र और परम श्रेष्ठ देव हैं। आप ही इन लोकों के कर्ता, विकर्ता, प्रभाव और अप्वये हैं ।६७। आपको ही परम सिद्ध, पराम्पर देव, परम मन्त्र, परम हृवि, परमधर्म, परभ विश्व और सबसे आदि में होने वाला पुरातन पुरुष कहते हैं । ६५-६६।

 

परं शरीरं परमञ्च ब्रह्म परञ्च योगं परमाञ्च वाणीम् पर रहस्यं परमाङ्गतिञ्च त्वामाहुरग्रच पुरुषं पुराणम् ॥६६ एवं परस्यापि परं पदं यत् परं परस्यापि परञ्च देवम् ।। परं परस्यापि परञ्च भूतन्त्वामाहुरग्रय पुराणम् ॥१०० परं परस्यापि परं निधानं परं परस्तापि परं पवित्रम् परं परस्यापि परं दान्तन्त्वामाहुरग्रय पुरुषं पुराणम् १०१ एवमुक्त्वा तु भगवान् सर्वलोकपितामहः ।। स्तुत्वी नारायण देवं ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः ।१२ ।।

अन्य दानवों के साथ नरसिंह का युद्ध ] | [ ४५ तृप्तो नदत्सु तूर्येषु नृत्यन्तीष्वप्सरःसु क्षीरोदस्यत्तरं कूल जगाम हरिरीश्वरः १०३ नारसिंहं वपुदेवः स्थायित्वा सुदीप्तमत् ।। पौराणं रूपमास्थाय प्रययौ गरुडध्वजः १०४ अष्टचक्र यानेन भूतयुक्तेन भास्वता ।। अव्यक्तप्रकृतिदेवं स्वस्थानं गतवान् प्रभुः १०५

हे भगवन् ! आपको ही परम शरीर परम ब्रह्म-परमयोग-परम वाणी-परम रहस्य तथा परम गति एवं आद्य पुराण पुरुष कहा करते हैं । इस प्रकार में जो पराक्रमी परम पद है और परकर्मी परम देव है। तथा परकामी परकामी परमभूत हैं। उस अद्य पुरुष एवं परम पुराण आपको ही कहते हैं ।६६-१००। सी भाँति परकामी परम निधान—- पारकामी परम पवित्र तथा परसेवी परम दान्त अद्य पुराण पुरुष आपको ही कहते हैं ।।१०१।। इस रीति से समस्त लोकों के पितामह भगवान् ने नारायण देव का स्तवन करके प्रार्थना की और फिर वे प्रभु अपने ब्रह्मलोक को वापिस चले गये थे ।१०२। इसके अनन्तर सूर्यों के घोष होने पर और अप्सराओं के नृत्य होने पर ईश्वर श्री हरि क्षौर सागर के उत्तर कूल पर गमन कर गये थे । १०३। देवेश्वर ने सुदीप्ति से युक्त नारसिंह वपु की स्थापना कराकर फिर गरुड़ध्वज प्रभ, पौराण स्वरूप में समास्थित होकर प्रयाण कर गयेथे । भ तयुक्त-भास्वान् आठ चक्रों वाले यान के द्वारा अव्यक्त प्रकृति देव प्रभु अपने स्थान को चले गये थे । १४-१८ ५।

 

।। मत्स्य पुराण ६४मनुमत्स्य संवाद वर्णन ।। पद्मरूपमभूदेतत् कथं हेममयं जगत् ।१. कथञ्च वैष्णवी सृष्टि: पद्ममध्येऽभवत्पुरा ।२ ।। श्रुत्वा नारसिहंमाहात्म्यं रविनन्दनः विस्मयोत्फुल्लनयनः पुनः प्रयच्छ केशवम् ।३ कथं पाद्म महाकल्पे तव पद्ममयं जगत् ।। जलार्णवगतस्येह नाभौ जातं जनार्दन ! ।४ प्रभावात् पद्मनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि ।। पुष्करे कथं भूता देवाः सषिगणाःपुरा ।५ एनमाख्याहि निखिलं योगं योगविदाम्पते ।। शृण्वतस्तस्य में कीतिर्न तृप्ति रुपजायते ॥६ कियता चैव कालेन शेते वै पुरुषोत्तमः कियन्तं वा स्वपिति कोऽस्य कालस्य मम्भवः 19

ऋषिगण ने कहा–हमारी यह प्रार्थना है कि सृष्टि रचना को कुछ और अधिक विस्तार के साथ आप वर्णन कीजिए ।१-२। यह सम्पूर्ण जगत् किस प्रकार से हेममय पदम के स्वरूप वाला हो गया था और पहिले उस पद्म के मध्य में यह वैष्णवी सृष्टि किस प्रकार से हुई थी।३। महा महर्षि श्री सूतजी ने कहा-रविनन्दन नै प्रभ, नरसिंह के माहात्म्य का श्रवण करके विस्मयसे उत्फुल्ल नेत्रों वाला होकर पुनः केशव प्रभु से पूछा था ।४। मनु ने कहा- हे जनार्दन ! पाम महा कल्प में जिस समय में आप जलार्णव में लीन होकर स्थित थे तब यह पदममय जगत् आपकी नाभि से किस प्रकार उत्पन्न हुआ था ? सागर के जल में शयन करने वाले पद्मनाभ के प्रभाव से उस पुष्कर में पहले देव-ऋषिगण और समस्त भ त किस रीति से समुत्पन्न हुए थे ।५। हे योग के वेत्ताओके स्वामिन् ! इस सम्पूर्ण योग का वर्णन कृपा करके

भनुमत्स्य संवाद वर्णन ]

४७ कीजिए ! उसकी कीति को श्रवण करने वाले मेरे हृदय की तृप्ति नहीं हो रही है। पुरुषोत्तम प्रभु, कितने लम्बे समय से वहाँ पर शयन किया करते हैं और किस काल पर्यन्त शयन करते रहते हैं। इस काल की उत्पत्ति क्या है ? ७॥

कियता वाथ कालेन ह्यत्तिष्ठति महायशाः कथञ्चोत्थाय भगवान् सृजते निखिलं जगत् ।८।। के प्रजापतयस्तावदासन् पूर्व महामुने ! ।२।। कथं निमितवांश्चैव चित्र लोक सनातनम् ।६।। प्रथमेकार्णवे शून्ये नष्ट्रस्थावरजङ्गमे .१५ दग्धदेवासुरनरे प्रणष्टोरगराक्षसे ।१०

नष्टानिलानले लोके नष्टाकाशमहीतले केवलं गह्वरीभूते महाभूतविपर्यये ।११ विभुर्महाभूतपतिर्महातेजा महाकृतिः ।।।अस्तेि सुरवरश्नष्ठो विधिमास्थाय योगवित् ।१२। शृणुयां परया भक्त्या ब्रह्मन्नेतदशेषतः वक्तुमर्हसि धर्मिष्ठ ! यशो नारायणात्मकम् १३

यह महान यशस्वी प्रभूकितने काल में वहाँ पर उत्थित हुआ करते हैं और किस प्रकार से उठकर इस सम्पूर्ण जगत् का सृजन भग वान् किया करते हैं ? हे महामुने ! पहिले कौन प्रजापति थे और इस अत्यन्त विचित्र जगत् तथा सनातन लोक का किस प्रकार से – निर्माण किया था ।८-६ । प्रथम इस प्रकार एक मात्र अर्णब मैं जबकि सभी स्थावर और जङ्गम नष्ट होकर यह एकदम शून्य था और सब देव | असुर एवं नर दग्ध हो गए थे तथा उरग और राक्षस भी सब नष्ट हो | गये थे । अनिल और अनल भी विनष्ट हो गए थे । लोक में आकाश

एवं महीतल का नाम निशान भी नहीं था । महाभूनों के विपर्यय हो जाने पर यह केवल एक गह्वर के तुल्य ही था। उस समय मैं-महान्

४६ ।।

मत्स्य पुराण तेजस्वीसुरवरों में परम श्रेष्ठमहाभूतों के स्वामीयोगवेत्ता बिभे, विधि में समास्थित होकर थे १७१३। हे ब्रह्मन् ! मैं परम भक्तिपूर्वक पूर्ण रूप से इस सबको श्रवण करना चाहता है है मष्ठ ! आप इस नारायण के ही स्वरूप वाले परम यश का वर्णन करने के योग्य होते हैं ।१३। श्रद्धया चोपविष्टानां भगवान् ! वक्तुमर्हसि नारायणस्य यशसः श्रवणे या तव स्पृहा ।।१४ तवंश्यान्वयभूतस्य न्याय्यं रविकुलभ ! शृणुष्वादिपुराणेषु वेदेभ्यश्च यथाश्रुतम् १५ ब्राह्मणानाञ्च वदतां श्रुत्वा वै सुमहात्मनाम् यथा तपसा दृष्ट्वा बृहस्पतिसमद्युतिः ।१६ पराशरसुतः श्रीमान् गुरुपायनोऽब्रवीत् तत्तऽहं कथयिष्यामि यथाशक्ति यथाश्चति ॥१७॥ यद्विज्ञातु मया शक्यमृषिमात्रेण सत्तमाः ! कः समुत्सहते ज्ञातु परं नारायणात्मकम् १८ विश्वायनश्च यद्ब्रह्मा वेदयति तत्त्वतः तत्कर्म विश्ववेदानां तद्रहस्यं महर्षिणाम् ।१६ तमीज्यं सर्वयज्ञानां तत्तत् सर्वदर्शिनाम् ।।तदध्यात्मविदां चिन्त्यंनरकं विकर्मिणाम् ।२० अधिदैवञ्च यद् वमधियज्ञ सुसंज्ञितम्

तद्भूताधिभूतञ्च तत्परं परमर्षिणाम् ।२१

हम सब श्रद्धा के साथ श्रवण करने के लिए यहाँ पर समुपस्थित हैं। आप अब कहने की कृपा कीजिए क्योंकि इसके बर्णन करने की पूर्ण क्षमता रखते हैं। मत्स्य भगवान् ने कहा-जो यह आपकी स्पृहा भगवान् नारायण के यश को श्रवण करने की समुत्पन्न हुई है वह है बकुलर्षभ! उसी बंश में होने वाले अन्वय मैं उत्पन्न आपकी बहुत इचत ही है ।

 [ ४ वेदों में तथा आदि पुराण में जिस प्रकार में सुना गया है उसका अर्थ श्रवण करो । १४-१४) सुन्दर और महान् आत्मा वाले बोलते हुए ब्राह्मणों का कथन मुनकर और बृहस्पति के समान छ ति बाले पाराशर के पुत्र श्रीमान् गुरु द्वैपायन ने जिस प्रकार में तपश्चर्या के द्वारा देख कर बोला था उसी को मैं अपनी शक्ति और श्रवण के अनुसार आपको सब कगा। १६-१७। हे श्रेष्ठतमो! ऋषि मात्र मेरे द्वारा जो भी जाना जा सकता है उस परम नारायण के स्वरूप को अन्य कौन जानने का उत्साह कर सकता है ।८। विश्व जिसको अपना बनाता है वह ब्रह्माजी तात्विक रूप से जिसको नहीं जानते हैं । विश्व वेदों का यह कमें मह पियों के लिए भी एक रहस्य हैं। सव यज्ञ के यजन करने के योग्य वह सर्व दशयों का तत्व हैं । वह अध्यात्म के वेत्ताओं के चितन के योग्य विपत्र हैं और विकम्मियों का नरक नहीं हैं। वह अधिदैव और अधियन संत्रा में युक्त एवं वह भूत अधिभूत है तथा परमर्षयों का वह परम हैं । १६-२१।।

स यज्ञो वेदनिदिष्टःस्तत्तपः कवयो विदुः । यः कर्ता कारको बुद्धिर्मनः क्षेत्रज्ञ एव च ।२२ प्रणवः पुरुषः शास्ता एकश्चेति विभाब्यते । प्राणः पञ्चविधश्चैव ध्रव अक्षर एव च ।२३ ।।

कालः शाकश्च यन्ता च द्रष्टास्वाध्याय एव च । उच्यते विविधदेवः स एवायं न तत्परम् ।२४ स एव भगवान् सर्वं करोति विकरोति च । सोऽस्मान् कारयते सर्वान् सोऽत्येति व्याकुलीकृताम् ।२५ यतामहे तमेवाद्यन्तमेवेच्छाम निवृताः ।। यो वक्ता यच्च वक्तव्यं यच्चाहन्तब्रवीमि वः ।२६। श्रयतै यच्च वै श्राव्यं यच्चान्यत् परिजलप्यते । याः कथाश्चैव बर्तन्ते श्र तयो बाथ तत्पराः ।२७

५० ]

मत्स्य पुराण विश्वं विश्वपतिर्यश्च स तु नारायणः स्मृतः । | यत् सत्यं यदमृतमक्षरं परं यत् यद्भूतं परममिदं च यदुभविष्यत् | यत् किञ्चिच्चरमचरं यदस्ति चान्यत् ।। तत् सर्वपुरुषवरः प्रभुः पुराणः ॥२८ ।

| वह वेदों से द्वारा निर्दिष्ट यज्ञ है और कविगण उसको तप कहते हैं । जो कर्ता, कारक, बुद्धि, मन, क्षेत्रज्ञ, प्रणव, पुरुष, शास्त्र और एक ही विभावित होता है । पाँच प्रकार का प्राण-ध्रव और अक्षर है। काल, शाक, यन्ता, दृष्टा और स्वाध्याय है । विविध देवोंके द्वारा वह देव कहा जाता है और यह वह ही है उससे पर कोई नहीं है। वह ही भगवान सब कुछ किया करते हैं और बिगाड़ते हैं। वह इन सबको कराता है और व्याकुलीकृतों का अतिगमन करता हैं ।२२-२५। उसी आदि में होने वाले के लिए हम यत्न किया करते हैं और निवृत (प्रसन्न होकर उसी को हम सब चाहते हैं। जो वक्ता है और वक्त व्य है तथा जो मैं हूँ उसको ही मैं आपको बतलाता हैं । जो श्राव्य सुनाया जाता है और जो अन्य परिजल्पित किया जाता है। जो कथायें वर्तमान हैं । जो श्रुतियाँ हैं वे तत्पर ही हैं। यह विश्व और विश्व का स्वामी है वह ही नारायण कहा गया है। जो सत्य है—अक्षर और पर | है। जो परम भूत हैं और भविष्यत् है-जो चर-अचर तथा जो अन्य है वह सभी पुरुषों में श्रेष्ठ पुराण प्रभु है ।२६-२८।८।।

६५-विष्णु प्रादुर्भाव वर्णन विष्णुत्वं शृणु विष्णोश्च हुत्रित्वञ्च कृते युगे । वैकुण्ठत्वञ्च देवेषु कृष्णत्वं मानुषेषु च । १ ईश्वरस्य हितस्यैषा कम्र्मणां गहनागतिः ।।

 

विष्णु-प्रादुर्भाव-वर्णन

संप्रत्यतीतान् भव्यांश्चशृणुराजन् ! यथातथम् ।२। अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थ एष भगवान् प्रभुः नारायणोह्यनन्तात्मा प्रभवोऽव्ययएवच ।३ एष नारायणो भूत्वा हरिरासीत् सनातनः ।। ब्रह्मोवायुश्चसोमश्च धर्मः शक्रोबृहस्पतिः ।४ अदितेरपि पुत्रत्वं समेत्य रविनन्दन ! एष विष्णुरितिख्यात इन्द्रस्यानुजो विभुः ॥५ प्रसादजं ह्यस्य विभोरदित्यः पुत्रकारणम् वधार्थं सुरशत्रूणां दैत्यदानवराक्षसाम् ।६। प्रधानात्मा पुरा ह्यष ब्रह्माणमसृजत् प्रभुः सोऽसृजत् पूर्वपुरुषः पुराकल्पे प्रजापतीन् ।७ ।।

श्रीमत्स्य भगवान ने कहा- अब तुम विष्णु के विष्णव का श्रवण करो और कृत युग में हरिब की-देवों में बैकुण्ठत्व का और मनुष्यों में कृष्णत्व के स्वरूप का भी श्रवण करलो । हितकारी ईश्वर के कर्मों की अतीव गहन गतियाँ हैं । हे राजन् ! अव इस समय में जो व्यतीत हो गये हैं उनको तथा आने जो होने वाले हैं उनको ठीक ठीक रीति से श्रवण करलो। १-२। यह जो अव्यक्त भगवान प्रभु हैं वह ब्यक्त लिगों (चिह्नों) में स्थित होते हैं वहीं अनन्त आत्मा वाले सबका प्रभव (उत्पत्ति) और अविनाशी साक्षात् नारायण हीं है ।३। यह पहिले नारायण होकर सनातन श्रीहरि हुए थे । हे रवि के नन्दन ! फिर इस ने ही ब्रह्मा–वायु-सोम-धर्म-इन्द्र-बृहस्पति तथा अदिति के पुत्रत्व को प्राप्त किया वा और यह ही फिर इन्द्र का छोटा पीछे उत्पन्न होने वाला भाई विभु विरुण, इस नाम से विख्यात हुए हैं ।४-५ – ५। देवगण इस विभु के पुत्र होने का कारण उनकी प्रसन्नता से होने वाला समझते थे जो कि सुरों के शत्रु दैत्य-नानब और राक्षसों के वध

करने के लिए ही था पहिले प्रसन्न आत्मा इस प्रभु ने ब्रह्मा का सृजन | किया था। फिर उस पूर्व पृरुष ने पहिले कल्पमें प्रजापतियों का सृजन किया था ।६-७। । असृजन्मानवांस्तत्र ब्रह्मवंशाननुत्तमान् तेभ्योऽभवन्महात्मभ्यो बहुधाब्रह्म शाश्वतम् ।८ एतदाश्चर्यभूतस्य विष्णोः कर्मानुकीर्तनम् कीर्तनीयस्य लोकेषु कीयमानं निबोध में वृत्त वृत्रवध तत्र वर्तमाने कृते युगे नासीत्रैलोक्यविख्यातः संग्रामस्तारकामयः १०३ यत्र ते दानवा घोराः सर्वे संग्रामदुर्जयाः इनन्ति देवगणान् सर्वान् सयक्षोरगराक्षसान् ।११ ते बध्यमाना चिमुखाः क्षीणप्रहरणारणे ।। त्रातारं मनसो जग्मुर्देवं नारायणं प्रभुः १२ एतस्मिन्नन्तरे मेधा निर्वाणाङ्गारवर्चसः ।।

सार्कचन्द्रग्रहगणंच्छादयन्तो नभस्तलम् ।१३ | वेणुविद्य दगणोपेता घोरनिह्लादकारिणः अन्योन्यवेगाभिहताः प्रवबुः सप्त मारुतीः १४ ।।

| वहाँ पर अत्युत्तम ब्रह्मा के वश वाले मानवों का उनने सृजन किया था फिर उन सब महान आत्माओं वालो से यह शाश्वत ब्रह्म ही बहुत से स्वरूपों में समुत्पन्न हुआ था । यह ही आश्चर्य स्वरूप वाले भगवान विष्णु के कर्मों का अनुकीत्त न हैं । लोकों में कीर्तन करने के योग्य के उस कीयं मान कर्म को अब मुझसे तुम भली भाँति समझलो । ।६-६। वर्तमान कृत युग में वृत्रासुर वध होने पर वहाँ पर त्रिभुवन में विख्यात तारकामय संग्राम हुआ था । जिस युद्ध में दुर्जय समस्त घोर दानव गण यक्ष-उरग और राक्षसों के सहित सब देवों का हनन किया करते थे ।१५ -११। उस रण में वध किए जाते हुए क्षीण आयुधों वाले क्रुिण, प्रादुर्भाव वर्णन । विमुख होकर बकै सवे मन से त्राण करने वाले प्रभु देव नारायण की शरण में गये थे :१२। इसी बीच में निर्वाण अङ्गार वर्चस वाले मेष, सूर्य, चन्द्र आदि ग्रहों से युक्त नभस्तल का अच्छादन करते हुए छा गये थे । ये मोघ वेण विद्यगण से युक्त थे तथा घोर गर्जन करने वाले थे । परस्पर में बेग से अभिहत सातों मरुत वहन करने लगे थे।

 

दीप्ततोयाशनिल्न गानलानिलः ।।

रौः सुघोरैरुत्पातेदह्यमानमिवाम्बरम् १५ तत उल्कासहस्राणि निपेतुः खगतान्यपि दिव्यानि विमानानि प्रपतन्त्युत्पतन्ति १६ चतुर्युगान्ते पर्याये लोकानां यभयं भवेत् अरूपवन्ति रूपाणि तस्मिन्नुत्पातलक्षणे १७ जातञ्च निष्प्रभं किञ्चन प्रज्ञायते ।। ।। तिमिरौघपरिक्षिप्ती रेजुश्च दिशोदशः ॥१८ विवेश रूपिणी काली कालमेघावगुण्ठिता। द्यौर्नभश्चाभिभूतार्का घोरेण तमसा वृता ।१६ ।। तीन घनौघान् सतिमिरान् दोभ्या॑माक्षिप्य प्रभुः वपुः स्वन्दर्शयामास दिव्यं कृष्णवपुर्हरिः ।२०। बलाहकाञ्जननिभं बलाहकतनूरुहम् ।। तेजसा वपुषा चैव कृष्णं कृष्णमिवाचलम् ॥२१

उस समय में यह सम्पूर्ण आकाश दीप्त और अशनि (बश्न) से संयुक्त यनों के द्वारा बज्र वेग अनल और अनिलों के द्वारा-सुघोर ध्वनि और उत्पातों से दह्यमान की तरह हो रहा था ।१५। इसके पश्चात् आकाश में स्थित भी सहस्रों उल्कायें गिर गयी थीं तथा दिव्य विमान उड़ते थे और नीचे की ओर गिरते थे ।१६। चतुयुगों के अन्त में लोकों के पर्याय में जो भय होता है उस उत्पात के लक्षण में सभी

१. [ मत्स्य पुराण रूप बिना रूप वाले हो जाते हैं । १७। लोकों में सभी कुछ प्रभा से हीन हो जाता है और कुछ भी नहीं जाना या समझा जाया करती हैं। अन्धकार के अत्यन्त घोर एवं गहम समुदाय से परिक्षिप्त हुई दशों दिशायें प्रकाशित नहीं होतीथीं। उस समय में काल मेघ में अवगुण्ठित होकर रूपधारिणी काली का प्रवेश हो जाता था। अत्यन्त घोर तम से समावृत दिवलोक तथा अन्तरिक्ष जिसमें सूर्य एकदम अभिभूत हो जाता है बिल्कुल भी दिखाई नहीं दिया करता है । १८-१६। तिमिर से परिपूर्ण उन घनों के समूहों को वह प्रभु अपने हाथों से आक्षिप्त करके कृष्ण वपुधारी श्री हरि अपने दिव्य शरीर को दिखाया करते थे ।२६ । बलाहक के सदृश काले बलाहक के समान रोमों से युक्त-वपु और तेज के एक कृष्ण स्वरूप को प्रकट किया था ।२१।

 

दीप्तापीताम्बरधरं तप्तकाञ्चनभूषणम् ।। धूमान्धकारवपुष युगान्ताग्निमिवोत्थितम् ।२२। चतुर्द्विगुणपीनांसङ्किरीटाच्छन्नमूद्ध जम् ।। बभौ चामीरप्रख्यैरायुधैरुपशोभितम् ।२३ चन्द्रार्ककिरणोद्योतं गिरिकूटमिवोच्छुितम् नन्दकानन्दितकरं शराशीविषधारिणम् ।२४ शक्तिचित्रफलोदयंशङ्खचक्रगदाधरम् विष्णुशैलं क्षमामूलं श्रीव क्षं शाङ्ग धन्विनम् ॥२५॥ त्रिदशोदारफलदं स्वर्गस्त्रीचारुपल्लवम् सर्वलोकमनः कान्तं सर्वसत्वमनोहरम् ।।२६ नानाविमानविटपन्तोयदाम्बुमधुवन्नम् ।। विद्याहङ्कारसाराद्य महाभूतप्ररोहणम् ॥२७ विशेषपत्रंनिचितं ग्रहनक्षत्रपुष्पितम् ।।

दैत्यलोकमहास्कन्धं मर्त्यलोके प्रकाशितम् ॥२८

[ ५५ वह दीप्तियुक्त पीत अम्बर को धारण करने वाला तथा तपे हुए सुवर्ण के भूषणों से संयुक्त-धूम सहित अन्धकार के शरीर वाला युगांत करने वाली अग्नि के तुल्य समुपस्थित हुआ था ।२२। चौगुने और दुगुने पीन अश से संयुक्त–किरीट से समाच्छन्न केशों वाला वह दिव्य व | चामीर प्रख्य आयुधों से उपशोभित होकर प्रकट हो रहा था ।२३। चन्द्र और सूर्य की किरणों के उद्योत वाला अत्यन्त ॐ चे गिरि के शिखर के सदृश था । नन्दक से आनन्दित करों वाला-शर तथा आशीविष के धारण करने वाला—क्षमा का मूल-विष्ण, शैल-श्री वृक्ष और शाङ्ग धनुष के धारण करने वाला वह दिव्य स्वरूप था ।२४-२५। उसी दिव्य स्वरूप का वर्णन किया जा रहा है-वह देवों का उदार फल देने वाला-स्वर्गीय स्त्रियों का चारु पल्लव-सब लोगों के मन को रमणीय सब जीवों में अत्यन्त मनोहर-नाना विमानों के विटपों वाला-मेघों के जलरूप मधु का श्रवण करने वाला—विद्या के अहंकार-सार का आय महान् भूतों का प्ररोहरण करने वाला-विशेष पत्रों से निचित ग्रह और नक्षत्र रूपी पुष्पों से संयुक्त और वह दिव्यरूप दैत्यों के लोकका महान् स्कन्ध था जो कि इस मयं लोक में प्रकाशित हुआ था ।२६-२७॥

 

सागराकारनिहदं रसातलमहाश्रयम् ।। ।। १० मृगेन्द्रपार्शविततं पक्षजन्तुनिषेवितम् ।२६।।।। शीलार्थचारुगन्धाढ्यं सवलोकमहाद्मम् अव्यक्तानन्तसलिलं व्यक्ताहकारफेनिलम् ।३० महाभूततरङ्गौघं ग्रहनक्षत्रबुदबुदम् विमानगरुतव्याप्तं तोयदाडम्बराकुलम् ।३१

जन्तुमत्सजनाकीर्ण शैलशङ्कुलैयु तम् जैगुण्यविषयावर्त सवलोकतिमिङ्गिलम् ।३२ वीरवृक्षलतागुल्मं भुजगोत्कृष्टशैबलम्

।। :

मत्स्य पुरणि द्वादशार्कमहाद्वीप रुद्र कादशपत्तनम् 1३३ वस्वष्ट्र पर्वतोपेतं त्रैलोक्याम्भोमहोदधिम् । सन्ध्यासङ्खयोमिसलिलं सुपर्णानिशसेवितम् ।३४ पितामहमहावीर्य सर्वस्त्रीरत्नशोभितम् । ३५

पुनरपि उसी परम दिव्य स्वरूप को वणित किया जा रहा है कि वह सागरके आकार के तुल्य निहदि था और रसातल के महान आश्रय वाला था । मृगेन्द्र के पाशों से बितत-पक्षिगण एवं जन्तुओंसे निचे वित शौलार्थ और सुन्दर गन्ध में आढ्य-सब लोकों का महान् द्रम-अव्यक्त एवं अनन्त सलिल वाला–व्यक्त अहङ्कर से फेनयुक्त-महान् भूतों की तरङ्गों के कोच वाला—ग्रह् तथा नक्षत्रों के बुलबुलों से समन्वित— विमान गरुत व्याप्त और तोयदों के आडम्बर से समाकुल था ।२६ ।३१। वह रूप जन्तुओं वाला-जनों से समाकीर्ण-शैल शखों के कुलों से संयुक्त-जैगुण्य के विषयों का वित्त—समस्त लोकों का तिमिङ्गल वीर रूपी वृक्ष लता और गुल्मों वाल-भुजङ्गों कै उत्कृष्ट शैवाल वाला द्वादश सूर्यों के महाद्वीपों वाला-एकादश रुद्रों के पत्तनों से युक्त आठ वसुरूपी पर्वतों से युक्त–त्रैलोक्य लपी महा सागरों वाला-संध्या संख्या की ऊर्मियों का सलिल–सुपर्ण की वायु से सेवित–दैन्य और रक्षोगण रूपी ग्रयों वाला-यक्ष और उगरूपी भू जोंसे समाकुल पिता मह के समान महान् वीर्य वाला और सब स्त्रियों के स्वरूप वाले रनों से सुशोभित था ।३२-३५।।

 

श्रीकांतिकान्तिलक्ष्मीभिर्नदीभिरुपशोभितम् कालयोगिमहापर्वप्रलयोत्पत्तिबेगिनम् ॥३६ तन्तु योगमहापौर नारायणमहार्णवम् देवाधिदेवं वरदं भक्तानां भक्तिवत्सलम् ३७ अनुग्रहकरं देवं प्रशान्तिकरणं शुभम् ।। हर्यश्वरथसंयुक्ते सुपर्णध्वजसेविते ।३८

ग्रचन्द्रार्करचिते मन्दराक्षवरावृते अनन्तरश्मिभियुक्ते विस्तीर्ण मेरुगरे ।३६ नाकाचित्रकुसुमे ग्रहनक्षत्रबन्धुरे। भयेष्वभयद योनि देवी दैत्यपराजिताः ॥४० दहशुस्तेस्थितं देव दिव्ये लोकसये थे। ते कृताञ्जथः सर्वे देवाः शक्रपुरोगमाः ।४१ जयशब्दं पुरस्कृत्य शरण्यं शरणङ्गताः ।। तेषां ताङ्गिरं श्रुत्वा विष्णुदेवेश्वरस्स्वयम् ॥४२

उसी दिब्य स्वरूप का वर्णन करते हुए बतलाते हैं कि वह दिव्य रूप श्रीकान्ति और लक्ष्मी से तथा नदियों से उपशोभित था-कालयोगी और महापर्व एवं प्रलय तथा उत्पत्ति के वेग वाला था । तन्तुयोग की महापार–नारायण रूपी महार्णव से युक्त-देवों का भी अधिदेव-वर देने वाला जो अपने भक्तों को प्रदान करते थे—भक्तों पर प्यार करने चाली वह स्वरूप था ।३६-३७ वह अनुग्रह करने वाला-देव-प्रशान्ति करने बाला शुभ था। हर्यश्च रथ में समन्बित-ध्वज से सेवित-ग्रह चन्द्र और सूर्य से विरचित-मन्दराक्ष बर से आवृत–अनन्त रश्मियों से युक्त–विस्तीर्ण मेरु गह्वर से युक्त–तारे रूप विचित्र कुसुमों से परिपूर्ण–ग्रह और नक्षत्रों से बन्धुर (सुडौल)-भय के अवसरों पर अभय देने वाले इस स्वरूप को व्याम में दैत्यों से पराजित देबों ने देखा था। उन देवों ने परम दिव्य लोकमय रथ में स्थित देव का दर्शन प्राप्त किया था। उस समय में इन्द्र को अपनी अग्रणी बना करके उन समस्त देवों ने अपनी अज़लियों को बद्ध कर लिया था । जयकार के शब्द को पहिले समुच्चारित करके शरण्य प्रभु की वे सब शरणागति में प्राप्त हो गए थे । उन देवों के भी देवेश्वर विष्णु भगवान् ने देवगण की शरणागति में प्राप्त होने के लिए कथित वागी का क्षण किया था ।

मत्स्य पुराण.. मनश्चक्र विनाशाय दानवानां महामृधे आकाशे तु स्थितो विष्णुरुत्तमं वपुरास्थितः ॥४३ : उवाच देवताः सवः सप्रतिज्ञमिदं वचः शान्ति व्रजत भद्र वो मा भैष्ट मरुताङ्गणाः ।४४। जिता मे दानवाः सर्वं त्रैलोक्यं परिगृह्यताम् ते तस्य सत्यसन्धस्य विष्णोर्वाक्येन तोषिताः ।४५।। देवाः प्रीति समाजग्मुः प्राश्यामृतमनुत्तमम् ।। ततस्तमः संहृतं तद्विनेशुश्च बलाकाः ॥४६ प्रववश्च शिवा वाताः प्रशान्ताश्च दिशो देश शुद्धप्रभाणि ज्योतींषि सोमञ्चक्र: प्रदक्षिणम् विग्रह ग्रहाचक्र : प्रशान्ताश्चापि सिंधवः

विरजस्का अभवन्मार्गा नाकवर्गादयस्त्रयः ।४८ याथार्थमुहुः सरितो नापिचुक्षुभिरोऽर्णवाः ।। आसंश्छभानोन्द्रियाणि नराणामन्तरात्मसु ।४६ महर्षयो बीतशोका वेदानुच्चैरधीयत यज्ञ षु हविः पाक शिवमाप पावकः ।५० प्रकृत्तधर्माः संवृत्ता लोको मुदितमानसाः ।। विष्णोर्दत्तप्रतिज्ञस्य श्रुत्वारिनिधने गिरम् ।५१

देबों की परित्राण के लिए कही हुई वाणी को सुनते ही विष्णुदेव ने उस महान युद्ध में दानबों के विनाश करने के लिए मन में स्थिरता करली थी । उस समय में भगवान् विष्णु उत्तम वपु में समास्थित होकर आकाश में ही स्थित थे। उन्होंने समस्त देवों से प्रतिज्ञा के सहित यह वचन कहा था कि अब अाप सेव लोग शान्ति धारणकरे अर्थात् एकदम प्रशान्त हो जावे हे मरुतों के गणो ! अव आप इरो मत–आपका कल्याण होगा। मैंने सभी दानवों को जीत हो लिया है-ऐसा समझलो | और सब इस त्रैलोक्य को जो तुमसे उन्होंने छीनकर अपना अधिकार

विष्णु प्रादुर्भाव वर्णन ]

[ ५६ कर लिया है पुनः वापिस ग्रहण कर लो। इस प्रकार के बचन जब उन समस्त देवगण ने सत्य प्रतिज्ञा वाले विष्णु भगवान् के सुने थे तो उनके वाक्य से सबको बहुत ही अधिक सन्तोष हो गया था ।४३-४५। उस समय में उस अत्युत्तम अमृत का प्राशन करके देवगण परम प्रीति को प्राप्त हो गये थे । इसके बाद वह सम्पूर्ण अन्धकार नष्ट हो गया था और अभी बलाहक विनाश को प्राप्त हो गये थे । सर्वत्र परम मङ्गल कारी वायु वहन करने लगी थी और दशों दिशायें एक दम प्रशान्त हो गयी थी । शुद्ध प्रभा वाली ज्योतियाँ अर्थात् नक्षत्रादि सोम की प्रद क्षिणायें करने लगी थीं।४६-४७। उस समय में ग्रह गण परस्पर में कोई भी विग्रह नहीं करते थे और सभी सिन्धु परम प्रशान्त हो गए थे। स्वर्ग वर्गादि तीनों ही रज से रहित माग वाले हो गये थे । सम्पूर्ण सरितायें ठीक मार्ग से यथार्थ रूप में बहन कर रही थीं और अर्णवों में भी किसी भी प्रकार का क्षोभ नहीं हो रहा था । सभी मनुष्यों की अन्तरात्माओं में परम शान्ति थी और इन्द्रियाँ परम शुभ-वृत्ति वाली हो गई थी । ४६४६। सब मषगण शोक से रहित होकर वेदों का उच्च स्वर से अध्ययन कर रहे थे। यज्ञों में जो भी हवि प्रक्षिप्त किया जाता था पाबक उसका अति शिव पाक करने लगा था ।५। सभी लोक परम प्रमुदित मनों वाले होकर अपने-२ धर्मों में प्रवृत्त हो गए थे जिस समय में सत्य प्रतिज्ञा वाले भगदान बिष्णु की समस्त शत्रुओं के विवाश कर देने की वाणी का सबने श्रवण कर लिया था, सभी को । परमानन्द प्राप्त हो गया था ।५।

मन्स्य पुराण । ६६-दैत्य सैन्य विस्तार वर्णन ततोऽभयं विष्णुवचः श्रुत्वा दैत्याश्च दानवाः । उद्योगविपुलं चक्र युद्धाय विजयाय च ।१। मयस्तु काञ्चनमयं त्रिनल्वायतमक्षयम् । चतुश्चक्र सुविपुलं सुकल्पितमहायुगम् ॥२ – २ किकिणीजालनिर्घोषं द्वीपिचर्मपरिष्कृतम् ।। रुचिरं रत्नजालैश्च हेमजालैश्च शोभितम् ।३।। ईहामृगगणाकीर्ण पक्षिपङक्तिविराजितम् । दिव्यास्त्रतूणीरघरं पयोधरनिनादितम् ।४।। स्वक्ष रथवरोदार सूपस्थं गगनोपमम् । गदापरिधसंपूर्ण मूर्तिमन्तमिवार्णवम् ।५।। हेमकेयूबययं स्वर्ण मण्डलकूवम् । सपताकध्वजोपेतं सादित्यमब मन्दरम् ॥६ गजेन्द्राभोगवपुष ववचित् केसरिवर्चसम् । युक्तमृक्षसहस्र ण समृद्धाम्बुदनादितम् ।।७

दीप्ताकाशगं दिव्यं रथं परं रथारुजम् । अध्यतिष्ठद्रणाकाङ्क्षी मेरु दीप्तमिवांशुमान् ।८ ।।

 

– – – – श्री मत्स्य भगवान ने कहा–इसके अनन्तर उस अभय से पूर्ण भगवान विष्णु के वचन का श्रवण करके दैत्यों और दानवोंने विजय की प्राप्ति करने के लिए विपुल उद्योग वाला युद्ध किया था ।१। विभिन्न दानवों के द्वारा किये जाने वाले युद्ध का वर्णन किया जाता है-अय दानव ने जिस रथ में विराजमान होकर समर किया था बहू काञ्चन मय था-निल्व आयत और अक्षय था । उस रथमें चार चक्र थे-अती व विपुल था और सुन्दर कल्पना किया हुआ। महायुग वाला था ।२। मय का रथ किङ्गिड़ी जालों के निर्दोष या युक्त-हाथियों के चर्म से परिष्कृत दैत्य से न्य बिस्तार वर्णन | रत्नों के जालों से अत्यन्त मनोरम-हेम रचिस जालों से शोभित-ईहा मग गणों में समाकीर्ण-पक्षियों की पंक्ति से शोभा सम्पन्न-दिव्य अस्त्र और तणीर को धरने वाला तथा पयोधरों के समान ध्वनि से पूर्ण था ।३-४। सुन्दर अक्षों वाला श्रेष्ठ रथों में भी अतोव उदार-सुपस्थ– गगन के सदृश -गदा और परिध से परिपूर्ण मूतमान एक अर्णव के ही समान वह यम का पथ था ।५। वह हेम के केयुर और बलय से युक्त स्वर्ण मण्डल कुवर चाला-पंताओं के सहित ध्वजा वाला और आदित्य से मन्दराचल के समान दिखलाई देता था ।६। गजेन्द्र के आभोग ब चाला—किस स्थल पर केशरी के वर्चस से युक्त-सहस्रों मृक्षों से | युक्त-समृद्ध अम्बुद के समान गर्जन वाला—दीप्त-अकाश में गमन करने वाला—पर थारु ज वह अतीव दिव्य रथी थी। जिस तरहसे अशुमाम् । अंशुमान दीप्त मोरु पर अधिरोहण किया करता है कि टीवः उसी भाँति बहू रण की अकांक्षा रखने वाला भय दानव उस अपने पूर्वोक्त प्रकार के रथ पर अधिष्ठित हुअा था ।३-८।

तारमुत्क्रोशविस्तार पूर्ण हेममयं रथम् ।। शैलाकारमसम्बाधं नीलाञ्जनचयोपमम् ।। काष्र्णेयासमयं दिव्यं लोहेषाबद्धकुबरम् ।। तिमिरोद्गारिकिरणं गर्जन्तमिव तोयम् १० लोहजालेन महता सगवाक्षेण दंशितम् आयसैः परिधैः पूर्ण क्षेपणायश्च मुद्गरैः ।११ प्रासैः पाशैश्च विततैर्नरसंयुक्तकण्टकैः शोभितं त्रासयानैश्च तोमरश्च परश्वधैः ।१२।। उद्यन्तं द्विषतां हेतोद्वितीयमिवं मन्दरम् युक्तं खरसहस्रण सोऽध्यारोहथोत्तमम् १३ विरोचनस्तु संक्रद्धो गदापाणिरवस्थितः

प्रमुखे तस्य सैन्यस्य दीप्तग्रह इवाचलः ।१४।।

तार का रथ उत्क्रोश के विस्तार वाला था और वह सम्पूर्ण रथ हेम से परिपूर्ण था वह रथ शैल के समान आकार वाला—बाधाओं से रहित-नील अञ्ज़न के निश्चय की उपमा वाला—काले लोह के पूर्ण दिव्य-लोहेषा से बृद्ध कूबर वाला—तिमिर के उद्गरण करने वाली | किरणों से संयुत-गर्जना करने वाले तोयद के सदृश–गवाक्ष से युक्त | महान् हेम जाल दंशित–आयस परिघों से तथा क्षेपणीय और मुद्गरों से पूर्ण–प्रास पाश और वितत मर संयुक्त कंटकों से शोभित–त्रास यानों, तोमरों और परश्वधों से शोभा सम्पन्न-सद्वष पुरुषों के कारण ही उदीयमान दूसरे मन्दर के ही समान वह रथ था । सहस्र स्वरों से संयुक्त वह उत्तम रथ था जिस पर उस दानव ने अध्यारोहण किया था 1६-१३। विरोचन तो भली भाँति क्रुद्ध होता हुअा अपने हाथ में गदा उठाकर उसकी सेना के सामने दीप्त ग्रहों वाले तचल के समान भव स्थित होगया था ।१४।।

 

युक्तं रथसहस्रण हयग्रीवस्तु दानवः ।। स्यन्दनं वाहयामास सपत्नानीकमर्दनः १५ व्यायतं किष्कुसाहस्र धनुविस्फारयन्महत् बाराहः प्रमुखे तस्थौ सप्ररोह इवाचलः १६ खरस्तु विक्षरन्दर्पान्नेत्राभ्यां रोषजं जलम् स्फुरदृदन्तोष्ठनयनं संग्रामं सोऽम्यकाङ क्षत १७ त्वष्टा त्वष्टगजं घोरं यानमास्थाय दानवः ।। व्यूहितु दानवव्यूहं परिचक्राम वीर्यवान् १८ विप्रचित्तिवपुश्चैव श्वेतकुण्डलभूषणः श्वेतः श्वेतप्रतीकाशो युद्धस्याभिमुखे स्थितः १६

अरिष्ठोबलिपुत्रश्च वरिष्ठादिशिलायुधः युद्धायाभिमुखस्तस्थौ धराधरविकम्पनः ।२० किशोरस्त्वभिसंघर्षात् किशोर इति चोदितः ।। सबला दानवाश्चैव सन्नह्यन्ते यथाक्रमम् ।२१

शत्रुओं की सेना का मर्दन करने वाले हयग्रीव नाम वाले दानव ने एक सहस्र रथों से युक्त अपने स्यन्दन (रथ) को बाहित किया था ।१५। एक सहस्र किकुओं से समन्वित–व्यायत महान् धनुष को बिस्फारित करता हुआ वाराह संमुख में प्ररोह से संयुक्त एक अचलकी भाँति समवस्थित हो गया था ।१६। खर नामधारी दानव घमन्ड से अपने नेत्रों के द्वारा रोष से समुत्पन्न जल को विक्षरित कर रहा था और वह भी जिसके दाँत–ोष्ट और नेत्र फड़क रहे थे संग्राम करने का आकांक्षा कर रहा था । १७॥ त्वष्टा नामवाला दानब आठ हाथियों वाले परम घोर थान में समास्थित होकर वीर्य वाला वह दानवों के व्युह की भली भाँति व्यहित करने के लिए चारों ओर घूम रहा था ।१८। श्वेत वण के कुण्डलों से विभूषित विप्रचित वपु वाला श्वेत प्रती काश श्वेत युद्ध करने के लिए अभिमुख में ममवस्थित होगया था ।१६ बड़े बड़े पर्बतोको भी कम्पित कर देने वाला-वरिष्ठ पर्वत की शिखाओं के आयुधों से समन्वित होकर अरिष्ठ और वलि का पुत्र संग्राम करने के लिए सामने स्थित हो गया था ।२०। अभिसंघर्ष से किशोर और किशोर इसी नाम से प्रेरित होने वाला था। इस प्रकार से अपने अपने बलों के सहित दानव जाण यथा क्रम युद्ध के लिए सन्नद्ध हो रहे थे ।२१। ।

अभवद्द त्यसैन्यस्य मध्ये रविरिवोदितः लम्बस्तु नवमेघाभः प्रलम्बावरभूषणः ।२२ दैत्यव्यूहगतो भाति सनीहार इवांशुमान् स्वर्भानुरास्ययोधी तु दशनौष्ठेक्षणायुधः ॥२३ हुसंस्तिष्ठति दैत्यानां प्रमुखे महाग्रहः अन्ये हयगतास्तत्र गजस्कन्धगताः परे ।२४ ।। सिव्याघ्रगतश्चान्ये वराहक्षेषु चापरे ।।।

मत्स्य पुराण केचित् खरोष्ट्रयातारः केचिच्छ्वापदवाहनाः ।२५ पतिनस्त्वपरे दैत्या भीषणा विकृताननाः ।। एकपादाद्ध पादाश्च ननृतुर्यद्धकाङक्षिणः ।२६ आस्फोटयन्तो वसवः क्ष्वेडन्तश्च तथापरे हृष्टशार्दूलनिघष नेदुदनिवपुङ्गवाः ।२७ | ते गदापरिषैः शिलामुसलपाणयः ।।

बाहुभिः परिघाकारैस्तर्जयन्तिस्म देवताः ।२८

 

दैत्यों की सेना के मध्य में प्रनम्ब अम्बर और भूषणों से संयुत नूतन मेघ की आभा के तुल्य आभा वाला लम्ब नाम बाला दैत्यसूर्यके समान उदित हो गया था ।२२। दैत्यों के व्यूह में प्राप्त होने वाला आस्मयोधी-दाँत ओष्ठ, नेत्र और आयुधौं वाला स्वर्भानुनी हारसे युक्त अशुमान् के समान शोभित हो रहा था ।२३। वह महान् ग्रह दैत्यों के समक्ष में हँसता हुआ स्थित था । वहाँ पर अन्य हृयोंपर स्थित थे और | दूसरे गजों के स्कन्धों पर समवस्थित थे ।२४। कुल सिहों तथा व्याघ्रों पर सवार थे और दूसरे वराह एवं ऋओं पर अधिरूढ़ थे । कुछ लोग | खरों तथा उष्ट्रों के द्वारा गमम करने वाले और कुछ श्वपादों के वाहनों वाले थे ।२५। अन्य सेनापति दैत्य परम भीषण और विकृत मुखौं याले थे। कुछ एक पैर बालै कोई आधे पैरों वाले थे जो युद्ध करने की इच्छा से युक्त होकर नृत्य कर रहे थे ।२६। बहुत से आस्फोटन कर रहे थे-दूसरे वेड़न करने वाले थे । प्रसन्न शार्दूल के समान गर्जन की ध्वनि करने वाले दानव श्रेष्ठ निर्दोष कर रहे थे ।२७। वे | सब शिलाए और भूसल हाथों में लिए हुए अत्यन्त उग्रगदा और परिधों के द्वारा तथा परिधों के आकार वाले बाहुओं के द्वारा देवगणों की तर्जनाए (फटकारे) दे रहे थे ।२६।

पाशैः प्रासैश्च परिघे स्तोमरांकुशपट्टिशैः । । चिक्रीडुस्ते शतघ्नीभिः शतधारैश्च मुदगरैः ॥२६॥

६५ गण्डशैलैश्च शैलेश्च परिघुश्चोत्तमायसः । शक्रश्च दैत्यप्रवराश्चक्र रानन्दितं बलम् ॥३० ॥ एतद्दानवसैन्यं तत्सर्व युद्धमदोत्कटम् । देवानभिमुखे तस्थौ मेघानीकमिवोद्धतम् ॥३१ तदभुतं दैत्यसहस्रगाढं वाय्वग्निशैलाम्बुदतोयकल्पम् ।। बल रणौघाभ्युदयेऽभ्युदणं युयुत्सयोन्मत्तमिवावभासे ।३२ दानव गणों पाशों-प्राशों परिधो-तोमर-अकुश और | पटिशों—-शतध्नीशितधार और मुद्गरों से क्रीड़ा कर रहे थे ।२६। वे दैत्यों में प्रवर मण्डशैलों-शैल-उत्तम अयिस वाले परिघों और चङ्गों के द्वारा अपने वल को आनन्द से युक्त बना रहे थे ।३०। युद्ध करने के मद में अत्यन्त उत्कट यह सम्पूर्ण दानवों की सेना उद्धत मेघों की अनीक के समान देवों के अभिमुख में स्थित थी ।३१। वह अति अदभुत-सहस्रों दैत्यों से अत्यन्त गहन-चायु अग्नि, शैल और अम्बुद सोय के तुल्य दानवों का बल (सेना) रथों के समूह के अभ्युदय में अभ्युदीर्ण युद्ध करने की इच्छा से उन्मत्त के समान अवभासित हो रहा था ३२।

६७सुरसैन्य विस्तार वर्णन 1 – श्रुतस्ते दैत्यसैन्यस्य विस्तरो रविनन्दन ! ।।

सुराणामपि सैन्यस्य विस्तरं वैष्णवं शृणु ।१ आदित्या वसवोरुद्रा अश्विनौ महाबलौ। सबलाः सानुगाश्चैव सन्नह्यन्त यथाक्रमम्

२३ – – पुरुतस्तु पुरतो लोकपालाः सहस्त्रदृक् ।। ।। ग्रामणीः सर्बदेवानामारुह्येसुरुद्धिषम् ।।३। मत्स्य पुराण मध्ये चास्य रथः सर्वपक्षिप्रवररंहसः सुचारुचक्रचरणौ हेमबज्रपरिष्कृतः ।४ देवगन्धर्वंयक्षौघेरनुयातः सहस्रशः दीप्तिमभिः सदस्यैश्च ब्रह्मर्षिभिरभिष्टुतः 1५। वज्रविस्फूजितोद्भुतैविद्युदिन्द्रायुधादितैः युक्तो बलाङ्कगणैः पर्वतरिव कामगैः ।६ यमारूढ़: से भगवान् पर्येति सकलं जगत् ।। हविर्धानेषु गायन्ति विप्रा मखमुखे स्थिताः ॥७॥

श्री मत्स्य भगवान् ने कहा-हे रविनन्दन ! तुमने दैत्यों की सेना। के विस्तार का वर्णन श्रवण गत कर लिया है। अब सुरगणों की सेना का भी बैंडणव विस्तार श्रवण करलो । द्वादश आदित्य–आठ वसुगण एकादश रुद्र-महान् बल सम्पन्न अश्विनीकुमार ये सब बलों और अनु गामियों के सहित क्रम के अनुसार ही सन्नद्ध हो गये थे ।१-२। समझ में सहस्र नेत्र वाले इन्द्रदेव-समस्त लोकपाल-सब देव की ग्रामणी सुरों के शत्रु पर समारोहण करने वाले हो गये थे ।३। मध्य में समस्त पक्षियों में श्रेष्ठ (गरुड़) के वैग वाले इनका सुचारु (सुन्दर चक्र) चरण वाला हेम और वज्र से परिष्कृत रथ था ।४। उस रथ के पीछे सहस्रों देव-गन्धर्व और पक्षों समुदाय अनुगमन करने वाले थे तथा वे दीप्ति मान सदस्यों के द्वारा और ब्रह्मर्षियों के द्वारा अभिष्ट्रत हो रहे थे ५। वज्र के तुल्य विस्फूजित एवं अद्भुत–विद्युत और इन्द्रायुधों से समुदित स्वेच्छया गमन करने वाले पर्वत के समान बलाहकों के गणी से युक्त थे ।६। जिस रथ पर वह भगवान् समारूढ़ थे वह रथ समस्त जगत में परिगमन करता था और यज्ञशालाओं में समवस्थित विप्रगण विनों में गायन किया करते थे ।७। स्वर्गे शक्रानुयातेषु देवतूर्यनिनादिषु

सुन्दर्यः परिनृत्यन्ति शतशोऽप्सरसाङ्गणे ।६।।

मत्स्य पुराण तीन वृत्तियाँ होती हैं । हम जो बनाश्रम निवासी हैं उनकी यहीं वृत्ति परम ने हैं  

अभक्षा वायुभक्षाश्च दन्तोलुखलिनस्तथा। अश्मकुट्टा दश तथा पञ्चातपसहाश्च ते ।३५ एले तपसि तिष्ठन्ति व्रतैरपि सुदुष्करैः ।। ब्रह्मचर्य पुरस्कृत्य प्रार्थयन्ति पराङ्गतिम् । ३६ ब्रह्मचर्या ब्राह्मणस्य ब्राह्मणत्वं विधीयते । एवमाहुः परे लोके ब्रह्मचर्यविदोजनाः ॥३७ ब्रह्मचर्य स्थितं धैर्य ब्रह्मचर्ये स्थितं तपः । ये स्थिता ब्रह्मचर्येषु ब्रह्मणा दिवि संस्थिता । ३८ नास्ति योगं विना सिद्धिर्न वा सिद्धि विना यशः ।। नास्ति लोके यशोः मूलं ब्रह्मचर्यात् परन्तपः । ३६० । यो निगृह्येन्द्रियग्रामं भूतग्रामं च पञ्चकम् ।। ब्रह्मचर्य समाधत्त किमतः परमं तपः ।।४० । अयोगे के शधरणमसङ्कल्पव्रतक्रिया ।। | अब्रह्मचर्ये चर्या च त्रयं स्याद् दम्भसंज्ञकम् ॥४१ । क्च दाराः क्व च संयोगः क्व च भावविपर्ययः । ।

नन्वियं ब्रह्मणा सृष्टा मनसा मानसी प्रज्ञा ४२ ।

जल के भक्षण करने वाले–वायु के भक्षण करने वाले तथा दन्तो | लूखली–दश चश्म कुट्ट और जो पाँच अतपों के सहन करने वाले हैं |ये तप में स्थित रहा करते हैं और जो परम दुष्कर व्रत के द्वारा ब्रह्मचर्य का पूर्ण परिपालन करके पगति की प्रार्थना किया करते हैं ।३५-३६। परलोक में भी ब्रह्मचर्य के महान् महत्व के ज्ञाता लोग इसी | प्रकार से कहा करते हैं कि ब्रह्मचर्य से ही ब्राह्मण का ब्राह्मणत्व स्थित रहा करता है । ३७। इस अहात्र में ही मैं की स्थिति रहा करती है  अौर इस ब्रह्मचर्य से ही तप स्थित रहता हैं । जो ब्राह्मण अपने पूर्ण  [ ८१ ब्रह्मचर्य व्रत में टिके हुए हैं वे दिवलोक में संस्थिति रक्खा करते हैं । 1३६। योग के बिना कोई भी सिद्धि नहीं हुआ करती है और जब कोई सिद्धि नहीं होती है यश भी लोक में नहीं हुआ करती हैं तथा लोक में यश का मूल नहीं है और ब्रह्मचर्य से अधिक कोई भी तय नहीं होता हैं । ३६ । जो कोई भी पुरुष अपनी इन्द्रियों के समूह को पाँचों भूत . ग्रामों को निग्रहीत करके ब्रह्मचर्य व्रत का पूर्ण पालन किया करता है फिर इससे अधिक अन्य क्या तप हो सकता हैं। यहीं सबसे परमश्र इट – तम होता है ।४। अयोग में केशों का धारण करना—बिना ही किसी – सङ्कल्प के व्रतों की क्रिया का सम्पादन करना और अब्रह्मचर्य ने अपनी

चर्या रखना ये तीनों कर्म दम्भ की संज्ञा वाले ही कहे गये हैं 1४१। – कहाँ तो दारों का संयोग हुआथा और कहाँ भावों का विपर्यभ ही हुआ | था अर्थात् दारा-संयोग और भावों की विपरीततो ये तीनों ही बातों :- का विल्कुन अभाव था तो भी अह्मा के द्वारा मन से ही इस मानसी || प्रजा का सृजनं किया गया था ।४२।

 

यद्यस्ति तपसो वीर्य युष्माकं विदितात्मनाम् ।। सृजध्वं मानसान् पुत्रान् प्राजापत्येन कर्मणा ।४३

मनसा निमिता योनिराधातव्या तपस्विभिः दारयोगो बीजं वा व्रतमुक्तं तपस्विनाम् ।४४ यदिदं लुप्तधर्मार्थ युष्माभिरि निर्भयैः व्याहृतं सद्भिरित्यर्थमसद्भिरिव मे मतम् ।४५ वपुर्दीस्तान्तरात्मानमेतत् कृत्वा मनोमयम् दारयोग विनां स्रक्ष्यै पुत्रमात्मतनूरुहम् ४६एवमात्मानमात्मा में द्वितीयं जनयिष्यति वन्येनानेन विधिना दिधिक्षन्तमिव प्रजाः ।४७

और्वस्तु तपसाविष्टो निवेश्योरु हुताशने भमन्यैकेन दर्भण सुतस्तं प्रभवारिम् ।४८ को तस्योरु सहसा भित्वा ज्वालामाली क्लनिन्धनः ४६

[ मत्स्य पुराण यदि आत्मा के ज्ञान को जानने वाले आप लोगों में कुछ भी तप का वीर्य विद्यमान हैं तो आप प्राजापत्य कर्म के द्वारा मानस पुत्रों का सुजन करिए ।४३। मनके द्वारा हीं निर्मित की हुई योनि ही तपस्वियों को आधान करनी चाहिए । दार। के साथ योग करना तथा बीज का प्रयोग करना तपस्वियों का ब्रत नहीं बताया गया है ।४४। यहाँ पर आप लोगों ने जो भी निर्भय होकर इस लुप्त धर्म और अर्थं से युक्त वचन को कह डाला है। यद्यपि आप लोक सत्पुरुष हैं जिन्होंने इसको यहाँ पर प्रतिपादन किया है तो भी वह मुझको असत्पुरुष के कथन के समान ही प्रतीत होता है मैं इस दीप्त अन्तरात्मा वाले बयु को मनो मय करके दास के योग के बिना भी आम तनहू पुत्र का सृजन । करूगा । इसी प्रकार से यह मेरी आत्माको जन्म ग्रहण करायेगी और इसी अन्य विधि के द्वारा प्रजा की भाँति ही जलाने वाली हो जायेगी। उस और्व ने तप से समाविष्ट होकर अपने उरुको हुताशन में निवेशित कर लिया था और एक धर्म में उनकी दर्भारणि का मंथन किया था। ४५-४६। उसके अरु का सहसा भेदन करके बिना ही ई धन वाला ज्वालामाली और इस जगत् को अन्त कर देने की आकांक्षा वाला अग्नि पुत्र समुत्पन्न हुआ था ।४६। ।।

ऊर्वस्योरु विनिभिद्यौर्चा नामान्तकोऽनलः दिधक्षन्निव लोकांस्त्रीजषेपरमकोपनः ॥५० उत्पन्नमात्रश्चोवाच पितरं श्लक्ष्णया गिरी क्षुधा में बाधते तात ! जगद्भक्ष्ये त्यजस्वमाम् ।५१ त्रिदिवारोहिभिज्वलज़म्भमाणो दिशो दश निर्दयन् सर्वभूतानि ववृधे सोऽन्तकोऽनलः ।५२।। एतस्मिन्नंतरे ब्रह्मा मुनिमूर्व सभाजयन् उवाच वार्यतां पुत्रो जगतश्च दयांकुरु ॥५३ : अस्यापत्यस्य ते विप्र ! करिष्ये स्थानमुत्तमम् तथ्यमेतद्वचः पुत्र ! शृणु त्वं वदताम्बरः ॥५४, धन्यऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मेऽद्य भगवांच्छिशोः मतिमेतां ददातह परमानुग्रहायवे ५५ प्रभातकाले संप्राप्ते काङक्षितव्ये समागमे भगवन् ! तपितः पुत्रः कैव्यैः प्राप्स्यते सुखम् ॥५६ कुत्र चास्य निवासः स्याभोजनं वा किमात्मकम् विधास्यतीह भगवान् वीर्यतुल्यं महौजसः !”

उस उर्व की ऊर का विनिर्भेदन करने और्वाण अन्त कर देने वाला परम कोष से समन्वित तीनों ले करती हुआ समुत्पन्न हुआ था। उत्पन्न होने के ही विनम्र वाणी में अपने पिता से प्रार्थना की थी कि हैन इ करूगा आप मुझे अपनी क्षुधा के निवारण करने के लिए छुट् ईजिए ।५०-५१। त्रिदिव में समारोहण करने वाली ज्वालाओं से देश दिशा में ज़म्भाण होता हुआ समस्त भूतों को दया से रहित होकर दलित करता हुआ गया था। इसी बीच में वह अन्तक अनल वृद्धि को प्राप्त हो गया था ब्रह्मा ने ऊबै मुनि का संभाजन करते हुए उससे कहा था कि हे पुत्र ! इसका धारण करो तथा इस जगत् पर दया करो । ५४-५४। है विप्न ! मैं आपकी इस सन्तति को समुचित स्थान स्थिर कर दूगी । हे पुत्र ! बोलने वालों में परम श्रेष्ठ आप मेरे अतीव तथ्य वचन का श्रवण करो।५४। ऊवं ने कहा-मैं परम धन्य और अतीव अनुगृहीत हैं कि आज भगवान आपने इस समय में इस शिशु को ऐसी बुद्धि मुझ पर परम अनुग्रह करने के लिए प्रदान की है। प्रभात काल के सम्प्राप्त होने पर आपका समागम अकांक्षणीय हैं। है भग वन् ! यह बतलाइए कि किन इयों से तर्पत हुआ मेरा पुत्र सुख प्राप्त करेगा। इसका निवास स्थल कहाँ पर होगा और इसके भोजन का स्वरूप होगा? भगवान आप इस महान् ओज वाले के वीर्य के तुल्य हीं इन बातों की व्यवस्था कर देंगे ।४५-५७।। ।

वडवामुखेऽस्य वसतिः समुद्र में भविष्यति । मम योनिर्जलं विप्र ! तस्य पीतवतः सुखम् 1५८ ।। यत्राहमास नियतं पिबनु वारिमयं हविः ।। तद्धविस्तव पुत्रस्य विसृजाम्यालयञ्च तत् ।५६ ततो युगान्ते भूतनामेष चाहञ्च पुत्रक ! सहित विचरिष्यावो निष्पुत्राणामृणापहः १६० एषोऽग्निरन्तकाले ते सलिलाशी मया कृत। दहनः सर्वभूतानां सदेवासुररक्षसाम् ॥६१ एवमस्त्वितितं सोऽग्निः संवृतज्वालमण्डलः । । | : प्रविवेशार्णबमुखं प्रक्षिप्य पितरिप्रभाम् ।६२

प्रतियातस्ततो ब्रह्मा ये च सर्वे महर्षयः । ऊस्याग्ने: प्रभां ज्ञात्वा स्वां स्वाञ्चतिमुपाश्रिताः ।६३। श्री ब्रह्माजी ने कहा-समुद्र में वड़बा के मुख में इसका निवास स्थल होगा । हे प्रिय ! मौरी उत्पत्ति की योनि जल पीने वाले इसको सुखकर होगी और जहाँ पर हैं वहीं पर नियत रूप से वारिमय विका पान करेगा तथा वह हवि आपके पुत्र के निमित्त लय काल पर्यन्त विसजित कर देता हैं ।५६-५६। इसके पश्चात हे पुत्र ! भूतों के युग के अन्त में यह अापका पुत्र और मैं दोनों एक साथ से मिलकर निष्पुत्री के ऋण का अपहरण करने वाले विचरण करेंगे । इस अग्नि को अन्त काल में मैंने सलिल का अशन करने वाला कर लिया है जो समस्तभूतीं का तथा देव-असुर और राक्षसों का दमन करने वाला होगा। ऐसा ही होवे यह कहकर वह अग्नि संवृत ज्वालाकों के मण्डल वाला अपने पिता ऊर्व में प्रभा को प्रक्षित करके अर्णव के मुख में प्रवेश कर गया था । इसके अनन्तर ब्रह्माजीं तथा सुब महषिगण प्रतिमान कर गयेथे ।

६५ ऊर्व की अग्नि की प्रभा को जानकर सब अपनी गति का उपाश्रय कर गये थे । ६४-६३। …

हिरण्यकशिपुदृष्ट्वा तदा तन्मदभुतम् उच्चैः प्रणतसर्वाङ्गो वाक्यमेतदुवाच ६४. .. भगवन्नद्भुतमिदं संवृत्त लोकसाक्षिकम् .…., तपसा ते मुनिश्रष्ट ! परितुष्टः पितामहः ॥६५ अन्तु तव पुत्रस्य तव चैव महाव्रत ! भृत्य इत्यवगन्तव्यः साध्यो यदिह कर्मणा ।६६ तन्मा पश्य समापन्नं तवाराधने तम् यदि सोदे मुनिश्रष्ठ ! तवैव स्यात् पराजयः ६७ धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्यतेऽहं गुरुः स्थितः नास्तिमे तपसानेन भयमद्य हसुव्रत ! ।६८ तामेव मायां गृणोष्व मम पुत्रेण निमिताम् निरिन्धनामग्निमयीन्दुर्घष पावकैरपि ।६९ : एषा ते स्वंस्य वंशस्य वशगारिविनिग्रहे 1 / 1 संरक्षयात्मपक्षच विपक्षञ्च प्रधर्षति ।।७ ।।१।

उसी समय में उसे महान् अद्भुत को हिरण्य कशिपु देखकर उच्च भाब से सब अङ्गों को प्रगत करने वा । होकर यह वाक्य बोला था 1६४। हे मुनिश्न ड्ठ ! यह लोक का साक्षिक अद्भुत हो गया है। हे भगवन् ! अापकी तपश्चर्या से पितामह भी परितुष्ट हो गये हैं । ६५॥ हे महाङ्गत ! मैं तो आपके पुत्र का और आपको भृत्व ही हैं—ऐसा ही अवगमन कर लीजिए जो कि यहाँ पर कर्म के द्वारा साधना के योग्य है । इसलिए उस मुझको आपके ही समाराधन में समापन ही देखिये । हे मुनिश्रेष्ठ! यदि मैं आपको अनुगामी सेवक होकर भी दुःखित रहता हैं तो यह आपका ही पराजय होगा । उर्व ने कहा- मैं परम धन्य हैं। और परम अनुगृहीत हैं कि जिस तुझको मैं गुरु संमवस्थित हो गया हैं।

मत्स्य पुराण हे सुव्रत ! आज यहाँ पर मेरे इस तप से कोई भी भय नहीं है। मेरे पुत्र के द्वारा निर्मित उसी माया को ग्रहण करो जो बिना ईधन वाली पावकों द्वारा मी दुर्घष और अग्निमयी हैं। यह तेरे अपने वश में गमन करने वाले अरियों के विशेष निग्रह में अपने पक्ष की रक्षा करेगी और विपक्ष को प्रदर्षित करेगी

एवमस्त्विति तां गृह्य प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् ।। जगाम त्रिदिवं हृष्टः कृतार्थो दानवेश्वरः ७१ एषा दुविषहा माया देवैरपि दुरासदा।

और्वेण निर्मिती पूर्व पावकेनोर्वसूनुना [७२। तस्मिस्तु व्युत्थिते दैत्ये निर्वीर्येषा संशयः ।। शापोह्यस्याः पुरा दत्तो सृष्टायेनैवतेजसा I७३, यद्य षा प्रतिहन्तब्य कर्त्तव्यो भगवान् सुखी दीयतां मे सखा शक्र ! तोययोनिनिशाकरः ॥७४ तेनार्दू सह सङ्गम्य यादोभिश्च समावृतः ।। मायामेतां हनिष्यामि त्वत्प्रसादान्नसंशयः ॥७५

ऐसाही होगा-ऐसा कहकर उसको ग्रहण किया था और फिर उस श्रेष्ठ मुनिको प्रणाम करके दानवेश्वर प्रसन्न एवं कृतार्थहोकर त्रिदिवे को चला गया था ।७१। यह माया दुविषय हैं और देवगणों के द्वारा भी गुरासद हैं । इसको उर्ब के पुत्र पावक और्व के द्वारा पूर्व में निर्माण किया गया था ॥७२। उस दैत्व के ब्यत्थित होने पर यह निर्वीर्य हो जाया करती है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। जिस-जिस तेज के द्वारा इसका सृजन किया गया था उसके द्वारा पहिले इसको शाप भी दिया गया है। यदि यह माया प्रतिहनन के योग्य करनी है तो भगवान को सुख से सम्पन्न एवं प्रसन्न करना चाहिए । है इन्द्रदेव ! अतएव तौयक्रौं यौनि निशाकर मेरा सखा दे दो ।७३-७४। उसके साथ मैं संगत होकर और वादव गणों से समवृत होकर आपकी कृपा एवं प्रसाद से उस माया का मैं हुनन कर दूगा—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है ।७५॥

देवासुर संग्राम वर्णन () एवमस्त्विति संहृष्टः शक्रस्त्रिदशवर्धनः सन्दिदेशाग्रतः सोमं युद्धाय शिशिरायुधम् ।१ ।।गच्छ सोम ! सहायं त्वं कुरु पाशधरस्य वै ।। असुराणां विनाशाय जयार्थञ्चदिवौकसाम् ।२ ।। त्वं मत्तः प्रतिवीर्यश्च ज्योतिषश्चेश्वरेश्वरः त्वमयं सर्वलोकेषु रसं रसविदो विदुः ।३ ।। क्षयवृद्धी तव व्यक्ते सागरस्येव मण्डले ।। परिवर्त्तस्यहोरात्र कालं जगति योजयन् ।४ लोकचछायामयः लक्ष्म तवाङ्कः शशसन्निभः विदः सोमदेवोपि ये नक्षत्रयोनयः त्वमादित्यपथादू ज्योतिषां चोपरि स्थितः तमः प्रोत्साये सहसा भासयस्यखिलं जगत् ।६ ।। अधिकृत्कालयोगात्मा इष्टोयज्ञस्यसोऽव्ययः औषधीशः क्रियायोनिरब्जयोनिरनुष्णभाः ॥७

श्री मत्स्य भगवान ने कहा- ऐसा ही होवेगा—यह कहकर परम प्रषित और देवों की वृद्धि करने वाले इन्द्र ने सौम के समक्ष में युद्ध करने के लिए शिशिर आयुद्ध के प्रयुक्त करने का सन्देश दे दिया था और सोम से उसने कहा था कि हे सोम ! तुम तुरन्त ही चले आओ और पाशधारी वरुण देव की युद्ध में सहायता करो यह इस प्रकार से तुम्हारा इस समय में वरुणका सहायक होना असुरों के विनाश के लिए

मत्स्य पुराण तथा देवगणों की विजय प्राप्त करने के लिए ही होगा ।१-३॥ हे सोम! आप मत्त हैं और गुकाबले के प्रतिवीर्य विक्रम वाले हैं तथा आप समस्त ज्योतियों के ईश्वरों के भी ईश्वर हैं। रसों के वेत्ता लोग सब लोकों में अप से परिपूर्ण रस को भली भाँति कहा करते एवं जानते हैं ।३।। मण्डल में सागर की ही भाँति आपकी क्षीणता तथा बुद्धि स्पष्ट हैं और जगत् में अहोरात्र के काल को योजित करते हुए आप परिर्वातत हुआ करते हैं । आपका यह शश के प्तदृश जो अङ्क के चिन्ह हैं यह लोकों की इच्छा से ही परिपूर्ण हैं और इसको नक्षत्रों की योनि वाले जों देवगण भी हैं वे भी हे सोम ! नहीं जानते हैं । ४.५। आप आदित्य के पथ से भी ऊपर सब ज्योतियों के उध्र्वभाग में समवस्थित हैं । अप सहसा इस तम को प्रोत्साहित करके सम्पूर्ण जगत् को अपने सुन्दर प्रकाश से भासित कर दिया करते हैं । ६। आप अधिकृत कालयोग के स्वरूप वाले–यज्ञ के अभीष्ट और अविनाशी हैं। आप औषधियों के स्वामी-सब क्रियाओं की योनि अब्ज योनि और शीतल दीप्ति से सम न्वित हैं ।।

शीतांशमृताधारश्चपलः श्वेतवाहनः त्वं कान्तिः कान्तिवपुषात्वं सोमःसोमपायिनाम् सौम्यस्त्वं सर्वभूतानां तिमिरघ्नस्त्वमृक्षराट् तद्गच्छु त्वं महासेन ! वरुणेन वरूथिना ।। शमयत्वासुरीं मायां यया दह्याम संयुगे ।६। यन्मा वदसि युद्धार्थ देवराज ! वरप्रद ! एवं वर्षामि शिशिन्दैत्यमायापकर्षणम् १० एतान् मच्छीतनिर्दग्धान् पश्य स्वहितमवेष्टितान् विमायान् विमदांश्चैव दैत्यसिंहान्महाहवे ।११ तेषां हिमकरोत् सृष्टाः सपाशा हिमवृष्टयः वेष्ट्यन्तिस्म तान् घोरान्दैत्यामेघगणाइव १२ ८६; तौ पाशशीतांशुधौ वरुणेन्दु महाबलौ जघ्नतुहिमपातैश्च पाशपातैश्च दानवान् ।१३। द्वाबम्बुनाथ समरे तौ पाशहिमयोधिन १८ १५ मृधं चेरतुरम्भोभिः क्षुब्धाविव महार्णवौ ।१४ ।।

हे सोम ! आप शीतल किरणों वाले—-अमृत के आधार-चपल श्वेत वाहून हैं । आप इसे अपने कान्तिपूर्ण शरीर के द्वारा स्वयं ही कान्ति हैं और सोम के पान करने वालों के लिए साक्षात् सोम स्वरूप वाले हैं। आप समस्त भूतों के लिए परम सौम्य हैं तथा सब ऋक्षों के राजा और तिमि रके नाश करने वाले हैं। इसलिए हे महासेन ! बरूथी वरुण के साथ सहायता करने के लिए अप शीघ्र ही चले जाइए तथा जिससे हम सब युद्ध में दग्ध हुए जा रहे हैं उस इस आसुरी माया का शमन कीजिए 1८-६। इन्द्रदेव के इस प्रकार से प्रार्थना करने पर सोम.. ने कहा-हे देवराज ! हे वर प्रदान करने वाले देव ! जो अप युद्ध करने के लिए मुझे कह रहे हैं। मैं अभी दैत्यों की माया के आकर्षण करने वाले शिशिर वो बर्षा करता हैं । आप इन सबको मेरे हिम से संवेष्टित और मेरे शीत से निर्दग्ध देखिए। इस महायुद्ध में इन सब ३त्य सिहों को मद और माया से रहित हुए ही आप देखेंगे ।१०-११।। उनको हिमकिरणों से समुत्सृष्ट पाशों के सहित हिम की वृष्टियों में घोर दैत्यों को मेध गणों की ही भाँति वेष्टित कर दिया था ।१२।। महान् बलवान पशि और शीतल किरणों को धारण करवे बाले वरुण और चन्द्र दोनों ने उन दानवों का हिम के पातों तथा पाशों के पतोके, कानन कर दिया था ।१३। वे दोनों अम्बुके स्वामी–पाश और हिम से युद्ध करने वाले उस महान घोर रण में जलों से क्षुब्ध दो महार्णवों की भंति ही विचरण कर रहे थे ।१४।

ताभ्यामाप्नोबिलं सैन्यं तदानमदृश्यत जगत् संवर्तकम्भिोदैः प्रविष्टैरिवसंवृतम् ।१५ ।।

 मत्स्य पुराण तीवुद्यताम्बुनाथौ तु शशांकवरुणाबुभौं   शमयामासतुर्माया देवौ दैत्येन्द्रनिमिताम् ।१६।। शीतांशुजालनिर्दधाः पाशैश्च स्पन्दिता रणे शेकूचलितु दैत्या विशिरस्का इवाद्यः ।१७ ।। शीतांशुनिहतास्ते ते दैत्यास्तोयहिमादिताः ।। हिमाप्लावितसर्वाङ्गी निरूष्माण इवग्नियः ।१८ तेषान्तु दिवि दैत्यानां विपरीतप्रभाणि वै विमानानि विचित्राणि प्रपतन्त्युत्पतन्तिच ।१६। | तान् पाशहस्तग्रथितांश्छादितांश्योतशिमभिः

मयोददर्शमायावी दानवादिविदानवः ।२०

उन दिनों में प्लावित दानवों को सेना उस समय में दिखलाई नहीं दे रही थी और यह सम्पूर्ण जगत् प्रविष्ट हुए सम्वत्त क अम्भोदों के द्वारा स वृत की तरह ही हो गया था ।१५। उन समुद्यत हुए शशांक और वरुण दोनों अम्बुनाथ ने देवों ने दैत्यों के द्वारा निर्माण की हुई उस माया का एकदम शमन कर दिया था। शीतांशुओं के जाल से निर्दग्ध हुए तथा पाशों से रणस्थल में स्पन्दित हुए सब दैत्यगण बिना शिर वाले पर्वतों के समान ही चलने में असमर्थ हो गए थे ।१६-१७॥ शीत किरणों से निहत हुए तथा जल और हिम से अदित तथा हिम से प्लावित समस्त अङ्गों वाले सब दैन्यगण विना ऊष्मा (ताप) वाली अग्नियों के ही तुल्य हो गये थे ।१८। दिवलोक में उन दैत्यों के विष रीत प्रभावाने विचित्र विमान ऊपर उड़ते थे और नीचे भूमि पर गिर | जाया करते थे। उस समय में दिवलोक में मायावी दानव मय ने उन सब दानवों को पाशहस्त ग्रथित और शीत रश्मियों से समाच्छादित देखा था । १६-२०।।

शिलाजालविततां खङ्गचर्माट्टहासिनीम् ।।१।। पादपोत्कटकूटा कन्दराकीर्णकाननाम् ।२१।।

 ६१ सिंहव्याघ्रगणाकोर्णा नददिभगंजयथः ।। ईहामृगगणाकीर्णा पवनाघृणित माम् ।२२।। ।। निमित स्वेन यत्नेन कूजितां दिवि कामगाम् प्रथितां पार्वती मायामसृजतसमन्ततः ।२३। सासिशब्दैः शिलावर्षेः सम्पतदिभश्च पादपैः ।। जघान देवसङ्धांश्च दानवांश्चप्यजीवयत् ।२४ नैशाकरी वारुणी मायेऽन्तर्दधतुस्ततः असिभिश्चायसगणैः किरन देवगणान् रणे ।२५।। साश्मयन्त्रायुधधना द्रमपर्वतसङ्कटा। अभवत् घोरसञ्चार्या पृथिवी पर्यतैरिव ।२६ अश्मना प्रहताः केचित् शिलाभिः शकलीकृताः ।। नानिरुद्धो दू_मगणैर्देवोऽदृश्यत कश्चनः ।२७ ।। तदपध्वस्तधनुषं भग्नप्रहरणविलम् ।। निष्प्रयत्नं सुरानीकं बर्जयित्वा गदाधरम् ।२८

उस समय में उस मय दानव ने शिला के जालों से वितत-खंग चर्मों के अट्टहास बाली–पादपों के उत्कट कूटों के अग्रभाग बाली कन्दराओं से समाकीर्ण, कानों से युक्त–सिंह एवं व्याघ्रों के गुणों से संकुल-चिंघाड़ते हुए गजों के यूथों से समन्वित-ईहामृग गणों से आकीर्ण पवन से घृणित दूमों वाली-दिवलोक में स्वेच्छया गमन करने वाली कूजित और अपने ही यत्न से निर्माण की हुई परम प्रथित पार्वती माया को चारों ओर सृजित कर दिया था। उसने असि के शब्दों से और सम्पात करने वाले पादपों से देवों के संघों का हनन कर दिया था तथा दानवों को जीवित कर दिया था। इस पार्वती माया में नै गाकरी और वारुणी दोनों मायाए अन्तहित हो गई थीं और देवगणों को असि तथा यस गणों से रण में तितर-बितर कर दिया था। ।२१-२५॥ अश्म यन्त्र और आयुधों से धन—द्रम और पर्वतों के संकट — ६२ ]

 

[ मत्स्य पुराण वाली वह माया पर्वतों से युक्त पृथिबी के समान अति घोर संचरण के योग्य हो गई थी ।२६। कुछ पाषणों से प्रत हुएथे और कुछ शिलाओं से खण्ड-२ कर दिये गये थे और इ.मगणों से अनिरुद्ध कोई भी देवता दिखाई नहीं दे रहा था। भगवान गदाधर को जप्त करके संपूर्ण सुरों की सेना अपध्वस्त धनुषो वाली भग्न प्रहरणों से अविल (मलिन) | और प्रयत्न रहित बन गई थी ।२७।

 

, हि युद्धगतः श्रीमानीशानोऽश्मव्यकम्पत ।। सहिष्णत्वाज्जगत्स्वामी चुक्रोधगदाधरः ।२९ कालज्ञः कालमेधाभः समीक्षन् कालमाहुवे देवासुरविमर्दन्तु द्रष्टुकामस्तदा हरिः ।३० ततो भगवता दृष्टौ रणे पावकमारुती चोदित विष्णुवाक्येन तौ मायामपकर्षताम् ।३१…. ताभ्याभुद्भ्रान्त वेगाभ्यां प्रवृद्धाभ्यां महाहवे . . दग्धा सा पार्वती माया भस्मीभूता ननाश हूँ ।३२ १ः सोऽनिलोऽनलसंयुक्तः सोऽनलश्चानिलाकुलः दैत्यसेनान्ददहतुयुगान्तेष्विवमूच्छितौ ।३३ वायुः प्रधावितस्तत्र पश्चादग्निस्तु मारुतम् ।। चेरतूदनवानीके क्रीड़न्तावनिलानलौ ३४ . = १५८

इन उस समय में युद्ध में गमन करने वाले श्रीमान् ईशान पाषाणों | से कम्पित हो गए थे किन्तु जगत् के स्वामी भगवान गदाधर ने सहि Kणता के गुण होने के कारण से क्रोध नहीं किया था। काल के ज्ञाता काल मेध के तुल्य आभा वाले हरि ने उस समय में उस युद्ध में कालको देखते हुए बह देवासुरों के विमर्द को देखनेकी कामना बाले हो गये थे। इसके उपरान्त भगवान ने उस रण में पावके और मारुत को देखा था और वे दोनों बिष्ण, के बाथसे प्रेरित होकर उस माया का अपकर्षण

६३ करने वाले हुए थे । उह महायुद्ध में उद्भ्रान्त वैगों वाले और प्रवृद्ध उन दोनों के द्वारा वह पार्वती माया दग्ध तथा भस्मीभूत होकर नष्ट होकर नष्ट हो गई थी ।२६-३२। वह अनिल (वायु) अनल (पावक) से संयुक्त और वह अग्नि बायु से समाकुल होकर इन दोनों ने युग के अन्त में मुछित होने के समान दैत्यों की सेना का दहन कर दिया था ।३३। वहाँ पर वायु प्रधावित हुआ था और पीछे से अग्नि वायु के अनुसार ही धातमान हुआ था । इस तरह से अनिल और अनन दोनों दानवों को सेना में क्रीड़ा करते हुए चरण करते थे ।३४। फा भस्मावयवभूतेषु प्रपतत्सुत्पतत्सु च ।नवानां विमानेषु निपतत्सु समन्ततः ।३५ | वातस्कन्धापविद्ध षु कृतकर्मणि पावके

मया वधे निवृत्त तु स्तूयमाने गदाधरे ३६ निष्प्रयत्नेषु दैत्येषु त्रैलोक्ये मुक्तबन्धने। संप्रहृष्टेषु देवेषु साधु साध्विति सर्वशः ३७ || जये दशशताक्षस्य दैत्यानाञ्च पराजये।। दिक्षु सर्वासु प्रवृत्त धर्मविस्तरे ।३८ , अपावृते चन्द्रमसि स्वस्थानस्ते दिवाकरे। प्रकृतिस्थेषु लोकेषु त्रिषु चारित्रबन्धुषु ।३९ यजमानेषु भूतेषु प्रशान्तेषु पाप्मसु अभिन्नवन्धने मृत्यौ हूयमाने हुताशने ।४० . यज्ञशोभिषु देवेषु स्वगर्थि दर्शयत्सु लोकपालेषु सर्वेषु दिक्षु संयानवतषु ।४१३८ भावे तपसि सिद्धानामभावे पापकर्मणाम् देवपक्षे प्रमुदिते दैत्यपक्षे विषीदति ।४२.

चारों ओर से दानवों के विमानों के नीचे गिर जाने पर उनके ऊपर उड़ कर भूमि पर. गिरने तथा भस्मीभूत अवयवों के होने पर एवं मत्स्य पुराण बात स्कन्ध से अपविद्ध हो जाने पर पावक के द्वारा किए हुए कर्म में मय का वध हो गया था और भगवान् गदाधर का स्तवन किया गया था ।३५-३६। जिस समय में मय दानव का वध हो गया था तो सभी दैत्य निष्प्रयत्न हो गए थे तथा त्रैलोक्य बन्धन से मुक्त हो गया था । सब देवगण अत्यन्त प्रसन्न हुए थे और सभी ओर ‘साधु-साधु अर्थात् अच्छा हुआ कि ध्वनियाँ होने लगी थी ।३७। इन्द्रदेव की जय होने पर और दैत्यों का पराजय हो जाने पर सब दिशाएं* विशुद्ध हो गई थीं एवं धर्म का विस्तार प्रवृत्त हो गया था ।३८) चन्द्रदेव अपावृप्त हो गये थे तथा दिबाकर अपने स्थान पर स्थित हो गये थे एव चरित्र के बन्धु तीनों लोक अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित हो गये थे ।३६। यज मानों में और भूतों में पाप प्रशान्त हो गये थे तथा अभिन्न बन्धन वाली मृत्यु अग्नि में हूयमान हो गया था । ४०।’ सब देवगण यज्ञों में शोभा प्राप्त करने लगे तथा स्वर्ग के अर्थ का प्रदर्शन करते थे । सभी लोकपाल अपनी-अपनी दिशाओं में यान से बर्तमान हो गये थे ।४।। उस समय में सिद्धों का तपश्चर्या में भाव स्थित हो गया था और जो पाप पूर्ण कर्म करने वाले थे उनकी अभाव में स्थिति थी । देवों का पक्ष परम प्रमुदित हो गया और दैत्यों का पक्ष एकदम विषाद से ग्रस्त | था ।४२।

त्रिपादविग्रहे धमें अधर्म पादविग्रहे। १८ ! अपावृत्त महाद्वारे वत्त माने सत्पथे ।४३ लोके प्रवृत्त धर्मेषु सुधर्मेष्वाश्रमेषु प्रजारक्षणयुक्तेषु भ्राजमानेषु राजसु ॥४४ प्रशान्तकल्मषे लोके शान्ते तमसि दानवे

अग्निमारुतयोस्तत्र वृत्त संग्रामकर्मणि ।४५ तन्मया विपुला लौकास्ताभ्यां तज्जयकृतक्रिया . पूर्वदेवभयं श्रुत्वा मारुताग्निकृतं महत् ।४६ . [ ६५

कालनेमीति विख्यातो दानवः प्रत्यदृश्यत भास्कराकारमुकुटः शिञ्जिताभरणांगदः ।४ बाहुभिस्तुलयन् व्योम क्षिपन् पभायां महीधरान् ईरयन्मुखनिश्वासै| ष्टियुक्तान् बलाहकान् ।४८

उस समय में तीन पादों वाला धर्म का निग्रह था और अधर्म केवल एक ही पावसे युक्त था। महाद्वार के अपावृत्त होने पर सब लोग सत्पथ में वर्तमान हो गये थे।४३। लोक अपने-अपने धर्मों और अश्रिमों में प्रवृत्त थे तथा सब नृपति गण अपनी प्रज्ञा की रक्षा कार्य में युक्त एवं ब्राजमान हो गये थे ।४४। सम्पूर्ण लोक प्रशान्त कल्मषों वाले थे एवं दानवीय तम भी एक दम शान्त हो गया था। वहीं पर अग्नि और मारुत का संग्राम जब हुआ था तभी यह सब हो गया था । बहुत से लोक तन्मय हो गये थे और उन दोनों में उनके विजय की करने वाली क्रिया भी हुई थी । मारुत और अग्नि के द्वारा किये हुए महान् पूर्व देवों का भय श्रवण करके परम विख्यात कालनेमि नाम बाला दानवे वहाँ पर दिखलाई दिया था जिसका भास्कर के आकार के सदृश मुकुट था और वह शिजित आभरणों एवं अङ्गदों वाला था । वह कालनेमि वपनी बाहुओं से व्योम तोलन करने लगा और पैरों से बड़े-बड़े मही धरों को भी क्षिप्त करता था। वह वृष्टि से युक्त बलाहकों को मुख के निश्वासों के द्वारा प्रेरित करता था ।४५-४६।।

तिर्यगायतरक्ताक्षं मन्दरोदग्रवर्चसम् ।। दिधक्षन्तमिवायान्तं सर्वान् देवगणान् मृधे ।४६ तर्जयन्तं सुरगणांश्छादयन्तं दिशोदश ।। संवर्तकाले तृषितं दृष्टं मृत्युमिवोत्थितम् ।५ सुसलेनोच्छ्ययवती घिपुलांगुलपर्वणा लम्बाभरणपूर्णेन किञ्चिच्चलितकर्मणा ।५१ उच्छितेमाग्नहस्तेन दक्षिणेन वपुष्मता दानवान् देवनिहतानुत्तिष्ठध्वमिति ब्रवन् ।५२ ।। तं कालनेमि समरे द्विषतां कालचेष्टितम् ।।१ वीक्षन्तेस्म सुराः सर्वे भयवित्रस्तलोचनाः ।५३ ११ तं वीक्षन्तिस्म भूतानि क्रमन्तं कालनेमिनम् त्रिविक्रमाधिकमतं नारायणमिवापरम् ॥५४ * सोऽत्युच्छ्यपुरः पादमारुता घृणिताम्बरः

प्रक्रामन्नसुरो युद्ध त्रासयामास देवताः ।५५ समयेनासुरेन्द्र परिष्वक्तस्ततो रणे कालनेमिर्बभौ दैत्यः विष्णुरिव मन्दरः ॥५६ अथ विन्यविरे देवाः सर्वे शुक्रपुरोगमाः ।। कालनेमि समायान्तं दृष्ट्वा कालमिवापरम् ॥५७

जिम समय में वह कालनेमि वहाँ रणथल में समागत हुआ था उस समय वह तिर्यक—-आयत और रक्त नेत्रों वाला था—उसका स्वरूप मन्दर गिरि के तुल्य उदग्र बर्चस से युक्त था— युद्ध में सब देवों को संतृप्त करता हुआ समायात हुआ था।४६। समस्त सुरों को बाँटता फटकारता हुआ देशों दिशाओंमें समाच्छादन करता हुआ और सम्वत्त काल में तृषित समुत्थित्त मृत्यु की भाँति दिल्ललाई दिया था। उच्छ्य से युक्त सुन्दर तल वाले–विपुल अ गुलियों के पर्यों से पूर्ण लम्बे अभिरणों से संयुक्त कुछ चलित कर्मों वाले–उच्छित-वपुरमान दाहिने हाथ से देवों के द्वारा मारे हुए दानवों से उठकर खड़े हो जाओं ऐसा कह रहा था ।५०-५२। उस समर क्षेत्र में द्वप करने वाले शत्रुओं का काल चेष्टित कालनेमि को भय से विशेष भीत लोचनों वाले समस्त सुरण देख रहे थे ।५३। चारों ओर क्रमण करते हुए उस काल मेभि को त्रिविक्रम ( बामन ) से भी अधिक माने हुए दूसरे नारायण के भी समान स्वभूता (प्राणी) देखते थे ।५४ अत्यन्त उच्छ्यपुर वाले– पैरों की भारुत घृणित – अम्बर से • सम्पन्न उस असुर ने

 

Matsya Puran Part-2

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