Matsya Puran Part-1

0
44
Matsya Puran

मत्स्यपराण

( प्रथम खण्ड )

[ सरल भाषानुवाद सहित ]

जनोपयोगी (संस्करण)

 

भूमिका

भारतीय पुराण-साहित्य बड़ा विस्तृत है। उसने मानव-जीवन के लिए आवश्यक किसी क्षेत्र को अछूता नहीं छोड़ा है। जो लोग समझते हैं कि पुराणों में केवल धार्मिक कथाये, ऋषि-मुनि और राजाओं का इतिहास, पुजापाठ की विधियाँ और तीर्थों का वर्णन मात्र हैं, वे वास्तव में उनसे अनजान हैं । कितने ही पुराणोंमें औषध विज्ञान, साहित्य और कला सम्वन्धी विवेचन, गृह निर्माण शास्त्र, साहित्य, संगीत, रत्न विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान, स्वप्न-विभरि आदि विविध विषय की पर्याप्त चर्चा की गई हैं । ‘अग्नि पुराण’ में तो विविध विषयक ज्ञान इतना अधिक संग्रह किया गया है कि लोग उसको प्राचीनकाल का ‘विश्वकोश कहते हैं। उसमें लगभग २००-२५० विषयों का परिचय दिया गया है । इस दृष्टि से ‘नारद पुराण’ भी प्रसिद्ध है जिसमें अनेक प्रकार की उप योगी विद्याओं का गम्भीर रूपसे विवेचन किया गया है । ‘गरुण पुराण’ में चिकित्सा शास्त्र और रत्न-विज्ञान की बहुत अधिक जानकारी भरी हुई है। पुराणों की इन्हीं विशेषताओं को देखकर प्राचीन साहित्य के एक बहुत बड़े ज्ञाता ने लिखा था

“पुराणों में भारत की सत्य और शाश्वत आश्मा निहित है। इन्हें पढ़ बिना भारत का ग्थार्थ चित्र सामने नहीं आ सकता, भारतीय जीवन का दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं हो सकता । इनमें आध्यात्मिक, आधि दैविक, आधिभौतिक सभी विद्याओं का विशद वर्णन है । लोक जीवनके सभी पक्ष (पहलू) इनमें अच्छी तरह प्रतिपादित हैं। ऐसा कोई ज्ञान विज्ञान नहीं, मन व मस्तिष्क की ऐसी कोई कल्पना अथवा योजना नहीं, मनुष्य-जीवन का ऐसा कोई अग नहीं, जिसका निरूपण पुराणों में न हुआ हो। जिन विषयों को अन्य माध्यमों से समझने में बहुत कठिनाई होती है, वे बड़े रोचक ढुङ् से सरल भाषा में, आख्यान आदि के रूप में इनमें दणित हुए हैं।” पर सच पूछा जाय तो पुराणों का यही गुण | कुछ आलोचकों की निगाह में उनका ‘दोष’ बन गया है। खण्डन की प्रवृत्ति वाले लेखक और सरसरी निगाह से पढ़ने वाले पाठक उनकी अद्भुत और चस्कार पुर्ण कथाओं को पढ़कर तुरन्त शोर मचाने लगते हैं-“देखा, पुराणों में कैसी गप्पाष्टके भरी पड़ी हैं। कहीं ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जो एक महीना पुरुष और एक महीना स्त्री रहें और जिनके स्त्री रूप में सन्तान भी हो जाय । कहीं सौ-सौ और दो-दो सौ गज लम्बे मनुष्य भी हुआ करते हैं।”

पर कदाचित् वे यह नहीं जानते कि वैज्ञानिक की खोज के अनुसार पृथ्वी पर आरम्भ का एकयुग ऐसा भी था जिसमें सन्ताने नर भादा द्वारा नहीं होती थीं, वरन् किसी भी जीव से दुसरा जीव किसी तत्काली प्रणाली से उत्पन्न हो जाता था । निश्चय ही यह स्थिति करोड़ों वर्ष पहले थी, जबकि मानव-प्राणी तो दूर गाय, भैंस और घोड़े -हाथी जैसे पशु भी नहीं थे। पर कुछ भी हो उस समय पृथ्वी पर उन्हीं जीवों का अस्तित्व था, चाहे वे मछली के रूप में हों और चाहे किसी प्रकार के कीड़े-मकोड़ों, छिपकली जैसे प्राणी आदि के रूप में । इस वैज्ञानिक तथ्य को पुराने जमाने के साधारण मनुष्यों को जब ज्ञान-विज्ञान की चर्चा बहुत ही कम फैली थी, समझा सकना असम्भव था । इस दशा में यदि किसी पुराणकार ने ‘इला’ नामक राजपुत्र की कहानी पढ़कर और उसका सम्बन्ध किसी ऐतिहासिक ब्यक्ति या वंश से जोड़कर समझा दिया तो इसमें क्या हानि हो गई ? विद्वान् उनका यथार्थ भेद जानते हैं और पौराणिक कथाओं के श्रोता केवल ‘पुण्य’ के विचारसे उन रोचक वर्णनों को सुनते हैं और कुछ लोग उनसे सत्कर्म करगे की कुछ शिक्षा भी ग्रहण कर लेते हैं। पर ‘अद्ध दग्ध’ जीवों के लिए वे परेशानी का कारण बन जाती हैं, और वे इधर-उधर से दो चा? प्रसंगों को लेकर उन्हें अधूरे रूप में वर्णन करने लगते हैं, और पुराणों के खिलाफ दस-पाँच खरी-खोटी बातें कहकर अपने को ‘विद्वान्’ सभझने का सन्तोष करें। लेते हैं। पौराणिक साहित्य का विस्तार और महत्व पर हम पाठकों को बतलाना चाहते हैं कि ‘पुराण’ वास्तव में ऐसी तिलिस्मी चीज नहीं है जैसा ये स्वयम्भू विद्वान् उनको सिद्ध करने का प्रयत्न किया करते हैं। ऊपर जो पुराणों के महत्व का उद्धरण दिया हैं वह भी सभस्त आयु वेदों का परिशीलन करने वाले एक विद्वान का हैं और वेदों तथा पुराणों का समन्वय करके इसी निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि ‘इतिहास पुराणाभ्यां वेदे समुपवृ हयेत् ।’ अर्थात् पुराणकारों ने मूल वैदिक तथ्यों को सर्व साधारण को समझाने की दृष्टि से ही उनका विस्तार करके नाना प्रकार की कथाओं की रचना की है। इतना ही नहीं पुराणों का दावा तो इससे बहुत अधिक है। ‘स्कन्द पुराण’ के रेवाखंड’ में कहा गया है—-

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here