Matsya Puran Part-1

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Matsya Puran

मत्स्यपराण

( प्रथम खण्ड )

[ सरल भाषानुवाद सहित ]

जनोपयोगी (संस्करण)

 

भूमिका

भारतीय पुराण-साहित्य बड़ा विस्तृत है। उसने मानव-जीवन के लिए आवश्यक किसी क्षेत्र को अछूता नहीं छोड़ा है। जो लोग समझते हैं कि पुराणों में केवल धार्मिक कथाये, ऋषि-मुनि और राजाओं का इतिहास, पुजापाठ की विधियाँ और तीर्थों का वर्णन मात्र हैं, वे वास्तव में उनसे अनजान हैं । कितने ही पुराणोंमें औषध विज्ञान, साहित्य और कला सम्वन्धी विवेचन, गृह निर्माण शास्त्र, साहित्य, संगीत, रत्न विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान, स्वप्न-विभरि आदि विविध विषय की पर्याप्त चर्चा की गई हैं । ‘अग्नि पुराण’ में तो विविध विषयक ज्ञान इतना अधिक संग्रह किया गया है कि लोग उसको प्राचीनकाल का ‘विश्वकोश कहते हैं। उसमें लगभग २००-२५० विषयों का परिचय दिया गया है । इस दृष्टि से ‘नारद पुराण’ भी प्रसिद्ध है जिसमें अनेक प्रकार की उप योगी विद्याओं का गम्भीर रूपसे विवेचन किया गया है । ‘गरुण पुराण’ में चिकित्सा शास्त्र और रत्न-विज्ञान की बहुत अधिक जानकारी भरी हुई है। पुराणों की इन्हीं विशेषताओं को देखकर प्राचीन साहित्य के एक बहुत बड़े ज्ञाता ने लिखा था

“पुराणों में भारत की सत्य और शाश्वत आश्मा निहित है। इन्हें पढ़ बिना भारत का ग्थार्थ चित्र सामने नहीं आ सकता, भारतीय जीवन का दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं हो सकता । इनमें आध्यात्मिक, आधि दैविक, आधिभौतिक सभी विद्याओं का विशद वर्णन है । लोक जीवनके सभी पक्ष (पहलू) इनमें अच्छी तरह प्रतिपादित हैं। ऐसा कोई ज्ञान विज्ञान नहीं, मन व मस्तिष्क की ऐसी कोई कल्पना अथवा योजना नहीं, मनुष्य-जीवन का ऐसा कोई अग नहीं, जिसका निरूपण पुराणों में न हुआ हो। जिन विषयों को अन्य माध्यमों से समझने में बहुत कठिनाई होती है, वे बड़े रोचक ढुङ् से सरल भाषा में, आख्यान आदि के रूप में इनमें दणित हुए हैं।” पर सच पूछा जाय तो पुराणों का यही गुण | कुछ आलोचकों की निगाह में उनका ‘दोष’ बन गया है। खण्डन की प्रवृत्ति वाले लेखक और सरसरी निगाह से पढ़ने वाले पाठक उनकी अद्भुत और चस्कार पुर्ण कथाओं को पढ़कर तुरन्त शोर मचाने लगते हैं-“देखा, पुराणों में कैसी गप्पाष्टके भरी पड़ी हैं। कहीं ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जो एक महीना पुरुष और एक महीना स्त्री रहें और जिनके स्त्री रूप में सन्तान भी हो जाय । कहीं सौ-सौ और दो-दो सौ गज लम्बे मनुष्य भी हुआ करते हैं।”

पर कदाचित् वे यह नहीं जानते कि वैज्ञानिक की खोज के अनुसार पृथ्वी पर आरम्भ का एकयुग ऐसा भी था जिसमें सन्ताने नर भादा द्वारा नहीं होती थीं, वरन् किसी भी जीव से दुसरा जीव किसी तत्काली प्रणाली से उत्पन्न हो जाता था । निश्चय ही यह स्थिति करोड़ों वर्ष पहले थी, जबकि मानव-प्राणी तो दूर गाय, भैंस और घोड़े -हाथी जैसे पशु भी नहीं थे। पर कुछ भी हो उस समय पृथ्वी पर उन्हीं जीवों का अस्तित्व था, चाहे वे मछली के रूप में हों और चाहे किसी प्रकार के कीड़े-मकोड़ों, छिपकली जैसे प्राणी आदि के रूप में । इस वैज्ञानिक तथ्य को पुराने जमाने के साधारण मनुष्यों को जब ज्ञान-विज्ञान की चर्चा बहुत ही कम फैली थी, समझा सकना असम्भव था । इस दशा में यदि किसी पुराणकार ने ‘इला’ नामक राजपुत्र की कहानी पढ़कर और उसका सम्बन्ध किसी ऐतिहासिक ब्यक्ति या वंश से जोड़कर समझा दिया तो इसमें क्या हानि हो गई ? विद्वान् उनका यथार्थ भेद जानते हैं और पौराणिक कथाओं के श्रोता केवल ‘पुण्य’ के विचारसे उन रोचक वर्णनों को सुनते हैं और कुछ लोग उनसे सत्कर्म करगे की कुछ शिक्षा भी ग्रहण कर लेते हैं। पर ‘अद्ध दग्ध’ जीवों के लिए वे परेशानी का कारण बन जाती हैं, और वे इधर-उधर से दो चा? प्रसंगों को लेकर उन्हें अधूरे रूप में वर्णन करने लगते हैं, और पुराणों के खिलाफ दस-पाँच खरी-खोटी बातें कहकर अपने को ‘विद्वान्’ सभझने का सन्तोष करें। लेते हैं। पौराणिक साहित्य का विस्तार और महत्व पर हम पाठकों को बतलाना चाहते हैं कि ‘पुराण’ वास्तव में ऐसी तिलिस्मी चीज नहीं है जैसा ये स्वयम्भू विद्वान् उनको सिद्ध करने का प्रयत्न किया करते हैं। ऊपर जो पुराणों के महत्व का उद्धरण दिया हैं वह भी सभस्त आयु वेदों का परिशीलन करने वाले एक विद्वान का हैं और वेदों तथा पुराणों का समन्वय करके इसी निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि ‘इतिहास पुराणाभ्यां वेदे समुपवृ हयेत् ।’ अर्थात् पुराणकारों ने मूल वैदिक तथ्यों को सर्व साधारण को समझाने की दृष्टि से ही उनका विस्तार करके नाना प्रकार की कथाओं की रचना की है। इतना ही नहीं पुराणों का दावा तो इससे बहुत अधिक है। ‘स्कन्द पुराण’ के रेवाखंड’ में कहा गया है—-

आत्मापुराणं वेदानां पृथगङ्गानितानि षट् । यच्चदृष्टंहि वेदेषु तद्दष्ट स्मृतिभिः किल ।। उभभ्यां यत्तष्टंहि तत्पुराणेषु गीयते । पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणः स्मृतम् ।। ११ “पुराण वेदों की आत्मा है। छ: वेदांग उससे पृथक हैं । जो कुछ वेदों में देखा वही स्मृतियों में भी देखा गया । और वेद तथा स्मृति दोनों में जो कुछ देखा गया वह सब पुराणों में गाया जाता है। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि पुराणों को ब्रह्माजी ने सब शास्त्रों से पहले। कहाँ है ।

हम इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि जब वेदों को लौक मान्य तिलक जैसे विद्वान् कम से कम दस इजार वर्ष पुराना बतलाते थे, तब पुराणों की रचना काल दो हजार वर्ष के भीतर माना जाता है।

यही बात इन दोनों प्रकार के ग्रन्थों की भाषा की तुलना करने के प्रकट होती है। पर ‘स्कन्द पुराण’ के लेखक का कथन केवल वर्तमान समय में पाये जाने वाले हस्तलिखित तथा छपे हुए अठारह पुराणों के सम्बन्ध में नहीं हैं, वरन् पौराणिक शैली के समस्त साहित्य से है चाहे वह लिखा हो अथवा जवानी कहा और सुना जाता हो । इस कथन पर विचार करने से अन्त में हमको यह स्वीकार करना पड़ता है कि वास्तव में वेद जैसी गम्भीर रचनाओं से पहले ‘पुराण’ जैसी लोक कथाओं का प्रचलन होना स्वाभाविक ही मानना चाहिये । सभी देशों और सभी कालों में इस तरह का ‘लोक-साहित्य’ ही पहिले उत्पन्न और प्रचलित होता है और तत्पश्चात् वहीं उन्नत और परिष्कृत होते हुए स्थायी और गम्भीर साहित्य के रूप में परिणित हो जाता है । इसी तथ्य को इयान में रख कर किसी विद्वान् ने कहा था कि ‘संसार का सबसे पहला साहित्कार कोई कहानी कहने वाला ही होगा ।

अब रह गई पुराणों में वर्णित धार्मिक विचरणों को अन्धविश्वासों का रूप देकर उनके आधार पर लोगों की अन्यश्रद्धा को जागृत करना और उसके द्वारा दान तथा पूजा पाठ के नाम पर मनमाना धन वसूल करना। इनके लिये पुराणों को दोष देना क्यों है । यह कार्य तो प्रत्येक देश के धर्मजीवी (पण्डा-पुजारी) करते आये हैं। चालाक और धूर्त व्यक्ति प्रत्येक परिस्थिति में अपनी स्वार्थ सिद्धि का मार्ग निकाल ही लेते हैं । ऐसे ही लोगों ने पुराणों में तीथ तथा दान की अति प्रशंसा भरदी और उनमें ‘रत्न पर्वत दान’ भूमण्डल दान ‘सप्त समुद्र दान’ जैसे अपूर्व वानों का विधान भी सम्मिलित कर दिया। इस दोष का उत्तर दायित्व एक विशेष मनोवृत्ति के व्यक्तियों पर है जो सदा से मौजूद हैं। और जब तक एक बड़ी ‘ज्ञान-क्रान्ति’ न हो जायगी तब तक बने रहेंगे। पुराणों का परिवर्तत स्वरूप

पुराणों का विवरण लिखते हुये मत्स्यपुराणतथा अन्य पुराणों

में भी यह कहा गया है कि पले एक ही पुराणं था, फिर व्यास जी ने उसे लोगों की सुविधा के लिए अठारह पुराणों के रूप में प्रस्तुत किया। पर यह संख्या अठारहू पर ही समाप्त नहीं होगई । अठारह ‘महापुराणों के पश्चात् अठारह ‘उप-पुराण’ भी तैयार हो गये और उनके बाद भी लोगों ने ‘लघु पुराणों का निर्माण किया । वास्तव में अब ‘पुराण’ शब्द सब प्रकार के धार्मिक कथा-ग्रन्थों के लिए काम आने लगा है। इसीलिए इस आधुनिक युग में किसी लेखक ने ‘मधी-पुराण’ भी लिख कर तैयार कर दिया हैं।

पर इन बातों से पुराणों का महत्त्व कम नहीं हो जाता । यदि | हमें पुराणों के प्रचलित संस्करणों का भी अध्ययन करें तो तरह-तरह की कथाओं के बीच में अध्यात्म, ब्रह्मज्ञान, विज्ञान, चरित्र, नीति आदि | के सर्वोच्च तत्व मिले-जुले दिखाई पड़ते हैं। कहने के लिए तो पुराण मूत-पूजा, तीर्थयात्रा, स्नान-दान आदि के मुख्य प्रचारक हैं, पर साथ | ही उनमें से अधिकांश में सृष्टि के मूल स्वरूप का जैसा वर्णन पाया जाता है वह आधुनिक विज्ञान की पहुँच से कहीं अधिक ऊचा है। उनमें सृष्टि विज्ञान और प्रलय (सर्ग और प्रति-सर्ग) का वर्णन करते हुए सदैव यही प्रतिपादित किया है कि इस समस्त विश्व ब्रह्माण्डका आवि एक अव्यक्त और निराकार तत्व से हुआ है, जिसकी कोई आदि अन्त नहीं है और न जिसके विस्तार की कोई सीमा है । समस्त सूक्ष्म और स्थूल पञ्चभूत, समस्त देवता और सांसारिक प्राणी उसी में से उत्पन्न होते हैं और कुछ समय तक पृथक रूप में दिखाई पड़कर अन्त में उसी में लय हो जाते हैं। ब्रह्मा विष्णु, शिव, इन्द्र, वरुण आदि समस्त देवता उसी एक मूल शक्ति के विभिन्न रूपे और नाम हैं। । यद्यपि उस अव्यक्त और निराकार शक्ति की उपासनाका वास्त विक मार्ग योग और ध्यान हैं, पर यह बहुत ही थोड़े लोगों के लिये सम्भव हो पाता है। शेष सामान्य स्तर के व्यक्ति किसी अव्यक्त और निराकार शक्ति का ध्यान कर सकने में असमर्थ होते हैं । ऐसे ही लोगों की संख्या 2 में से हैं ० होती है। इसलिये उन की सुविधा की दृष्टि से साकार मूर्तियों की योजना की गई है और उनकी प्रतिष्ठा के लिये मन्दिरों का निर्माण और तौकी स्थापना आवश्यक हुई। जिन पुराणों में किसी साधारण मन्दिर में मूति दर्शन करने या गङ्गा अथवा नर्मदा जैसी नदी में एक बार स्नान करने से करोड़ों वर्ष तक स्वर्ग सुख भोगने का लालच दिखाया गया है, उन्हीं में सृष्टि की वास्तविकता के उपरोक्त तर्क और विज्ञान के अनुकूल रूप का भी विवेचन किया गया है । इससे हम इन निकर्ष पर पहुँचते हैं कि आरम्भ में पुराणों को। उद्देश्य जनसाधारण के बीच धार्मिक तत्वों का प्रचार करना ही था ।

यह भी असम्भव नहीं हैं कि पुराणों की परम्परा का श्री गणेश करने वाले वैदव्यास ही हों । इस अनुमान का कारण यह है कि व्यासजी को ‘महाभारत’ भी एक प्रकार का पुराण ही हैं, यद्यपि उसमें धार्मिक मातों के साथ राजनीतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक विषयों का विवेचन भी बहुत अधिक परिमाण में मिलता है, जिससे उसे ‘इतिहास’ कहा जाने लगा है। हम इमारे कथन का आश्रय यह नहीं कि व्यास जी ने पुराणों की जो रूप रेखा बनाई वहीं अभी तक स्थिर है। भाषा और लिपि में हजार पाँच सौ वर्ष में इतना अन्तर पड़ जाता है कि अधिकांश अन्थों का नया संस्करण करने की आवश्यकता पड़ जाता है। फिर पुराणों में तो यह भी लिखा है कि कयासजी ने एक ही पुराण संहिता बनाई और उसका विस्तार उनके शिष्य और फिर उनके भी शिष्यों ने किया आख्यानैश्चप्युपाख्यानेगथाभिः कल्पशुद्धिभिः पुराण संहिता चक्रे पुराणार्थ विशारदः । ।

 

प्रख्यातो व्यास शिष्योऽभूत्सूतो वै रोमहर्षणः

पुराण संहिता तस्मै ददौ व्यासो महामतिः ।।

सुमतिश्चाग्नि चाश्य मित्रायुश्शांसपायनः ।।

अकृतव्रण सावर्षी षट शिष्यास्तस्य चाभवन् ।।

काश्यपः संहिताकर्ता सावण शांतपयनः

रोमहर्षणिका चान्या तितृणां भूल संहिता ।।

अर्थात्–*फिर पुराणों के ज्ञाता व्यास जी ने अख्यान, उपाख्यान गाथा और कल्पशुद्धिसे युक्त ‘पुराण-संहिता’ की रचना की। इस पुराण संहिता का अध्ययन व्यासजी ने अपने सुप्रसिद्ध शिष्य रोमहर्षण सूत को कराया । रोभ षण के छ: शिष्य हुए-सुमति, अग्निवर्षा, भित्रायु, शांसपायन, अकृतव्रण और सावणि । इसमें से काश्यप गोत्रीय अकुतव्रण सावण और शासपायन ने पृथक-पृथक तीन सहिताय रतौं । उन तीनों का मूल आधार रोमहर्षा द्वारा रचित एक संहिता थी।

इसके पश्चात् भी इन सबकी अगमी शि६य मंडली में से अनेक विद्वान् अपने देश-काल के अनुसार उन संहिताओं की वृद्धि करते रहे, उनमें नये-नये प्रेरणाप्रद आख्यान और उपाख्यान रचकर सम्मिलित करते रहे। ये सब कथावाचक शिष्य ‘सूतजी’ या “व्यास जी’ कहलाते थे । इनमें सभी प्रकार के व्यक्ति थे । कुछ विशेष रूप से धर्मपरायण और परमार्थी थे तो कुछ मैं जाति परायणता और सांसारिकतीकी मात्रा अधिक थी । यदि ऐसे कथावाचकों ने तीर्थयात्रा, स्नान-दान और अतो त्सव वाले अंशों को यथाशक्ति बढ़ कर अपने श्रोताओं को अधिकाधिक ‘दान’ देने की प्रेरणा की हो तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है । जब हम अठारहों पुराणों पर एक विहंगम दृष्टि डालते हैं और उनकी विषय सूचियों का विवेचन करते हैं, तो हमको यह प्रतीत होने लगता । है कि सब पुराण एक ही दृष्टिकोण से नहीं रचे गये हैं। किसी में धर्म-साधन की प्रधानता है, किसी ने जप-तप द्वारा आध्यात्मिकता का महत्व विशेष बतला प हैं और किसी ने हर तरह के दान-पुण्य पर ही अधिक बल दिया है। ‘मत्स्यपुराण’ में तीसरी श्रेणी के वर्णन बहुत ( १० ) अधिक संख्या में थे। यद्यपि हमने वर्तमान संस्करण में उनमें से अधि कांश को छोड़ दिया है, तो भी नमूने के तौर पर जिन व्रत’ और ‘दान’ का वर्णन आ गया हैं उनसे पाठक हमारे कथन को यथार्थता का अनुमान कर सकेंगे। पुराणों को परमार्थ और अध्यात्म भावना पर इस एक बात से ही इम पुराणों की भलाई-बुराई का निर्णय नहीं कर सकते । हम इस बात को पूरी तरह नहीं समझ सकते कि जिस समय–अब से एक-डेढ़ इजार वर्ष पहले पुराण-साहित्य को इस प्रकार विस्तार किया गया, देश और समाज को क्या परिस्थिति थी । सम्राट अशोक से लेकर पृथ्वीराज चौहान तक के शासन काल के बीच देश की क्या राजनीतिक और सामाजिक स्थिति थी, इसका पता इतिहास ग्रन्थों से बहुत कम सगता है । पर पुराणों के विवरणों को समझने में यदि अन्तद्द ष्टि से काम लिया जाये तो यह प्रतीत होता है कि इस हजार बारह सौ वर्ष के युग में एक देशब्यापी क्राँति होकर नये समाज का संगठन हो रहा था। बौद्ध धर्म की प्रबलता ने प्राचीन भारतीय सीमा जिक व्यवस्था को तोड़-फोड़ दिया था, उसी के भकनावशेषों पर इमारे धर्माचार्य पुनः हिन्दू-धर्म-भवन के पुननिर्माण का प्रयत्न कर रहे थे । इस बीच में देश को अस्त-व्यस्त राजनीतिक अवस्था को देखकर यवन, हुण, शक, सिथियन आदि विदेशी जातियों ने आक्रमण भी किया था । उन आक्रमणकारियों में से लाखों व्यक्ति यहाँ बस भी गये और देश के किसी भू भाग पर उन्होंने बहुत वर्षों तक शासन भी किया। ऐसी परिस्थिति में जो पुराण ग्रन्थ रचे गये अथवा प्रचलित किये गये उनमें पूर्ण रूप से विशुद्ध वैदिक आदर्शों को स्थिर रखना कैसे सम्भव हो सकता था ?

यूनानी-सम्राट सिकन्दर के आक्रमण तथा बुध धर्म की प्रभुता होने से पूर्व, देश की वैदिक संस्कृति अक्षुण्ण थी । उसमें जो परिवर्तन होते थे वे आन्तरिक कारणोंके क्षार पर ही होते थे। पर विदेशियों के क्रमण और उनमें से लाखों, करोड़ों रुयक्तियों के भारतीय समाज में मिल जाने के पश्चात् परिस्थिति बहुत कुछ बदल गई और उसके बाद जो धार्मिक संगठन बनाया गया और धार्मिक नियम प्रचलित किये गये उनमें देश काल की बदली हुई परिस्थिति का प्रभाव पड़ना अनिवार्य था । संसार के अन्य धर्म तथा जातियाँ तो इस प्रकार के आक्रमणों से सर्वथा ही नट हो गये । जैसे यूनान, रोम, और ईरान की प्राचीन संस्कृति और धर्म का नाम ही इतिहास में शेष रह गया है । पर यह वैदिक धर्म की ही विशेषता थी कि विदेशी आक्रमणों और बुद्ध धर्म द्वारा उत्पन्न गृह कलह के भयंकर आघात को सह कर भी उसने अपनी ‘आत्मा की रक्षा कर ली। हमारे तत्कालीन धर्म चायने नवीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थियों के कारण बाह्य पूजा, उपासना, कर्मकाण्ड की विधि में परिवर्तन किया, वैदिक यज्ञों का स्थान मन्दिर और तीर्थों की भक्तिमार्गीय उपासना-पद्धति ने ग्रहण किया, पर साथ ही वैदिक सिद्धान्तों और आदशों को उनमें बराबर समाविष्ट किया गया, प्रत्येक विधि-विधान में उन्हीं की घोषणा की गई। साथ ही समस्त पौराणिक धर्म कलेवर का लक्ष्य भी वैदिक आध्यात्मिक सिद्धान्त ही रखे गये । इस तथ्य का विवेचन इमको “वायु-पुराण’ के अन्तिम अध्याय “व्यास संशय वर्णन’ में मिलता है। उसमें पुराणों में वर्णित लौकिक धर्म विधियों का उल्लेख करते हुए अन्त में मानव-अात्मा के अध्यात्मिक लक्ष्य को ही प्रधानता दी गई है। उसमें स्पष्ट कहा गया है– | “हे सूतजी ! आप तो भगवान के सच्चे भक्त हैं। व्यास की केपासे अपने धर्म शास्त्रों का पूर्णतः अध्ययन कर लिया है । हे निष्पाप आपने अठारहों पुराणों और इतिहासों का आदि से अन्त तक अच्छी तरह वर्णन किया है। इन पुराणों में अपने बहुत से धर्मों का निरूपण किया है। उसमें गृहस्थ, त्यागी, सन्यासी, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, स्त्री, । शुद्द आदि के धर्म कर्तव्यों का वर्णन किया गया है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य द्विजातियों तथा इनसे उत्पन्न जो अन्य संकर जातियाँ-गंगा आदि महा नदियाँ और यज्ञ, व्रत, तप, दान, यम-नियम, योगाभ्यास, सांख्य-सिद्धान्त, भक्ति-मार्ग, ज्ञानमार्ग आदि सबका वर्णन किया हैं । कर्मों और उपासना द्वारा चित्त की शुद्धि और धर्म प्राप्ति के सम्बन्ध में भी आपने बतलाया है। अपने बाह्य, शैव, वैव, शाक्त, सौर (सूर्योपासक) तथा अहत् (जैन बौद्ध आदि)—इन छः प्रकार के दर्शनों की भी परिचय दिया है। इन सब तथा अन्य प्रकार के विषयों का पुराणों में अपने विवेचन किया है। अब हम आपसे कहना चाहते हैं | कि इनसे आगे भी क्या अन्य कोई उत्तम विषय ज्ञानने को शेष रहू जाता है ?’ प्रश्नकर्ता मुनियों ने बहुत स्पष्ट रूप से कहा न ज्ञायेत यदि व्यासो गोपायदथे भवान् । अत्र न संशय छिन्धि पूर्णः पौराणिको यतः ।।

अर्थातु-”यदि व्यासजी ने किसी विषय का वर्णन न किया हो। अथवा अपने ही कुछ गोपन कर लिया हो-न बतलाया हो तो अब उसे भी कहकर हमारे संशय को दूर कीजिए।”

सूतजी ने कहा-“हे शौनक ! आप ध्यान पूर्वक सुनो, मैं आपके ‘सुदर्लम’ (महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देता हैं । पराशर मुनि के पत्र | महर्षि व्यास देव ने समस्त वेदों के अर्थं से समन्वित पौराणिक कथा की रचना करके पिर वित्त में विचार किया कि मैंने बण तथा आश्रमों के पालन करने वालों के धर्म का भली भाँति वर्णन कर दिया है और वेद से अविरोध रखते हुए बहुत प्रकार के मुक्ति-मार्गों का भी निरूपण कर दिया है। सूत्रों की व्याख्या करते हुये जीव, ईश्वर और ब्रह्म का भेद भी प्रकट किया है और श्रुति (वेदों) के सिद्धान्तानुसार परब्रह्म का स्वरूप भी बतलाया है। एक मात्र परम ब्रह्म ही अविनाशी तत्व है। और उसी को प्राप्त करने के लिये ब्रह्मचारी से लेकर सन्यासी तक सबरे आश्रमों के व्यक्ति ‘व्रत’ (धर्माचरण) किया करते हैं। मैं वेदों के इस सिद्धान्त को भी जानता हूँ कि यह समस्त विश्व ब्रह्म से प्रथम नहीं हैं। वरन उसी से इस प्रकार उत्पन्न होता और मिटता रहता है जैसे बहते हुए फेनिल जल में बुलबुले उठते और टूटते रहते हैं। पर किसी-किसी स्थान पर यही सुनने में आता है कि परम ब्रह्म के ऊपर भी ‘गोलोक’ में भगवान् कृष्ण दीप्यमान होते हैं। इसका रहस्य जानमा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।’ जब व्यास जी बहुत कुछ ऊहापोह करने पर भी इस प्रश्न का सन्तोष जनक उत्तर न पा सके तो उन्होंने निश्चय किया कि इसका निर्णय केवल तप द्वारा हो सकता है। तब वे सुमेरु पर्वत को एक गुफा में जा बैठे और दीर्घमाल तक समाधि अवस्था में ध्यान करते रहे । अन्त में उनके सम्मुख वेद मृतिमान रूप में प्रकट हुए और उन्होंने कहा ११. हे पास ! आप महान प्राश हैं, शरीर धारण करने पर भी आप विष्णु आत्मा’ हैं । आप अजन्मा होकर भी संसारी प्राणियों के उद्धार की इच्छा से राह सब कर रहे हैं । हमारा ठीक अर्थं वही है जो अपने प्रकट किया है। पुराणों, इतिहास और सूत्र अन्यों में उसे अपने अनेक प्रकार से प्रकट किया है (ऐसा पात्र भेद से किया गया हैं। तो भी हम आपके प्रश्न का उत्तर देते हैं कि परब्रह्म ही अनिशी तत्व है और वहीं कारणों का भी कारण हैं। वह आत्मस्वरूप पुष्प की गन्ध की भाँति सदैव स्थिर रहता है। महाप्रलय हो जाने पर उस अक्षर-ब्रह्म से परे केवल ‘रस’ रहता है । पर हम शब्दात्मक होने से उस शब्दातीत तत्व का वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं।”

इस प्रकार पुराणों में सामान्य बुद्धि के मनुष्यों के लिये मन्दिर तीर्थ आदि का माहात्म्यःवर्ण से लेकर पूर्ण आत्मज्ञानियों के लिए अक्षर तत्व और ‘रस’ (भगवद्भक्ति और विश्व प्रेम) का भी निरूपण कर दिया गया हैं। उनमें धर्म-साधन के जो अनेक मार्ग बतलाये हैं उसका एक कारण तो सम्प्रदाय भेद है और दूसरा कारण उपासक की योग्यता और शक्ति है । प्रत्येक व्यक्ति उपनिषदों में वर्णित आत्म-तत्व और ब्रह्म-ज्ञान तथा माया-सिद्धान्त को हृदयङ्गम नहीं कर सकता। इसलिए पुराणकारों ने उसे अनेक प्रकार से सरल रूपों में वर्णित किया है जिससे प्रेरणा लेकर हर श्रेणी और योग्यता के व्यक्ति न्यूनाधिक अंशों में धर्मा चरण करते रहें । धर्माचरण ही व्यक्ति और समाज के उत्थान तथा कल्याण का मुख्य साधन है, और उसमें यथाशक्ति लगे रहना मानव मात्र का कत्त व्य है। ‘मत्स्य’ पुराण की विशेषताएं: | इस प्रकार के पुराण-साहित्य में “मत्स्यपुराण’ का दर्जा उभय पक्षीय हैं । एक तरफ तो इसमें व्रत, पर्व, तीर्थ आदि में अधिकाधिक दान देने की प्रेरणा की है और दूसरी तरफ राजकम, शासन व्यवस्था, गृह निर्माण, मूर्तिकला, शान्ति विधान, शकुन-शास्त्र आदि जीवनोपयोगी विषयों का भी विशद रूप में विवेचन किया है। भारतीय-साहित्य में नारी जाति की गरिमा का परिचय देने वाला प्रसिद्ध ‘सावित्री उपाख्यान’ मुख्य रूप से इसी में विस्तारपूर्वक दिया गया है। वाराणसी, हिमाचल नर्मदा आदि की प्राकृतिक शोभा को कायमय वर्णन साहित्य दृष्टि से उच्चकोटि का माना जा सकता है। और भी कितने ही विषय ऐसे हैं जो इसे पुराण की उत्कृष्टता तथा उपादेयता को प्रमाणित करते हैं। यद्यपि अव परिस्थितियों के बदल जाने से अधिकांश पाठक उनकी उप योगिता बहुत कम अनुभव कर सके गे, पर अब से कुछ सौ वर्व पहले ही हमारे देश का एक बड़ा भाग उन्हीं का अनुसरण करने वाला था।

राजधर्म वर्णन

मत्स्य पुराण का ‘राजकृत्य’ और ‘राजधर्म’ वर्णन विशेष रूप से महत्व रखता है। इसमें केवल प्रज्ञा-पालन करने और इन-पुण्य का ही जिक्र नहीं किया गया है, वरन् खास तौर पर इस विषय को व्याव हारिक ज्ञान दिया गया है। यद्यपि वर्तमान वैज्ञानिक-युग में ये बातें बहुत अधिक बदल गई हैं-तलवार तथा तीरों के युद्ध के बजाय वायु यानों से बम वर्षा और राकेटों से युद्ध होने का जमाना आ गया है तो भी अब से दो चार सौ वर्ष पहले तक भारतीय नरेशों के लिये राज्य व्यवस्था और शासन संचालन के ये नियम और विधियाँ ही उपयोग में आती थीं । प्राचीन काल में राज्य का पूरा अस्तित्व एक मात्र राजा पर ही रहता था । यदि उसे किसी भी उपाय से नष्ट कर दिया जाय तो सारी राज व्यवस्था विण्ड-खण्ड़ हो जाती थी। इसलिए अन्य बातों के साथ राजा को अपनी सुरक्षा के लिये भी सदैव सजग रहना पड़ता था। इस सम्बन्ध में ‘मत्स्य पुराण’ को निम्न वर्णन दृष्टव्य है ।

“राजा को सदैव कौए के समान शंका युक्त रहना चाहिये । बिना परीक्षा किये राजा को कभी भोजन और शयन नहीं करना चाहिये । इसी भाँति पहले से ही परीक्षा करके वस्त्र, पुष्प, अलंकार तथा अन्य वस्तुओं को उपयोग में लाना चाहिये । कभी भीड़भाड़ में न घुसना चाहिये और न अज्ञात जलाशय में उतरना चाहिये । इन सबकी परीक्षा पहले विश्वासी पुरुषों द्वारा करा लेनी चाहिये । राजा को उचित है कि अनजान हाथी और घोड़े पर कभी सवार न हो और न किसी अज्ञात स्त्री के सम्पर्क में आवे । देवोत्सव के स्थान में उसे निवास करना नहीं चाहिये । अपने राज्य तथा दूसरे राज्यों में भी उसको जाने हुये विचरण बुद्धि वाले, कष्ट सहिष्णु और संकट से न घबराने वाले, गृप्तचरों (जासूसों) को नियुक्त करना चाहिए जो उसे सब प्रकार के रहस्यों की सूचना देते रहें। फिर भी राजा को किसी एक ही गुप्तचर के कथन पर विश्वास नहीं कर लेना चाहिये । जब दो-चार गुप्तचरों की रिपोर्ट से उस बात का समर्थं न हो जाय तब उस पर भरोसा करे।”

इस ३न में 19चये या अविश्वस करने की कोई बात नहीं

है। अन्य लोगों के संघर्ष करने वाले दूसरों का स्तत्त्व अपहरण करने वाले शासकों की स्थिति ऐसे खतरे में ही रहती है। पुरानी बातों को छोड़ दीजिये वर्तमान समय में भी जर्मनी के डिक्टेटर हिटलर को अपनी रक्षा के लिये अपनी शकल सूरत से मिलते हुए और वैसी ही पोशाक तथा रंग ढंग वाले कई चयक्ति अपने निवास स्थान में रखने पड़ते थे, जिससे कोई जल्दी ही असली हिटलर को पहिचान कर आक्रमण न कर सके । इसी प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था बालकन प्रदेश के और भी कई शासक रखते थे, जहाँ षड्यन्त्रकारियों और गुप्त धातकों का अधिक जोर था । अब भी ऐसे मई शासकों के प्राण-नाश के लिए तरह-तरह की चालाकियों से काम लिया जाता है। रूस के जार को मारने के लिये षड्यन्त्रकारियों ने बड़ी धम्टा घड़ी तैयार की थी जिसके भीतर इना माइट का भयंकर बम छुपा था । इस घड़ी को गुप्त रूप से राजमहल (विटर पैलेस) के कर्मी कमरे से लगवा दिया गया। एक नियत समय पर जब उसको घण्टी बनी तो उसको चोट से बम फुट गया और महल का एक भाग उड गया । जब इस जनजागृति के युग में ऐसी घटनायें सम्भव हैं तो प्राचीनकाल के एकतन्त्र नरेशों को सावधान रहने की कितनी अधिक आवश्यकता थी, इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा।

प्राचीन काल को सैनिक व्यवस्था

५६ तो हुआ अपनी शारीरिक रक्षा का वर्णन । अब राज्य की रक्षा के लिये इससे कहीं अधिक तैयारियाँ करनी पड़ती हैं। ‘मत्स्य पुराण के अनुसार दुर्ग या किले छ: प्रकार के होते हैं-धनुदुर्ग-महीदुर्ग नरदुर्ग, वार्धदुर्ग, जलदुर्ग, और गिरिदुर्ग । इनमें से अपनी परिस्थिति के अनुसार किसी एक प्रकार का किला बनवाकर उसमें रक्षा की सब प्रकार की सामग्री इकट्ठी करनी चाहिए। इस सम्बन्ध में पुराणकार ने अस्त्र शस्त्रों तथा अन्य सामग्री की जो सूची दी है, उससे हमें प्राचीन काल के युद्धों के स्वरूप को बहुत कुछ अनुमान कर सकते हैं

‘दुर्ग में सभी प्रकार के आयुधों का संग्रह करना अत्यावश्यक है। इसके लिए राजा को धनुष, तीर, तलवार, तोमर, कवच, लठ्ठ, फरसा, परिघ, पत्थर, मुगदर, त्रिशूल, पटिश, कुठार, प्राश, भाला, शक्ति, चक्र, चर्म आदि का संग्रह करना आवश्यक है। कुदाल, चुर, | बैंत, घास-फूस और अग्नि की भी व्यवस्था रहे । ईधन और तेल का पूरा संग्रह होना चाहिये

युद्धकाल में सेना के लिय से और घायलों को चिकित्सा के लिये औषधियों का संग्रह भी आवश्यक है । इसका वर्णन करते हुए कहा है–जौ, गेहूँ, मूग, उदं, चावल आदि सब प्रकार के अन्न इक किये जायें सन, मूज, लाख, सुहागा, लोहा, सोना, चांदी, रत्न, वस्त्र आदि सभी आवश्यक वस्तु, जो यही कहीं गई हैं और नहीं भी कही गई हैं, राजा द्वारा सञ्चित की जानी चाहिये। सब प्रकार की वनस्पतियों तथा औषधियां जैसेजीवकर्षण, काकोल, आमलकी, शालपर्णी, मुग्दरपर्णी | माषपर्णी, सारिया, बला, घारा, श्वसन्ती, वृष्या, वहती, कण्टकारका, शृङ्गी, शृङ्गाटकी, द्रोणी, वर्षाभू, दर्भ, रेणुका, मधुपर्णी, विदारीकन्द, महाक्षी, महातपा, सहदेई, कटुक, एरण्ड, पर्णी, शतावरी, फल्गु, सर्जरयाष्टिका, शुक्राति शुकका, अमरी, छत्राति छत्रका, वीरणा, इक्ष, इक्षुविकार (सिरका), सिही अवरोधक, मधुक, शतपुष्पा, मधूलिका, मधूक, पीपल, ताल, आत्मगुप्ता, कतुफला, दाविना, राजशीर्षकी, राजसषेप (सरसों), धान्याक, उत्कटा, कालगाक, पद्मबीज, गोबरली, मधुवल्लका; शीतपाकीं, कुबेराक्षी, काकजिवी, उपुष्पिका, त्रयुष, गुजातक, पुनर्नवा, कसेरू, कारु काश्मीरी, वय, शालूक, केसर, सवतुष धान्य, शमीधान्य, क्षीर, औद्र, तक्र, तेल, बसा, मज्जा, घृत, नीम, अरिष्टिक, सुरा, आसव, मद्य, मण्ड़ अदि सभी का संग्रह किया ज्ञाप ( १८ )

यह सूची बहुत बड़ी—इससे लगभग चार-पाँच गुनी है। हमने केवल थोड़े से नाम चुन कर दे दिये हैं, जिससे पाठक अनुमान कर सकें कि उस समय भी चिकित्सकों को जड़ी-बूटियों को पर्याप्त ज्ञान था ।

आजकल भी युद्धक्षेत्र में सेनाओं के साथ बड़े-बड़े अस्पताल रखे जाते हैं। जिनमें सैकड़ों डाक्टर और नसें काम करती हैं। उनमें औषधियों का भी बड़ा भण्डार रहता है, जिसमें हजारों तरह के इञ्जेक्शन, कैपसूल, टैबलेट, टिंचर, एसिड आदि होते हैं। पहले जङ्गल की वनस्पतियों अपने असली रूप में ही अधिकतर काम में लाई जाती थीं, अब इनको वैज्ञानिक प्रक्रिया से साररूपमें बदल कर इन्जेक्शन, टैबलेट आदि के रूप – में बना दिया जाता है। साथ ही घावों की चिकित्सा के लिए घी, तेल, चर्बी, मज्जा, अन्तड़ी, हड्डी आदि का प्रयोग भी किया जाता था। योग्य राज्य कर्मचारियों का चुनाव : + पर इन सब बातों से भी अधिक महत्वपूर्ण है योग्य राज्य अधिकारियों और कर्मचारियों का चुनाव । इस प्रकरण के आरम्भ में ही यह कहा गया है कि “चाहे कोई छोटा कार्य भी क्यों न हो पर उसे किसी अकेले व्यक्ति द्वारा पूरा किया जा सकना बड़ा कठिन होता है । फिर राज्य शासन तो परम विशाल और महत्व का कार्य है। अतएव नृपति को स्वयं ही ऐसे कुलीन सहायकों का वरण करना चाहिए जो शूरवीर, उत्तम जाति के, बलशाली और श्री सम्पन्न हों। इस सम्बन्ध में राजा को यह ध्यान रखना चाहिये कि सहायक रूप और अच्छे गुणों से सम्पन्न सज्जन, क्षमाशील, सहिष्ण, उत्साही, धर्म के ज्ञाता और प्रिय बचन बोलेन वाले हों।

। ‘सेनापति राजा का परम सहायक होता है। वह कुलीन, शीलस्वभाव से मुक्त, धनुर्विद्या का महान् ज्ञाता, हाथियों और घोड़ों की शिक्षा में प्रवीण, शकुन-शास्त्र को जानने वाला, चिकित्सा के सम्बन्ध में ( १६ )

ज्ञान रखने वाला, कृतज्ञ, कर्म शूर, सहिष्ण, सत्य प्रिय, गूढ़ तत्वों के विधान का ज्ञाता हो । ऐसे विशिष्ट गुणों से युक्त व्यक्ति को सेनाध्यक्ष बनाना चाहिए । राजा का दूत ऐसा व्यक्ति होना चाहिये जो दूसरों के चित्त के भावों को ठीक तरहू समझता रहे। वह अपने स्वामी के कथन के आशय को ठीक ढङ्ग से प्रकट करने वाला, देश भाषा का विद्वान् वाग्मी साहसी और देश-काल की परिस्थिति को समझने वाला होना चाहिये, राजा के अङ्गरक्षक हर तरह से मुस्तैद, बहादुर, दृढ़ राजभक्त और धैर्यवान् हौं । संधि और विग्रह का निर्णय करने वाला अधिकणे (विदेश सचिव) नीति शास्त्रों का पंडित, देशभाषाओं का विद्वान्, षड्गुण का ज्ञाता और परम व्यवहार कुशल होना चाहिए। आय व्यय विभाग का अध्यक्ष ऐसा व्यक्ति हो जो देश की उपज से अच्छी तरह परिचित हो । रसोई घर को अध्यक्ष पाकशास्त्र के साथ ही चिकित्सा शास्त्र का भी पूर्ण झोता हो ।’

‘मत्स्यपुराण’ में राजा के कर्तव्यों और राज्य व्यवस्था का जो वर्णन किया है उससे विदित होता हैं कि पुराने जमाने में भी राओं की जीवन वैसा सुखद और ऐश आराम का न था, जैसा अनजान लोग कल्पना किया करते हैं। निस्सन्देह उसके सर पर रत्नजटित मुकुट होता था वह सोने के सिंहासन पर बैठता था और उसके महल में बीसियों रानियाँ और सैकड़ों दास-दासी होते थे, पर उसे सदा प्राणों का खटका भी बना रहता था। जो राजा इन कर्तव्यों की अवहेलना करते थे और रास-रंग में डूब कर कुशासन करने लगते थे वे प्रायः दूसरे राजाओं के आक्रमण से नष्ट-भ्रष्ट होजाते थे। इसलिए उस समय शासकों को और नहीं तो अपनी सुरक्षा के ख्याल से ही प्रजापालन और न्यायमुक्त व्यव हार का ध्यान रखना पड़ता था, जिससे उनकी स्थिति सुदृढ़ बनी रहे और वे बाह्य आक्रमणों का मुकाबला सफलता पूर्वक कर सकें।  ( २० )

पुरुषार्थ की प्रधानता

हमारे उपरोक्त मन्तव्य की पुष्टि पुराणकार ने भी एक अन्य प्रकार से की है। उसने ‘राज-धर्म के प्रसंग में एक अध्याय में यह प्रश्न उठाया हैं कि “दैव और पुरुषार्थ मैं कौन बड़ा है ?” इसके उत्तर में मत्स्य भगवान् द्वारा कहलाया गया है कि “दैव नाम वाला जो फल प्राप्त होता है वह भी अपना पूर्व कर्म ही होता है, इसलिए विद्वानों की सम्मति में पुरुषार्थ ही सर्व प्रधान है। यदि देव प्रतिकूल भी होता है, तो इसका पौरुष के द्वारा हनन हो जाता है । जो श्रेष्ठ आचार वाले और सदैव उत्थान का प्रयत्न करने वाले व्यक्ति होते हैं पुरुषार्थ से प्रतिकूल देव को बदल डालते हैं यह सत्य है कि कुछ उदाहरणों में अनेक व्यक्तियों को बिना पुरुषार्थ भी अच्छा फल, सौभाग्य युक्त स्थिति प्राप्त हो जाती है, जिसे पूर्व जन्म के प्रारब्ध को परिमाण माना जाता है । पर यदि वर्तमान में भी पुरुषार्थ और सत्कर्म न किये जायें तो वह स्थिति प्राय: थोड़े ही समय रहती है। इसलिए हम कह सकते हैं कि दैव, पुरुषार्थ और काल (परिस्थितियां) ये तीनों मिलकर ही मनुष्य को फल देने वाले हुआ करते हैं। पर इनमें भी पुरुषार्थ को ही प्रधान समझना चाहिये, क्योंकि कहा गया है–

नालसः प्राप्नवन्त्यर्थात् न च देव परायणः ।।

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन आचरेद्धमुत्तमम् ।। अर्थात्—“जो व्यक्ति आलसी होते हैं अथवा जो केवल दैव (भाग्य) के ही भरोसे रहते हैं, वे धनोपार्जन में सफल नहीं हो सकते । इसीलिए सदैव प्रयत्न पूर्वक उत्तम धर्म (पुरुषार्थ का पालन करना चाहिए।” जो लोग समझते हैं कि पुराने धर्म ग्रन्थों में भाग्य को ही प्रधान बताकर भारतवासियों को भाग्यवादी’ बना दिया है उनको ‘मरस्य पुराण’ के उपरोक्त कथन से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए । ( २१ )

भारतीय गृह निर्माण कला

मत्स्य पुराणान्तर्गत निर्माण सम्बन्धी वर्णन से सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में भी इस विद्या की काफी खोज की गई थी। जो लोग भारत को अद्ध सभ्य’ कहृते हैं और जिनका ख्याल है कि उस जमाने में यहाँ के मनुष्य जङ्गली प्रदेशों के निवासियों की तरह केवल झोंपड़ों अथवा कच्ची मिट्टी के छप्पर वाले मकानों में ही रहते थे, उनका कथन ‘मत्स्य पुराण’ के बर्णन से असत्य सिद्ध हो जाता है। इससे मालूम होता हैं कि ‘गृह निमणि-कला’ का आरम्भ और प्रसार बहुत पहले हो चुका था । अध्याय के आरम्भ में ही प्राचीन भारत के उन अठारह ‘वास्तु विज्ञान ज्ञाताओं’ (इजीनियरों) के नाम दिये गये हैं। जिन्होंने इस विषय में विशेष मनन और प्रयत्न करके प्रसिद्धि प्राप्त की।

यी

भृगुरत्रिर्दशिष्ठश्च विश्वकर्मा मयस्तथा

नारदोनग्नजिच्चैव विशालाक्षः पुरन्दरः ।।

ब्रह्माकुमारो नन्दीशः शौनको गर्ग एव हो

बासुदेवौऽनिरुद्धश्च तथा शुक्र बृहस्पति ।।

अष्टादशेते विख्याता वास्तु शास्त्रोपदेशकः

संक्षेपेणोपदिष्टन्तु मनवे मत्स्य रूपिणी ।।

अर्थात्-‘भृगु, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नग्नजित, विशालाक्ष, पुरुन्दर, ब्रह्मा, कुमार, नन्दीश, शौनक, गर्ग, वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र और बृहस्पति-ये अठारह प्रसिद्ध ‘वास्तु शास्त्र’ के उपदेशक हैं और उन्हीं की विधियों का वर्णन संक्षेप में ‘मत्स्य भगवान् ने मनु जी को सुनायो ।’

मालूम होता है उस समय इन नामों अथवा उपनाम वाले मनी षियों द्वारा रचित ‘वास्तु विज्ञान सम्बन्धी ग्रन्थ प्राप्त होंगे और उन्हीं में से एकाधिक ग्रन्थ के आधार पर संक्षेप में ‘मत्स्य पुराण’ ने इस कला का ( २२ )।

परिचय दिया है। हो सकता है ब्रह्मा, विश्वकर्मा, कुमार आदि की | नाम इस विषय में भी देवताओं की प्रधानता दिखाने के लिए शामिल कर दिया हो, तो भी प्राचीन समय में कितने ही उच्च कोटि के विद्वानों | ने इस विषय पर भी लिखा था, इसमें सन्देह नहीं । अब भी उनमें से | ‘मानसार’ आदि दो-एक ग्रन्थ देखने में आते हैं जिनको जानकर लोगों से बड़ी प्रशंसा सुनने में आती है। ‘मर्य’ तो दैत्य’ जाति वालों को प्रसिद्ध शिल्प शास्त्र ज्ञाता प्रसिद्ध है। महाभारत के अनुसार महाराज युधिष्ठिर के लिये इन्द्रप्रस्थ की अपूर्व राज-सभा उसी ने बनाई थी। संभव है जिस प्रकार आर्य जाति में शिल्प विज्ञान के ज्ञाता को विश्वकर्मा’ की पदवी दी गई, उसी प्रकार आर्यों की विरोधी दैत्य जाति में शिल्प कला के प्रमुख ज्ञाता को ‘मय’ के नाम से पुकारा जाता हो, और पांडवों को संयोगवश उसी जाति का कोई शिल्प विद्या विशारद मिल गया हो। कुछ भी हो ‘मत्स्य पुराण’ में सामान्य गृह, महल, भवन, प्रासाद, स्तम्भ, दर्वाजे, मंडप, वेदो, आदि के जितने भेद बतलाये हैं। और विस्तार पूर्वक उनकी विशेषताओं का वर्णन किया है, उससे यह अवश्य सिद्ध होता है कि उस जमाने में भी इस कला की काफी खोज बीन की गई थी और तदनुसार अनेक छोटे-बड़े गृहों का निर्माण भी किया जाता था । विभिन्न प्रकार की आकृति के गृहों का वर्णन करते हुए पुराणकार ने लिखी है–

‘सबसे उत्तम गृइ बहू होता है जिसमें चारों तरफ दरवाजे | और दालान होते हैं। उनका नाम ‘सर्वतोभद्र’ कहा जाता हैं और देवालय तथा राजा के निवास के लिये वही प्रशस्त होता हैं। जिसमें | तीन तरफ द्वार और दालान होते हैं पर पश्चिम की तरफ द्वार नहीं | होता वह ‘नन्द्यावत’ कहलाता है। जिस भवन में दक्षिण की तरफ द्वार नहीं होता वह ‘बद्ध मान’ कहा जाता है। पूर्व की तरफ बिना | दरवाजा वाला ‘स्वास्तिक’ नाम से प्रसिद्ध है। उत्तर की तरफ द्वार से रहित ‘रुचक’ कहा जाता है ।। ( २३.)

“राजा के निवास गृह पाँच प्रकार के होते हैं। जो सर्वोत्तम माना गया है उसकी लम्बाई एक सौ आठ हाथ (५४ गज) होती हैं। इस घर की जो अन्य चार श्रेणियाँ होती हैं उनमें से प्रत्येक की लम्बाई एक दूसरे से आठ हाथ कम होती जाती है। इसी प्रकार युवराज के प्रथम श्रेणी के महल की लम्बाई ६० हाथ होती है और बाद की चार 8 fणयों वाले गृहों की लम्बाई क्रम से छः-छः हाथ कम होती चली जाती है। इसी तरह सेनापति के उत्तम गृह की लम्बाई चौंसठ हाथ, मन्त्रियों के घरों की साठ हाथ, सरदारों और मन्त्रियों की घरों की अड़तीस हाथ होती है। शिल्प विभाग, व्यवस्था और मनोरञ्जन के अधिकारियों के घर अट्ठाईस हाथ लम्बे होने चाहिये। राजा के यहाँ नियुक्त वैद्य, ज्योतिषी, सभा के प्रबन्धक, पुरोहित के मकान चालीस हाथ लम्बाई के होते हैं । इन सबकी चौड़ाई दर्जे के अनुसार लम्बाई से एक तिहाई, चौथाई या छठवाँ भाग होती है।”

वर्तमान समय में भी अधिकाँश व्यक्ति घर के शुभ-अशुभ होने में बहुत विचार किया करते हैं, और नये घर में गृह-प्रवेश’ का बड़ा महत्व माना जाता है। मत्स्य पुराण’ के इस सम्बन्ध में बहुत अधिक विधि-विधान दिये गये हैं, और गृह-निर्माण तथा गृह-प्रवेश किन मुहूर्ता में किया जाय इस सम्बन्ध में बहुत कुछ लिखा गया है । प्राकृतिक शोभा वर्णन यद्यपि प्राचीन काल में जितने संस्कृत ग्रन्थ लिखे गये थे वे सभी पद्य में है, वैद्यक, ज्योतिष, शिल्प, कानूम आदि सभी विषयों को भी कारणबश पच्चों में लिखा गया है, पर यह स्पष्ट है कि इस प्रकार की रचनाओं में उच्च साहित्यिक गुण नहीं आ सकते। उनमें मुख्य रूप से उपयोगिता पर ही ध्यान रखा जाता है, काव्य-सौष्ठव को गौण माना जाता हैं । पर ‘मत्स्य पुराण’ में अनेक स्थलों पर प्राकृतिक ६ श्यों धी जो (२४ )

वर्णन किया गया है वह इस दृष्टि से भी उसके लेखक की विद्वता को प्रकट करता है । वैसे साधारण रूप से भी इस पुराण की भाषा कितने ही अन्य पुराणों और उपपुराणों अधिक परिष्कृत जान पड़ती है, पर कवि की बिक्षेषता राजवंश, ऋषिवंश, पूजा उपासना की विधि, प्रायश्चित्त के विधान आदि विषयों का वर्णन करने में नहीं जानी जा सकती। इनमें तो उपयोगिता की दृष्टि से तुकबन्दी की जैसी ही रचना करना पड़ती है।

पर जहाँ कहीं प्राकृतिक शोभा के वर्णन का अवसर आ जाता | हैं वहाँ कवि की कल्पना और प्रतिभा ऊँची उड़ान लेने लगती है और योग्य कवि अपनी विशेषता को प्रकट कर सकता है । ‘मत्स्य पुराण’ में हिमालय पर्वत, कैलाश, नर्मदा, वाराणसी को शोभा का जो वर्णन किया है इसकी गणना भाषा और भाव की दृष्टि से अपेक्षाकृत उत्तम कविता में की जा सकती है। यद्यपि इस प्रकार की पौराणिक रचनाओं की तुलना कालिदास, भवभूति, माघ आदि जैसे कवियों की रचनाओं से नहीं की जा सकती, जिनका मुख्य उद्देश्य कविता की उत्कृष्टता को ही दिखलाना होता है और जो कवि-कर्म को अपने जीवन का चरम ध्येय मानते हैं। पुराण रचयिता इसके बजाय अपना मुख्य उद्देश्य लोगों को सरल भाषा में धर्मोपदेश देना और विविध प्रकार के विधि विधानों का ययास था वर्णन करना समझते हैं, और उसी इङ्ग को करते हैं। इसलिये साहित्यिक गरिमा किन्हीं पुराणों में विशेष स्थलों पर ही दिखाई पड़ती है । उदाहरण के लिये हम ‘मत्स्य पुराण’ के हिमालय-वर्णन का कुछ अश नीचे देते हैं

“परम पुण्यमयी सरिता का अवलोकन करता और उसके समीप विश्राम करता हुआ पथिक जब महागिरि हिमालय के निकट पहुँचता है तो उसका दर्शन करके चकित होता है । इस हिमवान पर्वत के भूरे रंग | वाले उच्च शिखर आकाश को छूते प्रतीत होते हैं । वे इतने ऊचे हैं कि पक्षी भी वहां नहीं पहुँच सकते । वहाँ नदियों के जल से उत्पन्न होने(२५)

वाले महाशद के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का शब्द सुनाई नहीं पड़ता। वे सरिता, परम मनोरम और शीतल जल से परिपूर्ण हैं। देवदाई के वृक्षों को जो वन पर्वत के निम्न भागों में लगा हैं वहीं मानों उसका हरित अधोवस्त्र है, और ऊपर के भाग में जो मेघ घिरे रहते हैं। सही उत्तरीय (ऊपर ओढ़ने वाली वस्त्र) है। सबसे ऊपर जो श्वेत वर्ण को बदल दिखाई पड़ता है वहीं उसकी पगड़ी हैं, जिस पर सूर्य और चन्द्रमा मुकुट के समान ज्ञान पड़ते हैं। इस प्रकार यह महागिरि एक नृपति की भाँति ही जान पड़ता है। उसका सर्वाङ्ग चन्दन की भाँति श्वेत हिम से चचित रहता है और कहीं-कहीं सुवर्ण आदि वस्तुओं की आभा आभूषणों का उद्देश्य भी पूरा कर देती हैं । अनेक स्थानों पर इरिसमा युक्त घास और झाड़िी ऐसी घनी हैं कि उनमें इवा का भी। प्रवेश नहीं होता है और कहीं रङ्ग बिरंगे सुन्दर फूलों का बगीचा-सा लगा है । ऐसा यह महा पर्वत ‘तपस्वि शरणं शैल कामिनामतिदुर्लभम्” तपस्वियों के लिये उत्तम आश्रय-स्थल काम-सेवन करने वाली के लिए अत्यन्त दुर्लभ है ।”

सावित्री उपाख्यान

सावित्री उपाख्यान पति व्रत धर्म की महिमा के लिये भारतीय साहित्य में बहुत प्रसिद्ध है, और उसके आधार पर यहाँ के कवियों ने अनेक उत्कृष्ट कोटि की रचनायें प्रस्तुत की हैं। भारत ही नहीं इस उपाख्यान ने विदेशों के विद्वानों तक को आकृष्ट किया है और इसको लेकर अ ग्रेजी में भी सुन्दर काव्य लिखे गये हैं। उस उपाख्यान का मुझय उद्देश्य नारियों के सम्मुख पतिव्रत को आदर्श उपस्थित करना ही है जैसा कि इस कथानक के आरम्भ में कहा गया है | “इसके उपरान्त अपरिमित बल-विक्रम वाले उस राजा (मनु) ने देवेश मत्स्य से कहा–भगवन् ! पतिव्रत नारियों में कौन-सी नारी । श्रेष्ठ हैं और किसने अपने पतिव्रत के द्वारा मृत्यु को भी पराजित कर ३६ ) 

दिया था ? मनुष्यों को इस सम्बन्ध में किसके परम शुभ नाम की कीर्तन करना चाहिये ? ‘मत्स्य भगवान ने कहा-”नि:सन्देह पतिव्रता का माहात्म्य इतना अधिक है कि मृत्यु का अधीश्वर यमराज भी ऐसी नारियों की अवमानना नहीं कर सकता। अब मैं तुमको एक ऐसी ही पापनाशक कथा सुनाता हैं जिसमें एक परम श्रेष्ठ पतिव्रता ने अपने – स्वामी को मृत्यु के पाश से भी छुड़ा लिया था।”

इस वर्णन के आधार पर हम कह सकते हैं कि संभतः यह ‘सावित्री उपाख्यान’ कवि-कल्पना-प्रसूत ही हो और धर्म के अनुयायी की महिमा को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से ही इसकी रचना की गई। हो। फिर भी संसार में ऐसी नारियाँ हुई हैं जिन्होंने वास्तव में अपने पति को यमराज’ के घर से लौटाया हैं। इतिहास में एकाध ऐसी वीरांगना का वर्णन मिलता है, जिसका पति युद्ध में विषाक्त बाण लगने से मरने लगा, पर उसने तत्काल अपने मुह से दूषित रक्त को चूस कर । बाहर निकाल दिया और अपने प्राणों की चिन्ता न करके प्रिय पति के प्राणों की रक्षा की। इसी घटना का वर्णन करते हुए ब्रजभाषा के एक आधुनिक कवि ने लिखा था

सहृदय प्यारी, मृत्यु पराजित होत प्रेम सों निश्चय जानन हारी ।। वीरासन व भूपति पति को ले भुज लता सहारे । व्रण सों विष चूस्यौ लगाय जिन मधुराधर अरुणारे ।

कुछ भी हो ‘सावित्री उपाख्यान’ एक ऐसी महान् पतिव्रता की। कल्पना हैं जिसने आज तक लाखों नारियों को प्रेरणा देकर उनको पति की सच्ची सहगामिनी बनाया है। यमराज के सम्मुख उसके द्वारा प्रकट किये ये उद्गार आज भी पति की अनुगामिनी स्त्रियों के कानों में | गूजते रहते हैं- 1

मि .

१८ 11

मत्स्य पाणी एका २१

मत्स्यावतार वर्णन प्रचण्डताण्डवाटोपे प्रक्षिप्तायेन दिग्गजाः भवन्तुविघ्नभङ्गाय भवस्य चरणाम्बुजाः ,पातालादुत्पतिष्णो र्मकरबसतयो यस्य पुच्छाभिघाता दूध्वं ब्रह्माण्डखण्डब्यतिकरविहितव्यत्यनेनापतन्ति ।१ . बिष्णोर्मत्स्यावतारे सकलबसुमतींमण्डलं व्यशुमानं, तस्यास्योदीरितानां ध्वनिरपहरतादश्रियम्वः श्रुतीनाम् नारायणं नमस्कृत्य नरञ्बैंच नरोत्तमम् ।। देवी सरस्वती व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ।३ अजोऽपियः क्रियायोगा नारायण इतिस्मृतः त्रिगुणायत्रिवेदाय नमस्तस्मै स्वयम्भुवे ।४ सुतमेकान्तमासीनं नैमिषारण्यवासिनः मुनयो दीर्घ सत्रान्तेपप्रच्छुर्घसंहिताम् ।५। प्रवृत्तासु पुराणीषु धम्र्यासु ललितासु ।। कथासु शौनकाद्यास्तु अभिनन्द्य मृहुमु हुः ।६ कथितानि पुराणानि यान्यस्माकं त्वयानघ तान्येवामृतकल्पानि श्रोतुमिच्छामहेपुनः ।७ ।। वे भगवान् भव के चरण कम विघ्नों के शि करने के लिये होवें जिन्होंने अपने परम प्रचण्ड ताण्डव नृत्य के आटोप में दिग्गजों अर्थात् दिशाओं के अधिपतियों के गजों को भी प्रक्षिप्त कर दिया जा अर्थात् कर फेंक दिया था ।१। पाताल लोक से उत्पतन शील [ ३४ ]

 

मत्स्य पुराण जिसके पुछके अभिघात से ऊपर की ओर ब्रह्माण्ड के खण्डों के व्यति कर से किये हुए व्यत्यम से मकों की वस्तियाँ आकर गिरा करती हैं उन्हीं भगवान् विष्णु के मत्स्यावतार में यह समस्त पृथ्वीमण्डल व्यंशु | मान हो गया है उनसे मुख से उदीरितों की ध्वनि आपकी श्रुतियों की अश्री का अपहरण करे ।२। भगवान् नारायण और नरों में सर्वश्रेष्ठ नरदेवी सरस्वती महामहिम महर्षि व्यासदेव को नमस्कार करके इसके | अनन्तर भगवान् की जय हो’–ऐसा मुख से उच्चारण करना चाहिये। ।।३। जो अजन्मायी है वह भी किन्तु क्रिया के योग से नारायण कहे गये हैं। उन तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से युक्त तीनों (साम, यजु और ऋक) वेदों वाले भगवान् स्वयम्भू की सेवा में नमस्कार अर्पित है ।४। एकान्त स्थल में समासीन सूतजी से नैमिषारण्य के निवास करने | वाले मुनियों ने अपनी दीर्घ सत्र की अवसान बेला में दीर्घ संहिता के विषय में पूछा था ५ि। धर्म से संयुत परम ललित पुराणों की कथाओं के प्रवृत्त होने पर शौनक आदि ऋषियों ने बारम्बार अभिनन्दन था।६। महर्षियों ने सुतजी से कहा था–हे अनघ ! हम लोगों को कृपा करके आपने जो पुराण सुनाये हैं ॥७॥

कथंसंसर्जभगवान् लोकनाथश्चराचरम् कस्माच्च भगवान्विष्णुमत्स्यरूपत्वमाश्रितः ।८ भैरवत्वं भवस्यापि पुरारित्वञ्च गद्यते कस्य हेतोः कपालित्वं जगाम् वृषभध्वजः ।६ सर्वमेतत्समाचक्ष्व सूत ! विस्तरशः क्रमात् त्वद्वाक्येनामृतस्येव तृप्तिरिहजायते ।१०. ! :- पुण्य पवित्रमायुष्यमिदानीं शृणुत द्विजाः … ‘

मत्स्य पुराणमखिलं यज्जागाद गदाधरः ११ :: ::* | पुरा राजा मनुर्नाम चीर्णवान् विपुलन्तपः

भत्स्यावतर वर्णन

३५ पुत्रराज्यं समारोप्यंक्षमावान् रविनन्दनः ।।१२ ।। मलग्रस्यैकदेशेतु सर्वात्मगुणसंयुतः । समदुःखसुखोबरः प्राप्तवान् योगमुत्तमम् ।१३। ।

बभूव वरदश्चास्य वर्षायुतशते गते । ५० वरम्वृणीष्व प्रोवाच प्रीतः स कमलासनः ।१४ लोकों के स्वामी भगवान ने इस चराचर सम्पूर्ण सृष्टि का किस प्रकार से मृ जन किया था और किस कारण से भगवान् विष्णु ने मत्स्य की स्वरूप धारण किया था ।८। भगवान् भव की भी भैरव स्वरूपता पुरारित्व होना कहे। जाया करता है अर्थात् त्रिपुरासुर के हनन करने वाले और भैरव स्वरूप धारण करने वाले भव को कहा करते हैं किन्तु ऐसा कौन-मा कारण है जिसके होने से भगवान वृषभध्वज़ प्रभु कपाल हो हो गये हैं।६। है सूतजी यह सभी कुछ आप विस्तार पूर्वक क्रम से इमको बतलाने का अनुग्रह करें। आपकी परम श्रेयस्करी मधुर बचनावली ही ऐसी है जो अमृत के समान ही है कि इससे हमको कभी तृप्ति नहीं होती हैं । १० श्री सूतजी ने कहा है द्विजगण ! इस समय में परम में परम पृण्यमय आयु की वृद्धि करने वाला और अति पवित्र सम्पूर्ण मत्स्य पुराण का ही आप लोग श्रवण करिये जिसको भगवान् गदाधर ने स्वयं कहा था।११। प्राचीनकालमें मनु नामधारी एक राजी था जो चीर्ण वाला और बहुतही अधिक तपस्वीं था । उसने अपने पुत्र पर समस्त राज्य का भार सौंपकर वह क्षमाकान रविनन्दन योगाभ्यासी होगया था ।१२। मलय देशकै एक भाग में वह सम्पूर्ण आत्मा के गुणों से संवृत होकर तथा सुख और दुःख दोनों को समान भाव से मानकर वीर उत्तम योग को प्राप्त हो गया था। १३। जिस समय में एक सौ दश सहस्र वर्ष व्यतीत हो गये थे तब वह भगवान कमलासन परम प्रसन्न हो गये थे और इसको वरदान देने वाले बम गये थे। उन्होंने मनु के समीप में साक्षात् समुपस्थित होकर कहा था, जो चाहो वरदान माँग लो ।१४।

 

मत्स्य पुराण एवमुक्तोऽब्रवीदाजां प्रणम्य पितामहम् एकमेवामिच्छामि त्वत्तो वरमनुत्तमम् १५ भूतग्रामस्य सर्वस्य स्थावरस्य चरस्य भवेय रक्षणायालं प्रलये समुपस्थिते ।१६ एवमस्त्विति विश्वात्मा तत्रैवान्तरधीयत ।।३। पुष्पवृष्टिः सुमहती खात्पपात सुरापिता ।१७ ।। कदाचिदाश्रमे तस्य कुर्वतः पितृतर्पणम् ।। पपात पाण्ड़योरुपरि शफरी जलसंयुता १८ दृष्ट्वा तच्छफरीरूपं दयालुर्महीपतिः ।। रक्षणायाकरोद्यत्नं तस्मिन् करकोदरे १९ अहोरात्रेण चैकेन षोडशांगुलविस्तृतः ।। सोऽभवन्मत्स्यरूपेण पाहि पाहीति चाब्रवीत् ।२० तमादाय मणिक प्राक्षिपज्जलचारिणम् ।। तत्रापि चैकरात्रेण हस्तत्रयमवर्धते ।२१ |

जब राजा ने इस तरह ब्रह्माजी के द्वारा कहा गया तो उसने पितामह के चरणों में प्रणाम किया था और फिर राजा ने कहा है। भगवन ! मैं आपसे केवल एकहीं अत्युत्तम वरदान प्राप्त करना चाहता हैं ।१। जिस समय में इस सम्पूर्ण भूतों के समुदाय का तथा समस्त स्थावर और चर सृष्टि का प्रलयकाल उपस्थित होतों इस भीषणसमय में मैं सबकी रक्षा करने के कर्म से असमर्थ हो जाऊ” ।१६। इस बरकी याचना को सुनकर विश्वात्मा ने कहा-एवमस्तु ! अर्थात् ऐसा होवे। यह कहने के बाद में ही वहीं पर अन्तहित हो गये थे। उसी समय में अन्तरिक्ष से देवगण के द्वारा की गई बड़ी भारी पुष्पों की वर्षा होने लगी थी ।१७। इसके अनन्तर किसी समय में वह मनू आश्रम में अपने पितृगण के लिये तर्पण कर रहे थे तो उनके हाथों में एक शफरी (मछली) जल के साफ ही आगई थी ।१६। उस दयालु महीपति ने उस मत्स्यावतार वर्णन शफरी के स्वरूप को देखकर उसी की रक्षा करने का यत्न किया था और उसने उसे करकोदर में रख दिया था ।१६। एक ही अर्थ रात्रि के समय में वह सोलह अगुल के विस्तार वाला हो गया था और वह मत्स्य रूप से सम्पन्न होकर उस राजा से ‘मेरी रक्षा करो यह बोला ।२०। उस राजा ने उस जलचारी को लेकर एक मणिक में झल दिया था। वहाँ पर भी वह एक ही रात्रि में तीन हाथ का होकर बढ़ गया था ।२१।

पुनः प्राहार्तनादेन सहस्रकिरणात्मजम्

समत्स्यः पाहि पाहीति त्वामहं शरणाङ्गतः ।२२ . तः सः कूपे मत्स्यं प्राहिणोद्रविनन्दनः ।। यदा माति तत्रापि कूपे मत्स्यः सरोवरे ।२३। | क्षिप्तोऽमौ पृथुतामगात्पुनर्योजनसम्मिताम्

तत्राप्याह पुनर्दीनः पाहिपाहि नृपोत्तमः ।२४ ततः मनुना क्षिप्तोगङ्गावामध्यवर्धत यदा तदा समुद्र प्राक्षिपन्मेदिनीपतिः ॥२५ यदा समुद्रमखिलं व्याप्यासौ समुपस्थितः तदा प्राह मनुर्भातः कोऽपित्वमसुरेतरः ॥२६॥ अथवा बासुदेवस्त्वमन्य ईक्कथं भवेत् ।।१।। योजनायुतविशत्याकस्य तुल्यं भवेद्वपुः ॥२७॥ ज्ञातस्त्वमत्स्यरूपेण मां खेदयसिकेशव ! हृषीकेष ! जगन्नाथ ! जगद्धाम ! नमोऽस्तुते ।२८

उस मत्स्य ने फिर उस सूर्य के पुत्र नृपति से बड़े ही आर्तनाद में कहा था कि मेरी रक्षा करो-रक्षा करो-मैं तो इस समय में आपकी शरणागति में आ गया हैं ।२२। इसके पश्चात् उस रवि के पुत्र राजा ने उस मत्स्य को कुये में डाल दिया था। जब वह मत्स्य कुये में भी नहीं समाया था तो उस मत्स्य को एक सरोवर में प्रक्षिप्त कर दिया मत्स्य पुराण था । पर भी वह बहुत बड़ा होकर कि योजन के विस्तार वाला हो गया था और वहाँ पर भी वह फिर अधिक दीन होकर राजासे बोला था-हे नृपश्रेष्ठ ? मेरी रक्षा करो-रक्षा करो ।२३-२४। इसके अनन्तर उस मनु के द्वारा वह गङ्गा में प्रक्षिप्त कर दिया गया था किन्तु वह वहाँ पर भी बढ़ गया था । ऐसा जिस समय में देखा तो उसी समयमें राजा ने उस मत्स्य को समुद्र में डाल दिया था। जब यह सम्पूर्ण समुद्र में व्याप्त होकर समुपस्थित हो गया था तो उस राजा मनु ने अत्यन्त भयभीत होकर उससे बोला था-तुम असुरेतर कौन हो ! ३५ २६॥ अथवा आप साक्षात् भगवान बासुदेव ही हैं ! अन्य इस प्रकार का किस तरह हो सकता है। आपका यह शरीर का आकार अयुत विशति योजन बांला हो गया है ।२७। हे केशब ! मैं अब भली भाँति जान गया हैं कि आप इस विशाल मत्स्यके स्त्र रूपमें समुपस्थित होकर मुझे खेद दे रहे हैं । हे हृषीकेश! हे जगत् के स्वामिन् ! हे जगद्धाम ! आपकी सेवा में मेरा प्रणाम समर्पित है ।२६।।

एवमुक्तःसभगवान्मत्स्यरूपीजनार्दनः साधुसाध्वितिचोबाचसम्यग् ज्ञातस्त्वयाऽनघ ।२६ अचिरेणैव कालेन मेदिनी मेदिनीपते भविष्यति ज्ञले मग्नो सशैलवनकानना ३० नौरियं सर्वदेवानां निकायेन विनिमिता। महाजवनिकायस्य रक्षणार्थ महीपते ।३१ स्बेदाण्डजोभिजोयेवैयेचजावाजरायुजाः अस्यांनिधायसवांस्ताननाथान् पाहिसुब्रत ॥३२ युगान्तवाताभिहता यदाभवतिनौन !

शृङ्गऽस्मिन्मम राजेन्द्र ! तदेमां संयमिष्यसि ।३३ततोलयान्ते सर्वस्य स्थावरस्य चरस्य ।। प्रजापतिस्त्वं भविता जगतः पृथिवीपते ।३४ मत्स्यमन सम्वाद वर्णन ]

एवं कृतयुगस्यादौ सर्वज्ञो धृतिमान्नृपः मन्वन्तराधिपश्चापि देवपूज्यो भविष्यसि ।३५ :

इस प्रकार से राजा ने जब मत्स्य से निवेदन किया तो उस समय में मत्स्य स्वरूप को धारण करने वाले भगवान जनार्दैन ने कहा-बहुत अच्छा बहुत ही ठीक ! हे अवघ! तुमने मुझको अच्छी तरहसे पहिचान लिया है ।२६। हे मेदिनी के स्वामिन् ! अब बहुत ही थोड़े-से समय में यह पृथ्वी जल में मग्न हो जायगी । जिसमें ये समस्त पर्वत वन’ और कानन सभी इस मेदिनी के साथ जल में डूब आगेंगे ।३०। हे महीपते! यह नौका समस्त देवों के निकाय से निमित हुई और महान जीवों के निकाय की रक्षा के लिये ही इसका निर्माण उत्तम है ॥३१॥ हे सुव्रत ! जो भी स्वदेज-अण्डज-जरायुज और उद्भिज जीव है उन सैव अनाथों को इसी नौका में रखकर आप उनकी रक्षा कीजिएगा ।३३। जिस समय में यूगन्ति की वायु से अभिहत यह नौका होवे तब हे नृप ! है। राजेन्द्र ! इमको मेरे शृङ्ग से संयमित कर देना ।३३। है पृथिवीपते ! इसके उपरान्त जिस समय में समस्त स्थापर और चर के लय का अन्तं हो उस वक्त आप ही इस सम्पूर्ण जगत् के प्रजापति होंगे ।३४। इस प्रकार से सतयुग के आदि काल में सर्वज्ञ गौर घृतिमान नृप और देवों के द्वारा पूज्य मन्वन्तर का भी अधिप होगा ।३५।

मत्स्यमनुसंवाद वर्णन एवमुक्तो मनुस्तेन पप्रच्छ मधुसूदनम् | भगवन् ! कियद्भिर्वषैभविष्यत्यन्तरक्षयः

सत्वानि कथं नाथ ! रक्षिष्ये मधुसूदन ! त्वया सह पुनर्योगः कथं वा भवितामम ।३। मत्स्य पुराण अद्य प्रभृत्यनावृष्टिर्भविष्यति महोतले

यावद्वर्षशतं साग्रन्दुभिक्षमशुभावहम् ।३ ततोऽल्पसत्वक्षयदा रश्मयः सप्त दारुणाः सप्तसप्तेभविष्यन्ति प्रतप्ताङ्गारवणिनः ।४ सय और्वानलोऽपि विकृतिङ्गमिष्यति युगक्षये विषाग्निश्चापि पातालात्सङ्कर्षणमुखच्युतः

. भवस्यापि ललाटोत्थतृतीयनयनानलः ।५ त्रिजगन्निर्दहन् क्षोभंसमेष्यति महामुने !

एवंदग्धा महीसर्बा यदास्यभस्मसन्निभो ।६ . आकाशमूष्मणा तप्तम्भविष्यति परन्तप ! तत् सदेवनक्षत्र जगद्यास्यति संक्षयम् ॥६

श्री मूतजी ने कहा- उन मत्स्यावतारी भगवान् के द्वारा इस प्रकार से कहे जाने पर जो मनु ने मधुसूदन प्रभु से पूछा था-हे भग वन् ! यह अन्तर क्षय कितने वर्षों में होगा ! ।१। हे मधुसूदन ! हे नाथ ! इन जीवों की रक्षा किस प्रकार से करूगा ! फिर आपके साथ में मेरा योग कैसे होगा ? ॥२॥ मत्स्य भगवान् ने कहा- आज ही से लेकर इस महीतल में अनावृष्टि (बर्षा का अभाव) होगी । जिस समय | तक साम्र सौ वर्ष होगे तब तक यहाँ पर परम अशुभ का देने वाला अकाल हो जायगा ।३। इसके अनन्तर पुर्ण प्रतप्त अङ्गार के वर्ग के समान वर्ण वाले सप्त सप्ति सूर्य सात दारुण रश्मियाँ हो जायगी जो छोटे-छोटे सत्वों के क्षय को कर देने वाली हैं ।४। युग के क्षय में और्वा नल भी विकृतिको प्राप्त हो जायेगा । पाताल लोकसे भगवान् सकर्षण | के मुख से च्युत विषारिन भी विकृतिस्वरूप धारण करेगा और महादेव जी के ललाट में उत्थित तीसरे नेत्र का अनल भी महान् विकृत रूप धारण करेगा ।५। हे महामुने ! इन तीनों लोकों को निदाघ करते हुए परम क्षोभ को प्राप्त हो जायगा । इस तरह से यह सम्पूर्ण पृथ्वी|

|

मत्स्यमनुसंवाद वर्णन ],

[ ४१ दग्ध हो करके जिस समय में भस्म के सदृश हो जायगी उस समय में, हे परन्तप ! यह समस्त आकाश मण्डल ऊष्मा से एकदम तप्त हो जायगा । इसके अनन्तर देवगण और नक्षत्रों के सहित यह सम्पूर्ण जगत् सशय को प्राप्त हो जायगा ।६।। सम्वत भीमनादश्च द्रोणश्चण्डोबलाहकः । विद्य पताक: शोणस्तुसप्तैतेलयंवारिदाः ।६ कर उसे अग्निप्रस्वेदसम्भूतां प्लावयिष्यन्तिमेदिनीम् । समुद्राः क्षोभमागत्य चकत्वेन व्यवस्थिताः ।६। एतेदेकार्णवंसर्वङ्करिष्यन्ति जगत्त्रयम् । वेदनावमिमां गृह्य सत्यबीजानि सर्वशः । १० आरोप्य रज्जुयोगेन मत्प्रदत्त न सुन्नत । संयम्य नावं मच्छङ्ग मत्प्रभावाभिरक्षितः ।११।। एकः स्थास्यसि देवेषु दग्धेष्वपि परन्तप ! सोमसूर्यावहं ब्रह्मा चतुलॊकसमन्वितः । १२ नर्मदा च नदोपुण्यामार्कण्डेयोमहाऋषि । भवोबेदाः पुराणश्चविद्याभिः सर्वतोवृतम् ।१३।। त्वया सद्धि मिदं विश्वं स्थास्यत्यन्तरसंक्षये । एवमेकार्णवे जाते चाक्षुषान्तरसंक्षये । १४

 

सम्वत्त-भीमनांद-द्रोण—चण्ड-वलाहक–विद्युपताक और शोण ये सात संसार का लय करने वाले मेघ हैं ।८। अग्नि के प्रस्वेद से सम्भत इस मेदिनी को ये मेघ प्लावित कर देंगे । समुद्र भी सब क्षोभ को प्राप्य होकर एक रूप वाले व्यवस्थित हो जायेंगे । यह त्रैलोक ही सम्पूर्ण को एक सागरमय कर देंगे अथात् चारों और त्रैलोक्य में समुद्र के अतिरिक्त अन्य कुछ भी दिखाई नहीं देगा। उस समय में इस वेद नौका का ग्रहण करके सभी ओर से सत्व वजों को इसमें समरोपित करके हे सुव्रत ! मेरे द्वारा दिए रज्जु के योग से इस नाब का संयमित मत्स्यपुराण: करके मेरे ही शृङ्ग में मेरे प्रभाव से सुरक्षित होगा।६-११। है परन्तप.. समस्त देवों के दग्ध हो जाने पर भी एक देव उस समय में भी स्थित रहेगा । वह मोम और सूर्य समाहुन करने वाले चारों लोकों से सम न्वित ब्रह्माजी होंगे ।१२। नर्मदा परम पुण्यमयी नदी है और मार्कण्डेय महान् ऋषि हैं । सब वेदं और पुराण तथा विद्याओं में सर्वतः वृत यह विश्व आपके साथ अन्तर संक्षय में स्थित रहेगा जबकि यह चाक्षुषा न्तर संक्षय एकार्णव मात्र रहेगा ।१३-१४।

वेदान् प्रवर्स यिष्यामि त्वत्सर्गादौ महीपते ……….. एवमुक्त्वा भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत १५मनुरप्यास्थितोयोगं बासुदेवप्रसादजम् ।। —– अभ्यसन यावदाभूतसंप्लवं पूर्वसूचितम् १६ –.. काले यथोक्ते संजाते बासुदेवमुखोद्गते …….. शृङ्गी प्रादुर्वभूवार्थमत्स्यरूपी जनार्दनः ॥१७ ….. भुजङ्गोरज्जुरूणमनोः प्राश्र्वमुपागमत्.. -: भूतान्सर्वान्समाकृष्ययोगेना रोप्यधर्मवित् १८ भुजङ्गरज्वी मत्स्यस्य शृङ्ग नावमयोजयत् उपय्यु पस्थितस्तस्याः प्रणिपत्यजनार्दतम् ।१६ —- आभू संप्लवे तस्मिन्नतीते योगशायिना। –… —- पृष्टेन मनुना प्रोक्त पुराणं मत्स्यरूपिणा ।। .. तदिदानी प्रवक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमाः ।।२०

यद्भवद्भिः पुरा पृष्टः सृष्ट्यादिकमहन्द्विजाः ….. तदेवै कार्णवे तस्मिन् मनुः पप्रच्छ केशवम् ।२१-:-… —-

हे महीपते ! आपके स्वर्ग के आद्रिकाले में मैं वेदों को प्रवृत्त करूगा । इतना कहकर वह भगवान वहीं पर अन्तधन हो गये थे । १५। महींपति मनु भी भगवान वासुदेव के प्रसाद से समुत्पन्न योग से समस्थित हो गये थे जिसका अभ्यास पूर्व में सूचित जब तक भूत संप्लव रहा तव तक करते रहे थे ।१६। भगयान् वासुदेव के मुख द्वारा

| मत्स्यमनुसंवाद वर्णन ]

{ ४३ उगत जैसा भी कहा गया था उसी काल के समुपस्थित हो जाने पर मत्स्य स्वरूप को धारण करने वाले जनार्दन शृङ्गो प्रादुभूत हो गये थे ।१७। एक भुजङ्ग रज्जु (रस्सा) के स्वरूप में मनु के पाश्र्व में समा गत हो गया था । धर्म के वेता उस मनु ने समस्त भूतों का समर्कावित करके योग के द्वारा समारोपित कर दिया था ।१६। उस नौका को भुजङ्ग की रज्जु से मत्स्य के शृङ्ग में योजित कर दिया था। फिर भगवान् जनार्दन की सवा में प्रणिपात करके उस नौका के ऊपर स्वयं उपस्थित हो गया था ।१६। उस आभूत संप्लव के समाप्त हो जाने पर योगशायी मत्स्य रूपी मनु के द्वारा पूछे जाने पर यह पुराण कहा गया था । उसे ही इस समय में मैं कहूँगा । हे श्रेष्ठ ऋषिगण ! आप सब लोग उसका श्रवण कीजिये ।२०। हे द्विजवृन्द ! आप लोगों ने पहले मुझसे सृष्टि आदि का वृत्तान्त पूछा था वहीं उस समय में जब कि यह सम्पूर्ण जगत् एक अर्णव स्वरूप में था मनु ने भगवान् केशव से पृछ। था ।३१।

 

उत्पत्ति प्रलयञ्चैव वंशन्मिन्वन्तराणि ।। वंश्यानुचरितञ्चैव भुवनस्य विस्तरम् ।२२ दानधम्मवधिञ्चैव श्राद्धकल्पञ्च शाश्वतम् ।। वर्णाश्रमविभागञ्च तथेष्टापूर्त संज्ञितम् ।२३ देवतानां प्रतिष्ठादि यच्चान्यद्विद्यते भुवि तत्सर्वं विस्तरेण त्वं धर्म व्याख्यातुमर्हसि २४ महाप्रलयकालान्त एतदासीत्तमोमयम् प्रसुप्तमिव चातक्य॑मप्रज्ञातमलक्षणम् ।२५अविज्ञ यमविज्ञातं जगत् स्थास्नुचरिष्णु ।। ततः स्वयम्भूरव्यक्त प्रभवः पुण्यकर्मणाम् ।२६ गया। व्यञ्जयन्नेतदखिलं प्रादुरासीत्तमोनुदः योऽतीन्द्रियः परोव्यक्तादणुज्र्यायान् सनातनः ।।

४४. ]

—[.:-मत्स्य पुराण । नारायण इति ख्यातः स एकः स्वयमुह्वभौ ॥२७ २ ,

यः शरीरादभिध्याय सिसृक्षुविविधं जगत् । – : । अतएव ससर्जादौ तासु बीजमंवासृजत् ।२८ । । ।

मनु ने कहा है भगवन् ! इस बिश्व की उत्पत्ति, तथा इसका प्रलय-राजाओं आदिके वंश तथा मन्वन्तर-वंश में होने वाला अनुचरित और इस भुवन का विस्तार, दान, धर्म का विधान-शाश्वत श्राद्धकल्प चारों वर्षों तथा चारो आश्रमों का विभाग तथा इष्टापूतं संज्ञा बाला कर्म, देवगणों को प्रतिष्ठा आदि एवं अव्ययी जो कुछ भी इस भूमण्डल में विद्यमान है बहू सभी कुछ विस्तारपूर्वक तथा धर्म की पूर्ण व्याख्या का कथन करने को अपि परम योग्य हैं उसे अब कहिये ।२२-२४॥ अस्त्र भगवान् ने कहा-यह तमोमय महाप्रलय का अन्त काल है। यह प्रसुप्त की भाँति तर्क न करने के योग्य अप्रज्ञात और लक्षण शुन्य ही होना है ।२५। यह स्थाबर और चर जगत् अविज्ञ यः और अविज्ञात सा रहता है । इसके अनन्तर पुण्य कम्मों का प्रभव-अब्यक्त स्वयम्भू राम का नोदन करने वाले इन समस्त जगत् को प्रकट करते हुये प्रादू भूत हुए थे। जो इन्द्रियों की पहुंच से अतीत अव्यक्त से-पर, अण, झ्यामान और सनातन थे । इनका शुभ नाम नारायण प्रसिद्ध था, यह एक ही थे और स्वयं ही उद्भूत हुए थे ।२६-२७। जिनने अपने शरीर से अभिध्यान करके इस विविध भाँति के जगत् की रचना करने की इच्छा वाले थे । इसीलिये सृजन किया था और आदि में उन में बीजों

का अब सृजन किया था।२८।।

तदेवाण्डे समभवधेमरूप्यमयं महत् संवत्सरसहस्रण सुय्ययुतसमप्रभम् ।२६ प्रविश्यान्तर्महातेजाः स्वयमेवात्मसम्भवः प्रभावादपितत्व्याप्त्याविष्णुत्वमगमत्पुनः ।३० तदन्तर्भगवानेष सूर्य्यः समभवत् पुरा ४५ ।।

मत्स्यमनुसंवाद वर्णन ]

|| आदित्यश्चादिभूतत्वात् ब्रह्माब्रह्मपन्नभूत् ।३१।। दिवं भूमि समकरोत्तदण्डशकलद्वयम्

सचाकरोद्दिशः सर्वामध्येव्योमच शाश्वतम् ।३२जरायुर्मेरुमुख्याश्च शैलास्तस्याभवस्तदा यदुल्वन्तदभूमेघस्तड़ित्सङ्घातमण्डलम् ३३ नद्योऽण्डनाम्नः सम्भूताः पितरोमनवस्तथा सप्तयेऽमीसमुद्राश्चतेऽपिचान्तर्जलोद्भवाः लवणक्षमुराद्याश्च नानारत्नसमन्विताः ।३४ सिसृक्षुरभद्दवः प्रजापतिररिन्दम तत्त्त जसश्च तत्रैष मार्तण्डः समजायत ।३५ मृतेऽडे जायते यस्मान्मार्तडस्तेन संस्मृतः रजोगुणमयं यत्तद्र,पं तस्य महात्मनः चतुमु खः भगवानभूल्लोकपितामहः ॥३६ , येन सृष्टं जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् तमवेहि रजोरूपं मत्सत्वमुदाहृतम् ॥३॥

वही अगइहेम रूप्यमय महान हो गया था और एक सहरु सम्व त्सर मैं वह दश सहस्र सुर्यों की प्रभा के समान प्रभा वाला हो गया था ।२६। महान् तेज से युक्त आत्म सम्भव अर्थात् स्वयम्भू प्रभु अन्तर में स्वयं ही प्रविष्ट होकर प्रभाव से भी उसकी व्याप्ति के द्वारा फिर वह विष्णुत्व को प्राप्त हो गया था।३३। उसके अन्तर में गये हुये यह भगवान् पहिले सूर्य हुए थे ब्रह्मा आदि भूत होने के कारण से ब्रह्मका पाठ करते हुए आदित्य हुए।३१। उस अड़ के दो खण्डों ने दिन और भूमि को किया था और उसने सभी दिशाओं को बनाया था तथा मध्य में शाश्वत व्योम की रचना की थी ।३२। उस समय में उसके जटायु और मुख्य शैल हुये थे । जो उल्वण था वह मेध और विद्युत्  ४६ ]

 

मत्स्य पुराण के संघात का मण्डल हो गया था ।३३। उस अणु नाम से नदियाँ तथा पितृगण और मनु वर्ग हुये थे । जो ये सात समुद्र हैं वे भी अन्तर में जल से उद्भव प्राप्त करने वाले हो गये थे। जिनका लवण सागर इक्षु समुद्र और सूरा सागर आदि कहा गया है वे सब अनेक रत्नों में सम न्वित हो गये थे ।३४। हे अरिन्दय ! सृजन करने की इच्छा बाले यह देव प्रजापति होगये थे उनके तेज से वहाँ पर यह मार्तण्ड ससुत्पन्न हो गया था ।३५॥ अण्ड के मृत होने पर जिससे यह समुत्पन्न होता है इसी कारण से यह मार्स एड कहा गया गया है। उस महान् आत्मा वाले का यह रजोगुणमय स्वरूप है । लोकों के पितामहू वह भगवान् घार सुखों वाले हो गये थे ।३६। इस सम्पूर्ण जगत् का सृजन किया है जिसमें देव-असुर और मानव सभी है उसको रजोगुण के रूप वाला समझ लो और महात्मत्व उदाहृत किया गया है ।३।

३-सृष्टि-प्रकरण चतुमु खत्वमगमत्कस्माल्लोकपितामहः । । कथं तु लोकानसृजत् ब्रह्मविदाम्बरः ।१।

तपश्चचार प्रथममराणां पितामहः । : आविर्भू तास्ततो वेदाः साङ्गोपांगपदक्रमाः २ । पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्राह्मणा स्मृतम् । नित्यं शब्दमयंपुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम् ।३ अनन्तरश्च बक्त्रेभ्योवेदास्तस्यविनिः सृताः । – मीमांसान्यायविद्याश्चप्रमाणाष्टकसंयुताः ।४

वेदाभ्यासमरतस्यास्य प्रजाकामस्य मानसाः । मनसः पूर्वसृष्ट्रावे जातायत्त नमानसाः ।५.

 

सृष्टिप्रकरण ]

मरीचिरभवत्पूर्वततोऽत्रिर्भगवान् ऋषिः । एत अङ्गिराश्चाभवत्पश्चात् पुलस्त्यस्तदनन्तरम् ।६ ततः पुलहनामा वै ततः क्रतुरजायत । प्रचेताश्च ततः पुत्रो बशिष्ठश्चाभवत् पुनः ॥७

मनु ने कहा–लोकों के पितामह के अपने चार मुख बतलायें हैं सो इनके थे चार मुख कैसे हो गये थे ब्रह्म के वेत्ताओं में सर्वश्रेष्ठ ब्रह्माजी ने इन सब लोकों को सृजन किस प्रकार से किया था ? कृपा कर आप हमको यह बतलाइये ।१ । भगवान् मत्स्य ने कहा था-देवों के पितामह ने सबसे प्रथम तो तपश्चर्या की थी। इसके अन्तर सब वेदों का आविर्भाव हुआ था जो अपने अङ्ग शास्त्र उपाङ्ग तथा पद एवं क्रम से संयुत थे ॥२। ब्रह्माजी के द्वारा प्रथम ममस्त शास्त्रों के पुराण कहे गये हैं जो नित्य-पुण्य शब्दमय और भो करोड़ विस्तार वाला है ।३। इसके उपरान्त ब्रह्माजी के मुखों से बेद निकले थे जो मीमांसा-न्याय विद्या से संयुत और आठ प्रमाणों से समन्वित थे ।३। ब्रह्माजी : उस समय में सर्वदा वेदों के ही अभ्यास करने में निरत रहा करते थे । ऐसी दशा में जब उनकी प्रजा के समुत्पन्न करने की कामना हुई तो उनसे मानस सृष्टि समुत्पन्न हुई थी। क्योंकि सर्व प्रथम मन से ही मृजनहुआ था इसीलिये ये मानस समुभूत होने वाले कहलाये थे ॥४-५। सबसे पहिले ब्रह्माजी की मानस सृष्टि में मरीचि महष उत्पन्न हुई थे । इसके पश्चात् भगवान् अत्रि ऋषि की उत्पत्ति हुई थी। फिर अङ्गिरा ऋषि और इनके पश्चात् पुलस्त्य महर्षि का उद्भव हुआ था ।६। इसके अनन्तर, पुलह नाम वाले समुत्पन्न हुये, और इनके पीछे क्रतु की समु त्पत्ति हुई थी। फिर प्रचेता और इसके पश्चात् पुत्र वसिष्ठ ने जन्म | ग्रहण किया था

 

पुत्रो भृगुरभूत्तद्वन्नारदोऽप्यचिरादभूत् ।। : | – दशेमान्मानिसानुब्रह्मामुनीन् पुत्रानजीजनत् ।। सुक्टि-प्रकरण ] किया था कि पुद्धि से मोह की समुत्पत्ति हुई थी । अहङ्कार ही क्रोध कहा गया है तो फिर यह बुद्धि नाम बासी या कही जाती है अर्थात् यह वृद्धि किस स्वरूप वाली है ? ।१३।। सत्वं रजस्तमश्चैव गुणत्रयमुदाहृतम् ।। साम्यवस्थितिरेतेषां प्रकृति: परिकीतिता ।१४ केचित् प्रधानमित्याहुरब्यक्तमपरे जगुः ।। एतदेव प्रजासृष्टि करोति विकरोति च ।१५। गणेभ्यः क्षोभमाणेभ्यस्त्रयो देवा बिजज्ञिरे, एकामूतित्त्रयो भागा ब्रह्माविष्णुमहेश्वराः ।१६ ।। स विकारात् प्रधानात महत्तत्त्वं प्रजायते । महानितियत ख्यातिर्लोकानांजायनेसदा ॥ ११ ॥ अहङ्कारश्च महतो जायते मानवर्धनः ।। इन्द्रियाणि ततः पञ्च बक्ष्ये बुद्धिवशानि तु । । प्रादुर्भवन्ति चान्यानि तथा कर्मवशानि तु ।१८ ।। श्रोत्रंत्वाक्चक्षुषीजिह्वान सिकाचयथाक्रमम् । पायपस्थंहस्तपादवाक्चेतीन्द्रियसंग्रहः ।१६। शब्दः स्पर्शश्च रूपञ्च रसोगन्धश्च पञ्चमः ।। उत्सगनन्दनादानगत्यालापाश्चतक्रियाः ।२० । मन एकादश तेषांकर्मबुद्धिगुणान्वितम् । इन्द्रियावयवाः सूक्ष्मास्तस्यमूर्तिमनीषिणः ।२१। । श्रयन्ति यस्मात्तन्मात्रा शरीर तेन संस्मृतम् । । शरीरयोगज्जीवोऽपिशरोरीगद्यते बुधः ।२२

भगवान् मत्स्य ने कहा—मत्व गुण, रजोगुण, तमोगुण ये तीन गुण बतलाये गये हैं। इन तीनों गुणों की जो समान अवस्था होती हैं। अर्थात् सभी समान स्वरूप में किसी से भी कोई घट-बढ़ कर नहीं रहते हैं ऐसी दशा में) स्थित रहते हैं उसी को ‘प्रकृति’ इस नाम में परि कीक्षित किया गया है।१४। इसी प्रकृतिकौं लोग ‘अन’ इस नाम मत्स्य पुराण में कहते हैं और दूसरे लोग इसको अव्यक्त कहा करते हैं। यही प्रकृति प्रधान या अव्यक्त इस सृष्टि को किया करती है तथा इसका विघटन भी कर दिया करती हैं । १५। जब ये ही तीन गुण क्षोभ को प्राप्त होते तो इनसे न देव समुत्पन्न होकर तीन स्वरूपों में सामने आते हैं । सिद्धान्ततः यह एक ही मूत्ति है और उस एक के ही ये तीन भाग हो जाया करते हैं जो ब्रह्मा-विष्णु और महेश इन तीन शुभ नामों वाले होते हैं ।१६। वह विकार युक्त प्रधान से मह्त्तत्व समुत्पन्न होता है। इसकी ‘महान्’ यह ख्याति इसीलिये है कि यह सदा लोकों का होता हैं । १७। मान के बढ़ाने वाला अहङ्कार महत्तत्पन्न होता है। इसके पश्चात् पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं। जिनके विषय में बतलायेंगे तथा पाँच अन्य कर्मेन्द्रियाँ होती हैं ।१८। पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के नाम श्रोत्र त्वक् नेत्र-जिह्वा और नासिका ये हैं । ‘पायु-उपस्थ हुस्त-पादं नाक ये पाँच कर्मेन्द्रियों के नाम हैं; यही देशों इंन्द्रियों का संग्रह है।१६। इन दशों इन्द्रियों के भिन्न-२ अपने विषयों के कम से ही बतलाते हैं । ज्ञानेन्द्रियों के विषय शब्द-रूप-रूप-रस और ग्रन्थ हैं । कर्मेन्द्रियों के बिय क्रमशः उत्सर्म, आनन्द, दान, गति और आलाप ये इनकी क्रियायें हैं ।२०। मन ग्यारहीं सर्वोपरि इन्द्रिय हैं। इंसमें कर्म और बुद्धि दोनों ही गुणों का समावेश होता हैं । इन्द्रियों के अवयव बहुत ही सूक्ष्म होते हैं। मनीषीगण उसकी मूत्ति का समाश्रय ग्रहण करते हैं। इसी कारण से उसका शरीर तन्मात्रा कहा गया है। शरीर के ही योग से यह जीवात्मा भी बुधों के द्वारा शरीरी कहा जाया करता है। ।२१-२२।

मनः सृष्टि विकुरुते चोद्यमान सिसृक्षया । ११५ १६ १ * ओंकारशदतन्मात्रादभूच्छब्दगुणात्मकम् ।२३। १ १ -: आकाशविकृतेर्वायुः शब्दस्पर्शगुणोऽभवत् ।।… – वायोश्च स्पर्शतन्मात्रात्त जश्चाविरभूत्ततः ॥२४ ॥ -:* त्रिगुण सद्विकारेण-तच्छब्दस्पर्शरूपवत् ।। … . .

सृष्टिप्रकरण

तेजोविकारादभवारि राजंचतुगु गर ।२५ रसतन्मात्रसम्भूतं प्रायोरसगुणात्मकम् भूमिस्तु गन्धतन्मात्रादभूत्पञ्चगुणान्विता ।२६ ।। प्रायोगन्धगुणा सातु बुद्धिरेषा गरीयसी । एभिः सम्पादितं भुङ्क्तेपुरुषः पञ्चविंशकः ॥२७॥

पूजन करने की इच्छासे प्रेरणा प्राप्त हुआ मनसृष्टि किया करता है । यह आकाश शब्द तन्मात्रा से ही समुत्पन्न होता है और इस आकाश का शब्द ही विशेष गुण होता हैं ।२३। आकाश की विकृति में वायु की समुत्पत्ति होती हैं और इस बायु के शब्द और स्पर्श ये ही । विशेष गुण हुअा करते हैं । वायु के स्पर्श तन मात्रा से शब्द गुम कै स्वरूप वाला तेज प्रादुभ त हुआ करता करता हैं। इस तेज में शब्द के अतिरिक्त स्पर्श और रूप के भी दो गुण और होते हैं । ऐसे यह तैरन गुणों वाला होता है । तेन के विकार में जल की उत्पत्ति होती हैं। इस जल में हैं राजन् चार गुण होते हैं ।२४-२५। यह इसकी तन्मात्रा से समुद्भूत होता है अतएव यह प्रात: इस गुण से समन्वित होता है । भूमि की तन्मात्रा से उत्पन्न होती है और इसमें रूप, रस, स्पर्श, शब्द गन्ध ये पाँच गुण होते है ।२६। प्रायः यह गन्ध गुण वाली ही होती है। और यही गरीयसी वृद्धि भी है। इनके द्वारा सम्पादित को यह पञ्च विशक पुरुष भोजता है ।२।

 

ईश्वरेच्छावशः सोऽपि जीवात्मा कथ्यते बुधैः ।। एवं षड्विंशकंप्रोक्त शरीरइहमानवे ।२६ का प्रयास सांख्यसंख्यात्मकत्वोच्चकपिलादिभिरुच्यते । एतत्तत्त्वात्मकं कृत्वाजगद्धाअजीजनत् ।२६, मावित्रौं लोकसृष्ट्यर्थ हृदि कृत्वासमास्थितः ।, ततः सज़पतस्तस्यभित्वादेमकल्मषम् ॥३॥ यावदब्दशतं दिव्यं यथान्यः प्राकृत जनः ।।

मत्स्य पुराण ततः कालेन महतातस्याः पुत्रोऽभवन्मनुः ।३१।। स्वाम्भु इति ख्यातः स विराडिति नः श्रुतम् । तद्पगुणसामान्यादधिपूरुष उच्यते ॥३२। | वैराजा यत्र ते जाती बहवः शंसिप्तव्रताः ।। स्वायम्भुवा महाभावाः सप्त सप्त तथापरे ।३३।२।। स्वारोचिषाद्याः सर्वे ते ब्रह्मतुल्यस्वरूपिणः ।।

औत्तमिप्रमुखा स्तटूद्य षान्त्व सप्तमोऽधुना ।३४. | बुधों के द्वारा वह जीवात्मा भी ईश्वर की इच्छा के वश में रहने वाला कहा जाता हैं । इस प्रकार से इस मानवीय शरीरमें छब्बीसतत्व युक्त था यह षड़विशंक इस नाम से कहा जाया करता हैं ।२८। तत्वों की संख्या के स्वरूप वाला होने ही से कपिल आदिके द्वारा यह सांख्य “शास्त्र या दर्शन कहा जाता हैं बेधा ने इस जगत् को एक तत्व के स्वरूप वाला समुत्पन्न किया है ।२६। लोककी सृष्टि के लिये सावित्री को अपने हृदय में करके ही प्रजापति समास्थित होते हैं। इसके उप रान्त भली-भाँति जाप करते हुए उनके कल्मष सहित शरीर का भेदन करके ही सावित्री प्रकट हुई थीं। ३०। जिस प्रकारसे कोई प्राकृत मनुष्य होता हैं उसी भाँति दिव्य सौ वर्ष तक के बहुत महान् काल में उसका अर्थात् सावित्री का मनु पुत्र उत्पन्न हुआ था ।३१। इसका स्वायम्भुब मनु—यह शुभ नाम प्रसिद्ध था वह महान् विराट था-ऐसा हमने सुना है। इसके रूप गुण सामान्य से वह् अधि पुरुष कहा जाता है ।३२। जहाँ पर वे बहुत से शंसित व्रतवाले वैराज समुत्पन्न हुये थे तथा दूसरे सात-सात महाभाग बाले स्वायम्भुव थे ।३३। स्वाचिष आदि ये सब ब्रह्मा के ही तुल्य स्वरूप वाले थे। उसी तरह औत्तमि प्रमुख भी थे अर्थात् जिनमें औत्तम प्रधान थे। वे भी थे जिनमें आप इस समय में सातवें होते हैं ।३४। \सरस्वती चरित्र )

सरस्वती चरित्र कु‘ : * … स्वायम्भुव मनुधमांस्तपस्तष्त्वा सुदुञ्चरम् पत्रीमेवापरूपाढ्यामनन्तींनाम नामतः ।। प्रियव्रतोत्तानपादौ मनुस्तस्यामजीजनत् धर्मस्य कन्या चतुरा सुनतानाम भामिनी ।२ उत्तानपादात्तनयान प्राप मन्थरगामिनी अपस्यतिमपस्यन्तं कीतिमन्तं ध्रुवं तथा ।३ उत्तानपादोऽजनयत् सूनृतायां प्रजापतिः

ध्वो वर्ष सहस्राणि, श्रीणि कृत्वातपः पुरा ॥४, दिव्यमाप ततः स्थानमचलं ब्रह्मणोवरात् तमेव पुरतः कृत्वा ध्रुवं सप्तर्षयः स्थिताः ।५धन्या नाम मनोः कन्यां ध्र वाच्छिष्टमजीजनत् ।।::.. अग्निकन्या तु सुच्छाया शिष्टात्मा सुषुवे सुतान् ।६।। कृपं रिपु जयं वृत्त वृकं वृकतेजसम् चक्षुषं ब्रह्मदौहित्र्यां वारिण्यां रिपुञ्जयः ।७ का

मत्स्य भगवान् ने कहा-परम धीमान् स्वायम्भुव मनु ने अति दुश्चर तपश्चर्या करके परम रूप लावण्यवती अनन्ती नाम वाली पत्नी बनाई थी । १। महाराज मनु ने उसे अपनी पत्नी में प्रियव्रत और उत्तानपाद दो पुत्र समुत्पन्न किये थे। धर्म की एक अति चतुर सुनता नाम वाली भामिनी थी । उसने जो मन्थर गमन करने वालीथी उत्तान पाद से पुत्रों की प्राप्ति की थी। उन पुत्रों के नाम अपस्यति, अपस्यन्त कीर्त्तिमान और भ्रव में थे ।२-३ प्रजापति उत्तानपाद ने अपनी पत्नी सुनता में इनको जन्म ग्रहण कराया था। उनमें जो भ्रम नाम वाताः । पुत्र था उसने प्राचीन काल में तीन सहस्र वर्ष तक तपस्या की थी।४।। फिर उसने इसी तप के फलस्वरूप ब्रह्माजी के वरदान से परम दिव्य और चल स्थान प्राप्त किया था । उसी ध्व को अपने आगे करके। ५४ ]

 

मत्स्य पुराण । सप्तगण स्थित रहा करते हैं।५। धन्या नाम धारिणो मन् को कन्या ने ध्रुव से शिष्ट को जन्म दिया था। शिष्टात्मा अन्नि को कन्या मुकाया ने भुतों को समुत्पन्न किया था ।६। कृप, रि, जय, वत्त, वृक, तेजस, चक्षुष ब्रह्म दौहित्री में और वह रिपुञ्जय वौरिणी में उत्पन्न हुये थे ।

 

चोरणस्यात्मजायान्तु चक्षुर्मनुमजीजनत् मनुवैराजकन्यायां नड्वलायां सचाक्षुषः ।८ जनयामास तनयान्दग शूरान्कल्मषान् : पफ शतद्य म्नस्तपस्यो सत्यवाहविः 16।।।। अग्निष्टुदतिरात्रश्च मुद्य म्नश्चापराजितः अभिमन्युस्तु दशमो नङ बलायोमजायत १० ऊरोरजनयत् पुत्रान् षडाग्नेयी तु सुप्रभानु अग्निंसुमनसंख्याति क्रतुमङ्गिरसङ्गयम् ११

पितृकन्या मुनोथातु वेनमगादजी जमत् वैनमन्यायिनं विप्रा ममन्थुस्तकराभूत् पृथुनम महातेजाः पुत्रौ द्वावजीजनत् ।१२

अन्तर्धानस्तु चोरीच शिखण्डिन्यामजीजनत् ।। हविर्भानस्तु षडाग्नेयी धिषणाऽनियत् सुतान् ।। प्राचीनबहिषं सांग यमं शुक्र बल शुभम् ।१३।। प्राचीनबहभगवान् महानासीत्प्रजापतिः हविर्धानाः प्रजास्तेन बहवः सम्प्रवत्तिताः ।१४।।।।

बीरण की आत्मजा में मनु ने चक्षु को प्रसूत किया था और वै राज की कन्या नवला में सचाक्षुप मन ने कल्मष से रहित महान् । शूरवीर देश पुत्रों को जन्म ग्रहण कराया था। उन दशों के नाम– ऊक, पुरु, शतद्युम्न, तपस्वी सत्यवाक इवि, अग्निष्टुप्,’ अतिरात्र, सुख म्न, अपराजित और अभिमन्यु दशम था जो नङ वला से उत्पन्न :

सरस्वती चरित्र ] हुआ था।८-१-० :उरु से, षडाग्नेयी ने सुन्दर प्रभवाले-मुत्रों को अस्त किया था उन पुत्रों के नाम अग्नि, सुमन, ख्याति, ऋतु, अङ्गिरा और. गय में थे ।११। : पितृ कन्या जिसका शुभ नाम सुनीथा तो अङ्ग से वेन.. को जन्म दिया था। राजा बेन बहुत ही अधिक अन्याय हुआ था। अतएव विप्रों ने उसको शाप देकर फिर उसके शरीर का मंथन कि… था । उसके हाथ से मंथन करने पर पृथु नाम वाला महान् तेजस्वी का जन्म हुआ था उस मृत्यु ने भी दो पुत्रों को प्रसूत किया था।१२। इसने शिखण्डिनी में अन्तर्धान और मारीच नाम वाले पुत्रों को उत्पन्न किया.. था । धिषणा षड़ाग्नेयों ने हबिर्धान से सुतों को प्रसूत किया था जिनके नाम प्राचीन वह, सांग, यम, शुक्र, बल और शुभे थे । १३. प्राचीन बह भगवान् एक महान् प्रजापति हुये थे। उसने हविर्धान बहुत सी प्रजार्य सम्प्रवीतते की थी ।१४

सवर्णायान्तु सामुद्रयान्दशाधत्त सुतान्प्रभुः …. सर्वपचेतसोनाम धनुर्वदस्य पारगाः १५………… … तत्तपोरक्षिता वृक्षा बभूलक समन्ततः ………. देबादेशाच्च तानाग्निदह्रविनन्दन ! १६ सोमकन्याऽभवत्पत्नी मारिषा नाम विश्रुता। तेभ्यस्तु दक्षमेकं सा पुत्र मुग्रयमजीजनत् १७. .. दक्षादनन्तरं वृक्षानौषधानि सर्वशः अजीजनत्सोमकन्या नन्द चन्द्रवती तथा 1१६.. .. सोमशस्यचतस्यापिदक्ष स्वाशीतिकोटयः तासांतुविस्तरं वक्ष्ये लोके यः सुप्रतिष्ठितः ॥१६ द्विपदश्चाभवन् केचित् केचिद् बहुपदा नराः , बलौमुखाः शंकुकर्णाः कर्णप्राघरणास्तथा ।२० अश्बऋक्षमुखाः केचित् केचित् सिहानतास्तथा श्वशूकर मुखाः केचित् केचिदुष्ट्र मुखास्तथा ।२१

५६ ]

|| मत्स्य पुराण – प्रभु ने सवर्णा सामुद्रों में देश सुतों को जन्म प्रदान किया था। ये सभी प्रचेतस नाम से प्रसिद्ध हुए थे ।१५। उनके तप से सुरक्षित वृक्ष लोक में सब ओर सुशोभित हुये थे । है रविनन्दन ! देवों के आदेश से अनि ने उनको जला दिया था । १६। मारिषा इस शुभ नाम से प्रसिद्ध उसकी पत्नी हुई थी उनसे एक अगय अर्थान् परमोत्तम दक्ष नाम वाले पुत्र को उसने प्रसूत किया था ।१७। दक्ष के अनन्त र सभी ओर बहुत से वृक्ष और औषधियाँ सोम कत्या ने समुत्पन्न की थीं तथा नन्दी चन्द्रवती को भी जन्म दिया था ।१६। सोम के अ श उस ६६ के भी अस्सों करोड़ हुये थे उनका विस्तार बतायेंगे जो लोक में सुप्रतिष्ठित हुआ था ।१६। कुछ दो पद वाले और कुछ बहुत पद वाले नर हुये थे । अलीमुख, शंकु कर्ण तथा कर्ण प्रावरण कुछ अश्व और रीछ के मुख वाले तथा कुछ सिंह के समान मुख वाले हुये थे । कतिपय कुत्ता और कर के तुल्य मुख वाले और कुछ ऊट के समान मुख वाले हुये थे । ३०-३१।।

जनयामासधर्मात्माम्लेच्छान् सव्र्वाननेकशः । समृष्ट्वामनसादक्षः स्त्रियः पश्चादजीजनत् ।२२। ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश । सप्तविंशतिः सोमाय ददौ नक्षत्रसंज्ञिताः ।। देवासुर मनुष्यादि ताभ्यः सर्वमभूज्जत् ।२३

उस धर्मात्मा ने सब अनेकों म्लेच्छों को भी जन्म दिया था। उम दक्ष ने मन में सूजन करके पीछे स्त्रियों को जन्म दिया था ।२३। उसमे उन में से दश तो धर्म को दी थीं—तेरह कश्यप को प्रदान की हैं और मत्ताईस नक्षत्र मज्ञा बाली सोम को दी थीं। उन्हीं स्त्रियों | मे देव, असुर और मन हय प्रवृत्ति का यह सम्पूर्ण जगत् हुआ था ।२३।

 

सिजीजनत् ।।

दक्ष प्रजापति मैथुनी सृष्टि ]

५-दक्ष प्रजापति से मैथनी सुष्टि देवानां दानवानाञ्च गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।। उत्पत्तिविस्तरेणैव सूत ! ब्रूहि यथातथम् ॥१॥ सङ्कल्पाद्दर्शनात् स्पर्शात् पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते । दक्षात्प्राचेतसादूर्ब सृष्टिमैथुनसम्भव ।२ प्रजासृजेति व्यादिष्ट: पूर्व दक्षः स्वयम्भुवा । यथा ससर्ज चैवादौ तथैव शृणुत द्विजाः !!३ यदा तु सृजतस्तस्त देवषिगणपन्नगान् । न वृद्धिमग मल्लोकस्तदा मैथुनयोगतः । दक्षः पत्रसहस्राणि पाञ्चजन्यामजीजनत् ।४। तांस्तु दृष्ट्वा महाभागः सिसृक्षुविविधाः प्रजाः। नारदः प्राह्यं श्वान दक्षपुत्रान्समागतान् । भुवः प्रमाणं सर्वत्र ज्ञात्वध्वंमध एव च । ततः सृष्टि विशेषेण कुरुध्वमृषिसत्तमाः ।६ ।। ते तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतोदिशम् । । अद्यापि न निवत्त न्ते समुद्रादिव सिन्धवः । । ऋषियों ने कहा–हे सूतजी ! अब कृपा करके देवों की-दानवों की-गन्धर्व-उरग और राक्षसों की जो उत्पत्ति हुई थी उसको यथारूप से विस्तारपूर्वक बतलाइये ।१। सूतजी ने कहा–आरम्भ में तो केवल मनके संकल्प से दर्शन से और स्पर्श से ही पूर्व पुरुषों की सृष्टि कहीं हैं प्राचैतम दश के बाद में ही मैथुन से होने वाली सृष्टि हुई थी ।२।। स्वयम्भू प्रभु ने पहिले दक्ष को आज्ञा प्रदान की थी कि प्रजा का सृजन करो । हे द्विजगण? आदिकाल में जिस प्रकार से सृजन किया था उस का आप लोग अब श्रवण करो । ३। जिस समय में देवऋषि-और पन्नगों का उसने सृजन किया था तो उससे लोक में कोई भी वृद्धि नहीं। हुई थी तब उस प्रजापति दक्ष ने पाञ्चजनी में मैथुन के योग से सहस्र

[६ मत्स्य पुर… पुत्रों को जन्म ग्रहण क्रराया था ।४। विविध भाँति की प्रजा को सृष्टि करने की इच्छा करने की इच्छा करने वाले महाभाग ने उनको देख करके ना रहने समागत हर्यश्व दक्ष के पुत्र से कहा था ।५। है ऋषि सन्तमो ! सर्बत्र इस भूमण्डल का उमाण ऊध्वं भाग में और अधोभाग में भली भाँति जानकर फिर विशेष रूप से सृष्टि की रचना करो ॥६॥ उन्होंने भी उन के इस वचन को सुनकर सभी दिशाओं में प्रयाण किया था और तब से गये हुए वे आज तक भी वापिस नहीं लौटे हैं जिस तरह नदियाँ समुद्र में जाकर फिर वापिस नहीं लौटा करती हैं ।७।।

हर्यश्वेषु प्रणप्टेषु पूनर्दक्षः प्रजापतिः । * * वोरिण्यामेव पुत्राणां सहस्रमसृजत्प्रभुः ।८ शबला नाम ते विप्राः समेत सृष्टिहेतवः ।।८।। १। नारदोऽनुगताप्राह पुनस्तान् पूर्ववत्सतान् । । भुवः प्रमाणं सर्वत्र ज्ञात्वा भ्रातृनथो पुनः ।६।। आगत्य चोथ सृष्टिञ्च करिष्यथ विशेषतः ।। तेऽपि तेनैव मार्गेण जग्मुर्भातृन् यथा पुरा ।१०। । ततः प्रभृतिः न भ्रात कनीयान्मार्गमिच्छति । ।

अन्विषन्दुःखमाप्नोति न तेन तत्परिवर्जयेत् ।११।५। । – ततस्तेषु विनष्टेषु षष्टि कन्याः प्रजापतिः ।। २.२ २.. – वैरियां जनयामास दक्षः प्रचेतसस्तथाः।१२ । । १ श्रादात्स दश धमय कश्यपाय त्रयोदश। – ।।

सप्तवंशतिसोमायचतस्रोऽरिष्टनेमये (मिने) ।१३ । । द्व चैव भगुपुत्राय द्व कृशाश्वाय धीमहे । द्वि चैवाङ्गिरसे तद्वत्तासान्नामानि विस्तरात् ।१४ : “

उन हर्यश्वों के प्रनष्ट हो जाने पर दक्ष प्रजापति ने पुनः वीरिणी में प्रभु ने एक सहस्र पुत्रों का सृजन किया था ।८। वे विप्र शक्ल इस नाम वाले थे और सभी सृष्टि के हेतु स्वरूप एकाभित हुयेथे । फिर उन दक्ष प्रजापति से मैथुनी सृष्टि ]

[ ५६: अनुगत मुनों से पूर्व की भाँति हीं नारद ने कहा था कि इसे भूमिका सर्वत्र प्रमाण को जानकर कि यह कितनी विस्तृत है तथा अपने प्रथम गत भाईयों को भी जानकर फिर यहाँ आकर विशेष रूप से सृष्टि की रचना करोगे । देवपि नारद जी के कहने पर वे सभी उसी मार्ग से चले गये थे, जिससे पहले उनके बड़े भाई लोग गये थे। ९-१०| तभी से लेकर भाई के छोटे भाई उस मार्ग की इच्छा नहीं करता है । अन्वेषण करते हुये दुःख को प्राप्त होता है अतएव इसी कारण से उसका परि वर्तन कर देना चाहिये ।११। इसके अनन्त उनके भी विनष्ट ही जाने.. पर प्रजापति प्रचेतस दक्ष ने नैरिणी में साठ कन्याओं का सृजन किया । था अर्थात् उनको जन्म दिया था ।१३। उन्हीं साठ कन्याओं में से, दक्ष ने दस कन्याये तो धर्म को दी थों-तेरह कश्यप ऋषि को प्रदान की। मत्ताईस मोम को प्रदान की थीं—-चार अरिष्टनेमि को दी थीं । अब उनके नाम विस्तारपूर्वक बतलाये जाते हैं । १३-१४। ।

* शृणुध्वं देवमातृणां प्रजाविस्तर मादितः ।… – ०२ : १ | मरुत्वता वसूर्यामी लम्ब। भानुररुन्धती । १५ – 1

संकल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भामिना । धर्मपत्न्यः समाख्यातास्तासां पुत्रान्निबोधत ।१६ … विश्वेदेवांस्तु विश्वयाः साध्या साध्यानजीजनत् ।। मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो बसोस्तु वसवस्तथा ।१७ भानोस्तु भानवस्तद्वन् मुहूर्तायां मुहर्तकाः । लम्बायघोषनामानोनागवीथीनुयामिजा’ ।१८ पृथिवीतलसम्भूतमरुन्धत्यामजायत । संकल्पायास्तु संकल्पो बसुसृष्टिनिंबोधत । १६ : ज्योतिष्मन्तस्तुयेदेवाव्यापकाः पर्वतोदिशम् । । 8 बसवस्ते समाख्यात स्तेषाँ सर्गन्निबोधत ।२०। आप ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोऽनलः । । प्रत्युषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौप्रकीर्तिताः ।२१ । । ।

. . . मत्स्यः पुराण । अब आप लोक उन देवी की माताओं के परम शुभ नामों का तथा आदि से प्रजा के विस्तार का श्रवण करो-धर्म को जो कन्याये दश दी गयी थी उन धर्म की पत्नियों के नाम मरुत्वती-बसूर्यामी-लम्बा, भानु-अरुन्धती-सल्पा -मुहुर्ता-साध्या-विश्वा और भामिनी ये थे। ये सब धर्म की पत्नियाँ समाख्यात हुई थीं। अब उन दशों पत्नियों के उदर से जो पुत्र समुत्पन्न हुए थे उनको भी जान लो । १५-१६॥ विश्वा के विश्वेदेवा पुत्र हुए थे और साध्या ने साध्यों को जन्म दिया था। मरावती में मरुत्वायों ने जन्म ग्रहण किया था और वसू से बसुगण, समुत्पन्न हुये थे । १७ भानु से भानु गण और उसी भाँति महू में मुहूत्त कों ने जन्म लिया था । लम्बा नाम की पत्नी में घोष नाम वाले पुत्र हुए थे तथा यामि से जन्म लेने वाले नागवीथी थे । अरुन्धती में पृथ्वी तत सम्भूत का जन्म हुआ था। सङ्कल्पा से सङ्कल्प समुत्पन्न । हुआ था । अग वमुकी सृष्टि का ज्ञान प्राप्त करलो । १ ६-१६। ज्योति – हमान जो देव व्यापक हैं और सभी दिशाओं में है वे ही सब बसुगण नाम से समाख्यात हुए थे । अब हमसे जो सृष्टि हुई है उसको भी आप लोग समझलो ।३०। आप अर्थात् जल, नुव, सोम, घर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास ये आठ वसुगण कीतित किये गये हैं ।२१।।

अपस्य पुत्राश्चत्वारः शान्तो वैदण्डएवच शाम्वोऽथमणिवक्त्रश्चयज्ञरक्षाधिकारिणा ।२२ ध्वस्य कालपुत्रस्तु वचः सोमादजायत द्रविणो हुव्यावाहश्च धरपुत्राबुभौ स्मृतौ ।२३ कल्याणिन्यां ततः प्राणरमणः शिशिरोऽपि मनोहराधरात्पुत्रानवापार्थ हरे: सुता ।२४ शिवा मनोजवं पुत्रमविज्ञातगति तथा अवापाचानलात् पुत्रावग्निप्रायगुणौ ।२५

दक्ष प्रजापति से मैथुनी सृष्टि अग्निपुत्रः कुमारस्तु शरस्तम्बे व्यजायत तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठजीः ॥२६ अपत्यं कृत्तिकानां तु कातिकेयस्तत: स्मृतः प्रत्यूषसऋषिः (षेः) पुत्रोविभुर्नाम्नाथदेवलः

विश्वकर्मा प्रभासस्य पुत्रः शिल्पी प्रजापतिः ॥२७॥ | प्रासादभवनोद्यानप्रतिमाभूषणादिषु तड़ागारामकूपेषु स्मृतः सोमरवर्धकः ॥२८

 

आपके चार पुत्र स मुत्पन्न हुए थे। उनके नाम शान्त, वैदण्ड, शाम्ब और मणिवक्ता ये थे । ये सब बज्ञों की रक्षा करने के अधिकारी हुए थे ।२२। भेव का पुत्र काल हुआ था तथा सोम से वर्चा नामक पुत्र हुआ था । घर के द्रविण और हव्यवाह नाम वाले दो पुत्र हुए थे। ।२३। इसके पश्चात् कल्याणिनी में प्राण, रमण और शिशिर हुए थे । हरि की सुता ने घर से मनोहर सुतौं की प्राप्ति की थी ।२४। शिवा मनोजन और अविज्ञात गति नाम वाले ही पुत्रों को अनलसे जन्मदिया था जो प्रायः अग्नि के समान ही गुण वाले हुए थे ।२५॥ अग्नि पुत्र और कुमार शरस्तम्ब में समुत्पन्न हुए थे। उसके पृष्ठज शाख-विशाख और नैगमेय उत्पन्न हुए थे ।२६। कृत्तिकाओं की जो सन्तान थी वहीं कात्तिकेय—इस नाम से कहा गया है। प्रत्यूष ऋषि का जो पुत्र था उसका नाम विभ था । इसके पश्चात् देवल विश्वकर्मा प्रभास का पुत्र हुआ था जो शिल्पी प्रजापति था ।२७। प्रासाद, उद्यान, प्रतिमा और भूषण आदि में तथा तड़ाग, आदाय कृपोंमें वह अमर वधं कि महागया हैं ।२६। ६ ।। १ । । अजैकपादहिर्बुध्न्य विरूपाक्षोऽथ रेवतः । । हुरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्च सुरेश्वरः ।२९ सावित्रश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः । एते रुद्राः समाख्याता एकादश गणेश्वराः ॥३॥

 

मत्स्य पुराण एतेषां मानसानान्तु त्रिशूलबरधारिणीम् । कोटयश्चतुराशीतितत्पुत्राश्चाक्षया मताः ॥३१॥ दिक्षु सर्वासु ये रक्षां प्रकुर्वन्ति गणेश्वराः । म पुत्रपौत्रसुताश्चैते सूरभी गर्भसम्भवाः । ३२ = ?

अज, एकपाद, आदि बुध्न्य, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, श्यम्बक-सुरेश्वर-सावित्र-जयन्त-पिनाकी-अराजित-ये रुद्र समाख्यात हुए हैं । एकादश गणेश्वर हुए हैं ।२६-३०। ये मानस त्रिशूलवद के धारण करने वाले है इनकी संख्या चौरासी करोड़हैं और इनके पुत्र तो अक्षय माने गये हैं ।३१। ये गणेश्वर सभी दिशाओं में रक्षा का काम किया करते हैं । पुत्र, पौत्र और ये सुत सभी सुर भी गर्भस से भुत होने वाले हैं ।३३।

 

कश्यपान्वय वर्णन

 कश्यपस्य प्रवक्ष्यामि पत्नीभ्यः पुत्रपात्रकान् ।

आदितिदितिदनुश्चैव अरिष्टासुरसातथा १

सुरभिविनता तद्वत्ताश्ना क्रोधवशा इरा । । कद्र विश्वा मुनिस्तद्वत्तासां पुत्रान्निबोधत ।

 १ तुषिता नाम ये देवाश्चाक्षुषस्यान्तरे मनो ।

वैवस्वतेऽन्तरे चैते आदित्याद्वादशस्मृताः ।३ 13:13: इन्द्रोधाना भगस्त्वष्टा मित्रोऽथवरुणोयमः । विवस्तान्सवितापूषाअ शुमानविष्णुरेवच ।४ एते सहस्रकिरणा आदित्या द्वादश स्मृताः ।। मारीचात् कश्यपादाप पुत्रानदितिरुत्तमान् ॥५॥ भृशाश्वस्य ऋषेः पुत्रा देवप्रहरणाः स्मृताः । । । एते देवगणा विप्राः प्रतिसन्वरेषु च ।६।।।।।

 

कलपन्वय वर्णन ]

उत्पद्यन्ते प्रलीयन्ते कल्पे कल्पे तथैव च ।। १ . दितिः पुत्रद्वयं लेभे कश्यपादितिः नः श्रुतम् ।७।।

श्री सुतजी ने कहा-अब मैं कश्यप ऋषि की पत्नियों से जो पुत्र और पौत्र आदि हुए हैं उनका हाल बतलाने को जा रहा हैं। कश्यप महर्षकी पत्तियों के नाम अदिति-दितिदनु-अरिष्टा सुरसा-सुरभि-विनता ताम्रा-क्रोधं वणा-इरा-कडू-विश्वा-मुनि-ये थे। अब इन पत्नियोंके उदर से जो पुत्र समुत्पन्न हुए थे उनको भी आप लोग जान लीजिये ।१-२॥ तुबिना नाम वाले जो देवता चाक्षुष मन के अन्तर में हुए थे ये ही सब “बैवश्वत मन्वन्तर में बारह आदित्य कहे गये हैं। ३। उन द्वादश आदित्य के नाम इन्द्र-धाता भग-त्वष्टा-मित्र-वगण-पम-विवस्वान-सविता-प्पा अंशुमान-विष्ण-ये हैं ये ही सहस्त्र किरणों वाले बारह आदित्य कहे गये हैं। मारीच कश्यप महर्षि मे मदिनि ने परमोत्तम पुत्रों को प्राप्त किया था 1४५। भेगास्व ऋषि के पुत्र देव प्रहरण’ कहे गये थे ।’ हैं। विप्रो ! थे सब देवगण प्रत्येक मन्वन्तर में हुए हैं।६। ये सब उत्पन्न हुआ करते हैं और प्रलीन भी होते रहते हैं और कल्प-कल्प में ऐसा हीं होता रहता है । दिति नाम की जो महर्षि कश्यपजी की एक पत्नीथी उसने कश्यप से दो ही पुत्रों की प्राप्ति की थी-ऐसा मुना गया है ॥७॥

हिरण्य कशिपश्चैव हिरण्याक्षं तथैव च । हिरण्यकशिपोस्तद्वजातं पुत्रचतुष्टयम् ।८ प्रह्लादश्चानुलादश्च संह्लादोलाद एव च ।। प्रह्लादपुत्र आयुष्मान् शिविवष्किल एव च ।* * विरोचनश्चतुर्थश्च स बलि पुत्रमाप्तवान् । बलेः पुत्रशत त्वासीद्वाणज्येष्ठं तंतोद्विजाः ॥१०॥ धृतराष्ट्रस्तथा सुर्यश्चन्द्रश्चन्द्रांशुतापनः । निकुम्भनामो गुर्वक्षः कुक्षिभमो विभीषणः । ११ – १० एवमाद्यास्तु बहवो बाणज्येष्ठा गुणाधिकाः ।१।।

छ मत्स्य पुराग वाण : सहस्रबाहुश्च सर्वास्त्रगणसंयुतः ।१२ । तपसा तोषितो यस्य पुरे वसति शूलभृत् । महाकालत्वमगमत्सम्यं यश्च पिनाकिन: 1१३ हिरण्याक्षस्य पुत्रोऽभूदुलूकः शकुनिस्तथा।। भूतसन्तापनश्चैव महानाभस्तथैव च । १४

उन दिति के पुत्रों के नाम हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष था। हिरण्यकशिपु के उसी भाँति चार पुत्र हुए थे ।८। उन चारों पुत्रों के नाम प्रहलाद-अन लाद-सलाद और अनादि में थे । प्रहलादके पुत्र आयुष्मान-शिवि-वाष्कल तथा चौथा विरोचन हुएथे । विरोचनने बात नामधारी को पुत्र के रूपमें प्राप्त किया था। हे दिजगण! राजाबालक सौ पुत्र हुए थे जिनमें बाण सबसे बड़ा पुत्र था ।८ १०) धृतराष्ट्र-सूर्य – चन्द्र-चन्द्र चन्द्रांश-तापन-निकुम्भ-गृर्वक्ष-कुक्षिभीम-विभीषण एवं आदि गुणों में सर्वाधिक बहुत मे पुत्र थे इनमें बाण म्येष्ठ । । वाण और सहस्त्र बाहु सभी प्रकार के अस्त्रों के समुदाय से समन्वित में अर्थात् सभी अस्त्रों के पूर्ण ज्ञाता थे ।११-१२। तपश्चर्या के द्वारा परम सन्तुष्ट हुए भगवान् शुलभृत् जिस के पुर में ही निवास किया करते थे । और जो पिता की प्रभु के साम्य महा कालत्व को प्राप्त हो गया था । हिरण्याक्ष के पुत्र उलूक-शकुनि-भूत सन्तान और महाबाम हुए थे । १३-१४।।

एतेभ्यः पुत्रपौत्राणां कोट्यः सप्तसप्ततिः ।। महाबली महाकाया नानारूपा महौजसः । १५ दनुः पुत्रणतं लेभे कश्यपादबलदर्पितम् । विप्रचित्तिः प्रधानोऽभूद्य षां मध्येमहाबलः ।१६ द्विमूद्ध शकुनिश्चैव तथा शंकुशिरोधरः । अयोमुखः शम्वरश्च कपिशो नामतस्तथा । १७ मारीचिधवांश्चैब इरा गर्भशिरास्तथा ।

कश्यप न्यथ वर्णन

विद्रावणश्च केतुश्च केतुवीर्यः शतहृदः । १८ इन्द्रजित् सप्तजित चैव वज्रनाभस्तथैव च ।। एकचक्रो महाबाहुर्वञ्जाक्षस्तारकस्तथा । १६ ।

असिलोमा पुलोमा च बिन्दुवणो महासुरः । स्वर्भानुवृषपर्वा च एवमाद्यादनो: मृताः ।२० स्वभनोस्तु प्रभा कन्या शची शैव पुलोमजा। उपदानवी मयस्यासीत्तथा मन्दोदरी कुहः २१

इनमे जो पुत्र और पौत्र आदि हुए थे उनकी संख्या सततर करोड़ थी । ये महान् बलशानी-महान् शरीर के आकार प्रकार वाले, अनेक प्रकार के स्वरूप धारी और महान् औज वाले सभी हुए थे । ११ । दन् ने महा मुनींद्र कश्यप से बन के दर्द से मन्वित एक भौ पुत्रों का जन्म fया था । इन मबके मध्य में महान् बनवान और प्रधान विप्रचित्ति हुआ था ।१६। उन सौ दन के पुत्रों में कतिपय प्रधान पुत्रों के नाम यहाँ पर बतलाये जा रहे हैं— द्विर्धा-शकुन-कुशिरोधर-अयोमुख शम्बर-कपिश-मारीचि मेघवान-इरा-गर्भ शिरा-विद्रावण-केतुवीयं हृद-इन्द्रजिय सप्तजित-वज्ञनाम-कच-महा बाहु-वज्राक्ष-तारक जसिलोमां-पुलोमा-बिन्दु-बा-महामुर-वर्भानु वृषपर्वा एवं आदि दनुके पुत्र हुए थे जो कि प्रमुख थे 1१७-२] स्वर्भाने की कन्या का नाम था और शचीं थी तथा पुलमज। भय को उपदान था तथा मंदोदरी और कृह थी ।२१।।

शर्मिष्ठा सुन्दरी चैव चन्द्रा च वृषपर्वणः । पुलोमा कालका चैव वैश्वानरमुते हिने २२ । बह्वपत्ये महासत्वे मारीचस्य परिग्रहे। तयोः षष्टिसहस्राणि दानवानामभूत्पुरी ।२३।। पौलोमान् कालकेयांश्च मारीचोऽजनयत्पुर । अवध्या मेऽमराणां मैं हिरण्यपुरवासिनः ।२४

मत्स्य पुराण चतुर्मू खाल्लब्धव रास्ते हता विजयेन तु । -४! । विप्रचित्तिः सैहिकेयान् लिहिकाया मजीजनत् ।२५ हिरण्यकशिपोर्यवेभागिनेया स्त्रयोदश ।। 1 ,१६० ।। व्यंसः कल्पश्च राजेन्द्र! नलों वातपिरेव च ।२६५ इल्बलो नमुचिश्चैव श्वसृपश्चाजनस्तथा । नरक: कालनाभश्च सरमाणस्तथैव च ॥३७॥

. कालवीर्यश्च विख्यातो दनुवंशविवर्धनाः । हिन}} ॥ ॥ ७॥ संह्लादयस्य तु दैत्यस्यानि तव चाः स्मृताः ।२८• वृषपर्वा की शर्मिष्ठा-सुन्दरी और बद्र थीं बैश्वानर की दो सुतायें * हुई थीं जिनका नाम पुलोमा और काला था ।२२। महान् सत्व वाले – और बहुत सी सन्तति से समन्वित मारीच का परिग्रह था उन दोनों के । पुरातन कालमें साठ हजार दानव हुए थे।२३। पहले मारीच ने पौलोम

और कालकेयोंकी जन्म दिया था। जो ऐसे बलशाली थे कि ये हिरण्य पुरमें निवास करने वाले सब देवगों के द्वारा बध करने के योग्य नहीं

थे ।२४। वे सब चार मुरबों वाले ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त करने वालेथे * विजय के द्वारा हत हुए थे। बिश्नचित्ति सिहिक में संहिकेयों को जन्म * ग्रहण कराया था। जो हिरण कशिपुके वैभागी थे वे तेरह हुए थे। हे राजेन्द्र ! उनके नाम ये हैं-व्यंस, कल्प, नल, वातापि, इल्वल, नमुचि विसृप, अजन, नरक, काल नाभ, सरमाण और कालवीय तथा विख्यात ये दनु के वंश के वर्धन करने वाले हुए हैं । जो सल्लाद नामधारी दैत्य था उसके निबात कवच कहे गये हैं ।२४-२८। ।

अबध्या सर्वदेवानां गन्धर्वोर रक्षसाम् । १८ ये हृता भर्गमाश्रित्य त्वजु नेन रणाजिरे ।२९ ।। षट्कन्या जनयामास ताम्रा मारीचबीजतः । शुकश्येनीचभासीच सुग्रीवीगृध्किाशुचिः ॥३०॥ शुकी शुकानुलूकांश्च जनयामास धर्मतः । ३३ ।। श्येनी श्येनांस्तथा भासी कुरान माजीजनत् ।३१

कश्यपान्वय वर्णन !

गृधी गृध्रान् कपोतांश्च पारावतविहङ्गमान् । हंससारसकौञ्चांश्च प्लवान् शुचिरजीजनत् । ३२ अजाश्वमेषोष्ट्रखरान् सुग्रीवो चाप्यजीजनत् । एषताम्रान्वयः प्रोक्तो विनतायांनिबोधत । ३३ गरुड़: पततांनाथो अरुणश्च पतत्त्रिणाम् । सौदामिनी तथा कन्या येयं नभसि विश्रुता ।३४ सम्पातिश्च जटायुश्च अरुणस्य सुताबुभौ । सम्पातिपुत्रो बभ्रञ्च शीघ्रश्चापि बिश्रुतः । ३५ ये सभी महान बल विक्रमशाली थे और ऐसे बलिष्ठ थे कि मस्त देवगण तथा गंधर्व-उरग और राक्षस भी इनका वध नहीं कर मकते थे । इन को रणक्षेत्र में मार्ग का समा भय ग्रहण करके अर्जुन ने ही नित किया था ।२६। मारीच के बीर्य से ताम्रा ने छै कन्याओं का प्रसव किया था। उन छैओं कन्याओं के नाम ये थे-शुकी, श्येनी,भासी मुग्रीबी, गृश्चिका, शुचि ।३०। शुकी ने शुकों को तथा उलूकों को धर्म से जनम कराया था । श्ये नी ने श्येनों को प्रसूत किया था और भासी ने कुररों को सम्भूत किया था ।३१। गृधी ने गिद्धों को और कबूतरों पाराबत विहङ्गमों, हंस, रस, क्लचों को जन्म दिया था तथा शुचि ने प्लवों को समुत्पन्न किया था । ३२॥ सुग्रीव नाम धारिणी ने अज, अश्व, मेष, उष्ट्र और खरों (गधों) को जन्म ग्रहण कराया था। यहाँ तक यह ताम्र का वंश वर्णित किया गवा हैं अब यहाँ से आ आप सब लोग विनता में समुसोत्पत्ति हुई थी उसका भी ज्ञान प्राप्त करलो ।३३। पतनशील बपियों का स्वामी गरुड़ और पतत्त्रियों में अरुण और सोदामिनी नाम वाली एक कन्या जो नभ में विश्चत है । अरुशके | सम्पाति और जटायु दो पुत्र हुए थे । सम्पति का पुत्र बभ्र था और शीघ्रगामी प्रसिद्ध हैं ।३४-३५।।

जटायुषः णकारः शतगाती विश्रुतौ सारसो रज्जुबालश्चभे रुण्डश्चापि तत्सुताः ।३६,| मत्स्य पुराण तेषामन्तमभवत् पक्षिणां पुत्रपौत्रकम् ।। सुरसायाः सहस्रन्तु सपणामभवत्पुरी ।३७ सहस्र शिरसाङ्कद्रः सहस्रञ्चापि सुव्रत ! प्रधानास्तेषु विख्याताः षड्विंशतिररिन्दम ।३८ शेषवासुकिर्कोटशङ्ख रावतकम्बलाः धनञ्जयमहानीलपद्माश्वततक्षकाः ३६ एलापत्रमहापद्मधृतराष्ट्रबलाहकाः ।। शङ्खःपाल महाशङ्खपुष्पदन्ष्ट्रशुभाननाः ।४० शंकुरोमा बहुलो बामनः पाणिनस्तथा कपिलोदुमुखश्चापि पतञ्जलि रितिस्मृतीः ।४१ एषामनन्तमभवत् सर्वेषां पुत्रपौत्रकम् प्रायशो यत् पुरादग्धं जनमेजयमन्दिरे ।४२

जटायु के पुत्र कर्णिकार और शतगामी ये दो परम प्रसिद्ध हुए थे । सारस, रज्जुबा और भैरुएड भी उसी के पुत्र थे ।३६। उनके पुत्र और पौत्र जो हुए थे वे पक्षियों के अनन्त ही हुए थे । पुरातने समयमें सुरसाके एक सहस्र सर्प हुए थे । हे सुव्रत ! कद्र के सहस्र शिरवालों के एक सहस्त्र सर्प हुएथे किन्तु है अरिदय! उनमें परम प्रमुख छब्बीस ही विख्यात हुए हैं। ३७।३८। उन छब्बीस प्रकारके प्रधान सर्पोकै नाम तथा भेद इस प्रकार हैं—शेष, वासुकि, कर्कोट, शंख, ऐरावत, कम्बल, धन

जय, महानील, पदम, अश्वतर, तक्षक, एलापत्र, महापदम, धृतराष्ट्र, वलाहक, शंखपाल, महाशंख, पुष्पदंष्ट्र, शुभानम, शंकुरोमा, बहुल, वामन, पाणिन, कपिल, दुमुख और पतञ्जलि–इन नामों से छब्बीस कहे गये हैं। इन सबके पुत्र और पौत्र जो हुए वे सबके अनन्त ही हुए थे । बहुधा जनमेजय ने अपने मंदिर में सर्यों के ध्वंस करने वाले यज्ञ में प्राचीन काल में दग्ध कर दिये थे ।३६-४२।।

 

रक्षगणं क्रोधशा स्वनामानमजीजनत् दंष्ट्रियां मियुतं तेषां भीमसेनादगातुक्षयम् ।४३ रुद्राणाञ्च गणं तद्वद्गोमहिष्यो वरांगनाः ।। सुरभिर्जनयामास कश्यपात् संयतव्रता ।४४ मुनिमु नीनाञ्च गणं गणमप्सरसां तथा।। तथा किन्नरगन्धर्वानरिष्टाऽजनयबहून् ।४५ तृणवृक्षलतागुल्ममिरा सर्बमजीनत् ।। विश्वा तु यक्षरक्षांसि जनयामास कोटिशः ॥४६ तत एकोनपञ्चाशत्मरुतः कश्यपाहितिः ।। जनयामास धम्र्मज्ञान सवनमरबल्लभान् ।४७

क्रोधवशा नःम वाली पत्नी ने अपने नाम वाले राक्षसों के गण को जाम दिया था । दाढ़ वालों उनके संख्या में नियुत हीं हुए थे किन्तु भीमसेन से उनका श्रय हो गया ही था । ४३। उसी भाँति सुरभिनाम धारणी कश्यप की पत्नी से कश्यप ऋषि से ही रुद्रोंके गण-गौ-भैंस और बराङ्गनाओं का जन्म संयत व्रत वाली होकर दिया था ।४४। मुनि नाम की पत्नी ने मुनियोंके गण तथा अप्सराओं के गण को उत्पन्न किया था । अरिष्टा पत्नी ने बहुके किनरों और गंधर्वो को समुत्पन्न किया था ।४५। इरा ने ये सभी वृक्ष तृण, लता और गुल्मों को जन्म दिया था। विश्वा नाम वाली कश्यपकी पत्नी ने करोड़ों ही यक्षों और राक्षसों को उत्पन्न किया था ।४६। इसके अनन्तर दिति ने कश्यपजीसे गर्भ धारण करके उनचास मरुद्गणोंको प्रसूत कियाथा जो परम धर्मज्ञ थे और सभी देवताओं के परम प्रिय भी थे ।४७॥

मत्स्य पुराण आधिपत्याभिडोचन आदिसर्गश्च यः सूत ! कथितो बिस्तरेण तु ।। प्रतिसञ्चयेयेषामधिपास्तान् वदस्व नः ।१ यदाभिषिक्तः सकलाधिराज्ये पृथुर्धरिश्यामधिपो बभूव तदौषधीनामधिपं चकार यज्ञन्नतानां तपसाञ्च चन्द्रम् ।२ नक्षत्रताराद्विजवक्षगुल्मलतावितानस्य रुक्मगर्भः अपामधाशं वरुण धनानां राज्ञ प्रभु वैश्रवणच द्वत् ।३ बिष्णु रबीणामधिप वसूनामग्निञ्च लोकाधिपतिश्चकार प्रजापतीनामधिपं दक्षञ्चकार शक्र मरुतामधीशम् ।४ दैत्याधिपानामथ दानवानां प्रह्लादमीशयमं पितृणाम् ।। पिशाचरक्षःपशुभूतयक्षवेतालराजन्त्वथ शूलपाणिन् ।५।। प्रालेय शैलञ्च पति गिरीणामीशं समुद्र ससरिन्नदानाम् गन्धर्व विद्याध किन्नराणामीशं पुनश्चित्ररथं चकार ।६। नागाधिपं वासुकि मुग्रवीयं सपधिपं तक्षकमादिदेश दिशाङ्ग जानामधिपञ्चकार गजेन्द्रमरावतनामधेयम् ।७

ऋषिगण ने कहा है सुत जी ! आपने यह आदि सर्ग तो बड़े ही विस्तार के साथ वणित कर दिया हैं। अब इनके प्रत्येक सर्ग में जिनके जो अधिक हुए हैं उनका भी वर्णनकर भको बतलाने की कृपा कीजि येगा ।१। महामुनीन्द्र श्री सुतजों ने कहा–जिस समय में सम्पूर्ण राज्य में इस धरित्री में राजा पृथु अधिप का अभिषेक हुआ था उसी समय ये समस्त औषधियों का तथा यज्ञव्रत वाले तपोंका अधिप चन्द्रमा को बनाया गया था ।३। नक्षत्र, तारा, द्विज, वृक्ष, गुल्म, लता, वितान का रुक्म गर्भ को अधिप नियुक्त किया था सम्पूर्ण जलों को अधीश वरुण को बनाया गया था और उसी भाँति समस्त प्रकार के घनों का तथा राजाओं का स्वामी कुवेर को बनाया गया था ।३। रवियों का सबका अधिप बिष्णु और समस्त वस्तुओं का लोकाधिपत्ति अग्निदेन आधिपत्याभिषेचन । को किया या प्रजापतियों का प्रधान अधिप दक्ष को और मरुतों का स्वामी इन्द्र को बनाया गया था ।४। दैत्याधियों का तथा दानवों का । स्वामी प्रह्लाद को किया गया था और सव पितृगणों का अधाश यम को नियुक्त कियाथा । धिमाच, राक्षस, राक्षस, पशु, भूत, यक्ष, वेताल । इन सबका राजा भगबान शलपाणि को बनाया गया था ।५।- समस्त. गिरियों का अधिप प्रालय गिरि (हिमालय) का बनाया था तथा सब सर-सरित और नदों का अधीश्वर समुद्र को नियुक्त किया गया था । गन्धर्व-विद्याधर और किन्नरों का स्वामी फिर चित्ररथ को ही क्रिया गया था।६। जिसने भी नाग नामधारी थे उनक। अधीश उग्रवीय वासुकि को किया था और सप का स्वामी तक्षक को नियुक्त किया। था ।दिशांउ जों का स्वामी ऐरावत नाभधेय वाले गजेन्द्र को किया था।

सुपर्णमीशम्पतताथाश्वराजानमुच्चः श्रवचकारः . सिह मृगायां वृषभं गवाञ्च वृक्ष पुनः सर्ववनस्पतीनाम् पितामहः पूर्वमथाभ्यपिञ्चतन् पुनः सर्वदिशाधिनाथान् पूर्वण दिक्पाल मथायषिवन्ना सुधभागमरातिकेतुम् ततोऽधिपं दक्षिणेतचकर सर्वेश्वर शङ्खपदाभिधानम् सकेतुमन्तञ्च दिर्गशमीशश्चकारपवाद्भुबनण्डूगर्भः ॥१० हिरण्यरोमाणभुददगीश प्रजापतिदेवसुतचकार ।। अद्यापि कुर्वन्ति दिशामधीशाः शत्रून् दहतस्तु भुवोझिरक्षाम।११ चतुभिरेभिः पृथुनाभधेयौ नृपोऽभिषिक्तः प्रथमं पृथिव्याम् गतेऽन्तरे चाक्षुषनामधये वैवस्वताच पुनः प्रवृत्त ।।१२। प्रजापतिः सोऽस्य चराचरस्य बभूव सूर्यान्वयवंश चिन्हः १३

जो पतनशील पक्षि ग थे उनका राजा सुपर्ण को किया था और सभी प्रकार के अश्बो का राजा उच्चैः श्रव्य नाम वाले को बना दिया था । जितने भी प्रकार बन्य पशु हैं उन सबका शिरोभूषण स्वामी सिंह बनाया गया था-गौ जाति का अधिक दृषभ को और सम्पूर्ण मत्स्य पुराण वनस्पतियों का अधाशी वृक्ष को बनाया गया था ।८। पितामह ने सबसे पूर्व इनको अभिपिक किया और फिर उन्होंने ही इन समस्त दिशाओं के अधिनाथों का अभिपित किया था। पूर्व दिशा में दिक्पाल मुधर्मा नाम वाले को बनाया था जो अनि केनु हैं ।६। इसके अनन्तर दक्षिण दिशा का सनः अधीश्वर शंखुए द अभिघान् वाले सर्वेश्चर को बनाया था । फिर भुवनायडू गर्भ में केतुमान ईश को दिगोश किया था । १० प्रजापति ने उत्तर दिशा का दिक्पाल स्वामी देवमुत हिरण्य रमा को बनाया था। ये गब दिकपाल परम पुरातन समय में नियुक्त किये गये थे किन्तु वे तभी से आज तक भी दिशाओं के अधीश पर शत्रुओं का दाह करते हुए इग भू मगरल की रथ कर रहे हैं।११। इन चारों के द्रारा पृथु नाम वान्ना राजा सर्व प्रथम पृथ्वी में अभिक्ति किया गया था। जब चान्न प नाम बास्ना मन्वन्तर समान हो गया था और वे बस्अल नाम वाला मन्वन्तर प्रवत्त हो गया था उस समय में इस चराचर सम्पूर्ण विश्व का मर्यान्वय वंश के चिन्ह वाला प्रजापति हुआ था । १२-१३।

 

मन्वन्तर वर्णन एवं श्रुत्वा मनुः प्राह पुनरेव जनार्दनम् पूर्वेषाञ्चरितं ब्र हि मनूनां मधुसूदन ।१ मन्वन्तराणि सवाणि मनानां चरितञ्च यत् प्रमाणचवकालस्यतच्छण ध्वसमाहितः ।२ एकचित्तः प्रशान्तात्मा शृणु मार्तण्डुनन्दन यामनामपुरादेवासिन् स्वायम्भुवान्तरे ।३। सप्त ऋषयः पूर्व ये मेरी यादयः स्मृताः | आग्नीध्रश्चानबाहुश्च सहः सवन एव ।४

बन्न नर्गन | ज्योतिष्मान्द्य तिमान् हव्योमेधामेधा तिथिर्वसुः ।। स्वायम्भुवस्यास्यमनोर्दशैतेवंशवद्ध नाः ॥५ प्रतिसर्गमिमे कृत्वा जग्मुर्यत्परमम्पदम् एननुस्वायम्भुवंप्रोक्त स्वारोचिषमतः परम् ।६

वारोचिपस्य तनयाश्चत्वारो देववर्चसः ।। नभो नभस्यप्रसूतिभानव: कीतिवद्धनाः |

श्री सुतजों ने कहा-इस प्रकार से सबका श्रवण करके मनु ने पुनः गान जनार्दन से कहा था कि हे मधुसूदन ! अब आप परमानुग्रह करके पूर्व में होने वाले मनुगण का चरित हमारे सामने बणित कीजिए १। मत्स्य भगवान् ने कहा अब आप सब लोग पूर्ण रूप से समाहित हो जाइय और श्रवण करिये । मैं सम्पूर्ण मन्वन्तर और मनुष्यों के चरित्र तथा उनके काल का प्रमाण सभी कुछ बतलाता हूँ।२। हे मात नन्दन ! कनिष्ठ चित्त बने और परम प्रशान्त आत्म! वाले होकर अपि सुनिये । पहिले परम पुरातन समयमै योमा नाम वाले स्वायम्भूब मन्वन्तर में देवता हुए थे ।३। मरीचि आदि पूर्व में ये ही सप्त ऋषि हुए थे । अग्नीध्र अग्नि बाहु-सह-सवन-ज्योतिष्मान् छ तिमान्-व्य मेधा-मेधातिथि-वसु ये देश ही स्वायम्भुव मनु के वश के वर्धन करने वाले हुए हैं अर्थात् इन्हीं ने वंश को बढ़ाया था ।४-५। प्रत्येक सर्ग में ये परम पदको प्राप्त हुये थे-यही स्वायम्भुब मं वन्तर का चरित है जो तुमकों बता दिया गया है। अब इसके आगे स्वारोचिष मंतर आता है ।६। स्त्रीरोचिप मनु के देवों के समान वर्चस् वाले चार पुत्र हुए थे। उनके शुभ नाम ये हैं-नभ-नमस्य-प्रकृति और भानु । ये सभी कत्ति की वृद्धि करने वाले थे ।३।।

दत्तोनिश्च्यवनस्तम्ब: प्राणः कश्यप एव च ।। और्वो बृहस्पतिश्चैव सप्तैते ऋषयः स्मृताः ।८ देवाश्च तुषितानामस्मृताः स्वारोचिषेऽन्तरे।

। । रय पुण: हवीन्द्रः सुकृतोमूतरायोज्योतिस्य स्मथः ।। वसिष्ठस्य सुताः सप्तं ये प्रजापतयः स्मृताः । द्वितीयमेतन्कथितं मन्वन्तत्त्मतः परम् । १०

औत्तमोयं प्रवक्ष्यामि तथा अन्दन्तर शुभम् ।। मनुन मौत्तमियं च दशपुत्रानजीजन-!१६ —– ईषऊश्च तर्जुश्च शुचिः शुक्लस्तथैव च ।

। मधुश्च माधव चव नभस्योऽथ नभस्तिथा ।१२ । सहः कनीयान्तेषामुदारः कातिवद्ध नः ।

—-… भादनास्तत्र देवाः स्युरूज: सप्तर्षयः स्मृताः । १३ ई .. कौकुड़िश्च दाल्भ्यश्च शंखः प्रचणः शिवः। – । – सितश्चसस्मितश्चैवसप्ततेयोग वद्धना ।

स्त्रीरोचिप में वन्तर में इत्त, निश्च्यवन रम्व, प्राण, कश्यप, और्व और वृहस्पति ये साल है। सप्तप कहे गये हैं ।६। स्वारोचिष: गंवन्तर में देवता तो तुपिया न म वाले हैं। थे । हुवीन्द्र, राहुत, मूत्त, पिज्योति, अयसमय ये सात चांठ ऋषि के पुत्र ही उस समय में प्रजापति कहे गए हैं। यह दूसा जो स्वादोचिप नाम बाला मंजर

था उसका भी बर्णन कर दिया हैं। इससे आगे तीसरा मंवन्तर का सच | वर्णन करते हैं । इसके समय में औनमि नाम वाले मनु ने दश पुत्रको जन्म ग्रहण कराया था।६-११। उन दो पुत्र के शुभ नाम हैं-६षक ऊर्ज, तर्ज, शुचि, शुक, मधु, माधव, ने , नभा और सह । इनमें कनीयान् जो था वह उदार और कति वर्धन था । । त्तभोय. मंवन्तर में मानना वाले देवगण थे और ऊर्ज पर हुए थे । १२-१३। करैकुसुण्ड, दल्भ्य, शङ्ख, प्रबहा, शिव, सित, सस्मित में ही सात योग की वृद्धि करने वाले थे ।१४। ।

ह क र २१ । । । मन्वन्तरं चतुर्थ तु तामसं नाम विश्वतम् ।।३ । । कवि पृथुस्तथैवाग्निरकपिः कपिरेव । १५} | हुन् ।

मन्वन्तर वर्णन तथैव जल्पधीमानौं मुनयः सप्तनामतः । -१६ साध्या देवगणा यत्र कथितास्तामसेऽन्तरे । १६१ अकल्मषस्तथा धन्वी तपोमूल स्तपोधनः ।। तो रति तपस्यश्च तपोद्म तिपरन्तप । १७ १८ १११ तपो भागी तपो योगो धर्माचाररताः सदा । तामसस्य सुतः सदशवंशविवद्ध नः 1१८३ १ २ : पञ्चमस्य मनोस्तद्वद्र वतस्यान्तरं शृणु । ऐन्द्रबाहुः सुबाहुश्च पर्जन्यः सोमपो मुनिः । १६ ।। हिरण्यरोमा सप्ताश्वः सप्तते ऋषयः स्मृताः ।।: ।। देवाश्चाभतरजसस्तथाप्रकृतय; शुभाः ।२३ । ‘ ‘

‘तीन मवन्तरों का वर्णन किया जा क हैं अब चौथे मंबंन्तर को बतलाया जाता है जिसका तामस नाम प्रसिद्ध हैं । कवि, पृथ,अग्नि अकपि, कपि,अल्प और धीमान् ये ही इन नामों वाले सात मुनिगण और सांध्य नाम वाले देवगण इस तामस भवन्तर में हुए थे ।१५-१६।। तामस मनु के भी दश पुत्र हुए थे जो सभी वंश के वर्धन करने वाले थे । उनके नाम—अकल्मप, धन्बी, तपोमूल, तपोधन, तपोरति, तपस्य तपोधुति, परंतर, तपोभागी, तपोयोगी ये हैं और ये सदा धर्म के आचार में ही रति रखने वाले थे । १७-१८। इसके अनन्तर अब उस प्रकारसे पञ्जय मनु रैवत नाम बालक अन्तर आप लोग श्रवण करिए । इस पाँचवें मंत्रलर में ऐन्द्र बाहु-मुबाहु-पर्जन्य-मुनि-हिरण्य रोमा और सप्ताश्च में सात सतप कहे गए थे । देवता अभूत रजस हुए थे तथा शुभ प्रकृतियाँ थीं ।१६-२०। । । । । ।

. ! अरुणस्तत्वदर्शीचधतिमाहव्यवानकविः ।

। युक्तोनिरुत्सक: सत्वनिमहोऽथप्रकाशकः ॥२१॥ धर्मवीर्यबलोपेता दशैते दैवतात्मजाः । स !! भृगुः सुधामा बिरजाः सहिष्णुर्नाद एव च ।२२ २८

। मत्स्य पुराण विवस्वानतिनमा च षष्ठं सप्तर्षयोऽपरे । चाक्षुषस्यान्तरे देवालेखा नाम परिश्रताः ।२३ त्रभवोऽथ ऋभाद्याश्चवारिमूलादिवौकसः । चाक्षुषस्या तरेप्रोक्तादेवानांपञ्चयोनयः ।२४ रुरुप्रभृतयस्तद्वच्चाक्षुषस्य सुता दश ।। प्रोक्ताः स्वायम्भुवे वंशे ये मयापूर्वमेव तु ।२५ अन्तरं चाक्षुषं चतन्मया ते परिकीत्तितम् । सप्तमं तत्प्रवक्ष्यामि यद् वस्वतमुच्यते ।२६

। अत्रिश्चैव वसिष्सूश्च कश्यपोगौतमस्तथा ।२७ । भरद्वाजस्थायोगी विश्वामित्रः प्रतापवान् ।२८

अरुण-तत्वदर्शी-धृति मान्-हव्यवान-कवि-युक्त-निरुत्सुक-सत्व-निर्मोह प्रकाशक इन नामों वाले धर्म तथा वीर्य बल से समन्वित रैवत मनु के देश पुत्र समुत्पन्न हुए थे । भगु, सुधामा, बिरजा, सहिष्णु नाद विव स्वाम, अतिनाम ये छठवें मंथन्तर में दूसरे सप्तर्षि गण थे । चाक्षुष मं वन्तर में लेखा नाम वाले देवता हुए थे जो पूर्णतया परिश्रुत हैं।२१ २३। चालुप मंवन्तर में देवों की पाँच योनियाँ बतलाई गयीं हैं-ऋभ ऋभाद्य-वारिमूल और दिवौकरन ये उनके नाम हैं ।२४। उसी प्रकार से चाक्षुष मनु के कुछ प्रभृति वंश पुत्र समुत्पन्न हुए थे जिनका वर्णन मैंने स्वायम्भुव के वंश में पहले ही कर दिया है ।२५। इसके अनंतर मैंने यह चाक्षुष मन्वन्तर परिकीतित किया है। अब सातवाँ मन्वन्तर बतलाते हैं जिसको वैवस्वत मन्वन्तर कहा जाता है । इस मन्वन्तर में अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, भरद्वाज तथा प्रतापवान् योगी विश्वा मित्र और जय हानि ये सात इस वर्तमान समय में सात महर्षि हैं । ये | सब धर्म की व्यवस्था करके परम पद को चले जाते हैं ।२६-२८

साध्याविबेच रुद्राश्चम रुतोवसवोऽश्विनौ

आदित्याश्चसुरास्तद्वत्सप्तदेवगणाः स्मृताः ।२६ ७७

 

इक्ष्वाकुप्रमुखाश्चास्य दशपुत्राः स्मृता भुवि मन्वन्तरेषु सर्वेषु सप्त सप्तमहर्षयः ३० कृत्वा धर्मव्यवस्थानं प्रयन्तिपरमम्पदम् सावय॑स्यप्रवक्ष्यामिमनोर्भावितथान्तरम् ॥३१ अश्वत्थामा शरद्वांश्चकौशिकोगालवस्तथा शतानन्दः काश्यपश्चरामश्चऋषयः स्मृताः ॥३२॥ धृतिर्वरीयान् यवसः सुवर्णो वृष्टिरेव चरिष्णुरीड़यः सुमतिर्वसुः शुकश्च वीर्यवान् ।३३।। भविष्पादशसावर्णोर्मनोः पुत्राः प्रकीर्त्तिताः रौच्यादयस्तथान्येऽपिमनवः सम्प्रकीत्तिताः ॥३४॥ रुचेः प्रजापतेः पुत्रो रोच्यो नाम भविष्यति मनुभू तिसुतस्तद्वभौत्योनामभविष्यति ।३५

 

इस मन्वन्तर में साध्य, विश्वेदेवा, कुद्र, मरुद्गण, वसुगण, अश्विनो। कुमार, आदित्य और सर ये उसी भाँति सात देवगण कहे गयें हैं ।२६। इस वें स्वत मनुके इक्ष्वाकु जिनमें प्रमुख थे ऐसे दस पुत्र इस भूमण्डल में बताए गए हैं। इस रीति से सभी मन्वन्तरों में सात-सात हीं महर्षि हुए हैं ।३१। ये सब महर्षि इसीलिए हुआ क्रूरतेहैं कि अपने-३ मन्वन्तर में धर्म की ठीक ब्यवस्था कर देवें । इसके उपरान्त ये सप्तर्षि परम पद को चले जाया करते है । अब भावी मनु सावण्यं का अन्तर भी हम बतला दिये देते हैं । इस भाबी मन्वन्तर में भी उसी भाँति सात मह | षियों का गण होगा । अश्वत्थामा, शरद्वान्, कौशिक, गालव, शतानन्द

कश्यप और राम ये सात ऋषि कहे गए हैं । इभ मनु के भी दश पुत्र हैं। उनके नाम धृति, वरीयान् यवम, मुदण, वृष्टि, चरिष्णु, ईश्य, सुमति, वसु, शुः जो महान् वीर्य वाला है। ये आगे होने वाले सावगि मनु के दस पुत्र होंगे जिनके नाम यहाँ पर कीक्षित कर दिए गए हैं । इनके अतिरिक्त च्य प्रभृति अन्य भी मनु बतलाये गये हैं । इचि • ५५८ }

मत्स्य पुराण नामधारी प्रजापति का पुत्र रौय नाम वाला होगा। इसी प्रकार से भविष्य में भुतिकी पुत्र एक भौत्य नाम वाला भी मनु होगा । ३१-३५

ततस्तु मेरुसाबणब्र ह्मसूनुर्मनुः स्मृतः ऋतश्च मृतधामाचविष्वक्सेनोमनुस्तथा ३६ अतीतानाशश्चते मनवः परिकीतिताः पडूनं युगसाहस्त्रमेभिर्याप्तं नराधिप ।३७ स्वेस्वेऽन्तरे सर्वमिदमुत्पाद्य सचराचरम् कल्पक्षये विनिवृत्त मुच्यन्तेब्रह्मणा सह ।३८ एतेयुगसहस्रान्तेविनश्यन्तिपुनः पुनः ब्रह्माद्याविष्णुसायुज्यंयातायास्यन्ति वैद्विजाः ।३६

इनके पश्चात् ब्रह्मा का पुत्र मेरु सावर्णि अन् बताया गया है । ऋत, ऋतधामा, विकसन भी मनु कहे गये हैं जो सभी आगे समागत समय में ही होंगे । जो मनु जब तक हो चुके हैं वे अतीत मंवन्तर और जो अब यहाँ से आने वाले मनु हैं उन सबको परिकीत्तित कर दिया गया है। नराधिप ! इन मनुओं के द्वारा है कम एक सहस्त्र युगों का समय व्याप्त होता हैं। ये सभी मनु अपने-२ अतरमें इस सम्पूर्ण चरा 1. घर विश्व का समुत्पादन करके नव कल्प का क्षय होता हैं उस समय में कल्प की गि निवृत्ति में ब्रह्मा के साथ ही मुच्यमान हो जाया करते हैं। इसी प्रकार से ये सब एक सन्न युगों के अंत में बारम्वार विनष्ट हो जाया करते हैं । द्विजगण ! ब्रह्मा आदि सभी विष्णु भगवान के सायुज्य में गये हुए चले जायेंगे । ३६-३६।।

6-पृथ्वीदोहन

बहुभिर्धरण भुक्ता भूपालैः श्रूयतेपुरा पार्थिवाः पृथिवीयोगात्पृथिवीकस्य योगतः ।।१।  ७६ (4 किमर्थञ्चकृतासंज्ञाभूमेः किपारिभाषिणी इस है आप गौरितीयञ्चविख्यारासत ! कस्माद्ब्रवीहिनः ।२ ।।

* वंशे स्वायम्भुवस्यासीदङो नाम प्रजापतिः .मृत्यौस्तुदहितातेनपरिणीतासमु खा ।३ के सुनीथा नाम तस्यास्तु बेनो नामसुतः परा। अधर्मनिरतश्चासीबलवान्वसुधाधिपः ।४ मा लोकेऽप्यधर्मकृज्जातः परर्यापहारकः धर्माचारस्य सिद्धयर्थजगनऽथमहषि: ।५।। अनुनीतोऽपि ददावनुज्ञां यदा ततः शापेन मारयित्वैनमराजकभयादिताः ।६ममन्थ अह्मणास्तस्यवदेह मल्मषा = नि ! पितृरशस्य जांशेन धाभिको धम्र्मचारिणः ।७६

महर्षि गण ने कहा- यह सुना जाता है कि पहले बहुत से भुपालों | ने इसे पृथ्वी का भोग किया है। इस बी के नाम से राजाओं को इसका अधिप या भोग करने वाले होने से पार्थिव कहा गया हैं । पृथ्वी का जो यह नाम हुआ हैं दह किसके योग से पड़ा है ?। भूमि की यह संज्ञा (गृथ्वी) सिलिए हुई है और क्या परिभाषण करने वाली है। अर्थात् इससे क्या बतलाया जाता है । इस धरणी का ‘ग’ यह भी नाम कहा जाता है और यह नाम भी परम विख्यात है-यह इनका नाम किस कारण से पड़ा है यह कृपा करके अप इम को बतला दीजिए १।१-३॥ सूत जी ने कहा—वायम्भुव मन के वंश में अङ्ग नाम वाला १ प्रजापति हुआ था। उसने मृत्यु की दुहिता मृदुमुखा से परिणय किया था ।३। उसका सुनी। नाम था और पहिले बेन नाम्न का सुत’ था । यह वैन सर्वदा अधर्म में ही किरत रहा करता था और महान् बलवान् वसुधा का स्वामी था । ४। यह लोक में भी अधर्म के करने वाला हुआ १५ था और यह् पराई भास के अपहरण करने वाला था । जगत् के

[ मत्स्य पुणे धर्माचार की सिद्धि के लिए महर्षियों के द्वारा इसको अनुनीत भी किया गया था तो भी जिस समय में अनुज्ञा नहीं दी तो ऋषिगण में शाप देकर उसके द्वारा इसका हनन कर दिया था और फिर वे अराज कता के भय से अर्दित हो गए थे ।५-६॥ कल्मष से रहित ब्राह्मणों ने बलपूर्वक उसके देह का मंथन किया था । मंथन की हुई उसकी काया से कलेच्नु; जाति वाले लोग निययतित हुए ।७।

शरीरे मातुर शेन कृष्णाजनसमप्रभाः ।। पितुरंशस्य चांशेन धामको धम्र्मचारिणः ॥८ उत्पन्नो दक्षिणाद्धस्तात्स धनुः सशरोगदी। दिव्यतेजोमयवपुः सरत्नकवचाङ्गदः ।६ । पृथोरेवा भवद्यत्नात् ततः पृथुरजायत । में विभिषिक्तोऽपितपः कृत्वा मुदारुणम् । १० विष्णोर्वरेण सर्वस्थ प्रभृत्वमगमत्पुनः ।। निःस्वाध्यायवषट्कारंनिर्धर्म वीक्ष्य भूतलम् ।११ दग्धुमेवोद्यत: कोपाच्छरेणामितविक्रमः ।। ततो गोरूपमास्थाय भूः पलायितुमुद्यता ।१२ पृष्ठतोऽनुगतस्तस्याः पृथुप्तशरासनः ।। ततः स्थित्वैकदेशे तु किं करोमीतिचाब्रवीत् । १३ पृथुरत्यबदद्वाक्यमोसितं देहि सुव्रते ।। | सर्वस्य जगतः शीघ्र स्थावरस्य चरस्य च ।१४ । माता के अश से शरीर में वे कृष्ण अञ्जन के समान प्रभा वाले हुए थे पिता के अश के द्वारा जो धर्मचारी था धार्मिक हुआ था।८।

दाहिने हाथ से धनुष-शर के सहित गदाधारी समुत्पन्न हुआ था उस | समुद्भूत व्यक्ति के शरीर का परम दिव्य तेज था और उसका बह दिव्य तेज पूर्ण शरीर रन अटित कवच और अङ्गदों से विभूषित था ।।६। यह अधिक यत्न से समुत्पन्न हुआ था इसलिए यह पृथ ही हुआ पृथ्वी दोहन । था । विप्नों के द्वारा राज्यासन पर उसका अभिषेक भी किया गया था तो भी वह मुदारुण तप करके भगवान् विष्णु के वरदान में इस समस्त भूमन का प्रभु बन गया था। उसने भूमिपति होकर देखा था कि यह सम्पुर्ण भुतन स्वाध्याय वषट्कार और ध में रहित हो गया है । ।१०-११। उस अपरमित बल वि कुमशाली राजा ने जब भूतल का धर्म शुन्य देखा तो उसे बड़ा भारी क्रोध हो गया था और कोच में शरे के द्वारा उसको दग्ध कर देने को उन्नत हो गया था । जब राजा का इम प्रकार का भीषण क्रोधावेश देखा तो भूमि गौ रूप में समास्थित होकर भय से वहाँ में भोगने को उद्यम हो गयी थी ।।२। दीप्न शरासन वाले महाराज पृथ भी उमी के पीछे-पीछे अनुगमन करने लगे थे। इसके उपरान्त जब उसने देखा था राजा पीछे-पीछे खदेड़ते हुए ही बराबर चले आ रहे हैं तो वह एक स्थान में घबड़ाकर स्थित हो गई थी और राजा से बोली मैं क्या कह ? मुझे अपि हीं बतलायें । १ ३। पृथु में भी। यही कहा थे-हे मुव्रते ! जो भी भबके अभीष्ट पदार्थ हैं उनको तुम दो। स्थावर और चर सम्पूर्ण जगत्का अभीष्ट तुम्हें देना चाहिए।१४

तथैव सा अवमिदं दोह नराधिपः

स्वके पाणौ पृथुवत्सं कृत्वा स्वायम्भुवं मनुम् । १५ ।। तदन्नमभवद्ध प्रजाजीवन्तियेनवै । ततस्तु ऋषिभिदुग्धावत् सः सोमस्तदाभवत् । १६ १,१११ दोग्धाबृहस्पतिरभुत्पात्र वेदस्तपोरसः ।। वेदैश्च बसुधा दुग्धा दोग्धामित्रस्तदा भवत् । १७ इन्द्रोवत् सः समभवत् क्षीरमूर्जस्करं बलम् । देवानां काञ्चनं पात्र पितृणां राजतंतथा ११८ अन्तके,श्चाभावद्दोग्धायमोवत्सःस्वधा रसः ।। अलाबुपात्रंनागानांतक्षकोत्सकोऽभवत् । १६५ विषं क्षीरं ततो दोग्धा धृतराष्ट्रोऽभवत्पुनः । । ८२ ]

| [ मत्स्य पुराण असुरैरपि दुग्धेयमायसे शकपीडिनीम् ।२०। पात्र मायामभूद्वत्सः प्राह्लादिस्तु विरोचनः । | दोग्धाद्विमूर्धा तासीन्मायायेनप्रवत्तता ।२१ हा ।।। भूमि ने उसी भाँति कहा था और उस नराधिप ने दोहन किया

किया था। पृथ ने अपने हाथ मैं स्वायम्भुव मनु को वत्स बनाकर ही दोहन किया था ।१५। बहू अन्न शुद्ध हो गया था जिससे प्रजा जीवित रहा करती है। इसके पश्चात् फिर ऋषियों ने दोहन किया था उस समय में वत्स सोम हुआ था ।१६। फिर दोग्धा वृहस्पति हुए थे और |पात्र तो बैद था तथा तप रम था । घेदों के द्वारा भूमि योग्य हुई थी। उम ममय में दोहन करने वाले मित्र थे ।१७। इन्द्र वत्स बना था और ” उसका जो क्षीर था वह ऊर्जस्कर बल था। देवों का जो पात्र था, वह तो सुवर्णमय अर्थाचे सुवर्ण का था और पितृगण का पात्र राजत अर्थात् | चाँदी का था ।१८। जिस समय मैं अन्तक यमराज ने भूमि का दोहन कियाथा और अन्तक स्वयं दोग्धा बनेथे उस वक्त यम वत्स और स्वधा रस था । नाग का पात्र तो अलाब था और तक्षक वत्स बना था। ।१६। उस समय में विष ही क्षीर था । इसके अनन्तर पुनः धृतराष्ट्र दोग्धा हुए थे । इसका दोहन असुरों के द्वारा भी हुआ था यस पात्र अर्थात् बोर्ड के शुक्रपीडिनी थी दोहन हुआ । पात्र में माया को दुहा था और उस समय में प्रह्लाद विरोचन वत्स हुआ था। वहाँ पर दोग्धा दो मुद्धाओं वाला था जिसने माया को प्रवत्तित किया था ।

यसैश्च वसुधा दुग्धा पुरान्तद्धनमीप्सुभिः ।। कृत्वा वैश्रवणं वत्समामपात्रे महीपते ।२२; १ :: प्र तरक्षगणैदु ग्धा धारा रुधिरमुल्वणम् । रौप्यनामोऽभवद् दोग्धा सुमाली वत्सएव च ।२३. गन्धर्वेश्चपुरादुग्धा बसुधासाप्सराणः । :: ||

पृथ्वी दोहन ] | | ८३ । बत्मचैत्ररथं कृत्वा गन्धात् पद्मदलेतथा २४ पुस ।

दोग्धा वररुचिर्नामनाट्यदेवस्य पारगः । ।१।। गिरिभिर्वसुधा दुग्धा रत्नानि विविधानि च ।२५ो । औषधानि च दिव्यानि दोग्धा मेरुर्महाचलः । वत्सोऽभूद्धिमवांस्तत्र पात्रंशैलमयं पुनः ।२६८ वृक्षैश्च वसुधादुग्धा क्षीरं छिन्नप्ररोहणम् । पालाशपात्रंदोग्धातु शालः पुष्पलताकुलः ॥२७॥

लक्षोऽभवत्ततो वत्सः सर्ववृक्षोधनाधिपः । एवमन्यैश्च बसुधा तदा दुग्धायथेप्सितम् ।२८

पहिले अन्तर्धान की इच्छा रखने वाले यक्षों के द्वारा भी वसुधा दही गयी थी । हे महीपते ! उस समय में सामवेद को पात्र बनाया था तथा वैश्रवण (कुवेर) को बम बनाया गया था ।२२। इस धरा का दोहन प्रत और राक्षस गणोके द्वारा भी किया गया था अति बनबान रुधिठ दुहा गया था । रौप्य नाम दोग्धा हुए थे और मुमाली बत्महुआ था ।२३। पहिले काल में गन्धर्वो ने भी इस वसुधा को दुहा था जो कि अप्सराओं के गणों के साथ मिलकर ही दोहन किया गया था । उन्होंने चैत्र रथ को वत्स बनाया था और पद्मों के पलों में गन्धों को दुहा था ।२४। वररुचि नाम वाला तो वसुधा का दोग्धा हुआ था जो कि बर रुचि नाट्य वेद का पारगामी धुरन्धर विद्वान् था । गिरियों के के द्वारा इस वसुधा का दोहन किया गया था जिसमें विविध भाँति के रत्नों का दोहन हुआ था ।२५। महान् अचल मेम के द्वारा दिव्य औष धियो का दोहन हुआ था । उस दोहन के समय में वन्स हिमालय बन | था और शै लमष हो पात्र था ।२६। वृक्षों ने बमुन्धर का दोहन किया था जिस दोहन में छिन्न हुए वृक्षों को पुनः प्ररीहरण हो जाना क्षीर था । फलश (ढाक) का पात्र था और पुष्प तथा लताओं से समाकीर्ण …शाल वृक्ष दोग्धा अर्थात् दोहन करने वाला था।२६। उस काल में प्लक्ष [ मत्स्य पुराण (पौखर) हौं जो समस्तं वृक्षों का धनाधिप है वत्स हुआ था। इसी रीति से इस बसुधा का उस काल में अन्यों के द्वारा भी यथेच्छ रूप से दोहन किया गया था ।२६।

आयुर्धनानि सौख्यञ्चपृथौं राज्यंप्रशासति दरिद्रस्तदा कश्चिन्नरोगीन पापकृत् ।२६।२।। नोपसर्गभर्यकिञ्चित् पृथुराजनिशासति नित्यंप्रमुदितालोको दुःखशोकविवजिताः ॥३०॥

धनुष्कोट्यांच शैलेन्द्रानुत्सार्थ्यसमहाबलः भुवस्तलंसमञ्चके लोकनांहितकाम्यया ३१

पुरग्रामदुर्गाणि नचायुधधरा नराः ‘: क्षयातिशयदु:खञ्च नार्थशास्त्रस्य चादरः ॥३२

धमैकवासनालोकाः पृथौ राज्यं प्रशासति

कथितानिचपात्राणि यत्क्षीरचमयातव ।३३

येषां यत्र चिस्तत्तदृ यं तेभ्यो विजानता यज्ञश्राद्ध षु सर्वेषु मया तुभ्यं निवेदितम् ।३४ | | दुहितृत्वङ्गता यस्मात् पृथौधर्मवतो मही।

तदानुरागयोगाच्च पृथिवीं विश्नता बुधैः ॥३५

जिस समय में यहाँ पर भू-मण्डल में महाराज पृथु राज्य का प्रशासन कर रहे थे उस वक्त यहाँ आयु सौख्य और धन सभी कुछ था उस काल में यहाँ पर कोई भी दीन दरिद्र नहीं था और न कोई रंग से ही समाक्रान्त व्यक्ति था और न कोई भी पाप कर्मों के ही करने वाला था ।२६। पृथु राजा के शासन काल में किसी भी प्रकार के उपसर्ग |’ का भय किसी को भी नहीं था । सभी लोग नित्य ही परम प्रमुदित थे और सभी लोग दुःख तथा शोक से रहित थे ।३०। उस महान् बल – शाली राजा ने अपने धनुष की कोटि के द्वारा बड़े-बड़े विशाल समुच्च शैलों को उत्सारित करके इस तल को समतल कर दिया था तथा आदित्याख्यान..]

[६५ ऊबड़ खाबड़पन हटाकर लोकों के हित के सम्पादन की कामना से. परम सुन्दर इसको बना दिया था।३१। उस राजा के शासन काल में नगर और ग्रामों में कोई भी सुरक्षा सम्पादनार्थ दुर्म आदि की आवश्यकता ही नहीं थी । और कोई भी मनुष्य आयुधों को धारण करने वाले भी नहीं थे क्योंकि अस्त्रायुधों की कोई आवश्यकता ही नहीं रहीथी. क्षय के अतिशय होने का दुःख लेशमात्र भी नहीं था था तथा अर्थशास्त्रका कुछ भी समादर उस समय में नहीं रह गया था।३२। राजा पृथु महा राज के द्वारा प्रशासन की बागडोर हाथ से ग्रहण करने पर सभी लोग एक मात्र धर्म की वासना रखने वाले हो गये थे। हमने दोहन के पात्र और क्षीर सब बतबा दिए हैं।३३। जिनको जहाँपर इचिथी वहीं विशेष ज्ञान रखने वाले पुरुष को उनको देना चाहिए । यज्ञ में और श्राद्धों में सबमें कृत्रि के अनुसार ही दान करना चाहिए यह हमने तुमको बतला. दिया है ।३४। क्योंकि राजा पृथु के होने पर यहू धर्मवती पृथ्वी उसकी दुहिता के स्वरूप बाली हो गई थी। यह उसमें एक विशेष अनुराग का ही योग था इसी कारण से पृथु के ही नाम से इस बसुधा का नाम भी लोक में पृथ्वी यह विश्रुत हो गया था। जिसे बुध लोग कहा करते हैं । ३५

 

१०आदित्याख्यान * आदित्पवंशमखिलं वद सूत ! यथाक्रमम् सोमवंशच तत्वज्ञ ! यथावद्वक्तुमर्हसि ॥१ विवस्वान् कश्यपात् पुर्वमदित्यामभवत्तः तस्यपत्नीक्यं तद्वत्संज्ञाराज्ञी प्रभा तथा ।२। रेवतस्य सुता राज्ञी रेवतं सुषुवे सुतम् प्रभा प्रभात सुषुवे त्वाष्ट्रीसंज्ञा तथा मम् ॥३

मत्स्य पुराण यमश्च यमुना चैव यमलो तु बभवतुः ततस्तेजोमयं रूपम महन्ती विवस्वतः ।४। नारी मुत्पादयामास स्वशरीरादनिन्दिताम्

वाप्ट्रीस्वरूपेणनाम्ना छायेतिभामिनीतदा ।५। किङ्करोमीति पुरतः स्थितां तामभ्यभाषत ।। छाये ! त्वं भज भरमस्मदीयं वरानने ! १६ अपत्यानि मदीयानि मातृस्नेहेन पालय ।। तथेत्युक्ती तु सा देवमगमत् क्वापि सुत्रता

 

ऋषियों ने पूछा- गून जी ! मयं का सम्पूर्ण वश अप *मारे समिने वर्णन कीजिए जो कि सब के मपर्व हो । हे तत्वों के पूर्ण ज्ञाना विद्वान् ! इसी भाँनि चाँदीवंश का भी यथावन् वर्णन करने के लिए अपि परम योग्य हैं ।१ । महा मनोन्द्र सूतजी ने कहा- सबसे पूर्व में कश्यप महर्षि से अदिति नाम धारिणी पत्नी के उदर से विवस्वान् सुन ही स मुत्पन्न हुआ था। उग विवस्वानु (सूर्य की तीन पत्नियाँ थीं और उनके नाम संज्ञा-रानी और प्रभा थे ।३। राज्ञी रैवत की पुत्री थी। और उसने रैवत मुत को जन्म दिया था। प्रभा नाम वालों ने प्रभात को प्रसूत किया था तथा स्वाष्ट्री संज्ञा ने मनु को समुत्पन्न किया था ।३। यम ने यमुना समुदभूत की थी। ये अग्रत हुए थे । यह विवस्वान के उस तेजोमय स्वरूप को सहन करने वाली नहीं थी ।४। उसने अपने शरीर से एक अनिन्दित नारी को समुत्पादित किया था। उस समय में यह भामिनी स्वरूप से वाष्ट्री और नाम से छाया थी ।५। ‘मैं इस समय में क्या करू’—यह कहने वाली जन सामने वह स्थित हुई तो उससे कहा था- हे छाये! हे वर आनन वाली ! तुम हमारे ही स्वामी का भजन करो ।५-६॥ जो मेरी सन्तति हो उसे आप माता के समान स्नेह के द्वारा ही पालन करो । ‘तथास्थ’ अर्थात् ऐमा ही होगा— | यह कह कर बने सुबता कहीं पर देव के समीप में पहुँच गई थी।७।।

आदित्याख्यान |

कामयामास देबोंऽपि संयमितिचादरांत । – — : जनयामास तस्यांतु पुत्रञ्च मनुरूपिणम् । सवर्णत्वाच्च सावणिर्मनोर्वैवस्वतस्य च । । । । । ततः शनिञ्च तपतीं विष्टि चैव क्रमेण तु ।६।। यायां जनयामास संज्ञ यमिति भास्करः ।। छाया स्वपुत्रेऽभ्यधिक स्नेहं चक्र मनौ तथा । १० पूर्वो मनुस्तु चक्षाभ न यमः क्रोध मूच्छितः । सन्तर्जयामासतदा पदमुद्यम्य दक्षिणम् । ११ शशाप च यमं छाया सक्षतः कृमिसंयुतः । पादोऽयमेको भविता पूयशोणितविस्रवः । १२ निवेदयामास पितुर्धर्मः शापादमषितः । । निष्कारणमह शप्तोमात्रा देव ! सकोपया ।१३ ….. वालभावान् मया किञ्चदुद्यतश्चरण: सकृन्। .: मनुना वार्यमाणाधि मम शापंमदाद्विभो ।१४

यह देवी भी यह संज्ञा है-इसी आदर से उसको चाहने लगे थे । उसमें उन्होंने मनुरूपी पुत्र को जन्म ग्रह्ण कराया था. 15। वैवस्वत | मनु के सवर्ण होने से वह सावण हुआ था। इसके पश्चात् क्रम से शनितपती और विष्टि को समुत्पन्न किया ।६। भगवान भास्कर ने यह संज्ञा दी है यह समझकर छाया में ही समुत्पन्न किए थे । छाया अपने पुत्र मनु में विशेष अधिक स्नेह किया करती थी ।१०। पूर्व मनु ने तो । देखा नहीं था किन्तु यम तो क्रोध से अत्यधिक मूच्छित हो गया था। उस समय में उसने अपनी दाहिनी लात उठाकर भली-भाँति उसको इाट फटकार दी थी ।११। तब तो छाया ने यम को शाप ही दे दिया था कि यह तेरा एक पैर जिसको तुने उठाकर मारनेकी धमकी दी थी। कृमियों से युक्त क्षत वाला और मवाद तथा रक्त में बिस्रव हो जायगा ।१२। इस शाप से अमषत होकर धर्म ने पिता से निवेदन किया था।

मन्स्य पुराण है देव ! मू में बिना ही किसी विशेष कारण के माता ने शाप दे दिया हैं वह मुझ पर अत्यन्त ही कुपित हो गई है ।१३। बल के अभाव होने के ही कारण से मैंने एक ही बार अपना चरण अवश्य ही कुछ उद्यत किया था । हे विभो ! मन के द्वारा उसे निवारत भी किया गया था तो भी मुझे माता ने शाप देहीं दिया है ।१४।।

प्रायोन माता सास्माक शार्पनाह यतो इतः देवोऽध्यायम भूलः किङ्करोमि महामते १५ मौख्यकस्यनदुःखंस्यादथबाकर्मसन्ततः अनिवार्याभवस्यापिकाकथान्येषुजन्तुषु १६ कुकवाकुर्मया दत्तो यः कृमीन भक्षयिष्यति

लेदच रुधिररचैव वत्सायमपनेष्ययि १७ एवमुक्तस्तपस्तेपे यमस्तीव्र महायशाः गोकर्णतीर्थ वैराग्यात् फलपत्रानिलाशनः १८

आराधयन् महादेव यावर्षायुतायुतम् वरं प्रादान महादेवः सन्तुष्टः शूलभृत्तदा ।१६ वव्रसलोकपालत्वं पितृलोकेनृपालयम् धर्माधम्मधर्मात्मकस्यापि जगतस्तुपरीक्षणम् ।२०

एव से लोकपालत्वमगमच्छूलपाणिनः पितृणाझ्चधिपत्यञ्च धम्मधि मर्मस्य चानघ ।२१

प्राय: यह हमारी माता शाप के द्वारा मुझे कभी हत नहीं किया करती थी इसीलिए बड़ा दुःख है । उस समय देव ने भी फिर यम से कहा था-हे महामते ! बताओ, अब मैं इसमें क्या करू ।१५।। मूर्खता के कारण किसको दुःन्त्र नहीं होता है अर्थात् सभी में खंता वश दुःखित हुआ ही करते हैं । अथवा यह कर्मों की सन्तति ऐसी अनिवार्य होतीहैं जो भी जैसा कम करता है उसे उसका फल अवश्यही भोगना ही पड़ता है। यह तो मुझन् भगवान् भव को भी भोगनी पड़ती हैं।

 

Matsya Puran

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