Brahma Puran

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* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

सूर्यकी महिमा तथा अदितिके गर्भसे उनके अवतारका वर्णन ब्रह्माजी कहते हैं-भगवान् सूर्य सबके आत्मा, ! प्रकार यहाँ एक ही सूर्यके चौबीस नाम बताये सम्पूर्ण लोककै ईश्वर, देवताओंके भी देवता और गये हैं। इनके अतिरिक्त और भी हजारों नाम प्रजापति हैं। वे ही तीनों लोकोंकी जड़ हैं, परम | विस्तारपूर्वक कहे गये हैं। देवता हैं। अग्निमें विधिपूर्वक आली हुई आहुति | मुनियोंने पूअ-प्रजापते ! जो एक हजार नामक सूर्यके पास हीं पहुँचती हैं। सूर्यसे वृष्टिं होतीं, द्वारा भगवान् सूर्यकी स्तुति करते हैं, उन्हें क्या पुण्य वृष्टि से अन्न पैदा होता और अन्नसे प्रज्ञा जीवन- | होता है? तथा उनकी कैसी गति होती है? निर्वाह करती हैं। क्षण, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, ब्रह्माजी बोले—मुनिवरो। मैं भगवान् सूर्यका मास, संवत्सर, ऋतु और युग-इनकी काल-कल्याणमय सनातन स्तोत्र कहता हैं, जो सब संख्या सूर्यके बिना नहीं हो सकती । कालका ज्ञान स्तुतियोंका सारभूत है। इसका पाठ करनेवालेको हुए बिना न कोई नियम चल सकता हैं और न सहस्र नामको आवश्यकता नहीं रह जाती। अग्निहोत्र आदि हीं हो सकते हैं। सूर्यके बिना भगवान् भास्करके जो पवित्र, शुभ एवं गोपनीय ऋतका विभाग भी नहीं होगा और उसके बिना नाम हैं, उन्हींका वर्णन करता हैं सुनो। विकर्तन, वृक्षोंमें फल और फूल कैसे लग सकते हैं? खेती | विवस्वान्, मार्तण्ड, भास्कर, रवि, लोकप्रकाशक, कैसे पक सकती है और नाना प्रकारके अन्न कैसे श्रीमान्, लोकचक्षु, महेश्वर, लोकसाक्षी, त्रिलोकेश, उत्पन्न हो सकते हैं। उस दशामें स्वर्गलोक तथा कर्ता, हुर्ता, तमिलहा, तपन, तापन, शुचि, समाश्चाहन, भूलोकमें जीके व्यवहारको भी लॉप हो जायगा। गभस्तिहस्त, ब्रह्मा और सर्वबनमस्कृत-इस प्रकार आदित्य, सविता, सूर्य, मिरि, अर्क, प्रभाकर, इक्कीस नामका यह स्तोत्र भगवान् सूर्यको सदा मार्तण्ड, भास्कर, भानु, चित्रभानु, दिवाकर तथा प्रिय है। यह शरीरको नीरोग बनानेवाला, धनक रवि-इन बारह सामान्य नामोंके द्वारा भगवान् वृद्धि करनेवाला और यश फैलानेवाला स्तोत्रराज सूर्यका ही बोध होता है। विष्णु, धाता, भग, पूषा, हैं। इसकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हैं। द्विजवरो! मित्र, इन्द्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, अंशुमान्, जो सूर्य उदय और अस्तकालमें दोनों संध्याक चना तथा पर्जन्य-ये बारह सूर्य पृथक-पृथक् समय इस स्तोत्रके द्वारा भगवान् सूर्यको स्तुति माने गये हैं। चैत्र मासमें विष्ण, वैशाखमें अर्यमा, करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। ज्येष्ठमें विवस्वान्, आषाढ़में अंशुमान्, श्रावणमैं| भगवान् सूर्यके समीप एक बार भी इसका जप पर्जन्य, भादों में वरुण, आश्विनमें इन्द्र, कार्तिकमें करनेसे मानसिक, याचिक, शारीरिक तथा कर्मजनित धाता, गह्नमें मित्र, पौषमें पूषा, माघमैं भग सब पाप नष्ट हो जाते हैं। अतः ब्राह्मणो! आप और फाल्गुनमें त्वष्टा नामक सूर्य तपते हैं। इस लोग यत्नपूर्वक सम्पूर्ण अभिलषित फलक देनेवाले

* विकर्तनों विवस्वांश्च मार्तण्डों भास्करों रविः। लोकप्रकाशकः श्रीमल्लोकचक्षुर्महेश्वरः॥

लोकसाक्षीं त्रिलोकशः कर्ता हर्ता तमिस्रा तपनस्तापनचैव शुचिः समाश्ववाहन: गभस्तिहस्तों ब्रह्मा सर्वयनमस्कृत: एकविंशतिरित्येय साय इष्टः सदा वै:

(३१ ३१=३३)

 

* सूर्यकी महिमा तथा दितिके गर्भसे उनके अवतारको वर्णन के

भगवान् सूर्यका इस स्तोत्रके द्वारा स्तवन करें।। करके कठोर नियमका पालन करती हुई एकाग्रचित्त मुनियोंने पूछा- भगवन्! आपने भगवान् सूर्यको | हो आकाशमें स्थित तेजौराशि भगवान् भास्करका निर्गुण एवं सनातन देवता बतलाया है; फिर स्तवन करने लगी। आपके ही मुँह से हमने यह भी सुना है कि वे अदिति बोली-भगवन्! आप अत्यन्त सूक्ष्म, बारह स्वरूपोंमें प्रकट हुए। वे तेजकी राशि और परम पवित्र और अनुपम तेज धारण करते हैं। महान् तेजस्वी होकर किसी स्त्रीकै गर्भमैं कैसे तेजस्वियोंके ईश्वर, तेजकै आधार तथा सनातन प्रकट हुए, इस विषयमें हमें बड़ा संदेह है। | देवता हैं। आपको नमस्कार हैं। गोपते ! जगत्को ब्रह्माजी बोले-प्रजापति दक्षके साठ कन्याएँ । उपकार करनेके लिये मैं आपकी स्तुति-आपसे इई ज्ञ श्रेष्ठ और सुन्दरीं । उनके नाम अदिति, | प्रार्थना करती हैं। प्रचण्ड रूप धारण करते दिति, दुनु और विनता आदि थे। इनमें तेरह | समय आपकी जैसी आकृति होती है, उसको मैं कन्याओंका विवाह इझने कश्यपज्ञीसे किया था। प्रणाम करती हैं। क्रमश: आठ मासतक पृथ्वीके अदितिने तीनों लोकोंके स्वामी देवताओंको जन्म जलरूप रसको ग्रहण करनेके लिये आप जिस दिया। दितिसे दैत्य और इनसे बलाभिमानी अत्यन्त तीव्र रूपको धारण करते हैं, उसे मैं भयंकर दानव उत्पन्न हुए। विनता आदि अन्य प्रणाम करती हैं। आपका वह स्वरूप अग्नि और स्त्रियोंने भी स्थावर-जङ्गम भूतको जन्म दिया। सौमसे संयुक्त होता है। आप गुणात्माको नमस्कार इन दक्षसुताओंके पुत्र, पौत्र और दौहित्र आदिके हैं। विभावसो! आपका जो रूप ऋक्, यजुर् द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया। कश्यपके और सामकी एकतासे त्रयसंज्ञक इस विश्वके पुत्रोंमें दैववा प्रधान हैं, वें सात्विक है; इनके | रूपमें तपता हैं उसको नमस्कार हैं। सनातन! अतिरिक्त दैत्य आदि जस और तामस हैं। उससे भी परे ज्ञ ‘ॐ’ नामसे प्रतिपादित स्थूल देवताओंको यज्ञका भागी बनाया गया हैं। परंतु एवं सूक्ष्मरूप निर्मल स्वरूप है, उसको मेरा दैत्य और दानव उनसे शत्रुता रखते थे, अतः वे प्रणाम हैं।” मिलकर उन्हें कष्ट पहुँचाने लगे। माता अदितिने ब्रह्माजी कहते हैं-इस प्रकार बहुत दिनोंतक देखा, दैत्यों और दानवने मैरै पुत्रको अपने आराधना करनेपर भगवान् सूर्यने दक्षकन्या अदितिको स्थानसे हटा दिया और सारी त्रिलोकी नष्टप्राय | अपने तेजोमय स्वरुपका प्रत्यक्ष दर्शन कराया। कर दी। तब उन्होंने भगवान सूर्यकी आराधनाके अदिति बोलीं-जगतुके आदि कारण भगवान् लिये महान् प्रयत्न किया। वे नियमित आहार | सूर्य ! आप मुझपर प्रसन्न हों। गोपते ! मैं आपको

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