अथर्ववेद संहिता

0
238
अथर्ववेद संहिता

अथर्ववेदसंहिता

॥अथ प्रथमं काण्डम्

 [मेधाजनन सूक्त ]

|| ऋषिअथर्वा देवतावाचस्पति छन्दअनुष्टुप् . चतुष्पदा विराट् उरोबृहतीं ]

इस सूक्त के देवता वाचस्पति हैं वाक्ज्ञक्त में अभिव्यक्ति होती है। पात्र में तो अव्यप में सभी कुछ सपति रना ही है कि वह अव्यक्त को अभिव्यक्त करता है, तो उसे वाचस्पति कहना मुक्तसंगत है ।जिसने इस विश्व को व्यक्तप्रकट किया, उसी से किसी विशिष्ट उपलब्धि के लिए प्रार्चना किया जाना उचित है

 

. ये त्रिषप्ता: परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभतः

वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु में ॥१॥

 

ये जो त्रिसप्त (तीन एवं सात के संयोगी विश्व के सभी रूपों को धारण करके सब ओर संव्याप्त-गतिशील हैं, हे वाचस्पते ! आप उनके शरीरस्य बल को आज हमें प्रदान करें ॥ १ ॥ | | त्रिसप्तका अई अधिकांश भाष्यकारों ने = २६ किया है, किंतु ऋषि का भाव इससे कहीं अधिक व्यापक तीत होता है। गणित के अनुसार निमण की अभिव्यनि इतने कार में हो सकती हैं + 2 = 1, ४७ = , ७ ३४३.३ ३६ तथा L ३१॥ ६४ x ) = १५१२० आदि। फिर अपने विसन को एक ही शब्द के काम में लिखा है, इसलिए उसका भाव यह क्या है कि बसने ची हिंमत है…. 1 आधार पर विधासृष्टि में तीन लॉक, नीन गुण, जॉ याम देिव आदि सभी आते हैं। इळे साच्च आताण, संजयतु स्याहय परमाण के मत माटो आदि जाते हैं। इनमें से सभी के योगभेदपमन नन बने हैं। उन्हें केवल प्रकटकन वापत हो भनी प्रकार जानते हैं। हमें विश्न में रहते हुए सभी के साथ समुचित बर्ताव करना होगा, इसलिए वाचस्पति से प्रार्थना की गई है कि उन केकसूक्ष्म संयोगों के इस इवे पी प्रदान करें।

 

. पुनरेहि वाचस्पते देवेन मनसा सह

वसोध्यते नि रमस मेरयेवास्तु मयि श्रुतम् ॥२॥

 

| ३ गते ! आप दिघकाशित) ज्ञान से युक्त होकर, बारम्बार हमारे सम्मुख आएँ हे वसष्पते ! आर्य हमें प्रति १३ । प्राप्त ज्ञान हममें स्थिर रहे ।।३।।

यहाँ वाचम्पत | अपश्यक्त करने वाले से प्राप्त की तवा मोपत (आवास दान करने वाले) से प्राप्त को घाणस्थिर करने की प्रार्थना की गई है। योग एवं वेप दोनों ही साधेऐसी प्रार्थना है।

 

. इहैवाभि वि तनूमें आर्मी इव ज्यया।

वाचस्पतिर्न यच्छतु मय्येवास्तु मयि श्रुतम् ॥३॥

 

हैं देव ! धनुष की चढ़ी हुई प्रत्यञ्चा से खिंचे हुए दोनों छोरों के समान दैयों ज्ञान धारण करने में समर्थ, मेथा बुद्धि एवं वांछित साधन-साम आप हमें प्रदान करें । प्राप्त बुद्धि और वैभव हममें पूरी तरह स्थिर रहें ॥३॥

| ज्ञान की प्राप्ति और धारण काने की सामर्थ्य यह क्षमताएँ घमुष के दो सिरों की तरह हैं। एक साधण्यापूर्वक बस गाकर बाण की तरह, ज्ञान का वा प्रयोग किया जा सकता है।

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here